किट्टू एक खोज !

उसे दिल्ली लाने गए तो हमें नहीं पता था कि वो कैसी होगी। OLX पर बिल्ली का विज्ञापन देने वाला एक कॉलेज का लड़का एक महीने की कमज़ोर सी बड़े कान वाली बिल्ली को पकड़ा कर चला गया था, घर लाए तो पता चला लड़की है, नाम दिया गया “किट्टू”। “कुटकुट”(पहले वाला बिल्ला) के खो जाने के बाद घर मे छाई उदासी धीरे धीरे फिर से उल्लास में बदलने लगी, अब किट्टू के माँ बाप हम ही थे तो हमारे साथ ही सोती जागती, कई बार जब भी कहीँ फँसती तो हमें पुकारने की आदत बचपन से थी। 26 अगस्त को उमस और गर्मी से भरी बरसाती मौसम की एक सुबह थी। मोहन नगर के पास सूसू लगने से बेचैन किट्टू चलती कार से कूद गई। मोहन नगर गाज़ियाबाद वाले हाइवे के दोनों तरफ़ ग्रीन बेल्ट में बरसात ने घास फूस के जंगल खड़े कर दिए थे। फ्लाईओवर के नीचे रेलवे लाइन के किनारे आठ फिट से भी ऊँचे कास, सरपत और वन विभाग के जंगल में अचानक गुम हुई किट्टू ने होश उड़ा दिए। हाइवे के एक तरफ जंगल और उसके बाद वसुन्धरा के रिहाइशी फ्लैट। दूसरी तरफ पार्श्वनाथ सोसाइटीऔर बड़े बड़े फैक्ट्रियों के शेड। लगभग ढाई वर्ग किलोमीटर में फैले घास और कंक्रीट के जंगल मे एक फिट की किट्टू को ढूँढ निकालना भूसे के ढेर से सुई। खोजने की चुनौती थी। और हमें यह भी ज्ञात नहीं था कि वो गई किस दिशा में थी। उसी समय तेज़ धूप में ही खोज चालू हुई…

पहला दिन: कार की पिछली खिड़की से उसके कूदते ही पहला घण्टा बदहवासी में चारों तरफ हाइवे के किनारे दौड़ते बीता, किट्टू किट्टू चिल्लाते गला सूख गया, प्यास के मारे आँख के आगे अँधेरा छाने लगा, चार घण्टे की सतत खोज के बाद बेहोश हो जाने की स्थिति आ गई, लेकिन किट्टू का कोई अता पता नहीं चला। उद्विग्न और उदास मन के साथ घर लौट आया, उस रात एक घण्टे ही सो पाया। चूँकि किट्टू केवल कैट फ़ूड ही खाती थी और पानी बहुत पीती थी इस लिए जंगल मे उसके पानी खाना न मिलने की चिंता हमें सताए जा रही थी, डरी हुई बिल्लियाँ कई दिन तक खोए हुए स्थान पर छिपी रह सकती हैं, इस लिए हम कितना भी पुकारते कोई जवाब नहीं आने वाला था। उस दिन देर शाम तक भटक कर घर आना ही पड़ा।

दूसरा दिन: दूसरे दिन नए सिरे से खोज चालू हुई, लेकिन कोई अनुमान नहीं लग पा रहा था कि कार से कूद कर वो किस दिशा में गई होगी। सुबह के कई घण्टे झाड़ियों में ही खोजते बीत गए लेकिन कोई सूत्र हाथ नहीं आया तो हमने नए तरीके से खोज करने का संकल्प लिया। दुकान से पेपर पर किट्टू के खोने के पोस्टर प्रिंट करवाए और पार्श्वनाथ सोसाइटी और फैक्ट्री एरिया की ओर लगाए किन्तु परिणाम शून्य ही रहा । उधर बिटिया नानी के घर थी और बुद्धि के दिशाहीन घोड़े चक्कर खा कर गिर रहे थे। कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा था । यही हाल उस दिन संध्या को भी रहा, लगातार किट्टू को पुकारते घूमे लेकिन उधर से कोई जवाब न आया।

