जूता पचीसी

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कई बार मज़ाक मे लिखी गयी दो चार पंक्तियाँ   अपना कुनबा  गढ़ लेती है… ऐसा ही हुआ इस जूता पचीसी के पीछे… फेसबुक पर मज़ाक मे लिखी गयी कुछ पंक्तियों पर रजनीकान्त जी ने टिप्पणी की कि इसे जूता बत्तीसी तक तो पहुँचाते… बस बैठे बैठे बत्तीसी तो नहीं पचीसी अपने आप उतर आई… अब आ गयी है तो आपको परोसना भी पड़ रहा है… कृपया इसे हास्य व्यंग्य के रूप मे ही लेंगे ऐसी आशा करता हूँ।

जूता मारा तान के लेगई पवन उड़ाय
जूते की इज्ज़त बची प्रभु जी सदा सहाय ।1।
 
साईं इतना दीजिये दो जूते ले आँय
मारहुं भ्रष्टाचारियन जी की जलन मिटाँय   ।2।
 
जूता लेके फिर रही जनता चारिहुं ओर
जित देखा तित पीटिया भ्रष्टाचारी चोर ।3।
 
कबिरा कर जूता गह्यो छोड़ कमण्डल आज
मर्ज हुआ नासूर अब करना पड़े इलाज ।4।
 
रहिमन जूता राखिए कांखन बगल दबाय
ना जाने किस भेस मे भ्रष्टाचारी मिल जाय ।5।
 
बेईमान मचा रहे चारिहुं दिसि अंधेर
गंजी कर दो खोपड़ी जूतहिं जूता फेर ।6।
 
कह रहीम जो भ्रष्ट है, रिश्वत निस दिन खाय
एक दिन जूता मारिए जनम जनम तरि जाय ।7।
 
भ्रष्टाचारी, रिश्वती, बे-ईमानी,   चोर
खल, कामी, कुल घातकी सारे जूताखोर ।8।
 
माया से मन ना भरे, झरे न नैनन नीर
ऐसे कुटिल कलंक को जुतियाओ गम्भीर ।9।
 
ना गण्डा ताबीज़ कुछ कोई दवा न और
जूता मारे सुधरते भ्रष्टाचारी चोर  10।
 
जूता सिर ते मारिए उतरे जी तक पीर
देखन मे छोटे लगें घाव करें गम्भीर ।11।
 
भ्रष्ट व्यवस्था मे चले और न कोई दाँव
अस्त्र शस्त्र सब छाँड़ि के जूता रखिए पाँव ।12।
 
रिश्वत खोरों ने किया जनता को बेहाल
जनता जूता ले चढ़ी, लाल  कर दिया गाल  ।13।
 
रहिमन काली कामरी, चढ़े न दूजो रंग
पर जूते की तासीर से  भ्रष्टाचारी दंग  ।14।
 
थप्पड़ से चप्पल भली, जूता चप्पल माँहिं
जूता वहि सर्वोत्तम जेहिं भ्रष्टाचारी खाहिं  ।15।
 
रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि
जहाँ काम जूता करे कहाँ  तीर तरवारि ।16।
 
जूता मारे भ्रष्ट को, एकहि काम नासाय
जूत परत पल भर लगे, जग प्रसिद्ध होइ जाय ।17।
 
भ्रष्ट व्यवस्था मे कभी मिले न जब अधिकार
एक प्रभावी मन्त्र है, जय जूतम-पैजार ।18।
 
जूता जू ताकत  फिरें  भ्रष्टाचारी चोर
जूते की ताकत तले अब आएगी भोर ।19।
 
रिश्वत दे दे जग मुआ, मुआ न भ्रष्टाचार
अब जुतियाने का मिले जनता को अधिकार ।20।
 
एक गिनो तब जाय के जब सौ जूता हो जाय
भ्रष्टाचार मिटे तभी जब बलभर जूता खाय।21।
 
दोहरे जूते के सदा  दोहरे होते  काम
हाथों का ये शस्त्र है पैरों का आराम ।22।
 
पनही, जूता, पादुका, पदावरण, पदत्राण
भ्रष्टाचारी भागते नाम सुनत तजि प्राण ।23।
 
जूते की महिमा परम, जो समझे विद्वान
बेईमानी के लिए जूता-कर्म निदान ।24।
 
बेईमानी से दुखी रिश्वत से हलकान
जूत पचीसी जो पढ़े, बने वीर बलवान ।25।

कबिरा कर जूता गह्यो …

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सविनय अर्ज़ है -

रहिमन जूता राखिए, बिन जूता सब सून
बिन जूता होने लगे, भ्रष्टाचारी दून

जूता मारा तान के, लेगई पवन उड़ाय
जूते की इज्ज़त बची, प्रभु जी सदा सहाय

साईं इतना दीजिये, दो जूते ले आँय
मारूँ भ्रष्टाचारियन, जी की जलन मिटाँय

जूता लेके फिर रही, जनता चारिहुं ओर
जित देखा तित पीटिया, भ्रष्टाचारी चोर

कबिरा कर जूता गह्यो, छोड़ कमण्डल आज
मर्ज हुआ नासूर अब, करना पड़े इलाज

रहिमन जूता राखिए, कांखन बगल दबाय
ना जाने किस भेस मे, भ्रष्टाचारी मिल जाय

(अ)निर्मल हास्य ….. पद्म सिंह

बम्बा लगता साँप …

सर सर चलती हवा रात दिन तन उठता है काँप

जाड़े मे है कठिन नहाना बम्बा लगता साँप….

