भ्रष्टाचार

जूता पचीसी

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कई बार मज़ाक मे लिखी गयी दो चार पंक्तियाँ   अपना कुनबा  गढ़ लेती है… ऐसा ही हुआ इस जूता पचीसी के पीछे… फेसबुक पर मज़ाक मे लिखी गयी कुछ पंक्तियों पर रजनीकान्त जी ने टिप्पणी की कि इसे जूता बत्तीसी तक तो पहुँचाते… बस बैठे बैठे बत्तीसी तो नहीं पचीसी अपने आप उतर आई… अब आ गयी है तो आपको परोसना भी पड़ रहा है… कृपया इसे हास्य व्यंग्य के रूप मे ही लेंगे ऐसी आशा करता हूँ।

जूता मारा तान के लेगई पवन उड़ाय
जूते की इज्ज़त बची प्रभु जी सदा सहाय ।1।
 
साईं इतना दीजिये दो जूते ले आँय
मारहुं भ्रष्टाचारियन जी की जलन मिटाँय   ।2।
 
जूता लेके फिर रही जनता चारिहुं ओर
जित देखा तित पीटिया भ्रष्टाचारी चोर ।3।
 
कबिरा कर जूता गह्यो छोड़ कमण्डल आज
मर्ज हुआ नासूर अब करना पड़े इलाज ।4।
 
रहिमन जूता राखिए कांखन बगल दबाय
ना जाने किस भेस मे भ्रष्टाचारी मिल जाय ।5।
 
बेईमान मचा रहे चारिहुं दिसि अंधेर
गंजी कर दो खोपड़ी जूतहिं जूता फेर ।6।
 
कह रहीम जो भ्रष्ट है, रिश्वत निस दिन खाय
एक दिन जूता मारिए जनम जनम तरि जाय ।7।
 
भ्रष्टाचारी, रिश्वती, बे-ईमानी,   चोर
खल, कामी, कुल घातकी सारे जूताखोर ।8।
 
माया से मन ना भरे, झरे न नैनन नीर
ऐसे कुटिल कलंक को जुतियाओ गम्भीर ।9।
 
ना गण्डा ताबीज़ कुछ कोई दवा न और
जूता मारे सुधरते भ्रष्टाचारी चोर  10।
 
जूता सिर ते मारिए उतरे जी तक पीर
देखन मे छोटे लगें घाव करें गम्भीर ।11।
 
भ्रष्ट व्यवस्था मे चले और न कोई दाँव
अस्त्र शस्त्र सब छाँड़ि के जूता रखिए पाँव ।12।
 
रिश्वत खोरों ने किया जनता को बेहाल
जनता जूता ले चढ़ी, लाल  कर दिया गाल  ।13।
 
रहिमन काली कामरी, चढ़े न दूजो रंग
पर जूते की तासीर से  भ्रष्टाचारी दंग  ।14।
 
थप्पड़ से चप्पल भली, जूता चप्पल माँहिं
जूता वहि सर्वोत्तम जेहिं भ्रष्टाचारी खाहिं  ।15।
 
रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि
जहाँ काम जूता करे कहाँ  तीर तरवारि ।16।
 
जूता मारे भ्रष्ट को, एकहि काम नासाय
जूत परत पल भर लगे, जग प्रसिद्ध होइ जाय ।17।
 
भ्रष्ट व्यवस्था मे कभी मिले न जब अधिकार
एक प्रभावी मन्त्र है, जय जूतम-पैजार ।18।
 
जूता जू ताकत  फिरें  भ्रष्टाचारी चोर
जूते की ताकत तले अब आएगी भोर ।19।
 
रिश्वत दे दे जग मुआ, मुआ न भ्रष्टाचार
अब जुतियाने का मिले जनता को अधिकार ।20।
 
एक गिनो तब जाय के जब सौ जूता हो जाय
भ्रष्टाचार मिटे तभी जब बलभर जूता खाय।21।
 
दोहरे जूते के सदा  दोहरे होते  काम
हाथों का ये शस्त्र है पैरों का आराम ।22।
 
पनही, जूता, पादुका, पदावरण, पदत्राण
भ्रष्टाचारी भागते नाम सुनत तजि प्राण ।23।
 
जूते की महिमा परम, जो समझे विद्वान
बेईमानी के लिए जूता-कर्म निदान ।24।
 
बेईमानी से दुखी रिश्वत से हलकान
जूत पचीसी जो पढ़े, बने वीर बलवान ।25।

कुल मिला कर ज़ीरो…

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SAnjay 006कई महीने हो गए ब्लॉग पर कुछ लिखे हुए…. लिखते रहने के अतिरिक्त कुछ करने की सोच कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा के साथ हो लिया…. हर अनशन, हर मोर्चे, और हर जुलूस मे कभी झंडे लिए तो कभी मोमबत्ती जलाए गले फाड़ता रहा…भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब ज़िन्दाबाद…. लोगों ने अपने एयरकंडीशंड घरों से स्वतः निकल कर मोमबत्ती जलाई और हमारे साथ हो लिए… ऐसा लगने लगा जैसे अब क्रान्ति हो चुकी है… अब हो न हो देश से भ्रष्टाचार के काले बादल छंट जाएँगे… नया सवेरा आने ही वाला है… परन्तु सरकारी पैंतरों और गुलाटी खाते सत्तासीन चुने हुए(वास्तव मे छंटे हुए) प्रतिनिधियों को देख कर लोकतन्त्र और संसद की सर्वोच्चता का असल मतलब… और मकसद दोनों काफी कुछ(जितनी आम जनता की समझ की औकात है) समझ मे आई…. समझ तो आप को भी आ गयी होगी… पर पुनः ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करते हुए एक लोकोक्ति कहना चाहूँगा…