तीसरा दिन: पूरे घर मे बेचैनी और उदासी छा रही थी लेकिन बेटी के आ जाने के बाद निराशा के अंधेरे में संकल्प के नए बीज बोए गए, हमे पता था कि किट्टू ने जंगल में कुछ नहीं खाया होगा, पानी भी मिलना दूभर होगा और उसे खोजा नहीं गया तो अधिक दिन नहीं बचेगी। हमने संकल्प किया कि अपनी शक्ति भर खोज जारी रखेंगे। तीसरे दिन तक अनुमान हो गया कि बिना किसी सूत्र के हाथ लगे इतने बड़े क्षेत्र में उसे खोज पाना असम्भव है, जब कि उसके किसी भी ओर चले जाने की संभावना थी। हमने नई रणनीति तय किया और नए रंगीन स्टिकर वाले पोस्टर तैयार करवाए और हर संभावित क्षेत्र में देर रात तक पोस्टर लगते और लोगों से बातें करते रहे। लोग सुन कर चकित भी होते, आश्वासन भी देते लेकिन उसे तीसरे दिन तक किसी ने कहीं नहीं देखा। तीसरे दिन एक घर से सूचना मिली कि एक बिल्ली हमारे बाथरूम की छत पर बैठी थी। लगभग हुलिया वैसा ही बताया तो हमारा उत्साह बढ़ गया। खोज की सुई को पहली बार एक दिशा मिली। लेकिन उस दिन हम बिना किसी परिणाम वापस नोएडा आ गए।

चौथा दिन: चौथे दिन की एकदम सुबह एक फोन आया कि बिल्ली वहीं एक घर मे देखी गई है। हम पूरी तेजी से कार दौड़ाते हुए बीस मिनट में नोएडा से वसुन्धरा (लगभग 18 किलोमीटर) पहुँच चुके थे, लेकिन तब तक बिल्ली वहाँ से जा चुकी थी। उनके बताए विवरण ने हमें आशा से भर दिया और हमने उस स्थान पर खाना छोड़ने के साथ लिटर (बिल्ली के नित्य क्रिया के लिए एक विशेष मिट्टी) भी छिड़क आए। उसी दिन संध्या को फिर खोज चालू हुई, लेकिन बिल्ली का कोई अता पता नहीं। इसी बीच वसुन्धरा कॉलोनी में पैदल भटकते हुए किसी ने बताया कि सामने वाले पार्क में अभी अभी बिल्ली देखी गई है। हम भागे उस ओर, पार्क छान मारा, एक बिल्ली दिखी सफेद और बादामी रंग की, परन्तु !!….वो किट्टू नहीं थी ! अब हम फिर दिशाहीन अँधेरे में थे।