BATH-HATER-17सर्दियाँ अपने चरम पर हैं। ऐसे मे लिहाफ मे घुस कर फेसबुक और ब्लाग पर राष्ट्र हित की लड़ाई  लड़ते समय पत्नियाँ कभी भी विषय और समय की गंभीरता को नहीं समझ पाती हैं, और आठ बजते बजते संसद (धोती/गृह मंत्रालय) की सर्वोच्चता का हवाला देते हुए नहाने का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर देती हैं। ऐसे मे फेसबुकीय बालाओं के सुप्रभात और शुभकामना संदेशों से आनंदित “पुलकावली सरीर”  भय से काँप उठता है। ऐसे मे “चुनी हुई” प्रतिनिधि का हम “छंटे हुए” लोग कुछ भी नहीं कर पाते और जबरन हमें शरद-शत्रु बम्बा-सर्प के सानिध्य मे धर दिया जाता है। अब इन्हें कौन बताए कि नहाते तो गंदे लोग हैं… वैसे ही …जैसे पुण्य वो करते हैं जो अपने पाप से डरते हैं … यहाँ तो मन चंगा और कठौती मे गंगा… लेकिन कठौती का जल भी कितना कीमती है !!!…. जल ही जीवन है और जीवन की रक्षा करना जीव मात्र का स्वभाव और कर्तव्य है।

ANIMAL IN A BATH 1जल के महत्व के कारण ही दुनिया की तमाम सभ्यताओं को नदियों और समुद्रों के जल ने पाला पोसा… परन्तु  मनुष्य  ने कृतघ्नता की सीमा तोड़ते हुए हुए नहाने की आदत डाल ली… और सबसे ज़्यादा जल बर्बाद करने वाला जीव बन गया।   जहां सरकार से लेकर तमाम स्वयं सेवी संस्थाएं जल बचाने की अपील करते नहीं थक रही हैं, वहीं  मनुष्य अपने जीवन मे लाखों लीटर शुद्ध जल केवल नहाने  पर खर्च कर देता है।  इसके लिए सबसे अधिक भारत जैसे विकासशील देश जिम्मेदार हैं, जहाँ आज भी दक़ियानूसी (Old fashioned) लोग रोज़ नहाने जैसी रूढ़िवादी परम्परा के वाहक हैं। कुछ लोग आधुनिक कहलाने के चक्कर मे यूँ तो अंग्रेजों की छोड़ी हुई चड्डी तक को अपना खानदानी झण्डा बनाने मे गर्व महसूस करते हैं, परंतु उनका हफ्तों न नहाने का मूलमंत्र आज तक नहीं  अपना पाये । समझ मे नहीं आता ऐसे लोग कब और कैसे विकसित होंगे।

मॉल और मल्टीस्टोर्स संस्कृति के ज़माने मे रोज़ नहाने वाले देश को लाखों रूपये के राजस्व और टैक्स का चूना लगा रहे हैं। रोज़ नहाने से जहाँ डियोडरेंट बनाने वाली कंपनियाँ निरंतर घाटे मे जा रही हैं वहीं टिश्यू पेपर,हेयर जेल, फेस वाश,  क्रीम और पाउडर की बाज़ार ठंडी पड़ी हुई है। खैर मनाइए आज के कुछ विकासवादी आधुनिक युवाओं का, जिन्होंने जल बचाने के लिए कौवा-स्नान जैसे आधुनिक तरीके विकसित कर लिए हैं  जिसके अंतर्गत  चारों पंजे और  गर्दन से ऊपर का हिस्सा जो आम जनता के दर्शनार्थ खुले होते है, को  जलाचमन अथवा के द्वारा शुद्ध करने  का प्रावधान है।

अपने आप को धार्मिक और मार्मिक मानने वाले भी समझ लें कि रोज़ नहाने वालों को सीधे सीधे जीवहत्या का पाप लगता है। नहाने वाले कभी सूक्ष्मदर्शी लेकर तो नहाते नहीं, उन्हें क्या पता कि उसके एक बार नहाने से लाखों निरीह जंतुओं की बस्तियाँ एक लोटे सुनामी  से ही तबाह हो जाती हैं। अकारण ही वे त्वचारोमों के अभयारण्य मे विचरण करते हुए और रोम कूपों के रक्त से अपनी पिपासा शांत करते जंतुओं की हत्या के  भागी बनतेहैं। इस जघन्य समूहिक संहार के  हम  “सः नाववतु सः नौ भुनक्तु” की अवधारणा को भी बिसरा देते हैं, और  ‘अपने ही खून’ की हत्या कर बैठते हैं।

एक बार नहाने से  औसतन बीस लीटर बहुमूल्य जल की क्षति होती है। और सर्दियों मे तो नहाने का खर्च ही बहुत  है । पानी गरम करने की मशीन, गरम करने के लिए बिजली का खर्च,  और नहाने से हुए सर्दी बुखार के लिए डाक्टर का खर्च, सब मिला कर नहाना एक घाटे के सौदे के सिवा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त साबुन, शैम्पू, कंडीशनर, कलोन, जैसे फालतू खर्च अलग। इन्हीं समस्याओं को ध्यान मे रखते हुए पण्डितों  ने आचमन की अवधारणा को जन्म दिया। बस आचमनी मे जल लीजिये और मन्त्र बोलिए “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु “…… और सिर के ऊपर छिड़क लीजिये। जब एक आचमनी मे सातों नदियों का स्नान संभव है तो शरीर को खामखा कष्ट क्यों देना।

यूं भी अनुभवी लोगों ने केवल तीन स्नान ही महत्वपूर्ण बताए गए हैं, जन्म के समय, विवाह के समय और अंतिम स्नान… फिर बीच मे नहा कर उनके अनुभवों का महत्व कम क्यों करना। अगर ज़्यादा ही इच्छा हो तो मकरसंक्रान्ति का स्नान  अपवाद स्वरूप लिया जा सकता है। फिर भी कुछ लोग रूढ़िवादी होते हैं और गाहे-बगाहे स्नान करने का दुस्साहस कर बैठते हैं, क्योंकि उन्हें स्नान के सही समय का पता नहीं होता।  फिर भी लकीर के फकीरों के लिए स्नान करने के समय का पता करने का एक आसान सा तरीका  ज्ञानियों ने और बताया है…जब खुजाने की दिशा  होरीजेंटल से बदल कर  वरटिकल हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि अब वह उचित समय आ गया है।

funny-kitten-500x466-customवर्षों से भारत देश की विडम्बना रही है कि तमाम ज्ञानी अपने ज्ञान को बिना किसी को बांटे चले गए… इसी लिए …यह लेख मैंने उन पीड़ित पुरुषों के लिए लिख दिया जो गृह मंत्रालय की ज़्यादतियों के शिकार हैं, ताकि सनद रहे …. और वक्त पर काम आए….अगर कोई भीगी बिल्ली बने रहना  नहीं चाहता ….तो इस लेख को हृदयंगम कर ले,… गृह मंत्रालय तक पहुँचा दे ….अन्यथा बना रहे लकीर का फकीर, रूढ़िवादी, पिछड़ी सोच का।