दो टके की हाँडी गयी तो गयी…. कुत्ते की जात तो पहचान मे आई

बस मन मे बहुत खुन्नस है… धीरे धीरे निकलेगी… फिलहाल इसे बाँच लीजिये…. लिख दिया… ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए…

भ्रष्टाचार, काला धन
बाबा का आंदोलन
अन्ना का अनशन
ज्वाइंट  मीटिंग
सरकारी चीटिंग
लोगों का सपोर्ट
बाबा एयरपोर्ट
मान मनौवल
सरकारी सिर फुटौव्वल
बाबा का अनशन
सत्ता  से अनबन
अनशन पर वार
बाबा तड़ीपार
अनशन पर शर्तें
साजिश की परतें
अन्ना को जेल
दमन का नंगा खेल
वार्ता, करार,
सोनिया फरार
राहुल को कमान
राम लीला मैदान
ओमपुरी का बयान,
संसद का अपमान,
अग्निवेश का फोन
मनमोहन का मौन
राहुल का बयान
मीडिया की उड़ान
स्थायी कमेटी,
सिंघवी की हेटी
पासवान की टांग
आरक्षण की मांग
सर्वदलीय मीटिंग
बैकडोर चीटिंग
फेसबुक निगरानी
दमन की कहानी
बार बार मीटिंग
भितरघात चीटिंग
नहीं बनी बात
धाक के पात
हाँ हाँ, ना ना
चीं चीं, काँ काँ
धीरे धीरे आम लोग
पक गए तमाम लोग
अन्ना बन गए हीरो
बंसी बजाए नीरो 
हासिल रहा ज़ीरो…
कुल मिला कर ज़ीरो…

(ज़ीरो मतलब सुन्ना…  “0” मौज करो मुन्ना)

….. पद्म सिंह

हम आम आदमी … (कविता)

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हम आम आदमी हैं
किसी ‘खास’ का अनुगमन हमारी नियति है
हमारे बीच से ही बनता है कोई खास
हमारी मुट्ठियाँ देती हैं शक्ति
हमारे नारे देते हैं आवाज़
हमारे जुलूस देते हैं गति
हमारी तालियाँ देती हैं समर्थन ….
तकरीरों की भट्टियों मे
पकाए जाते हैं जज़्बात
हमारे सीने सहते हैं आघात
धीरे धीरे
बढ़ने लगती हैं मंचों की ऊँचाइयाँ
पसरने लगते हैं बैरिकेट्स
पनपने लगती हैं मरीचिकाएं
चरमराने लगती है आकांक्षाओं की मीनार
तभी अचानक होता है आभास
कि वो आम आदमी अब आम नहीं रहा
हो गया है खास
और फिर धीरे धीरे …..
उसे बुलंदियों का गुरूर होता गया
आम आदमी का वही चेहरा
आम आदमी से दूर होता गया
लोगों ने समझा नियति का खेल
हो लिए उदास …
कोई चारा भी नहीं था पास
लेकिन एक दिन
जब हद से बढ़ा संत्रास
(यही कोई ज़मीरी मौत के आस-पास )
फिर एक दिन अकुला कर
सिर झटक, अतीत को झुठला कर
फिर उठ खड़ा होता है कोई आम आदमी
भिंचती हैं मुट्ठियाँ
उछलते हैं नारे
निकलते हैं जुलूस ….
गढ़ी जाती हैं आकांक्षाओं की मीनारें
पकाए जाते हैं जज़्बात
तकरीर की भट्टियों पर
फिर एक भीड़ अनुगमन करती है
छिन्नमस्ता,……!
और एक बार फिर से
बैरीकेट्स फिर पसरते हैं
मंचों का कद बढ़ता है
वो आम आदमी का नुमाइंदा
इतना ऊपर चढ़ता है …
कि आम आदमी तिनका लगता है
अब आप ही कहिएये दोष किनका लगता है?
वो खास होते ही आम आदमी से दूर चला जाता है
और हर बार
आम आदमी ही छ्ला जाता है
चलिये कविता को यहाँ से नया मोड़ देता हूँ
एक इशारा आपके लिए छोड़ देता हूँ
गौर से देखें तो हमारे इर्द गिर्द भीड़ है
हर सीने मे कोई दर्द धड़कता है
हर आँख मे कोई सपना रोता है
हर कोई बच्चों के लिए भविष्य बोता है
मगर यह भीड़ है
बदहवास छितराई मानसिकता वाली
आम आदमी की भीड़
पर ये रात भी तो अमर नहीं है !!
एक दिन ….
आम आदमी किसी “खास” की याचना करना छोड़ देगा
समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई,
वक्त की मजबूत कलाई मरोड़ देगा
जिस दिन उसे भरोसा होगा
कि कोई चिंगारी आग भी हो सकती है
बहुत संभव है बुरे सपने से जाग भी हो सकती है
और मुझे तो लगता है
यही भीड़ एक दिन क्रान्ति बनेगी
और किस्मत के दाग धो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी

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…… पद्म सिंह  09-09-2011(गाजियाबाद)