पाँचवाँ दिन: कल किसी और बिल्ली के मिल जाने से हम निराशा के गर्त में गोते लगाने लगे थे। निराशा के साथ-साथ हताशा ने भी घेरना चालू कर दिया, कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा था, समझ नहीं आया कि हज़ारों लोगों की बस्ती में किसी ने एक लावारिस बिल्ली को भटकते क्यों और कैसे नहीं देखा ! जबकि एक बिल्ली के खोने के इतने पोस्टर अब मुहल्ले में चर्चा का विषय बन चुके थे। पाँचवें दिन की सुबह भी इधर उधर भटकते ही बीत गई, हमने हाइवे के दूसरीं ओर फैक्ट्री के बड़े बड़े आहातों और शेडों को भी छान मारा। कई कई बार हाइवे की ढलान पर उगे बरसाती घास के झुरमुटों को छान मारा, अब हमें लगने लगा कि किट्टू कहीं किसी घर मे शरण ले चुकी होगी जिसको खोज पाना अब सम्भव नहीं लग रहा था। सुबह भटक कर हम वापस आ गए और लगभग सोच लिया कि आज शाम और खोजेंगे, नहीं तो न चाहते हुए खोज बन्द करने का निर्णय लेना ही पड़ेगा क्योंकि अब तक हमारे हाथ एक भी सार्थक सूत्र नहीं लगा था और हम पूरी तरह दिशाहीन थे। सन्ध्या को हम फिर वसुन्धरा लौटे, देर रात तक गलियों में भटकते रहे, पार्श्वनाथ सोसाइटी को हमने ये मान कर छोड़ दिया था कि उधर इतने पोस्टर लगे हैं कि कोई न कोई फोन आएगा ही। उस रात हम पूरी तरह से निराशा की गर्त में लगभग डूब ही चुके थे, ईश्वर से प्रार्थना करते हुए झुके कन्धों के साथ हम उस दिन खोज समाप्त कर लौट ही रहे थे कि ईश्वर की ओर से प्रज्ञा हुई कि एक बार जंगल के बीच मे बैठे IGL के गार्डों से मिल लेना चाहिए। रात के शायद 9 बजे जंगल में अँधेरा होने के बाद भी हम गार्ड के पास गए, तो गार्ड हमें देखते ही चौंका और कहा कि मैंने कल शाम एक सफेद बिल्ली इसी जंगल मे भटकती हुई देखा है, वो कूड़े के ढेर के पास बैठी थी, पकड़ने की कोशिश पर भाग गई । उसके बताए हुलिए से हमें रोमांच हो गया, फिर से आशा की किरण कौंध गई कि ये किट्टू ही थी और अब तक जंगल मे ही भटक रही है। किसी घर मे जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है। अब हमने खोज को नए सिरे से करने का निर्णय लिया और रात में खोज करने की नई योजना बनाई।

छठा दिन: छठे दिन सुबह 3:00 बजे मैं और बेटी जंगल और वसुन्धरा सेक्टर के सन्धि वाली लेन पर पहुँच चुके थे। उस दिन भयंकर उमस और गर्मी थी, कार चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था, हम कार की अगली सीट को नीचे कर लेटे हुए पौ फटने की प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन मन मे उद्विग्नता भी थी और आशा भी, इतनी सुबह पूरे सेक्टर में सन्नाटा छाया हुआ था। अचानक मुझे फिर प्रज्ञा हुई कि उठो …. हमने उठ कर जंगल के किनारे किनारे चक्कर काटने का मन बनाया और उठ कर घूमने लगे…. जंगल के किनारे चलते चलते टॉर्च का प्रकाश भी अँधेरे के लिए अपर्याप्त ही था, किन्तु अब हमारे पास एक दिशा थी, आज हम उस जंगल को छान मारने के दृढ़ संकल्प के साथ आए थे। उस समय सुबह के लगभग साढ़े चार बज रहे थे, हम टहलते हुए गली से निकल कर हाइवे की ओर लगभग मुड़ चुके थे जहाँ से जंगल समाप्त हो जाता था और कुत्तों से भरा मीट की दुकानों वाला क्षेत्र आ जाता था, उधर इतने कुत्ते होते थे कि उधर होने की बहुत कम संभावना थी। तभी अचानक बेटी हल्का सा ठिठकी, उसे देख मैं भी रुक गया, भोर की नीरवता में हल्की और बेहद क्षीण “म्याऊँ” की ध्वनि पहली बार तो हमें भ्रम लगी, किन्तु दोबारा हम सचेत हो चुके थे और ध्वनि दोबारा कान में पड़ते ही हम सचेत हो गए और आवाज़ का अनुमान कर वापस दौड़ पड़े…. इस बीच उसने कई बार हमें आवाज़ लगाई और हम उस दिशा में वापस बढ़ते रहे। हम पहले उसके पास से ही निकले थे और वो घास के झुरमुटों से हमें देख चुकी थी और हमारी बातों से हमें पहचान भी चुकी थी, पर उसे लगा हम उसे बुला लेंगे, लेकिन न हम उसे देख पाए थे, न बुलाया तो उसने स्वयं ही हमें बुलाया कि मैं यहाँ हूँ। हम जैसे ही वापस लौटे लगभग 10 मीटर दूर घास के झुरमुटों से निकल कर किट्टू हमारे सामने खड़ी थी, मैं रोमांचित हो उठा, बिटिया चीख उठी थी “ये किट्टू ही है, किट्टू ही है” और अनायास मैं वहीं बैठ गया और मेरे मुँह से निकला “आजा मेरे बच्चे, आजा मेरे बच्चे” ….. और वो दौड़ कर आई और गोदी में समा गई…. भाग कर हम कार में पहुँचे, डिब्बे से कैट फ़ूड निकाला तो वो टूट पड़ी, पाँच दिन से उसने कुछ नहीं खाया था, जंगल मे ही छुपी रही, बरसात भी हुई, गर्मी भी थी, अँधेरा और तमाम कुत्तों का डर भी था लेकिन वो किसी तरह बच गई।