निर्मल हास्य…

फोटो- गूगल से साभार

जनमानस स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार

 

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जनता सड़कों पर खड़ी मांग रही कानून
मनमानी सरकार की बना नहीं मजमून
भय है भ्रष्टाचार पर लग ना जाय नकेल
भ्रष्टाचारी       खेलते     उल्टे    सीधे   खेल
उल्टे   सीधे    खेल   काम जैसे भी बनता
नहीं बने कानून    भाड़ मे जाये जनता

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संसद की सर्वोच्चता सत्ता का यह खेल
कैसी   अंधाधुंध     है    कैसी    रेलमपेल
राजनीति की नसों  मे पसरा भ्रष्टाचार
जनमानस   स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार
लोकतन्त्र  लाचार ठनी नौटंकी हद की
फिर नंगी तस्वीर उभर आई संसद की

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जनता जब से जगी है ऐसी पड़ी नकेल
हुए उजागर बहुत से राजनीति के खेल
कहने को सब चाहते लोकपाल मजबूत
पर सपनों मे डराए  लोकपाल का भूत
लोकपाल का भूत  नहीं कुछ कहते बनता
अन्ना,बाबा, स्वामी पीछे सारी जनता

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मंहगाई सर पे चढ़ी फिर उछला पेट्रोल 
सरकारी वादे सभी  बने ढ़ोल के पोल
भूखा मारे गरीब और सड़ता रहे अनाज
देश नोच कर खा रहे  सत्ताधारी बाज़
सत्ताधारी बाज़    कयामत    जैसे  आई
जीना दूभर हुआ चढ़ी सर पे मंहगाई

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कवि सम्मेलन और रज़ाई वार्ता … सांपला ब्लागर मीट 24-12-11 (भाग-2)

गतांक से आगे-

24-12-11, स्थान-सांपला, समय -  सायं 4 बजे के आस पास

ब्लागर मिलन हो चुका था… अजय झा, शाहनवाज़, कनिष्क, अंजू जी, संजय अनेजा जी, खुशदीप जी, संजू तनेजा जी, सहित DSC01264तमाम चिट्ठाकार रात अपने ही घर मे काटने की ठान चुके थे अतः अनमने ही उन्हें विदा करना पड़ा … हमारी बात कुछ और थी…अब हम ठान चुके थे कि देर से आने की कमी को रात्रि-प्रवास से निपटा कर ही वापस जाएँगे…. उधर राज भाटिया जी से फुर्सत मे अनौपचारिक बातचीत का लोभ और अंतर सोहिल के स्नेह ने हमें सांपला मे रुकने को मजबूर कर दिया। राजीव तनेजा जी, और केवल राम को हम सब ने जबरन रोका गया …जाट देवता पहले से ही हमारे बीच विराजमान थे… शाम को कुछ और ब्लागर मित्र आ गए जिनमे आशुतोष तिवारी और दीपकबाबा का नाम ही ध्यान है मुझे… रज़ाई मे घुस कर देर शाम तक बतकही करने का मज़ा अनुपम था… फेसबुक से लेकर ब्लाग और विषयगत लेखन, आभासी रिश्तों से लेकर न्यू मीडिया की संभावनाओं तक बहुत कुछ अनौपचारिक वार्ता मे शामिल रहा… बीच बीच मे चाय शाय का भी दौर चला… देर शाम सांपला सांस्कृतिक मंच के तत्वाधान मे होने वाले कवि सम्मेलन मे चलने की तैयारी हुई… अलबेला खत्री, और अन्य कवि गण अलग कमरे मे अपने आपको मेक-अप कर रहे थे… हमारे कार्यक्रम स्थल तक पहुँचने तक आधा पाण्डाल पहले  ही भर चुका था…

 DSC01287इन्दु जी, राज भाटिया जी, राजीव तनेजा और केवल राम जी के साथ हम सब अपने अपने फैशन मे कवि सम्मेलन मे विराजमान हुए…. लेकिन एक घंटे के अंदर ही ठंड ने कहा अपने अपने फैशन और अपनी अपनी शरम अपनी जेब मे रखो… अब यहाँ हमारा राज है॥ और फिर भागे ठण्ड का इंतज़ाम करने… इधर इन्दु जी ने माइक सम्हाला और कवियों और अतिथियों के सम्मानित करने का दौर चलाया… बाद मे कवि सम्मेलन का औपचारिक प्रारम्भ होते ही मंच की कमान अलबेला जी के हाथों मे सौपी गयी…

मुख्य रूप से सम्मेलन के लिए आमंत्रित कवियों मे कवि P241211_21.53_[02]अलबेला खत्री, योगेंद्र मुदगिल, व्यंजना शुक्ला, कृष्णकांत दिल्ली, सत्येन वर्मा इंदौर, जोगेंद्र मोर रोहतक से थे। सभी कवियों ने अपने अपने अंदाज़ मे काव्यपाठ कर सांपला के साहित्यप्रेमी श्रोताओं को मगन किया तो अपने चुटकुलों और हास्य रस से माहौल को जीवंत भी बनाए रखा। बीच बीच मे जनमानस को सम्मेलन से बांध कर रखने के लिए व्यंजना और अलबेला जी के बीच चुटकियाँ भी चलती रहीं… ठण्ड काफी हो रही थी…यद्यपि पाण्डाल भरा हुआ था परन्तु लोगों ने अपने आपको गरम शालों और कपड़ों मे ऐसे छुपा रखा था कि तालियों के लिए भी हाथ निकालने से बचते रहे… उधर सुबह से लाइट न होने के कारण  जनरेटर भी हलाकान हुआ जा रहा था…