बंदर बनाम टोपीवाले …

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एक कहानी बचपन से सुनते आये हैं… एक टोपी वाला जंगल से गुज़र रहा था. दोपहरी चटख रही थी. दो घड़ी आराम करने की नीयत से वह एक पेड़ के नीचे अपनी टोपियों की टोकरी रखकर सो गया… थोड़ी देर में जब उसकी तन्द्रा टूटती है तो उसने देखा कि बंदरों के एक झुण्ड ने उसकी टोपियाँ उठा ली हैं और लेकर पेड़ पर चढ गए हैं. टोपी वाला पहले तो बहुत मिन्नतें की लेकिन बंदर तो बंदर… अनुनय विनय का तरीका काम न आने पर टोपीवाले ने सहज बुद्धि का इस्तेमाल किया और बंदरों की नकल करने की आदत का फायदा उठाया. उसने टोकरी में बची हुई एक टोपी को बंदरों को दिखाते हुए अपने सर पर पहन ली… जैसा की बंदरों की आदत होती है… टोपीवाले की नकल करते हुए बंदरों ने भी टोपी सर पर रख ली…जब टोपीवाला टोपी हाथ में ले लेता तो बंदर भी टोपी हाथ में ले लेते… अंत में टोपीवाले ने अपनी टोपी सर से उतार कर जोर से ज़मीन पर दे मारी… लेकिन ये क्या ? एक भी बंदर ने ऐसा नहीं किया ? बल्कि लगे खिलखिला कर हँसने…बल्कि बंदरों ने टोपी फिर से अपने सिर पर धारण कर ली… टोपी वाला अचंभित…उसने लाख दिमाग लगाया लेकिन माजरा कुछ समझ में नहीं आया…
हर टोपीवाला अपने इतिहास से सीखता है कि अपनी टोपी बचाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं…उनसे पहले के टोपीवालों ने अपनी टोपियाँ कैसे बचाई थीं?… और हमेशा उन्हीं तरीकों का प्रयोग भी करते रहे… लेकिन उधर बंदरों ने भी पीढ़ी दर पीढ़ी टोपी वालों का खेल देखा था… बंदरों ने टोपीवालों की चालाकियों को बखूबी समझ लिया था और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी टोपी वालों की चालाकियों से सचेत कर दिया…. समय के साथ साथ साथ सभी ने अपनी गलतियों से सीख ली और समझ लिया था कि टोपी वाले कैसे उनकी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं… जबकि टोपी वाले पीढ़ी दर पीढ़ी बंदरों को एक ही तरीके से जीतने की कोशिश करते रहे …और कभी कल्पना नहीं की थी कि बंदर भी कभी अपनी पुरानी कमियों से सीख लेकर कहीं अधिक चालाक हो जायेंगे… यही कारण कि बंदरों ने अचानक नयी गुलाटी खाई और टोपी वालों को चारों खाने चित कर दिया…
यही नहीं कालान्तर में धीरे धीरे बंदरों ने अपनी नस्ल को और उन्नत करने के लिए एक संकर नस्ल की मादा को  अपने परिवार में लाये.. संकर नस्ल हमेशा चालाक होती है ये वैज्ञानिकों का कहना है.. फिर चालाक बंदरों ने मनुष्यों जैसे वेश धर लिए और मनुष्यों में जा मिले.. कईयों ने सफ़ेद खद्दर के कुर्ते बनवाए सर पर गाँधी टोपी पहनी और चुनाव लड़ते हुए इंसानी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए सत्ता में भी अपनी पैठ बना ली…अपने हिसाब से क़ानून बनाने लग गए.. अपने वंशजों को समाज के हर क्षेत्र में फैला दिए.. किसी को उद्योगपति, किसी को मठाधीश बनाए तो किसी को सरकारी मशीनरी में फिट कर दिया… मनुष्यों के वेश में मनुष्यों को लूटने के लिए सिंडिकेट बना लिए… मनुष्यों द्वारा दुरियाए जाने वाले बंदरों ने मनुष्यों पर ही राज करना शुरू कर दिया… अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुसार तरह तरह की गुलाटियाँ खाना और कलाबाजियाँ करना नहीं भूले…. बंदरों ने इस बार मनुष्यों की मान मर्यादा की प्रतीक टोपी को निशाना नहीं बनाया बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी धन दौलत पर हाथ साफ़ करने लगे और अरबों खरबों रूपये हड़प कर उड़न खटोलों पर जा चढ़े और विदेशों में छुपा आये..अपने पास रखने का जोखिम भी नहीं उठाया क्योंकि बंदर अपनी आदतों को जान चुके थे.. किसी तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते थे . इधर इंसान हलाकान परेशान होने लगे लेकिन हमेशा अपनी लालच का शिकार हो इन्हीं बंदरों को चुन कर सत्तासीन करते रहे… कुछ लोगों को इन बंदरों पर शक भी हुआ और कुछ की तन्द्रा भी टूटी… समस्या विकट थी… चारों तरफ धन दौलत के अम्बार लेकर उड़न खटोलों पर चढ़े हुए बंदर ही बंदर और अपना पेट पालने में हैरान हलाकान औंघाई हुई जनता… खलबली तब मची जब चंद जागे हुए लोगों द्वारा समस्या के हल खोजे जाने लगे…
