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मेरा एकांत

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मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है
कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो… 
क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर 
चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का 
दहकती हुई किसी कविता की आग निचोड़ो
नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद 
मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत 
या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश 
जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों 
तुन जिस तरह उस लड़की से
विदा ले रहे थे 
मैं समझ गया था 
तुम चप्पू भले चलाओ
घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे 
उड़ान कितनी ऊँची कर लो
चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे 
उछालो न कोई नाद चौताला 
नोच फेंको मुखौटे  
वरना जब भी मिलो गे अकेले
छोड़ूँगा नहीं 
जबकि पता ये भी है
गोलचक्कर में भागोगे
तो कहाँ जाओगे 
जब भी खुद से लड़ोगे
मुँह की खाओगे
-पद्म सिंह 15-03-2017

एक हज़ल (खतरनाक सी)

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मित्रों आप लोगों को हमेशा लगता था कि इस ब्लॉग पर सीरियस और दार्शनिक
रचनाएं भरी रहती हैं….तो मैंने सोचा क्यों न आज कुछ नया प्रस्तुत किया जाय आपके लिए ….
आज आपके लिए एक हज़ल ले कर हाज़िर हूँ , हलके मन और मज़बूत दिल के साथ ध्यान से पढ़िए
और मज़े लीजिए

मिलन की खुशबुओं को आज भी खोने नहीं देते
वही गंजी है सालों से मगर धोने नहीं देते

हमारे घर के मच्छर भी सनम से कितना मिलते हैं
जो दिन भर भुनभुनाते हैं तो शब१ सोने नहीं देते

हवाएं धूप पानी बीज लेकर साथ फिरते हैं
मगर वो खेत वाले ही फसल बोने नहीं देते

अब उनसे हमारा झगड़ा मिटे भी तो भला कैसे
अमन की बात करते हैं मिलन होने नहीं देते

अब अपने दर्द का इज़हार भी कैसे करूँ यारों
वो थप्पड़ मारते भी हैं मगर रोने नहीं देते

न जाने कब गरीबी मुझे साबित करनी पड़ जाए
इसी खातिर तो राशन कार्ड हम खोने नहीं देते

ये पैसा मैल है हाथों का और हम हैं सफाईमंद
तभी रब हाथ मैला हमारा होने नहीं देते

बड़ी मेहनत से करते हैं तरक्की मुल्क की अपने
हुई औलाद दर्जन, मगर ‘बस’ होने नहीं देते

खसम तो आज हो बैठे हैं कुत्तों से कहीं बद्तर
बंधा रखते हैं थोड़ी हवा भी खाने नहीं देते

मोहोब्बत पाक है अपनी रिन्यू करते हैं रोज़ाना
अकेले ही किसी को खर्च हम ढोने नहीं देते

अजब दस्तूर है इस जहां में इन हुस्न वालों का
किसी को थाल मिलते हैं हमें दोने नहीं दे
ते

हमारी उम्र में अक्सर जवानी कसमसाती है
वो जाना चाहती है और हम जाने नहीं देते

नहीं कर पाए साबित जल के परवाने वफा अपनी
‘तवज्जो’ शमा कहती है कि परवाने नहीं देते

(शब=रात)
(इज़हार=अभिव्यक्ति)

लीगल सूचना: इस पोस्ट पर के सभी चरित्र काल्पनिक हैं , अगर किसी को इससे
अपनी समानता मिले तो लेखक इसके लिए उत्तरदाई नहीं होगा ……..हा हा हा