406378_10150457058826799_642751798_8822138_120434910_nआमंत्रित स्थापित  कवियों के बाद ब्लागजगत की ओर से काव्यपाठ के लिए मुझे मंच से आमंत्रित किया गया। साथ ही इन्दु जी, राजीव तनेजा और राज भाटिया जी को भी सम्मानित किया गया… देर रात तक लोग कवि सम्मेलन का मज़ा लेते रहे…कवि सम्मेलन के मुख्य अतिथि लगभग ७५ वर्षीय लाला हरकिशन जी ने जब माइक सम्हाला तब पता चला कि वो काव्य और साहित्य के कितने बड़े रसिया हैं। तमाम अच्छी सीखों के साथ उन्होने बड़े सार्थक अंदाज़ मे कवितायें भी सुनाई और आश्वासन  दिया कि यह कवि सम्मेलन हर वर्ष होना चाहिए… वो हमेशा हर तरह से साथ देंगे…सांपला मिलन और सम्मेलन मे लाला जी विशेष रूप से अविस्मरणीय रहेंगे। DSC01296

देर रात सम्मेलन की समाप्ति के बाद सभी कवियों सहित हम सब भोजन कर  रज़ाई को प्राप्त हुए.. और फिर शुरू हुई रज़ाई-वार्ता सुबह चार बजे तक चलती रही… मै अपने लैपटॉप पर स्व० राजीव दीक्षित के आख्यान सुनते हुए कब निद्रा देवी की गोद मे समा गया कुछ पता ही नहीं चला…शेष लोग बहुत देर तक रज़ाई गोष्ठी मे रमे रहे… अंतर सोहिल और सांपला सांस्कृतिक मंच के अन्य स्वयंसेवक रात भर हम सब का ध्यान रखते रहे …

रज़ाई वार्ता

२५ दिसंबर की सुबह हो चुकी थी… विदाई का समय भी आ गया था… अंतर सोहिल विदाई को लेकर इतने भावुक हो चुके थे कि अलबेला जी की छेड़-छाड़ का भी कोई असर नहीं हुआ…अन्तर सोहिल ने सभी मेहमानों के दिलों पर जो छाप छोड़ी वो हमेशा के लिए अमिट रहेगी… सांपला की सुमधुर स्मृतियाँ, सोहिल का स्नेहिल समर्पण और सब का स्वप्निल साथ सदा स्मरणीय रहेगा…

सांपला ब्लागर मिलन

जब अलबेला खत्री स्टेशन से उठाए गए … सांपला ब्लागर मीट 24-12-11 (भाग-1)

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पवन चन्दनजी,अविनाश वाचस्पति जी,सुमित प्रताप सिंह, संतोष त्रिवेदी और ललित शर्मा जी  सांपला जाने से पहले ही घबरा गए कि आखिर साँप कहाँ से लाएँगे । कनिष्क कश्यप के साथ केवल राम जी से आग्रह किया कि वो भी हमारे साथ ही चलें लेकिन ऐन मौके पर केवल राम जी  अलबेला जी को उठाने के मिशन से घबरा कर अकेले ही सांपला की ओर प्रस्थान कर गए… अब अलबेला जी को उठाने के लिए  चार के स्थान पर मै और इन्दु जी ही रह गए…जैसे तैसे गाजियाबाद से दिल्ली स्टेशन की ओर अपना रथ जाम से जूझते हुए बढ़ा.. तभी सूचना मिली कि अलबेला जी नदिरेस्टे . की जगह पुदिरेस्टे पर अवतरित हो रहे हैं तो हमने उधर को रुख किया और कनिष्क को पुदिरेस्टे पर ही फटाफट पहुँचने को बोला…

P241211_14.10लाल किले के पास गलत साइड की रोड पर घुसने के बावजूद पुलिस जी ने हमें अभयदान दे दिया और हम जैसे तैसे जाम की बाधा दौड़ पार करते पुदिरेस्टे पहुँच गए। अलबेला जी को फोन पर बोला कि वो जहां हों अपना हाथ ऊपर हिलाएँ ताकि हम उन्हें देख सकें… लेकिन कहीं नहीं दिखे तो खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो पता चला अलबेला जी कार के एकदम पास मे पीछे की तरफ खड़े हाथ हिला रहे थे… लो जी… अलबेला जी को तो हम दोनों ने ही उठा लिया था… अब कनिष्क कश्यप का इंतज़ार करना था… कनिष्क के  आते आते आधा घंटा और बीत गया… अब हमारे 12 यही बज चुके थे… लेकिन जैसे तैसे सांपला के लिए फिर दिल्ली की ट्रैफिक मे बाधा दौड़ करते हुए आगे बढ़े… रास्ता पूछने  का भार अलबेला जी ने अपने ऊपर ले लिए  था।

