दिल्ली सोशल मीट 11-4-16

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फेसबुक वारियर्स… !! दिल्ली मीट !
लोग कहते थे आग बुझ गयी है, राख़ है ये 

जरा कुरेद के देखा तो मशालें निकलीं।
ये शे’र लिखते हुए मैं उम्मीद और नए उत्साह से भर जाता हूँ… सोशल मीडिया को निरा लफ़्फ़ाज़ी मञ्च और हवा हवाई कहने समझने वालों के लिए यह समझ लेना चाहिए कि वैचारिक क्रान्ति की जो जाग हुई है वो एक दिन आग भी बनेगी… और 
जो समझते हैं यहाँ खून नहीं पानी है… 

उनसे कह दूँ के ये दरिया बड़ी तूफानी है …. 
दिल्ली मे हुई मीट को मैं एक करवट के रूप मे देखता हूँ, एक मीटिंग से कोई निष्कर्ष निकल सकता था ऐसा मानना भी नहीं था। आभासी दुनिया से निकाल कर विचार जब सड़कों पर निकल पड़ें तो ये उस करवट की निशानी है जो सुबह की उजास के साथ जाग मे बदलेगी, उस चिंगारी की निशानी है जो एक दिन आग मे बदलेगी। पिछले लगभग दो सालों से देश मे एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है.. भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। बहस के आयाम बदल गए हैं… दशकों से छुपे हुए तमाम मकोड़े अचानक बिलबिला कर बिलों से बाहर आ गए हैं…एकजुट हो रहे हैं…  दाँव पर दाँव खेल रहे हैं… और ऐसे विरोध के अतिरेक मे जिस डाल पर बैठे हैं वही काटने को उतारू हो रहे हैं। 

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं….ऐसे मे वो कहीं न कहीं बहुत दिनों से सोए पड़े दूसरे धडे को भी झकझोर रहे हैं… जागने को मजबूर कर रहे हैं… दिल्ली मीट इसका एक उदाहरण है।

दिल्ली मीट बहुत Organized नहीं थी… बहुत व्यवस्थित भी नहीं थी… एजेंडा भी बहुत स्पष्ट नहीं था… कुछ लोग बोले  कुछ लोग चाह कर भी नहीं बोल पाए। मुद्दा JNU और मीडिया जैसे मुद्दों और समस्याओं की खोज के गोल दायरे मे घूमता रहा… वास्तव मे ऐसी मीटिंग्स से बहुत बड़ा परिवर्तन होने वाला है ऐसा भी मैं नहीं मानता.. ऐसे तमाम मिलन, बैठक, मीटिंग्स हम रोज़ करते हैं… मन मे जज़्बा भी है, जुनून भी है और ज़रूरत भी है… लेकिन हर बार एक कसमसाता हुआ सवाल सामने आ खड़ा होता है- आखिर हम करें तो क्या करें ? … लड़ाई के हजारों छोटे बड़े मोर्चे हैं कि शुरुआत कहाँ से करें, कैसे करें और किसके खिलाफ़ करें? लेकिन जब हम आभासी दुनिया से निकल कर आमने सामने मिलते हैं तो उसके मायने बदल जाते हैं… जब हम एक साथ बैठते हैं तो हमारी तमाम सोच तमाम ऊर्जा और शक्ति जो अलग अलग दिशाओं मे बहती है उसको संगठित होने और एक दिशा पाने का अवसर मिलता है… और एक प्रश्न भी मिलता है ” Who am I ” टाइप का… हम अपनी स्थिति कुछ और स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं। 
ऐसे मिलन और होने चाहिए… हजारों की संख्या मे होने चाहिए…अपने अपने क्षेत्र मे कम से कम सभी वैचारिक समझ रखने वाले लोग आपस मे एक दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जाने। …. समाधान, परिवर्तन, और परिणाम इसके बारे मे तुरन्त आशा करना व्यर्थ है। अन्ना आंदोलन जैसे दूध के उफ़ान बनने से कुछ नहीं होगा… बाबा रामदेव(जिसे मिर्ची लगे वो इससे बड़ा योग, आयुर्वेद और स्वदेशी का काम कर के दिखा दे) जैसे दूरदर्शी और सुव्यवस्थित सोच के साथ बढ़ना होगा… सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य है… अपनी अपनी विशेषज्ञता … लेकिन लक्ष्य एक है… बाकी सब गौण हैं… साधन अनेक हैं… साध्य एक है… यही सोच रखेंगे तो सब अच्छा होगा…. अंत मे शुभेक्षा के साथ कुछ बिन्दु आगे  होने वाली मीटिंग्स के लिए छोडना चाहूँगा-
1- आगे के मिलन किसी बन्द स्थान मे रखे जाएँ(मंदिर, सभागृह, स्कूल) 

