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मेरा एकांत

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मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है
कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो… 
क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर 
चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का 
दहकती हुई किसी कविता की आग निचोड़ो
नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद 
मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत 
या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश 
जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों 
तुन जिस तरह उस लड़की से
विदा ले रहे थे 
मैं समझ गया था 
तुम चप्पू भले चलाओ
घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे 
उड़ान कितनी ऊँची कर लो
चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे 
उछालो न कोई नाद चौताला 
नोच फेंको मुखौटे  
वरना जब भी मिलो गे अकेले
छोड़ूँगा नहीं 
जबकि पता ये भी है
गोलचक्कर में भागोगे
तो कहाँ जाओगे 
जब भी खुद से लड़ोगे
मुँह की खाओगे
-पद्म सिंह 15-03-2017

अम्मा

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जाड़े की सुबह

एकदम तडके ही

मेरे तापने को

अलाव जला देती हैं

फिर ओखली में कुटे

मांड वाले चावल के लिए

अदहन चढा देती हैं

बहुत जतन से मुझे पोसती हैं अम्मा

मुझे नहलाती है कस कस के

जमी हुई कीचट साफ करती हैं

मै सिसियाता हूँ ठण्ड से

वो गरियाती है मुओं को

जो मुझे खेलने को साथ ले गए

फिर अनायास मुझे देख मुस्का देती हैं अम्मा

हथेली में मेरा चेहरा पकड़

तेलहुंस बालों में कंघी करती हैं

आँखों में काजल डाल

माथे पर डिठौना लगाती हैं

और एक पल में

राजा बाबू बना देती हैं अम्मा

मुझे मेरे भगवान दिखाती हैं

झुक कर प्रणाम करवाती हैं

या किताबों के फटने पर

विद्या माता का डर दिखाती हैं

और कुछ इसी तरह मुझमे

आस्था का दीप जलाती हैं अम्मा

होली की सुबह

उबटन लगाती हैं

सरसों के दाने उवार कर

फिर कच्चे धागे से मेरी नाप ले

होलिका मैया में डाल देती है

और अगले साल मेरे बड़े हो जाने का

स्वप्न सजाती हैं अम्मा

द्वार पर किसी याचक बाबा को

मेरे हाथों छोटी सी टोकरी से

धान दिलवाती हैं और

इसी तरह मेरे लिए

बहुत से असीस इकठ्ठा करती हैं अम्मा

स्कूल से जल्दी भाग आने पर

या मेरे माटी में खेलने पर

मुझे डांटती हैं

कभी कभी गाल को लाल

या कान को खटाई कर देती हैं अम्मा

और इसी बहाने

यादों में ही सही

एक एक संस्कार

फिर से जगाती हैं

संवारती हैं मुझे

मेरी सब पूंजी

बनावटी उसूल

परत दर परत चेहरा

सब छीन कर

दो पल को

मेरा बचपन लौटा देती हैं अम्मा


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