DSC01246गाड़ी धीरे धीरे जाम को नाकाम करते हुए नांगलोई के मेट्रो पिलर नंबर 420 के पास पहुँचने ही वाली थी कि एक साइकिल सवार अचानक कार के ऊपर साइकिल सहित सवार होने को तैयार हो गए… लेकिन अंततः साइकिल ही उनपर सवार हो गयी। बाद मे पता चला ये पिलर नंबर 420 राजीव तनेजा जी का ‘इलाका’ था और उसी का असर था। दिल्ली से बाहर निकलते निकलते राज भाटिया जी के कई फोन आ गए… लगभग सभी ब्लागर आ चुके थे… अलबेला जी सीधे सौ-चक्रिका से उतर कर चौ-चक्रिका पर सवार हुए थे, जाहिर है पेट के चूहे आंदोलन पर उतर आए  होंगे। तय हुआ कि कहीं एक एक कप कड़क चाय मारी जाय। अच्छी जगह खोजते खोजते कई किलोमीटर निकाDSC01244ल दिये तो एक जगह को जबरन अच्छी मानने को मजबूर होना पड़ा। फिर तो चाय के साथ साथ पड़ोस मे खड़े मशहूर अमृतसरी पराँठे(यद्यपि इस मशहूर पराठों को जानता कोई नहीं:) उड़ाने का दौर भी चला। अलबेला जी खाने से ज़्यादा नहाने की ज़िद पर अड़े हुए थे। कनिष्क कश्यप शक्ल से  ही नहाये हुए लग रहे थे। इन्दु बुआ बाथरूम से काँपते हुए निकली ज़रूर थीं इसका साक्षात गवाह मै। और मेरे बारे मे किसी को कोई शंका हो ही नहीं सकती थी। इस लिए सबसे ज़्यादा आहाने की चिंता अलबेला जी को हो रही थी। अंततः सर्वसम्मति से तय हुआ कि ब्लागर मीट मे कोई नहाने की चर्चा नहीं करेगा। अंततः सन्नाटी रोड पर सन्नाते हुए सांपला पहुँच चुके थे।

DSC01255सांपला आ चुका था । रेलवे रोड पर पंजाबी धर्मशाला तमाम दिग्गज और सहृदयी ब्लागरों से चहक रहा था। राज भाटिया जी, महफूज, मनीष जी और अन्तर सोहिल के स्नेहिल मिलन को देख कर ऐसा लगा जैसे कुम्भ के मेले मे बिछड़ा हुआ परिवार मिल गया हो। खुशदीप सहगल, वंदना गुप्ता, अजय झा और शाहनवाज़  सहित कई और ब्लागर बंधुओं से पहले भी मिल चुका था किन्तु अन्तर सोहिल और उनकी जोशीली सांपला सांस्कृतिक मंच के स्वयं सेवकों की टीम से मिलना और उनका स्नेह और समर्पण अद्भुद लगा।

फिर चला परिचय और संक्षिप्त विचारों का दौर… अन्तर सोहिल जी के अतिरिक्त मिलन मे आने वाले चिट्ठाकारों की सूची कुछ यूँ है,,, यद्यपि कुछ नाम यहाँ छूट रहे हैं – DSC01257

  सुश्री इंदुपुरी जी (उद्धवजी)

सुश्री अंजु चौधरी जी (अपनों का साथ)

सुश्री वन्दना जी (जख्म…जो फूलों ने दिये, एक प्रयास)

श्री राज भाटिया जी (पराया देश, छोटी छोटी बातें)

श्री खुशदीप सहगल जी (देशनामा, स्लॉग ओवर)

श्री महफूज अली जी (लेखनी…, Glimpse of Soul)

श्री यौगेन्द्र मौदगिल जी (हरियाणा एक्सप्रैस)

श्री अलबेला खत्री जी (हास्य व्यंग्य, भजन वन्दन, मुक्तक दोहे)

श्री संजय अनेजा जी (मो सम कौन कुटिल खल…?)

श्री वीरू भाई जी (कबीरा खडा बाजार में)

श्री राजीव तनेजा जी (हँसते रहो, जरा हट के-लाफ्टर के फटके)
श्री जाट देवता (संदीप पवाँर) जी (जाट देवता का सफर)

श्री संजय भास्कर जी (आदत…मुस्कुराने की)

श्री कौशल मिश्रा जी (जय बाबा बनारस)
श्री दीपक डुडेजा जी (दीपक बाबा की बक बक, मेरी नजर से…)
श्री आशुतोष तिवारी जी (आशुतोष की कलम से)

श्री मुकेश कुमार सिन्हा जी (मेरी कविताओं का संग्रह, जिन्दगी की राहें)

श्री केवलराम जी (चलते-चलते, धर्म और दर्शन)
श्री शाहनवाज जी (प्रेमरस, तिरछी नजर)

और मै पद्मसिंह  (पद्मावली)

मिलने मिलाने के दौर के बाद पता चला हमारे आने से पहले गन्ना चूसने और चर्चाओं और शाम तक के अवशेष (ब्लागर)चाय पानी के कई दौर पहले ही चल चुके थे… परिचय के बाद भोजन तैयार था… सुस्वादु भोजन करते करते स्नेहिल मिलन का दौर भी लगातार चलता रहा। भोजन के बाद काफी देर सब बातें करते रहे और फिर आया विदाई का समय। कई ब्लागर वापस जाने को तैयार थे जबकि रात मे कवि सम्मेलन और ठंडे मौसम मे गरमा गरम वार्ताओं का पूरा इंतज़ाम था, महफूज, कनिष्क, खुशदीप जी सहित तमाम ब्लागर वापस चले गए। जबकि कुछ हिम्मती ब्लागर ने सांपला मे रात बिताने को तैयार हो गए जबकि केवल राम और  राजीव तनेजा जी  को जबरन रोक लिया गया। और फिर रज़ाई मे बैठ कर असल ब्लागर मिलन शुरू हुआ जिसे मे अनौपचारिक और धुंवाधार वार्ताओं का दौर चला। और ये महफिल तब उठी जब अन्तर सोहिल ने कविसम्मेलन का समय होने की घोषणा की।

शेष अगले अंक मे ……..जनहित मे जारी :)

आओ खेलें वादी वादी

छोड़ो भी ईमान की बातें

लूटें खाएं आधी आधी

सोचे कौन देश की बातें

आओ खेलें वादी वादी

 

जाति पांति मे बंटे रहेंगे

अपने हित पर डटे रहेंगे

तने रहे हैं तने रहेंगे

कैसे छोड़ेंगे परिपाटी

बने रहे हैं बने रहेंगे

हिन्दूवादी मुसलिमवादी

अन्ना-वादी बाबा-वादी

 