2- पहले से चर्चा का एक विषय तय हो तो अच्छा होगा

3- चर्चा के मुख्य विषय पर कुछ विशेषज्ञ भी हों। 

3- सभी स्वयं का परिचय कराएँ, सभी एक दूसरे को कम से कम पहचानें 

4- विचार के लिए फेसबुक पहले से है, मीटिग् मे अपने क्षेत्र मे मित्रवत संगठन या ग्रुप्स पर विशेष ज़ोर हो। 

5- यह तय हो कि यदि आवश्यक हुआ तो उस क्षेत्र के फेसबुक वारियर्स अल्प समय मे कब कहाँ और कैसे मिलेंगे। 
…………….. बहुत कुछ है …. दो लाइन लिखने वाले से इतना लिखवा लिया… ज़्यादा ज्ञान(तथाकथित) देने से कोई फायदा नहीं है… लगे रहिए… जूझते रहिए… हार नहीं माननी और … भाई अजीत सिंह की तरह कहूँ तो …(छोड़ो पोस्ट की ऐसी तैसी नहीं करानी) 😛 … 
ज़िन्दाबाद …. फेसबुक वारियर्स ज़िन्दाबाद  !!

धूप …

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सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप
एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप

लाँघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर
धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप

मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये
पाँव छू, उंगली पकड़ फिर सर पे चढ जाती है धूप

किस कदर चालाक है ख़ुर्शीद की बेटी भला
खिज़ां का इल्ज़ाम रुत के सर पे मढ़ जाती है धूप

देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले
शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप

पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर
जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप
-पद्म

मेरा एकांत

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मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है
कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो… 
क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर 
चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का 
दहकती हुई किसी कविता की आग निचोड़ो
नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद 
मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत 
या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश 
जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों 
तुन जिस तरह उस लड़की से
विदा ले रहे थे 
मैं समझ गया था 
तुम चप्पू भले चलाओ
घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे 
उड़ान कितनी ऊँची कर लो
चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे 
उछालो न कोई नाद चौताला 
नोच फेंको मुखौटे  
वरना जब भी मिलो गे अकेले
छोड़ूँगा नहीं 
जबकि पता ये भी है
गोलचक्कर में भागोगे
तो कहाँ जाओगे 
जब भी खुद से लड़ोगे
मुँह की खाओगे
-पद्म सिंह 15-03-2017

झमकोइया मोरे लाल !!

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हमारे जिले में शुभ कार्यों में अपने मज़ाक वाले रिश्तों के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए सस्वर गाली गाते हैं होली पर ताज़ी ताज़ी नाज़िल हुई गाली कोे इसी संदर्भ में पढ़ा /गाया जाए। 

यूपी की जनता ने कीन्हा कमाल झमकोइया मोरे लाल 
56 इंच का लगा ऐसा धक्का 
पंचर भई साइकिल निकल गवा चक्का
अंदर से ठट्ठा लगावें सिपाल ….झमकोईयामोरे लाल 

बुआ कहें बबुआ से बड़ा बुरा पटका 
कद्दू जो कटता तो आपस में बंटता 
फाट पड़ा जाने कहाँ से बवाल … झमकोइया मोरे लाल 