किट्टू अपने घर आ गई, किन्तु उसमे कई परिवर्तन आ गए … अब थोड़ा गम्भीर हुई है… हमसे उसका जुड़ाव और बढ़ गया है… लेकिन अनजान लोगों से डरने लगी है। पेड़ पर चढ़ते हुए उसके सारे पंजे घिस गए हैं, लेकिन किट्टू के प्रति स्नेह के अंकुर अब और प्रगाढ़ हो चुके हैं।

किट्टू की खोज ने कहीं न कहीं हमें अपने आप को भी खोजने को विवश किया। अपना स्नेह, अपना धैर्य, अपना संकल्प और अपना संघर्ष… और बहुत कुछ मिला इस खोज में।

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी
 
स्वप्न बंधे जंजीरों में
आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ
आज समय विपरीत सही
विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ
स्वेद लिखेगा आने वाले
कल को बाज़ी किसकी होगी
झंझावात रुके हैं किससे
राहें होँ अवरुद्ध, भले होँ
जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य
कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी
क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षो का फल लाएगी …
 
हमने सीखा नहीं समय से
डर जाना घुट कर मर जाना
क्रान्ति और संघर्ष रहा है
परिवर्तन का ताना बाना
दुर्दिन के खूनी पंजों से
खेंच सुपल फिर वापस लाना
ठान लिया तो ठान लिया
पाना  है या कट कर मर जाना
थर्रायेंगे दिल दुश्मन के
वो भीषण हलचल लाएगी
क्रांति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी….
 
याचक बन कर जीना कैसा
घुट घुट आंसू पीना कैसा
रोशन होकर ही जीना है
धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा 
घात लगा कर गलियों गलियों
गद्दारों की फ़ौज खड़ी है
तूफानों  से घबरा जाए
वो भी कहो सफीना कैसा
हर पगडण्डी राजमार्ग तक
आज नहीं तो कल लाएगी
क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी ….

जीवन और स्मृति 

वो पहला दिन था ! जब मैं त्रिभुवन जी की साइकिल के आगे डण्डे पर बैठ कर स्कूल पहुँचा था। स्कूल के ही दो कमरे ब्लॉक ऑफिस के काम आते थे तो कुछ लोहे की सरकारी रंगीन बैलगाड़ियाँ स्कूल में ही खड़ी थीं। 25 पैसे फीस होती थी उस समय पहली क्लास की…चन्द पन्नों की एक ही किताब “हिन्दी बाल पोथी”.. महुए के पेड़ के नीचे बैटरी की कालिख से लकड़ी की पट्टी काली करना और सुलेख लिखना, महुए के पेड़ पर जहरीली चींटियां और 3 पैसे की एक पुड़िया “लकी” स्याही… सब इतना स्पष्ट याद है कि लगता है कल की बात है… पहली क्लास में एक लड़की (शायद सुशीला नाम था) मेरे से कुछ बड़ी थी, उसके साथ रहना मुझे बहुत सुखद लगता था, अक्सर हम घर से लाए पराँठे आपस मे शेयर भी करते…साथ साथ स्कूल के पिछवाड़े वाले बाग में घूमते और झरबेरी खाते। (अब सोचता हूँ तो लगता है क्या उस उम्र में भी कुछ प्यार व्यार जैसा तो नहीं रहा होगा?) लगभग 40 साल के इस अन्तराल में अगर वो याद रह गयी है तो कुछ विशेष तो थी ही… 