फूल नहीं हम खार रहेंगे

प्यार नहीं व्यापार रहेंगे

ना सुधरे थे ना सुधरेंगे

हम धरती पर भार रहेंगे

हँस कर सह लेंगे बरबादी

बेशक छिन जाये आज़ादी

लेकिन हम तो बने रहेंगे

अगड़ा-वादी पिछड़ा-वादी

 

नहीं स्वावलंबन लाएँगे

सस्ते का राशन खाएँगे

आरक्षण की भांग पिएंगे

जितना कुनबा उतना राशन

खूब बढ़ाएँगे आबादी

अपने ठेंगे से मर जाएँ

भगवा-वादी, खादी-वादी

अन्नावादी, बाबा वादी

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होने दो मंथन कोई तो हल निकलेगा

अमृत निकलेगा या कोई गरल निकलेगा

तप जाने दो स्वर्ण कलश सा दिखने वाला मौसम

ये तो समय बताएगा पीतल या कि कुन्दन निकलेगा

कुल मिला कर ज़ीरो…


SAnjay 006कई महीने हो गए ब्लॉग पर कुछ लिखे हुए…. लिखते रहने के अतिरिक्त कुछ करने की सोच कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा के साथ हो लिया…. हर अनशन, हर मोर्चे, और हर जुलूस मे कभी झंडे लिए तो कभी मोमबत्ती जलाए गले फाड़ता रहा…भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब ज़िन्दाबाद…. लोगों ने अपने एयरकंडीशंड घरों से स्वतः निकल कर मोमबत्ती जलाई और हमारे साथ हो लिए… ऐसा लगने लगा जैसे अब क्रान्ति हो चुकी है… अब हो न हो देश से भ्रष्टाचार के काले बादल छंट जाएँगे… नया सवेरा आने ही वाला है… परन्तु सरकारी पैंतरों और गुलाटी खाते सत्तासीन चुने हुए(वास्तव मे छंटे हुए) प्रतिनिधियों को देख कर लोकतन्त्र और संसद की सर्वोच्चता का असल मतलब… और मकसद दोनों काफी कुछ(जितनी आम जनता की समझ की औकात है) समझ मे आई…. समझ तो आप को भी आ गयी होगी… पर पुनः ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करते हुए एक लोकोक्ति कहना चाहूँगा…

दो टके की हाँडी गयी तो गयी…. कुत्ते की जात तो पहचान मे आई

बस मन मे बहुत खुन्नस है… धीरे धीरे निकलेगी… फिलहाल इसे बाँच लीजिये…. लिख दिया… ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए…

भ्रष्टाचार, काला धन
बाबा का आंदोलन
अन्ना का अनशन
ज्वाइंट  मीटिंग
सरकारी चीटिंग
लोगों का सपोर्ट
बाबा एयरपोर्ट
मान मनौवल
सरकारी सिर फुटौव्वल
बाबा का अनशन
सत्ता  से अनबन
अनशन पर वार
बाबा तड़ीपार
अनशन पर शर्तें
साजिश की परतें
अन्ना को जेल
दमन का नंगा खेल
वार्ता, करार,
सोनिया फरार
राहुल को कमान
राम लीला मैदान
ओमपुरी का बयान,
संसद का अपमान,
अग्निवेश का फोन
मनमोहन का मौन
राहुल का बयान
मीडिया की उड़ान
स्थायी कमेटी,
सिंघवी की हेटी
पासवान की टांग
आरक्षण की मांग
सर्वदलीय मीटिंग
बैकडोर चीटिंग
फेसबुक निगरानी
दमन की कहानी
बार बार मीटिंग
भितरघात चीटिंग
नहीं बनी बात
धाक के पात
हाँ हाँ, ना ना
चीं चीं, काँ काँ
धीरे धीरे आम लोग
पक गए तमाम लोग
अन्ना बन गए हीरो
बंसी बजाए नीरो 
हासिल रहा ज़ीरो…
कुल मिला कर ज़ीरो…

(ज़ीरो मतलब सुन्ना…  “0″ मौज करो मुन्ना)

….. पद्म सिंह

ओ मेरे चरण दास (जस्ट खुराफात)

मेरे चरण दास…!

            सुनो मेरी अरदासकम लिखे को ज्यादा समझना, खर्चा जो भेजा था आधा समझनाकई दिन से तुम् दिलो- दिमाग में रह गए हो फंस के, मन में याद बन के ऐसे कसके, जैसे ऊँगली में घुसी फांसजैसे दमे की सांस, जैसे टी बी की खांसी पुरानी,…..

मेरे पश्चानुगामी  … अब तो जिंदगी लग रही है बेमानी …. तुमारी आस में महाजन से कितना कर्जा कर चुकी हूँ, काम धंधा छोड़ दिया है, कितना हर्जा कर चुकी हूँ अंटी में दाम…! रात को चैन दिन को आराम.. तुम्ही कहो कैसे पड़े चैनकैसे रहूँ खुश

मेरे कामी पुरुष!.…… काम में इतना मगन….? क्या झूठी थी मुझसे तुम्हारी लगन…. तुम्हें भी अकेलापन कैसे भाता होगा, क्या तुम्हें मेरे चेहरे की झाइयां और जुल्फों का घोसला याद आता होगातुम्हारी याद मुझे अंदर तक हिला देती है, मन कसैला, जैसे कच्ची ताड़ी पिला देती हैये देस ये समाज मेरे दिल को तार तार करता है,… रात बेचैन दिन अनमना रहता है रोम रोम में उठती है सुरसुरी …….