घूरे भी ताड़े भी पर नहीं पाए 
अपने ही घर की खबर नहीं पाए 
बुर्के के अंदर से होइगा धमाल ….झमकोईया मोरे लाल

यूपी के लड़िकन की लुटि गयी खटिया 
इतना काम बोला कि डूबि गयी लुटिया
 घरहिन मा मुरगी होइगै हलाल … झमकोइया मोरे लाल 

वारे परधान वारे वा रे अमितवा 
वा रे मनोज वा रे वा रे सम्बितवा
धोती को फाड़ कर दीन्हा रुमाल… झमकोइया मोरे लाल 
©पद्म सिंह #निर्मल हास्य 

फिर न कहना के हम ने पुकारा नहीं

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तुम मेरे ना हुए ना मिले ना सही 
तेरे दिल पर भी अब हक़ हमारा नहीं
गाँव माज़ी  में कोई घरौंदा तो है
जिस को सपनों ने बेशक सँवारा नहीं 

गिर गयी रात की आख़िरी पाँखुरी
और उफ़क पर भी कोई सितारा नहीं 
आखरी साँस है मेरी आवाज़ की 
फिर न कहना के हमने पुकारा नहीं 

एक दिया टिमटिमाता रहा रात भर 
एक दस्तक की उम्मीद जागी रही  
एक कतरा  न टूटा मेरी आँख से 
एक लम्हा तेरे बिन गुज़ारा नहीं 

यूँ तो हर फ़ूल का एक अंजाम है
खिल के महका महक कर के खुद गिर गया 
तुम कली तोड़ कर घाव क्यों दे गए 
वक्त का तुमने समझा इशारा नहीं 

शर्त बस एक थी मैं तुम्हारा रहूँ
मेरा कुछ ना रहे सब तुम्हारा रहूँ 
ना मिरा मैं रहा ना तुम्हारा हुआ 
हाय डूबा के मिलता किनारा नहीं। 

ज़िन्दगी का फ़साना भला या बुरा 
सुर में सुर बिन मिलाए गुज़ारा नहीं 
दिल लुभाती हैं  लहरों की अठखेलियाँ
कूद जाओ तो मिलता किनारा नहीं 

ज़िन्दगी जंग है रंग ए महफ़िल भी है
वही मजधार है और साहिल भी है 
हौसलों के मुसलसल हुए इम्तहाँ
जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं

ऊमीद के धागों में वो बाँध गया साँसें (गज़ल) – पद्म सिंह

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ये दिल का फलसफा भी क्या खाक समझ पाते

काबू मे दिल ही होता तो दिल ही क्यों लगाते

 

हर चोट ख़ुशी देती हर ज़ख्म मुस्कुराते

गर डूब गए होते तो पार उतर जाते

 

मुश्किल से तराशा है जीवन को मुश्किलों ने

हम तैर न पाते जो तूफ़ान नहीं आते

 

वो कायनात रच कर आराम से बैठा है

और बन्दे परेशां हैं इक आशियाँ बनाते

 

जब तक न लगे ठोकर एहसास नहीं होता

वो मानता नहीं था हम कब तलक बताते

 

ऊमीद के धागों में वो बाँध गया साँसें

तुम इंतज़ार करना कह गया जाते जाते

….. पद्म सिंह ०८-०७-२०१

जो डूबा सो पार !