Posted via email from हरफनमौला

अम्मा

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जाड़े की सुबह

एकदम तडके ही

मेरे तापने को

अलाव जला देती हैं

फिर ओखली में कुटे

मांड वाले चावल के लिए

अदहन चढा देती हैं

बहुत जतन से मुझे पोसती हैं अम्मा

मुझे नहलाती है कस कस के

जमी हुई कीचट साफ करती हैं

मै सिसियाता हूँ ठण्ड से

वो गरियाती है मुओं को

जो मुझे खेलने को साथ ले गए

फिर अनायास मुझे देख मुस्का देती हैं अम्मा

हथेली में मेरा चेहरा पकड़

तेलहुंस बालों में कंघी करती हैं

आँखों में काजल डाल

माथे पर डिठौना लगाती हैं

और एक पल में

राजा बाबू बना देती हैं अम्मा

मुझे मेरे भगवान दिखाती हैं

झुक कर प्रणाम करवाती हैं

या किताबों के फटने पर

विद्या माता का डर दिखाती हैं

और कुछ इसी तरह मुझमे

आस्था का दीप जलाती हैं अम्मा

होली की सुबह

उबटन लगाती हैं

सरसों के दाने उवार कर

फिर कच्चे धागे से मेरी नाप ले

होलिका मैया में डाल देती है

और अगले साल मेरे बड़े हो जाने का

स्वप्न सजाती हैं अम्मा

द्वार पर किसी याचक बाबा को

मेरे हाथों छोटी सी टोकरी से

धान दिलवाती हैं और

इसी तरह मेरे लिए

बहुत से असीस इकठ्ठा करती हैं अम्मा

स्कूल से जल्दी भाग आने पर

या मेरे माटी में खेलने पर

मुझे डांटती हैं

कभी कभी गाल को लाल

या कान को खटाई कर देती हैं अम्मा

और इसी बहाने

यादों में ही सही

एक एक संस्कार

फिर से जगाती हैं

संवारती हैं मुझे

मेरी सब पूंजी

बनावटी उसूल

परत दर परत चेहरा

सब छीन कर

दो पल को

मेरा बचपन लौटा देती हैं अम्मा


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कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

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कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

स्वप्न दिखा कर दूर गए तुम

रूठ गए मधुमीत ..

कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

 

मुझको अपने अंग लगा लो

व्याकुल मन की प्यास बुझा दो

प्रीति करो परतीति न जानो

ठीक नहीं यह रीत ..

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

नंदन वन के विटप मनोहर

खग कलरव, मधुसिक्त सरोवर

ऐसे में तुम्हरे बिन प्रियतम

नीरस जीवन गीत,

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

कैसी लई परीक्षा मोरी

सौतन बन आई सुधि तोरी

मन वीणा के तंतु विखंडित

रूठ गया संगीत..

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

छलना था तो छलने आते

निज सर्वस्व लूट ले जाते

जब जब चाहा हारूँ तुमसे

पुनि पुनि जाऊं जीत,

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

 

 

 

क्या मांगता हूँ… एक गज़ल

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क्या मांगता हूँ इसकी मुझको खबर नहीं

या मेरी दुआओं का ही कोई असर नहीं

थोड़ी सी ख़लिश ने ही मरासिम मिटा दिए

दिवार-ए-अना इश्क में थी लाज़मी नहीं

फलदार था दरख्त बुलंदी भी थी बहुत

गुज़रे बहुत मुसाफिर ठहरा कोई नहीं

दुनिया को जीत पाने का जज्बा तो है मगर

बेकार है दिल जीतने का गर हुनर नहीं

जब टूट के मिला तो गरजमंद सा लगा

अब फासले पे कहते हैं मेरी फिकर नहीं

महफ़िल में रहा चर्चा सभी खासो आम का

अफ़सोस मेरा नाम रकीबों में भी नहीं

नज़र की भाषा अदाओं का गणित

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रात थी चांदनी सुहानी भी
लब पे थी अनकही कहानी भी