इंसान सदा से हर समस्या का हल धर्म-गुरुओं, परम्पराओं और पुरातन-पोथियों में खोजता रहा है, “महाजनो येन गतः स पन्थाः” की तर्ज़ पर आँख मूँदे झुण्ड की शक्ल में चलता रहा है. इस बार भी इतिहास खंगाले गए… पोथियाँ पलटी गयीं… पर इन्हें इतिहास में फिर एक टोपीवाला ही मिला जिसका रास्ता ही सबसे प्रभावी लगा… मिल जुल कर कुछ लोग एक टोपी वाला खोज लाये… क्योंकि उनका अनुभव बताता था कि टोपी वाले ही उत्पाती बंदरों से निपटते आये हैं… साथ ही एक भगवा धारी बाबा ने अपनी तरफ से मोर्चा खोल दिया… अब बंदरों में खलबली मच गयी…. घबराए हुए बंदरों की अम्मा ने उन्हें समझाया बेटा ये इंसान हैं.. ये पीढ़ी दर पीढ़ी लकीर के फ़कीर होते हैं… इनकी हर अगली चाल को हम हिंदी सिनेमा के सीन की तरह आसानी से भांप सकते हैं… ये ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे … अनशन करेंगे… भूखे रहेंगे… सड़कों पर चिल्लायेंगे…भाषण बाज़ी करेंगे… सोशल साइट्स पर हमें कोसेंगे..गरियायेंगे … क्योंकि इनकी परंपरा यही कहती है… अहिंसा परमो धर्मः… पंचशील सिद्धांत…बस यही सब … तो इन मनुष्यों से घबराने की ज़रूरत नहीं है…
एक तरफ बाबा और एक तरफ टोपी वाला … दोनों तरफ से बंदरों पर दबाव बढ़ने लगा… यहाँ तक कि उन्हें मनुष्यों के वेश में रहना मुश्किल हो गया… और खीज में एक दिन बंदरों की मूल प्रवृत्ति उजागर हो ही गयी और खिसियाये हुए बंदर एक साथ इनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए भगवाधारी बाबा पर खौंखिया कर दौड़ पड़े… … बाबा इस अप्रत्याशित हमले से जैसे तैसे जान बचा कर निकले … उधर टोपी वालों ने अलग नाक में दम कर रखा था… रोज़ धरने की धमकी… अनशन की चेतावनी… बंदरों ने अपने कुछ चालाक और कुटिल प्रतिनिधियों को छाँट कर टोपी वालों से निपटने के लिए एक गोल बनाई और जैसे कभी इंसान ने बंदरों को लालच दिया था… आज बंदरों ने टोपीवालों को लालच दी… और टोपी वाले उनकी चाल में फंस गए…
जैसे कभी मनुष्यों ने उन्हें अपनी शर्तों और इशारों पर नचाया था… आज ये मण्डली टोपी वालों को नचाने लगी… रोज़ नई तरह की बातें… रोज़ नए तरह के पैंतरे… और लाख कोशिशों के बाद आज भी बन्दर टोपी वालों पर भारी हैं… टोपी वालों के पास पोथियों में और इतिहास के पन्नों में एक ही तरीका लिखा है इन लंगूरों से निपटने का…और कोई रास्ता अपनाते देख बंदर उन्हें बदनाम करने में लग जाते हैं.. इधर बंदर दिन ब दिन अपनी चालाकियों और गुलाटियों में परिवर्धन करते गए.. अपनी गलतियों से सीखते गए.. अपडेट होते गए… बंदरों ने लालकिले की प्राचीरों पर अपना मोर्चा लगा रखा है …चंद मनुष्यों ने पुराने जंग खाए तमंचे में तेल लगा कर तोपों से मोर्चा लेने की ठान रखी है… फिर से पुराने तरीकों पर अमल करने में लगी है .. बाकी जनता आज भी अपनी टोकरी पेड़ के नीचे रख कर सो रही है ….कई तो यह मानने को भी तैयार नहीं कि उनकी टोकरियों को खाली करने के साथ साथ बंदरों ने उनके तन से कपड़े भी उतार लिए हैं और गाँठ में रखी रोटी भी छीन ली है… उधर बंदर अपनी हर कमियों को सुधार कर मनुष्यों से निपटने के नए नए गुर सीखने में लगे हैं.
सो… टोपीवाले फिर से अनशन की तैयारियाँ कर रहे हैं… फिर से भूख हड़ताल की धमकियाँ दे रहे हैं… उधर सारे बंदर पेड़ छोड़ कर उड़न खटोलों की सवारी कर रहे हैं… और धीरे धीरे मनुष्यों के धन के साथ टोपी (धर्म) और रोटी के साथ कपड़ा और मकानों पर भी नज़र जमाये हुए हैं…. कुछ लोग बंदरों को पहचान कर भी कुछ करने में असमर्थ हैं… कुछ लोग कुछ पहचानने को तैयार नहीं हैं… और कुछ लोग तो उनकी नस्ल में शामिल होने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं….
फिलहाल ……..बंदरों और टोपी वालों में जंग जारी है…
———————padmsingh 9716973262  21-07-2011