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                  वैसे तो मैं बचपन से ही खुराफाती जिज्ञासु टाइप का रहा हूँ…संगीत, ड्रामा,लकड़ी का काम सहित साहित्य और तकनीकी विषयों के प्रति विशेष रुचि रही… इसी क्रम मे कई बार तैरना सीखने की कोशिश भी की पर बार बार नाकाम ही रहा…कई बार इस चक्कर मे डूबते डूबते भी बचा। गाँव वाले घर के पिछवाड़े वाले तालाब मे भैंस की पूँछ पकड़ कर पार उतरने की कोशिश मे अचानक पूँछ का छूट जाना और पानी के अंदर खुली आँखों से पानी के बाहर का दिखने वाला उजाला आज भी याद आ जाता है। भला हो मुन्ना तिवारी का जो मेरे पीछे से आ कर मुझे पार निकाला। उस घटना के बाद मैं गहरे पानी मे उतरने की हिम्मत लगभग तीस साल बाद ही कर पाया क्योंकि तब तक भी मुझे तैरना नहीं आता था।

                   गाज़ियाबाद  के मुरादनगर कस्बे मे एक बदनाम "गंग नहर" है जो हरिद्वार से निकलती है। मुरादनगर मेरठ हाइवे के पुल पर 12 हों महीने नहाने वालों का मेला लगा रहता है। पड़ोस के मित्रों ने मुझे चढ़ाया, समझाया और नहर मे तैरना सिखाने का लालच देकर ले गए नहर पर। नहर मे साल भर औसतन 5 से 8 फुट पानी रहता है। हर सप्ताह एक दो लोगों का डूब जाना वहाँ आम बात है। पहले दिन की बोहनी खराब हो गयी… एक घण्टे नहाने के बाद जब बाहर आए तो पता चला कोई हम सब की पैंट और कपड़े  घाट से उठाकर चंपत हो गया था…। हम सभी चड्डी मे ही कार मे छुप कर घर लौटे। अगले रविवार फिर योजना बनी नहर जाने की… इस बार थोड़ी तैयारी से गए…आधा घण्टे सीढ़ी के पास चेन पकड़ कर नहाने के बाद कुछ उपाय खोजा गया… गाड़ी मे पड़ी एक पतली रस्सी निकाली और उसका एक सिरा अपनी कमर से बाँध कर दूसरे सिरे पर अपनी दोनों हवाई चप्पल बाँध दी फिर सभी मित्रों से भरोसा लिया कि अगर मैं डूब जाऊँ तो ऊपर तैरती चप्पल खोज कर मुझे बाहर खींच लेंगे। इतना आश्वासन देखर सब नहर के बीचों बीच नहाने लग गए और मैं घाट की चौथी सीढ़ी तक ही तैरने की कोशिश करता रहा। तैरते हुए अचानक मेरा पैर पाँचवीं सीढ़ी पर गया और फिर मैं वापस घाट पर आने के प्रयास मे और गहरे उतरता चला गया…चंद सेकेंड मे मैं पानी के अंदर उछल रहा था पर पानी के बाहर निकाल नहीं पा रहा था… डूबते हुए आदमी की मनःस्थिति क्या होती है यह बताया नहीं जा सकता… कुल मिलाकर घबराहट मे कुछ नहीं सूझता सिवाय हाथ पैर मारने के। सभी दोस्त नहाते हुए दूर चले गए थे… हालाँकि उनमे से एक (अतहर परवेज़) मुझे डूबता देखकर मेरी तरफ चल पड़ा था… लेकिन अगले दस सेकेंड मे ही मैं डूब जाने वाला था…इसी बीच जाने कहाँ से एक हाथ ने मेरा हाथ पकड़ कर बाहर खींच लिया… मैं घबराहट मे उस व्यक्ति को धन्यवाद भी नहीं कह सका… शायद इसी लिए आपद्काल मे सभी औपचारिकताएँ गौण हो जाती हैं। मेरी जान बच गयी थी… पर मैंने अगले पाँच मिनट मे ही निश्चय कर चुका था… "आज तैरना सीख कर ही जाऊंगा"