मेरे नयनों की किरकिरी...! तुझे तहे-तिल्ली से याद करती है तुम्हारी सिरफिरी…. हर पल मेरे नयनों में ही करकते होएक-एल पल सीने में कसकते होक्या तुम अपने सारे खेल-खिलंदड भूल गए? या किसी सौतन की गलबहियां झूल गएजरा याद करो वो गिल्ली वो  डंडा, वो चकरी वो गोटकभी मैक्सी के पीछे, कभी पेटीकोट की ओट आओ सम्हालो अपना माल असबाबसगरा गाँव पढ़ने को दौड़ता हैजैसे मै हूँ कोई खुली किताब

मेरे सींकिया कबाब  ...कुछ  तो दे दो जवाब …  साज़ बिखरे पड़े हैं बजाए कौनबर्तन को साफ़ करे, घर को सजाये कौन….? और जानेमन मेरी पीठ का एग्जिमा….??? तुम्ही कहो खुजाए कौन? …. तुम बिन तन्हाई में जीती हूँखून के घूँट पीती हूँ …. क्या करूं……जब भी तुम्हारी याद आती हैतुम्हारे पुराने कच्छे की तुरपनकभी फाड़ती हूँकभी सीती हूँअब तो एक ही है मलाल, हाल तो बिगड़ ही चुका है, कब तक सम्हालूँ अपनी चाल…….

मेरे अकेशोज्योतिर्कापाल.….आजा और अपना कुनबा संभाल…. तुम्हारा बड़कू खनगिन काखसम-खास‘ (यानी खासम खास) हो गया हैछुटकी  लटक गयी  … मझला पास हो गया हैऔर क्या बताऊँ जीवन खार हो गया हैगाय और सांड की लड़ाई मेंबछिया का बंटाधार हो गया हैकभी तो लगता है कि जान…..कि अब  तो जान गई ..

मेरे तिर्यकनेत्रद्वयी …. इतनी देर काहे भई ….…. कब तक करूँ तुम्हरे नाम का जापतुम्हारा दारू से आरक्त और मदमस्त चेहरा भूले नहीं भूलता हैऔर मन है कि तुम्हारी गालियों और फटकारों में ही झूलता है …. तुम्हारी  मर्दानगी जब याद आती है तो दिल उठता है काँप….. जो जूता, वो चप्पल, वो गालियाँ वो झापतुम्हारी चाहत में टूटी खटिया पर लेटती हूँ और आँख मूँद लेती हूँ …. तुम्हें याद करती हूँ और तुम्हारी गंजी का पसीना सूंघ लेती हूँ…. देख आज फिर हो गयी मेरी आँखें नम …..

मेरे चवन्नी कममेरा कुछ तो रखो भरमअरे इन पैसों का क्या करूँ……?? बत्ती बनाऊं……? . और तेल में डाल के दिया जलाऊंतुम बिन ज़िंदगी कटती नहींचहुं दिस छाई अंधियारी… जैसे कामन वेल्थ की तैयारी तुम्हीं कहो तुम्हारी अमानत का कैसे हिसाब दूँ?? और सुबह शाम नेपथ्य से उठती  सीटियों का क्या जवाब दूँ ? …. दिलो दिमाग में उठते हैं बलबले ,,,

मेरे जिगरजले मेरे बजरबट्टूइंटरनेट के चट्टू …..जाओ   जहाँ रहो आबाद रहो ,,, गाज़ियाबाद चाहे इलाहाबाद रहो  …..  चिट्ठी करती हूँ बंदजब याद आये तो एक पोस्ट मेरे नाम की सजा देनावरना ट्विटर या बज़ पर बजा देना  …बातें लिखते हो कितनी चीपथोड़ा सोच को करियो डीपवरना सबकी उलटी टीप खाओगे ….जहाँ तहां बजाये जाओगे …. कुछ भी हो  तेरा यश हरदम अपनी जुबां पर सजाऊँगी …. और यही गाऊँगी

मुन्नी बदनाम हुई  ………………………तेरे लिए

                                                                                ‘आपकी प्राण‘, प्यासी

 

अकेशोज्योतिर्कापाल=बिना केश और चमकते कपाल वाला

तिर्यकनेत्रद्वयी= तिरछी नज़र वाला …(भेंगा)

मीनू का हर-सिंगार

दशहरे के बाद के दिन हर पखवारे शीतल होते जाते हैं. सुबह की धूप रुपहली होने लगती है… सुबह घर से निकल कर कुछ दूर यूं ही ठंडी ऑस मे टहलने की मंशा ने अनायास मुझे वहाँ खड़ा कर दिया… उसके घर मे अब ताला पड़ा हुआ है… घर वाले भी गाँव के पैतृक मकान मे जा चुके हैं, पर तुलसी का पेड़ आज भी से वैसे हरा भरा है जैसा उसे आज भी हर शाम दीप जला कर पूजा जाता हो… आज अनायास मै तुलसी के उसी पौधे के पड़ोस मे खड़े रह कर हर-सिंगार के पेड़ से झर रही अगणित तारिकाओं को निहार रहा था तो ऐसे लगा जैसे किसी ने पीछे से पुकारा हो…. “लड्डू वाले भैया”…!!! एक पल को लगा जैसे मै मुस्कुराया भी था, फिर मन भारी हो गया… मुझे पता था ये मेरे मन की अंतरध्वनि थी परन्तु मन एक बारगी थरथरा कर रह गया… बैठ कर हरसिंगार के फूल चुनने लगा… पर एक आवाज़ मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी “लड्डू वाले भैया”….!!!