गाँधी जी के मजबूर बंदर ….(पद्म सिंह)

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वे जाने कब से  आने जाने वालों को मौन सीख दे रहे हैं,  सीख दे रहे हैं कि… बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, और बुरा मत सुनो…. इसके लिए एक ने अपना मुँह बंद कर रखा है, दूसरे ने अपनी आँखें तो तीसरे ने अपने कान बंद कर रखे हैं… एक दिन सामने से सामने से गुजरते हुए अचानक उत्सुकता जागी तो इनसे पूछ बैठा,… गाँधी जी के बंदरों, गाँधी जी ने तुम्हें ऐसा ही सिखाया है,,,, कि बुरा मत बोलो इस लिए अपने मुँह बंद कर लो, बुरा मत देखो, इस लिए आँखे बंद कर लो, बुरा मत सुनो इस लिए कान बंद कर लो… ये तो हुई गाँधी जी की सीख की बात… अपने दिल की बात भी तो कहो कुछ?

तीनों बंदरों का चेहरा बेचारगी से भर गया…. वे बोले…. ये शिक्षाएँ आज के युग में प्रासंगिक तो हैं लेकिन शायद अपर्याप्त लगने लगी हैं… आज गाँधी जी के सिखाये रास्ते पर चलना असंभव है,,,, आँखें बंद करते हैं तो कान खुले रह जाते हैं…. सरे आम भ्रष्टाचार, बलात्कार, और अनैतिकता की हदें पार करती ख़बरें कानों में पड़ ही जाती हैं…कान बंद करते हैं तो आँखें खुली रहती हैं और इन्हीं आखों से समाज और दुनिया की तेज़ी से अधोमुखी प्रगति की तस्वीर दिखाई देती है… ऐसे में मुँह बंद रखना असहनीय होता जा रहा है…

हम तो गाँधी जी के बंदर हैं…. हमारी मजबूरी है कि हम अपना तरीका नहीं बदल सकते… लेकिन  अब तो बस यही लगता है….कि समय के साथ साथ लोगों को अपना नजरिया बदल लेना चाहिए….

आज की परिस्थितियां ऐसी नहीं रहीं कि अपने आँख कान मुँह बंद कर के रखे जाएँ… बल्कि आज आवश्यकता यही है… कि आँखें पूरी तरह से खुली रखा जाए और हर बुराई पर कड़ी नज़र रखी जाए…. छद्म वेश धारी पाखण्डी और नकली मुखौटे वाले चेहरों को पहचाना और बेनकाब किया जाए….

अपने कान पूरी तरह से खुले रखे जाएँ… जिससे समाज, देश और भविष्य के प्रति रची जा रही हर साजिश की आहट को सुना और महसूस किया जा सके…

और इन साजिशों और हर बुराइयों को पहचानते हुए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने मुँह को भी खुला रखा जाय… किसी बुराई अथवा अत्याचार  को देखते समझते हुए भी मुँह बंद रखना भी बुराई ही है…. इस हम गाँधी जी के बंदरों को जाने दें… हम भले अपने आकाओं से मजबूर हैं लेकिन आम जन को हम यही सीख देना चाहेंगे कि अपनी आँख कान खुले रखें और बुराइयों, अत्याचार और छद्मवेशी आस्तीन के साँपों के खिलाफ़ अपनी आवाज़ को बुलंद किया जाए…

गाँधी जी के  बंदर

मजबूर हैं गाँधी जी की सीखों से

तभी तो आखें,कान मुँह

बंद कर रखे हैं……

अनभिज्ञ हैं

मानवता की चीखों से

वो बंदर हैं

नासमझी का दामन थाम

मजबूरी के नाम पर

न कुछ देखते हैं

न सुनते हैं

या सबकुछ देख सुन कर भी

चुप रहते हैं

गाँधी जी के नाम पर

लोग कब तक

बंदर बने रहेंगे

बुराई न देखेंगे

बुराई न सुनेंगे

बुराई के लिए

मुँह बंद रखेंगे…..

और कुछ भी नहीं कहेंगे…

अरे भाई नेता होना कोई बच्चों का खेल है…??

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आखिर कोर्ट की (खमखा) दखलंदाज़ी से पूर्व संचार मंत्री घोटाले के “राजा”  को(सानुरोध, सविनय) गिरफ्तार कर लिया गया है। खबर है कि इस के लिए करुणानिधि की खुशामद कुछ यूँ करनी पड़ी है यूपीए सरकार को…

तुम्हारा साथ  हमें यूँ बड़ा सुहाना लगे….

मै एक मंत्री पकड़ लूँ अगर बुरा न लगे

जहाँ सीबीआई राजा और उनके सचिव के खिलाफ पर्याप्त सुबूत इकट्ठा करने का दम भर रही है वहीं डीएमके राजा को बचाने मे लगी हुई है।  जब तक दोष साबित(जो होगा नहीं) नहीं हो जाता,… मामला कोर्ट मे रहता है…हमारी बेशर्मी खतम होने वाली नहीं हैं।

मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चारों ओर से दबाव झेल रही यूपीए सरकार की स्थिति कितनी दयनीय है…क्या ज़माना आ गया है… जनता है कि  अपनी चुनी हुई सरकार को खाने कमाने भी नहीं देती… भूखे रह कर कैसे और कब तक जनता की सेवा करेगी सरकार… लोग पीछे ही पड़ गए हैं, कभी  मंहगाई को ले कर… कभी भ्रष्टाचार को लेकर…. जैसे किसी को और कोई काम ही नहीं है…

प्याज मंहगी हुई तो उसका कारण शरद पवार(पावर?) जी ने विचारोपरांत जनता को अवगत कारवाया कि मौसम के कारण  फसल खराब हो गयी थी इस लिए प्याज अस्सी रुपये पहुँच गयी… अब कृषि मंत्री का काम फसल पर नज़र रखना थोड़े ही है। लोगों ने कयास लगाए कि छह महीने तक प्याज के दाम नीचे नहीं आने वाले( अगली फसल तक)।  लेकिन ज़्यादा हो हल्ला करने पर आनन फानन मे कृषि मंत्रालय द्वारा मौसम ठीक करवाया गया, फसल पैदा कारवाई गयी  तब कहीं जा कर कीमतें 25 रुपये तक आ गयी हैं…क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं नेता हो कर… अरे भाई नेता होना कोई  बच्चों का खेल है ??