आज एक लम्बा समय निकल चुका है, देखते देखते लगभग 45 साल सर्र से निकल गए… सुबह, शाम, सुबह शाम… बहुत कुछ स्मृति में शेष है, ट्रिलियन ट्रिलियन डेटा मस्तिष्क तन्तुओं में सोया पड़ा है… 

तमाम ऐसी घटनाएँ जिन्हें हम खुद ही याद नही करना चाहते, लेकिन याद रह जाती हैं… बहुत से ऐसे पल जो समय की धूल में अदृश्य हो चुके हैं… कभी सोच कर देखिये आपकी स्मृति बचपन में कितने पीछे तक जा पाती है… क्या आपको माँ की गोद याद है ?.. क्या याद है कि आपके बचपन के सबसे पुराने खिलौने क्या थे ?…  मुझे लगता है मैं अपने बचपन के तीसरे साल तक की स्मृति में जा सकता हूँ…

ओशो कहते हैं अपने पूर्व जन्म की स्मृति में जाना सम्भव है… यहाँ तक कि बचपन के 6 माह तक बालक को अपने पूर्व जन्म की स्मृति होती है… समस्या यह है कि स्मृति में पीछे जाना टेप को उल्टा बजाने जैसा है… अगर हम स्मृति में पीछे जा भी पाए तो समझ पाना सम्भव नही होता…थोड़ी स्मृतियाँ जो टुकड़ों में रह जाती हैं वो टेप को रिवर्स कर के फिर सीधा बजाने जैसा है।

मनोविज्ञान में स्मृति एक पूरा विषय ही अलग है… स्मृति के विषय में आपकी अभिरुचि, सम्वेदना, अभिप्रेरणा ही नही चेतन और अचेतन में पड़ी इच्छाएँ और अनुभव भी प्रभावित करते हैं। 

तो एक बार प्रयास करिये आप अपने बचपन मे कितना पीछे जा सकते हैं, अपना पहला स्कूल का दिन, उससे पहले के दिन, या उससे भी पहले … आप देखेंगे कि आपके अनुभव बदल गए, समझने की क्षमता बढ़ गयी, रुचियाँ, स्वभाव, प्राथमिकताएं  सब बदलीं, लेकिन आप लगभग आज भी वैसे ही हैं… गौर से देखिये जो द्रष्टा है उसमें कोई परिवर्तन नही है।

 धीरे धीरे चलते हुए वर्तमान में आइए… द्रष्टा भाव से… वरना आप उदास हो सकते हैं… और फ़िर अगले पाँच साल आगे जाइये, दस साल, पन्द्रह साल या बीस पचीस साल आगे जाइये और स्वयं को देखिए… आप कहाँ होंगे, आप का शरीर कहाँ होगा… लेकिन ज़रूरी है हर घटना, सम्भावना की आँख में आँख डाल कर स्पष्ट देखने का प्रयास करना… संभव है आप स्थितप्रज्ञ हो जाएं।  

हिन्दू समाज को बांटने की राजनीतिक साजिश है सहारनपुर दंगे

Rastra Sandesh

दंगों की आग झेल रहा सहारनपुर सतही तौर पर भले ही दलितों और ठाकुरो के बीच की जातीय हिंसा लगे पर इसकी तह पर बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश की बू आती है। हज़ारों वर्षो के भारतीय इतिहास को अगर पलट कर देखे तो आप पाएंगे कि आज़ादी के 70 वर्षो बाद पहली बार ऐसा लग रहा था कि पूरा देश हिंदुत्व के साये में जातीय बेड़ियों को तोड़कर एकता के गठबंधन में बंधकर एकता के रास्ते पर अग्रसर होना चाहता है।