           अबकी बार पड़ोस के होटल राहगीरों का पसंदीदा गंग नहर का चाय नाश्ता होटल) के आस पास दो तीन बिसलरी की खाली बोतलें खोजी गईं.. बोतलों के मुँह मे रस्सी के फंदे फंसाए गए और फिर मेरी कमर पर बाँधा गया। अब मैं आसानी से डूब नहीं सकता था। फिर अनथक चार घण्टे के गहन प्रशिक्षण और प्रयास के बाद अच्छा खासा तैरना सीख गया और उसी दिन बिना बोतल बाँधे धार मे कूद कर कई बार किनारे आया। उसके बाद बहुत बार गया और हर बार आत्मविश्वास बढ़ता गया…अब स्थिति यह है कि मुझे भरोसा भी नहीं होता कि मुझे तैरना नहीं आता था। जैसे साइकिल सीख लेने के बाद लगता है इसे चलाने मे ऐसी भी क्या मुश्किल है। तो कुल मिलाकर मैं तैरना सीख चुका था।

तैरना इतना मुश्किल भी नहीं– कम से कम इतना तैरना सबको आना चाहिए कि आपातकाल मे अपनी जान बचाई जा सके। कुछ लोग डूब जाने के डर से आजीवन तैरने का प्रयास भी नहीं करते जबकि तैरना इतना कठिन नहीं है जितना लोग समझते हैं। ज़रूरत है थोड़े से प्रयास धैर्य और हिम्मत की। तैरना सबसे अच्छा व्यायाम माना जाता है जिसमे शरीर का हर अंग श्रम करता है और बिना किसी चोट मोच या नुकसान किए पेशियों को सुदृढ़ करता है।

तैरना कहाँ सीखें- तैरना सीखने के लिए आदर्श परिस्थितियाँ तो तरणताल मे योग्य प्रशिक्षक के साथ सुरक्षा पेटी के साथ सीखना ही है परन्तु ये सब हर जगह सुलभ नहीं है। इस लिए अपने आस पास के तालाब या नदी मे तैरना सीखा जा सकता है। रुके हुए पानी की अपेक्षा बहते हुए पानी के प्रवाह मे तैरना आसान होता है। पानी मे जाने से पहले सुरक्षा का इंतज़ाम अवश्य कर लेना चाहिए, अच्छा हो कोई मित्र जिसे अच्छी तरह से तैरना आता हो वो भी साथ रहे तो अच्छा हो।

कैसे करें शुरुआत- तैरना सीखते समह सबसे पहले पानी से दुश्मनी समाप्त कर पानी से मित्रता बहुत आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले पानी के सामने लड़ने के स्थान पर समर्पण करना सीखना चाहिए…पहले साँस रोक कर धीरे से पानी के अंदर बैठ जाएँ…और अपने पैरों को मोड़ कर घुटनों को अपने हाथों के घेरे से बाँध लेना चाहिए… इससे आप अपने आप पानी मे अपने आप पीठ के बल पानी की सतह पर आ जाएँगे लेकिन ऐसा करते समय सिर पानी के अंदर ही रखें और जल्दबाज़ी न करें… ऐसा करने से पानी के साथ एकाकार होने मे सहायता मिलेगी और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। घुटनों को बाहों मे मोड़ कर जब पर्याप्त समय तक के लिए इस तरह सतह पर तैरना आ जाए तो अगला चरण शुरू होता है। अब… जब घुटनों को थामे हुए जब आप पीठ के बल पानी के उत्प्लावन बल से सतह पर आएँ तो बिना सिर को पानी से बाहर निकाले हाथ को आगे और पैर को पीछे फैलाते हुए पानी के अंदर ही मुँह के बल लेट जाने का प्रयास करें। धीरे धीरे इसका भी अभ्यास हो जाएगा और आत्मविश्वास और बढ़ेगा। अब तीसरा चरण है हाथ पैर चलाना… जब पानी पर लेटना सहज लगने लगे तो दोनों हाथों के पंजों  को  चप्पू की तरह बना कर पानी को पीछे धकेलते हुए आगे बढ्ने का प्रयास करें। धीरे धीरे इसी तरह पैरों को भी चलाना आ जाएगा और जल्दी ही आपको लगेगा इसमे तो कुछ भी खास नहीं था। जैसे साइकिल सीखने के बाद हमें भरोसा भी नहीं होता कि कभी साइकिल चलाना नहीं आता था।