कामन वेल्थ मे चालीस करोड़ का गुब्बारा पूरी दुनिया ने खूब मज़े ले ले कर देखा…  काम निकल गया तो सभी लगे आँख दिखाने सब के सब… ये कोई नहीं देखता कि कितने प्रयासों के बाद जा कर  भारत का नाम (अंदरूनी) खेलों के लिए पूरी दुनिया मे पहुँचा और (बद) नाम भी हुआ। वरना तो इतना नाम चाइना ओलंपिक का भी नहीं हुआ।

3757033538_fff4461cd4किसी को क्या मालूम कि मनचाही कंपनियों को ठेके देने मे कितने जुगाड़ लगाने पड़ते हैं। फर्जी कंपनियाँ बनवाना,  टेंडरों को पूल करवाना,  अंतिम समय पर टेंडर की तिथि बढ़ा देना, नेगोशिएशन के नाम पर पत्ती फिट करना, सात आठ गुने दामों पर टेण्डर पास करवाना, अपने खास लोगों का ध्यान रखना, और  कुर्सी पर भी  बने रहना  कोई  मज़ाक है? क्या इतना भी पता नहीं कि दरबार कोई भी हो “होत न आज्ञा बिन पैसा रे” का मंत्र हर जगह चलता है… । कोई यह क्यों नहीं समझता कि  मंत्री जी तो सबके हैं… उनके भी तो बच्चे हैं जिन्होने इत्ती बड़ी बड़ी कंपनियाँ खड़ी की हैं… चुनाव मे चंदे दिये हैं… होटलों मे नेता जी की “उत्तम व्यवस्थाओं” पर खर्चे किए हैं…  आम जनता का क्या है…आम जनता एक वोट के बदले पूरे देश को अपनी बपौती समझती है… ये तो वैसे ही हुआ जैसे मंदिर मे सवा रूपये का प्रसाद चढ़ा कर लखपति होने का वरदान मांगना। मुंह खोला और बोल दिया कि नेता और सरकार सब चोर है। अरे भाई नेता होना कोई बच्चों का खेल है??

आदर्श सोसाइटी को आज लोग घोटाले का नाम दे कर हो हल्ला कर रहे हैं। कोई पूछे उनसे विकास और समाजवाद का ऐसा उदाहरण मिलगा कहीं?  जरा सोचिए मुख्य मन्त्री से ले कर सेना के ब्रिगेडियर सहित तमाम तबकों और पदों के लोग एक साथ रहेंगे… भाईचारे की और क्या मिसाल होगी। पर्यावरण मंत्रालय की तंद्रा भी टूट गयी है आज। इतनी ऊंची इमारत बन गयी और किसी को पता भी नहीं चला… पता चल जाता तो ? तो क्या मुंबई का विकास रुक जाता… एक खूबसूरत इमारत बनने से रह जाती… अगर किसी की ज़रा सी लापरवाही से भारत का विकास हो रहा है तो “दाग अच्छे हैं न”?

आज किसी न्यूज़ चैनल पर भाजपा और कांग्रेस के दो भद्रजनों मे गरमागरम वार्ता चल रही थी… कांग्रेस का कहना था कि आपके यहाँ तो टीवी पर लाइव पैसा लेते हुए  पूरी जनता ने देखा था… लेकिन FIR नहीं दर्ज़ की गयी… हमने तो अपने कैबिनेट  मन्त्री को बंद कर के दिखाया है। इस पर बीजेपी का बयान आया कि हाँ वो तो हुआ था लेकिन एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपये जितना बड़ा घोटाला नहीं था वो…और जनता की नाराजगी भी तो हमने सही है? (यानी अब किलियर)  इस पर कांग्रेस वाले महानुभाव कहें लगे कि आप झूठ बोल रहे हैं… कपिल सिब्बल  ने कह दिया है कि मामला इतने रूपये का नहीं है। मतलब दोनों मामले को मानते हैं लेकिन घोटाले कितने के हुए इस  आँकड़े  को ले कर दोनों मे मतभेद है….

हमारे देश की जनता  रात गयी बात गयी की विचारधारा मानती  है। पहले किसी भी घोटाले के सामने आते ही हो हल्ला शुरू कर देती है… मीडिया भी चीखने चिल्लाने लगेगी… गिरफ्तारी होने तक सब कुछ सुर्खियों मे रहता है लेकिन उसके बाद ?… जमानत होते, केस चलते और अगले चुनाव आते आते सब कुछ भूल जाती है… आज तक इतने घोटाले हुए लेकिन किसी मन्त्री को सज़ा के तौर पर दो चार साल जेल मे सड़ते देखा है कभी? नही न? इसी लिए कि वो नेता हैं… और नेता होना कोई बच्चों का खेल नहीं  है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध

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लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

P300111_13.25_[04]पूरे भारत मे लगभग साठ शहर… कोई राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व के बिना…. आम आदमी के आह्वान पर…. आम आदमी का भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध….