पर इससे पहले की इस गठबंधन को मजबूती मिलती हैदराबाद विश्वविद्यालय से रोहित वेमुला की आत्महत्या की खबर आती है और राष्ट्रीय पटल पर यह चर्चा का विषय बन जाता है कि देश में दलितों के साथ अन्याय हो रहा है और उन्हें इस प्रकार से शोषित किया जा रहा है कि उन्हें आत्महत्या पर विवश किया जा रहा है। इस पर जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक वामपंथी…

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दिल्ली सोशल मीट 11-4-16

फेसबुक वारियर्स… !! दिल्ली मीट !
लोग कहते थे आग बुझ गयी है, राख़ है ये 

जरा कुरेद के देखा तो मशालें निकलीं।
ये शे’र लिखते हुए मैं उम्मीद और नए उत्साह से भर जाता हूँ… सोशल मीडिया को निरा लफ़्फ़ाज़ी मञ्च और हवा हवाई कहने समझने वालों के लिए यह समझ लेना चाहिए कि वैचारिक क्रान्ति की जो जाग हुई है वो एक दिन आग भी बनेगी… और 
जो समझते हैं यहाँ खून नहीं पानी है… 

उनसे कह दूँ के ये दरिया बड़ी तूफानी है …. 
दिल्ली मे हुई मीट को मैं एक करवट के रूप मे देखता हूँ, एक मीटिंग से कोई निष्कर्ष निकल सकता था ऐसा मानना भी नहीं था। आभासी दुनिया से निकाल कर विचार जब सड़कों पर निकल पड़ें तो ये उस करवट की निशानी है जो सुबह की उजास के साथ जाग मे बदलेगी, उस चिंगारी की निशानी है जो एक दिन आग मे बदलेगी। पिछले लगभग दो सालों से देश मे एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है.. भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। बहस के आयाम बदल गए हैं… दशकों से छुपे हुए तमाम मकोड़े अचानक बिलबिला कर बिलों से बाहर आ गए हैं…एकजुट हो रहे हैं…  दाँव पर दाँव खेल रहे हैं… और ऐसे विरोध के अतिरेक मे जिस डाल पर बैठे हैं वही काटने को उतारू हो रहे हैं। 

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं….ऐसे मे वो कहीं न कहीं बहुत दिनों से सोए पड़े दूसरे धडे को भी झकझोर रहे हैं… जागने को मजबूर कर रहे हैं… दिल्ली मीट इसका एक उदाहरण है।