जितना पढ़ाई मे मेधावी, उतना ही बात व्यवहार मे प्रखर… माँ बाप की साधारण आर्थिक स्थिति मे भी घर को चाँदी सा चमका कर और करीने से सजा कर रखने का पागलपन था उसे.. माँ बाप भाई सब के बीच सामंजस्य की कड़ी कहलाने वाली वो लड़की समझ मे अपनी उम्र से बड़ी थी…भाई बहनों मे सबसे छोटी लड़की होने के कारण परिवार मे और अपनी चपल स्निग्ध मुस्कान वाली चंचल लड़की पूरे मोहल्ले मे सबकी चहेती थी। गली के नुक्कड़ पर उसका घर होने के कारण सब उसके घर के सामने से ही निकलते। अक्सर ऐसा होता कि मै जब भी उधर से निकलता तो वो हर-सिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी दिख जाती। मेरी नज़र पड़े न पड़े… एक आवाज़ ज़रूर मेरा पीछा करती… “लड्डू वाले भैया”॥… और मेरी नज़र पड़ते ही वो हँसते हुए दोनों हाथ जोड़ देती … नमस्ते भैया … !!!… मेरे लड्डू कहाँ हैं…? ये लगभग रोज़ का नियम था… मेरा ये नाम उसने कब रखा ये ध्यान तो नहीं पर शायद किसी दिन उसने किसी खुशी के मौके पर बोला था आप बड़े भैया हो आप लड्डू खिलाओगे… और उस लड्डू का तकादा रोज़ हुआ करता था… सुबह भी शाम भी ।

हर किसी के लिए एक सुबह ऐसी बनी होती है जिसे वह कभी छू नहीं पाता.. जीवन के रंग-मञ्च पर हर किरदार की एंट्री और एग्जिट दोनों तय है। न एक क्षण इधर और न एक पल उधर। कई बार पलट कर पीछे देखो तो लगता है पूरा जीवन यूं ही सरसराती रेलगाड़ी सा निकल गया है…बिना जाने कि हम आए ही क्यों थे यहाँ…जीवन का अंतिम स्टेशन भी आ जाता है और हम अनजाने  ही उतार दिये जाते हैं।

अचानक एक दिन उठते ही किसी ने बताया मीनू की तबीयत बहुत खराब है। आई सी यू मे है शायद पेट मे कोई गंभीर रोग है। मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ… कल रात ही तो पड़ोस की बर्थ-डे पार्टी मे मेरी बिटिया के साथ एक ही थाली मे खाना खाया था उसने …. हँस रही थी… खिलखिला रही थी.. अपने हाथों से सिला हुआ सूट भी पहना हुआ था उस दिन। फिर सुबह ही अचानक ऐसा क्या हो गया?….. अस्पताल पहुँचने पर देखा तो उसके हाथ पैर पलंग से बाँध दिये गए थे। देह स्याह पड़ रही थी … आँखें उलट रही थीं… बार बार चीत्कार के साथ पूरी देह दोहरी हो रही थी। मुँह से चीखने के अलावा कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी… मुझे देखते ही … भैया!!!!!!! “भैया मुझे बचा लो” की कातर चीत्कार.. जिसे आज भी याद करते हुए मेरा पूरा वजूद सिहर जाता है… इसी चीख के साथ वो अचेत हो चुकी उस लड़की की वो शायद इस दुनिया मे किसी के लिए दी गयी अंतिम पुकार थी। एक दो घंटे बाद उसे वेंटिलेटर पर डाल दिया गया… मुँह मे पाइप लगी होने के कारण कुछ भी बोल पाने मे असमर्थ उसकी  की कातर आखें बहुत कुछ कहना चाह रही थीं… शरीर का बार बार ऐंठना….. ऊपर उठना और धड़ाम से गिर जाना…कल्पना भी नहीं की जा सकती उस पीड़ा की… आखिर उसकी असीम पीड़ा का अंत भी आया … वेंटिलेटर पर 12-13 घण्टे का अस्पतालीय नाटक भोगते हुए… वो कब विदा हो गयी किसी को पता नहीं चला। एक बार फिर कोई प्रेम समाज के बेदर्द पूर्वाग्रह का शिकार हो गया (दो घंटे बाद ही सल्फास की डिबिया भी मिल गयी थी… उधर दूसरे अस्पताल मे एक नौजवान भी इसी तरह वेंटिलेटर पर दम तोड़ रहा था)

अगले दिन दुनिया का दूसरा नाटक भी निभाया गया… पैसे और सिफ़ारिश से पोस्टमारटम रिपोर्ट ठीक कारवाई गयी, पुलिस से सेटिंग की गयी…रात भर मे पानी की थैली मे बदल चुकी लड़की चिता की ज्वाला मे धुआँ बन ऊर्ध्वगामी हो गयी… सब कुछ ठीक ठाक हो गया.. तमाम मेहमान जुटे, सांत्वनाएं दी गईं,,,बाकी बची दवाइयाँ वापस कर पैसे लिए गए… और चार पाँच दिन मे सब खत्म… दुनिया अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ी…. पिता और भाई के चेहरे पर कोई खास  शिकन नहीं थी …कहीं न कहीं उनके चेहरे पर काम ठीक से निपट जाने का संतोष झलक रहा था, पुलिस केस का डर  पहले से ही सता रहा था… और फिर शायद उनकी नज़र मे ‘ऐसी लड़की’ का जाना …. जो हुआ ठीक हुआ… और फिर शादी ब्याह के पाँच-सात  लाख रूपये का खर्च भी बच गया था…!

हर-सिंगार सब कुछ वहीं खड़ा देखता रहा… उस समय हर सिंगार की उम्र भी फूलने फलने की नहीं थी… अब उसमे फूल आने लगे हैं… परंतु इन्सानों की दुनिया मे फलने फूलने के लिए इसकी कीमत अपनी आत्मा, अपने हृदय की धड़कनें झूठी प्रतिष्ठा और दक़ियानूसी परम्पराओं के हाथ गिरवी रख कर देनी होती है… और कई बार अपना जीवन दे कर भी।

मै कभी लड्डू नहीं ला पाया उसके लिए… अब लाने का कोई लाभ भी नहीं… कोई एक बड़ा कर्ज़ मेरे सिर छोड़ कर चला गया है। हर-सिंगार महक रहा है… जब तक यहाँ रहूँगा हर-सिंगार को सींचता और पोसता रहूँगा… संभव है कर्ज़ कुछ तो कम जाय।

….. पद्म सिंह 18-10-2011

 

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