30-01-2011, नयी दिल्ली के रामलीला मैदान मे शायद पहली बार बिना किसी राजनैतिक पार्टी के सहयोग अथवा आह्वान के बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध किरण बेदी,जस्टिस संतोष हेगड़े,प्रशांत भूषन,जे.एम .लिंगदोह,स्वामी अग्निवेश,अन्ना हजारे,आर्चविशप विन्सेंट एम. कोंसेसाओ तथा अरविन्द केजरीवाल सहित  तमाम  संगठनो, प्रबुद्धजनों, और आम इन्सानों को एक मंच पर अपार जनसमुदाय के रूप मे देख कर लगा कि आम नागरिकों का धैर्य टूट गया है…

जेएनयू और अन्य कालेजों की छात्राएं आज करोड़ो और अरबों के घोटाले सनसनीखेज खबर मात्र बन कर रह गए हैं… रोज़ नया घोटाला, रोज़ नई जांच… चारों तरफ भ्रष्टाचार व्याप्त है। आज जहां हर सरकारी दफ्तर मे हर रोज़ हर क्षण जनता के सम्मान का बलात्कार किया जाता है, रिश्वत मांगी जाती है, रिश्वत न देने पर गाली गलौच की जाती है, वहीं इन्हीं विभागों मे बैठे अधिकारियों, मंत्रियों और दलालों की साँठ गाँठ माफियाओं की जमातें फल फूल P300111_12.57_[01]रही हैं।  आज हम भ्रष्टाचार की शिकायत उसी विभाग के उच्च अधिकारियों से करते हैं जो उसी भ्रष्टाचार मे लिप्त हैं।  क्या हम यह मान लें कि आज सिस्टम इतना खोखला हो गया है कि उसे सुधारा जाना संभव नहीं है और चुपचाप जो हो रहा है उसे सहते रहें, या फिर यह सोच लें कि आज समय आ गया है जब आम इंसान आम नागरिक को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी।

इससे अधिक माफिया राज का ज्वलंत उदाहरण क्या मिलेगा कि भ्रष्टाचार का विरोध करने पर अधिकारी  सोनवणे को ज़िंदा जला दिया जाता है…  बाद मे छापे भी पड़ते हैं और सैकड़ों तेल माफिया से जुड़े लोग पकड़े भी जाते हैं लेकिन उससे पहले सिस्टम के रखवाले कहाँ रहते हैं और क्या करते रहते हैं…कर्नाटक मे वेल्लारी मे खनन माफिया रेड्डी बंधुओ से  से वहाँ का शासन और प्रशासन घबराता है… यह एक प्रश्नचिन्ह है व्यवस्था पर। कार्यालयों मे काम करने वाले सामान्य कर्मचारी और पुलिस के सिपाही भ्रष्टाचार के नाम पर सबसे अधिक बदनाम किए जाते हैं, जब कि उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार का नंगा नाच होता है उसे जाँचों की आड़ मे छुपा दिया जाता है… कितने ऐसे घोटाले हैं पिछले दस सालों मे जिनमें जांच रिपोर्ट के आधार पर भ्रष्टाचारी को सजा दी गयी हो… राष्ट्र को हुए नुकसान की भरपाई की गयी हो… शायद एक भी उदाहरण खोजने से न मिले… चोरी की बात गले उतरती है लेकिन खुलेआम डकैती जैसी स्थिति आज की व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। यह स्थिति कमोबेश पूरे देश की है… किसी सरकार अथवा क्षेत्र मात्र की ही नहीं।

उच्च पदों पर बैठे हुए अफसर और राजनेताओं से माफियाओं की साँठ गाँठ दिन ब दिन उजागर होती रही है… अरबों खरबों की की काली कमाई विदेशी बैंकों मे भरी पड़ी है… जहां तहाँ विकास के नाम पर बहुमूल्य ज़मीनों को किसानों से छीन कर औने-पौने दामों पर कारपोरेट घरानों को दिये जा रहे हैं…निजीकरण के नाम पर महत्वपूर्ण विभागों को धनपशुओं का गुलाम बनाया जा रहा है…. घोटालों की तो कोई सीमा नहीं रह गयी है…एक से बड़े एक घोटाले करने की प्रतियोगिता हो रही हो जैसे… आखिर कब तक चलेगा ये सब….

नेतृत्व जब अपनी क्षमता खो दे तब जनता को इसकी बागडोर अपने हाथों मे लेनी ही होती है… हाँगकाँग मे 1970 के  दशक तक आज के भ्रष्टाचार के भारत से भी बदतर अवस्था में था जिससे आजिज़  आकर वहां के लोग सड़कों पर उतर आये और वहां (ICAC ) Independent Commission Against Corruption नामक स्वतंत्र संस्था का गठन हुआ और  एक साथ 180 में से 119 पुलिस अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया गया जिससे पूरी नौकरशाही में सन्देश गया की अब भ्रष्टाचार नहीं चलने वाला | नतीजा ये है की हांगकांग आज लगभग भ्रष्टाचार मुक्त देश है और ICAC पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है….| आज मिस्र आदि देशों मे भी जनता शासन के खिलाफ एक जुट हो कर सड़कों पर है…

हद है ….हद है !!!

भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार द्वारा लाये जा रहे लोकपाल बिल भी पहले की जांच एजेंसियों जैसी लचर और सरकारी दखल से प्रभावित व्यवस्था  हैं जिसके आने से वर्तमान स्थिति मे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आज ज़रूरी है एक व्यावहारिक, पारदर्शी और प्रभावशाली कानून की जो इन धनपशुओं और भ्रष्टाचारियों मे नकेल डाल  सके।

व्यवस्था से इतर एक व्यावहारिक और असरदार लोकपाल बिल की प्रस्तावना तैयार की गयी है  जिसके अंतर्गत केंद्र मे लोकपाल और राज्य मे लोकायुक्त सरकार के अधीन नहीं होंगे….. वर्तमान सरकार द्वारा लाई जा रही व्यवस्था और व्यावहारिक जन लोकपाल की व्यवस्थाओं के बीच का अंतर ऐसे समझा जा सकता है –

 

वर्तमान व्यवस्था    प्रस्तावित व्यवस्था
तमाम सबूतों के बाद भी कोई नेता या अफसर जेल नहीं जाता क्योकि एंटी-करप्शन ब्रांच (एसीबी) और सीबीआई सीधे सरकारों के अधीन आती हैं। किसी मामले मे जांच या मुकदमा शुरू करने से पहले इन्हें सरकार मे बैठे उन्हीं लोगों से इजाज़त लेनी पड़ती है जिनके खिलाफ जांच होती है

प्रस्तावित कानून के बाद केंद्र मे लोकपाल और राज्य मे लोकायुक्त सरकार के अधीन नहीं होंगे। ACB और सीबीआई का इनमे विलय कर दिया जाएगा। नेताओं या अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और मुकदमों के लिए सरकार की इजाज़्त की आवश्यकता नहीं होगी। जांच अधिकतम एक साल मे पूरी कर ली जाएगी। यानी भ्रष्ट आदमी को जेल जाने मे ज़्यादा से ज़्यादा दो साल लगेंगे

तमाम सबूतों के बावजूद भ्रष्ट अधिकारी सरकारी नौकरी पर बने रहते हैं। उन्हें नौकरी से हटाने का काम केंद्रीय सतर्कता आयोग का है जो केवल केंद्र सरकार को सलाह दे सकती है। किसी भ्रष्ट आला अफसर को नौकरी से निकालने की उसकी सलाह कभी नहीं मनी जाती

प्रस्तावित लोकपाल और लोकायुक्तों मे ताकत होगी की वे भ्रष्ट लोगों को उनके पदों से हटा सकें केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्यों के विजिलेन्स विभागों का इनमे विलय कर दिया जाएगा।

आज भ्रष्ट जजों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जाता। क्योकि एक भ्रष्ट जज के खिलाफ केस दर्ज़ करने के लिए सीबीआई को प्रधान न्यायाधीश की इजाजत लेनी पड़ती है।

लोकपाल और लोकायुक्तों को किसी जज के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए किसी की इजाजत लेने की आवश्यकता नहीं होगी

आम आदमी कहाँ जाये? अगर आम आदमी भ्रष्टाचार उजागर करता है तो उसकी शिकायत कोई नहीं सुनता। उसे प्रताड़ित किया जाता है।

लोकपाल और लोकायुक्त किसी की शिकायत को खुली सुनवाई किए बिना खारिज नहीं कर सकेंगे आयोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेंगे
सीबीआई और विजिलेन्स विभागों के कामकाज गोपनीय रखे जाते हैं इसी कारण इनके अंदर भ्रष्टाचार व्याप्त है लोकपाल और लोलायुक्तों का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा किसी भी मामले की जांच के बाद सारे रिकार्ड जनता को उपलब्ध कराने होंगे। किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर जांच और जुर्माना लगाने का काम अधिकतम दो माह मे पूरा करना होगा
कमजोर भ्रष्ट और राजनीति से प्रेरित लोग एंटीकरप्शन विभागों के मुखिया बनते हैं लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्ति मे नेताओं की कोई भूमिका नहीं होगी। इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके और जनता की भागीदारी से होगी।
सरकारी दफ्तरों मे लोगों को बेइज्जती झेलनी पड़ती है। उनसे रिश्वत मांगी जाती है। लोग ज़्यादा से ज़्यादा उच्च अधिकारियों से शिकायत कर सकते हैं लेकिन वे भी कुछ नहीं करते क्योकि उन्हें भी इसका हिस्सा मिलता है लोकपाल और लोकायुक्त किसी व्यक्ति का तय समय सीमा मे किसी भी विभाग मे कार्य न होने पर दोषी अधिकारियों पर 250/- प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगा सकेंगे जो शिकायतकरता को मुवाबजे के रूप मे मिलेंगे।
कानूनन भ्रष्ट व्यक्ति के पकड़े जाने पर भी उससे रिश्वतख़ोरी से कमाया पैसा वापस लेने का कोई प्राविधान नहीं है। भ्रष्टाचार से सरकार को हुई हानि का आंकलन कर दोषियों से वसूला जाएगा
भ्रष्टाचार के मामले मे 6 माह से लेकर 7 साल की जेल का प्राविधान है कम से कम पाँच साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा होनी चाहिए।

 

क्या आप तैयार हैं भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस जनयुद्ध मे शामिल होने के लिए … या सिर्फ सरकारों और व्यवस्थाओं को कोसने भर से काम चल जाने वाला है…. ???  अगर तैयार हैं तो इस विषय पर लिखें… बोलें… और ठान लें कि बस…. बहुत हो गया ….

enough is enough !!!

संपर्क करें… भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध…

ए-119 कौशांबी, गाजियाबाद- 201010, उ0 प्र0

फोन- 9717460029

email- indiaagainstcorruption.2010@gmail.com    

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