दिल्ली मीट बहुत Organized नहीं थी… बहुत व्यवस्थित भी नहीं थी… एजेंडा भी बहुत स्पष्ट नहीं था… कुछ लोग बोले  कुछ लोग चाह कर भी नहीं बोल पाए। मुद्दा JNU और मीडिया जैसे मुद्दों और समस्याओं की खोज के गोल दायरे मे घूमता रहा… वास्तव मे ऐसी मीटिंग्स से बहुत बड़ा परिवर्तन होने वाला है ऐसा भी मैं नहीं मानता.. ऐसे तमाम मिलन, बैठक, मीटिंग्स हम रोज़ करते हैं… मन मे जज़्बा भी है, जुनून भी है और ज़रूरत भी है… लेकिन हर बार एक कसमसाता हुआ सवाल सामने आ खड़ा होता है- आखिर हम करें तो क्या करें ? … लड़ाई के हजारों छोटे बड़े मोर्चे हैं कि शुरुआत कहाँ से करें, कैसे करें और किसके खिलाफ़ करें? लेकिन जब हम आभासी दुनिया से निकल कर आमने सामने मिलते हैं तो उसके मायने बदल जाते हैं… जब हम एक साथ बैठते हैं तो हमारी तमाम सोच तमाम ऊर्जा और शक्ति जो अलग अलग दिशाओं मे बहती है उसको संगठित होने और एक दिशा पाने का अवसर मिलता है… और एक प्रश्न भी मिलता है ” Who am I ” टाइप का… हम अपनी स्थिति कुछ और स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं। 
ऐसे मिलन और होने चाहिए… हजारों की संख्या मे होने चाहिए…अपने अपने क्षेत्र मे कम से कम सभी वैचारिक समझ रखने वाले लोग आपस मे एक दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जाने। …. समाधान, परिवर्तन, और परिणाम इसके बारे मे तुरन्त आशा करना व्यर्थ है। अन्ना आंदोलन जैसे दूध के उफ़ान बनने से कुछ नहीं होगा… बाबा रामदेव(जिसे मिर्ची लगे वो इससे बड़ा योग, आयुर्वेद और स्वदेशी का काम कर के दिखा दे) जैसे दूरदर्शी और सुव्यवस्थित सोच के साथ बढ़ना होगा… सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य है… अपनी अपनी विशेषज्ञता … लेकिन लक्ष्य एक है… बाकी सब गौण हैं… साधन अनेक हैं… साध्य एक है… यही सोच रखेंगे तो सब अच्छा होगा…. अंत मे शुभेक्षा के साथ कुछ बिन्दु आगे  होने वाली मीटिंग्स के लिए छोडना चाहूँगा-
1- आगे के मिलन किसी बन्द स्थान मे रखे जाएँ(मंदिर, सभागृह, स्कूल) 

2- पहले से चर्चा का एक विषय तय हो तो अच्छा होगा

3- चर्चा के मुख्य विषय पर कुछ विशेषज्ञ भी हों। 

3- सभी स्वयं का परिचय कराएँ, सभी एक दूसरे को कम से कम पहचानें 

4- विचार के लिए फेसबुक पहले से है, मीटिग् मे अपने क्षेत्र मे मित्रवत संगठन या ग्रुप्स पर विशेष ज़ोर हो। 

5- यह तय हो कि यदि आवश्यक हुआ तो उस क्षेत्र के फेसबुक वारियर्स अल्प समय मे कब कहाँ और कैसे मिलेंगे। 
…………….. बहुत कुछ है …. दो लाइन लिखने वाले से इतना लिखवा लिया… ज़्यादा ज्ञान(तथाकथित) देने से कोई फायदा नहीं है… लगे रहिए… जूझते रहिए… हार नहीं माननी और … भाई अजीत सिंह की तरह कहूँ तो …(छोड़ो पोस्ट की ऐसी तैसी नहीं करानी) 😛 … 
ज़िन्दाबाद …. फेसबुक वारियर्स ज़िन्दाबाद  !!

धूप …

सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप
एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप

लाँघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर
धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप

मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये
पाँव छू, उंगली पकड़ फिर सर पे चढ जाती है धूप

किस कदर चालाक है ख़ुर्शीद की बेटी भला
खिज़ां का इल्ज़ाम रुत के सर पे मढ़ जाती है धूप

देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले
शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप

पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर
जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप
-पद्म

मेरा एकांत

मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है
कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो… 
क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर 
चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का 
दहकती हुई किसी कविता की आग निचोड़ो
नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद 
मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत 
या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश 
जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों 
तुन जिस तरह उस लड़की से
विदा ले रहे थे 
मैं समझ गया था 
तुम चप्पू भले चलाओ
घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे 
उड़ान कितनी ऊँची कर लो
चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे 
उछालो न कोई नाद चौताला 
नोच फेंको मुखौटे  
वरना जब भी मिलो गे अकेले
छोड़ूँगा नहीं 
जबकि पता ये भी है
गोलचक्कर में भागोगे
तो कहाँ जाओगे 
जब भी खुद से लड़ोगे
मुँह की खाओगे
-पद्म सिंह 15-03-2017