दिल में थी  पाक मोहोब्बत की महक
मन के कोने में बेईमानी भी

वैसे तो चेहरे पे सब लिक्खा है
कुछ तो ज़ाहिर करो ज़ुबानी भी

नज़र की भाषा अदाओं का गणित
हल भी करता हूँ तर्जुमानी भी

फिर नयी बात ने दिया नश्तर
यूँ तो भूली न थी पुरानी भी

रेत सी उम्र फिसलती जाए
और सुलझे नहीं कहानी भी

ये जो दुनिया से कह रहा हूँ मै
वो किसी खास को सुनानी थी

जोश-ओ-मस्ती,बुलंदी-ए-ख्वाहिश
वाह क्या चीज़ है जवानी भी

कैक्टस, गुलाब, और गुलाबजामुन

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नया वर्ष फिर आ गया है, रात से ही लोग इसे मनाने में लगे हुए है, खुश है लगता है कल से कुछ और होने वाला है, अपना  भला भले ही न कर पा रहे हों पर नए साल पर अपने इष्ट मित्रों के सारे दुःख दूर करने का पूरा प्रयास करेंगे, नए संकल्प करेंगे(वो बात अलग कि हर साल नए संकल्प  लेते है पर दो दिन में भूल जाते है अगले नए साल तक के लिए)   मैसेज भेजेंगे, इ मेल करेंगे, और भी बहुत से खेल होंगे नए वर्ष के नाम पर. कुछ नया करने के इरादे, कुछ नया पाने का लक्ष्य, कुछ नया पन, नया परिवर्तन लाने का संकल्प। सब के अपने अपने लक्ष्य होंगे नए वर्ष पर । पर असली नया वर्ष तो युवा वर्ग मानते है , दिल्ली के कनाट प्लेस  में डी जे की बीट पर थिरकने, कभी न पीने वाले भी दो घूट… के आलावा, और भी बहुत से तरीके अपनायेगे ये आज के होनहार नया वर्ष मानाने के लिए । पार्क भरे होंगे( खास कर पार्कों के दुर्गम कोने), सारी फिजा प्रेम मय होगी… देख कर  नहीं लगता की दुनिया से प्यार कम हो गया है .. किसी के एक्स्ट्रा क्लास होंगे, किसी को ज़रूरी नोट्स लेने दोस्त के घर जाना होगा, किसी के दोस्त की बर्थडे पार्टी होगी…. यानि सारे हथकंडे अपनाये जायेंगे घर से निकलने के(नया साल मानाने के)…. और फिर हो भी क्यों न…. नया साल कोई रोज़ थोड़े ही आता है? पूरा एक साल बाद ही आएगा ……….शायद पता न हो कि इस युग में जिसके बॉय या गर्ल फ्रैंड न हो उनका स्टेटस झुण्ड से निकाले गए बन्दर जैसा होता ॥ इस लिए नया साल बहुत सारी नयी संभावनाओं के साथ फिर हाज़िर है…. जो फायदा नहीं उठा पाया तो समझो अगला नया साल पूरे  एक साल बाद आएगा  और पता नहीं तथाकथित पुराने लोग  अगले साल ???…. । जिनके अपने आत्मीय लोग है उनको तो सलाह नहीं दूंगा, पर जिनके नहीं है उनके लिए मौका है …..इस सम्बन्ध में अपने एक गुरु टाइप मित्र से चर्चा भी की थी … उनकी फिलासफी नायाब है जिसे ब्लॉग दुनिया के समाज सेवियों तक पहुचने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ … बताया कि प्रबुद्ध और सु-समाज में संबंधों को तीन श्रेणियों में बाटा जा सकता है… कैक्टस, गुलाब, और गुलाब जामुन….मेरी उत्सुकता कुछ और बढ़ी…. वो कैसे भाई ये श्रेणियां तो पहली बार सुनने में आई है … किसी समाज शास्त्री ने नहीं लिखा, नेट पर भी नहीं मिली ये परिभाषा… जी हाँ यही तो है विशुद्ध फिलोसफी … समाज में संबंधों को तीन श्रेणियों में बाँट सकते है कैक्टस, गुलाब और गुलाब जामुन. ..  भाई वोकैसे? तो थोड़ी देर ध्यान मग्न रहने के बाद गुरु ने उवाचना शुरू किया ….  कैक्टस के रिश्ते वो होते है जो हम राह चलते कही भी बना लेते है… जैसे कैक्टस की ख़ास बात … देखने में बहुत सुन्दर होता है … उसे छू नहीं सकते….कांटे होते है उसमे….. छुआ नहीं कि… सूंघ नहीं सकते ….  खा भी नहीं सकते …….लेकिन देख सकते है … देखने में सुन्दर होते है और बड़े घर की शान होते है…. आम आदमी की पहुच से दूर…. छूते ही…… !!! और गुलाब? ……. गुलाब ??………..गुलाब को  छू सकते है , देख सकते है…. खाना वर्जित है (ये बात अलग है की लोग इस नियम का पूरी तरह से पालन नहीं करते) मै कुछ और उत्साहित हुआ …. मेरे प्रिय मित्र और तीसरा सम्बन्ध??? …. वो तो जी गुलाबजामुन वाला होता है …. जैसे गुलाबजामुन  देखने में तो काली होती है सुन्दर भले न लगे ………. पर उसे छू सकते है…. सूंघ सकते है…. चख सकते है……और तो और खा भी सकते है …  मेरा तो दिमाग घूम गया ये क्या फिलासफी हुई …. मेरी शंका या यूँ कहें आशंका थोड़ी बलवती हुई ….. थोडा और पास खिसक आया और पूछ ही लिया … आपने परिभाषा तो बता दी थोडा उदाहरण भी बता दें तो ….. मित्र उवाच …. पहला सम्बन्ध कैक्टस … राह चलते नज़रों -ही – नजरों में बना लेते है….. देखने में अच्छा लगता है पर छूना, चखना,….. सब वर्जित है, ऊँचे घरों में पाए जाते है … आम आदमी की पहुच से दूर…. छूते ही…… !!! और गुलाब? ……. गुलाब …… जैसे प्रेमिका प्रेमी का रिश्ता  गुलाब को  छू सकते है , देख सकते है…. खाना वर्जित है (ये बात अलग है की लोग इस नियम का पूरी तरह से पालन नहीं करते) और तीसरा?? गुलाब जामुन?? …….हाँ जी  ये सरकारी मान्यता प्राप्त रिश्ता है….. जैसे पति पत्नी का ….. देखने में काली बदसूरत भले ही लगे…. पर गुलाब जामुन देख सकते है …. चख सकते है…. छू सकते है……और खा भी सकते है…… इतना कह गुरु जी अंतर्ध्यान हो गए और मै ध्यान मग्न हो गया………..” नया वर्ष मंगलमय हो”