बंदर बनाम टोपीवाले …

 
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एक कहानी बचपन से सुनते आये हैं… एक टोपी वाला जंगल से गुज़र रहा था. दोपहरी चटख रही थी. दो घड़ी आराम करने की नीयत से वह एक पेड़ के नीचे अपनी टोपियों की टोकरी रखकर सो गया… थोड़ी देर में जब उसकी तन्द्रा टूटती है तो उसने देखा कि बंदरों के एक झुण्ड ने उसकी टोपियाँ उठा ली हैं और लेकर पेड़ पर चढ गए हैं. टोपी वाला पहले तो बहुत मिन्नतें की लेकिन बंदर तो बंदर… अनुनय विनय का तरीका काम न आने पर टोपीवाले ने सहज बुद्धि का इस्तेमाल किया और बंदरों की नकल करने की आदत का फायदा उठाया. उसने टोकरी में बची हुई एक टोपी को बंदरों को दिखाते हुए अपने सर पर पहन ली… जैसा की बंदरों की आदत होती है… टोपीवाले की नकल करते हुए बंदरों ने भी टोपी सर पर रख ली…जब टोपीवाला टोपी हाथ में ले लेता तो बंदर भी टोपी हाथ में ले लेते… अंत में टोपीवाले ने अपनी टोपी सर से उतार कर जोर से ज़मीन पर दे मारी… लेकिन ये क्या ? एक भी बंदर ने ऐसा नहीं किया ? बल्कि लगे खिलखिला कर हँसने…बल्कि बंदरों ने टोपी फिर से अपने सिर पर धारण कर ली… टोपी वाला अचंभित…उसने लाख दिमाग लगाया लेकिन माजरा कुछ समझ में नहीं आया…
हर टोपीवाला अपने इतिहास से सीखता है कि अपनी टोपी बचाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं…उनसे पहले के टोपीवालों ने अपनी टोपियाँ कैसे बचाई थीं?… और हमेशा उन्हीं तरीकों का प्रयोग भी करते रहे… लेकिन उधर बंदरों ने भी पीढ़ी दर पीढ़ी टोपी वालों का खेल देखा था… बंदरों ने टोपीवालों की चालाकियों को बखूबी समझ लिया था और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी टोपी वालों की चालाकियों से सचेत कर दिया…. समय के साथ साथ साथ सभी ने अपनी गलतियों से सीख ली और समझ लिया था कि टोपी वाले कैसे उनकी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं… जबकि टोपी वाले पीढ़ी दर पीढ़ी बंदरों को एक ही तरीके से जीतने की कोशिश करते रहे …और कभी कल्पना नहीं की थी कि बंदर भी कभी अपनी पुरानी कमियों से सीख लेकर कहीं अधिक चालाक हो जायेंगे… यही कारण कि बंदरों ने अचानक नयी गुलाटी खाई और टोपी वालों को चारों खाने चित कर दिया…
यही नहीं कालान्तर में धीरे धीरे बंदरों ने अपनी नस्ल को और उन्नत करने के लिए एक संकर नस्ल की मादा को  अपने परिवार में लाये.. संकर नस्ल हमेशा चालाक होती है ये वैज्ञानिकों का कहना है.. फिर चालाक बंदरों ने मनुष्यों जैसे वेश धर लिए और मनुष्यों में जा मिले.. कईयों ने सफ़ेद खद्दर के कुर्ते बनवाए सर पर गाँधी टोपी पहनी और चुनाव लड़ते हुए इंसानी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए सत्ता में भी अपनी पैठ बना ली…अपने हिसाब से क़ानून बनाने लग गए.. अपने वंशजों को समाज के हर क्षेत्र में फैला दिए.. किसी को उद्योगपति, किसी को मठाधीश बनाए तो किसी को सरकारी मशीनरी में फिट कर दिया… मनुष्यों के वेश में मनुष्यों को लूटने के लिए सिंडिकेट बना लिए… मनुष्यों द्वारा दुरियाए जाने वाले बंदरों ने मनुष्यों पर ही राज करना शुरू कर दिया… अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुसार तरह तरह की गुलाटियाँ खाना और कलाबाजियाँ करना नहीं भूले…. बंदरों ने इस बार मनुष्यों की मान मर्यादा की प्रतीक टोपी को निशाना नहीं बनाया बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी धन दौलत पर हाथ साफ़ करने लगे और अरबों खरबों रूपये हड़प कर उड़न खटोलों पर जा चढ़े और विदेशों में छुपा आये..अपने पास रखने का जोखिम भी नहीं उठाया क्योंकि बंदर अपनी आदतों को जान चुके थे.. किसी तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते थे . इधर इंसान हलाकान परेशान होने लगे लेकिन हमेशा अपनी लालच का शिकार हो इन्हीं बंदरों को चुन कर सत्तासीन करते रहे… कुछ लोगों को इन बंदरों पर शक भी हुआ और कुछ की तन्द्रा भी टूटी… समस्या विकट थी… चारों तरफ धन दौलत के अम्बार लेकर उड़न खटोलों पर चढ़े हुए बंदर ही बंदर और अपना पेट पालने में हैरान हलाकान औंघाई हुई जनता… खलबली तब मची जब चंद जागे हुए लोगों द्वारा समस्या के हल खोजे जाने लगे…
इंसान सदा से हर समस्या का हल धर्म-गुरुओं, परम्पराओं और पुरातन-पोथियों में खोजता रहा है, “महाजनो येन गतः स पन्थाः” की तर्ज़ पर आँख मूँदे झुण्ड की शक्ल में चलता रहा है. इस बार भी इतिहास खंगाले गए… पोथियाँ पलटी गयीं… पर इन्हें इतिहास में फिर एक टोपीवाला ही मिला जिसका रास्ता ही सबसे प्रभावी लगा… मिल जुल कर कुछ लोग एक टोपी वाला खोज लाये… क्योंकि उनका अनुभव बताता था कि टोपी वाले ही उत्पाती बंदरों से निपटते आये हैं… साथ ही एक भगवा धारी बाबा ने अपनी तरफ से मोर्चा खोल दिया… अब बंदरों में खलबली मच गयी…. घबराए हुए बंदरों की अम्मा ने उन्हें समझाया बेटा ये इंसान हैं.. ये पीढ़ी दर पीढ़ी लकीर के फ़कीर होते हैं… इनकी हर अगली चाल को हम हिंदी सिनेमा के सीन की तरह आसानी से भांप सकते हैं… ये ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे … अनशन करेंगे… भूखे रहेंगे… सड़कों पर चिल्लायेंगे…भाषण बाज़ी करेंगे… सोशल साइट्स पर हमें कोसेंगे..गरियायेंगे … क्योंकि इनकी परंपरा यही कहती है… अहिंसा परमो धर्मः… पंचशील सिद्धांत…बस यही सब … तो इन मनुष्यों से घबराने की ज़रूरत नहीं है…
एक तरफ बाबा और एक तरफ टोपी वाला … दोनों तरफ से बंदरों पर दबाव बढ़ने लगा… यहाँ तक कि उन्हें मनुष्यों के वेश में रहना मुश्किल हो गया… और खीज में एक दिन बंदरों की मूल प्रवृत्ति उजागर हो ही गयी और खिसियाये हुए बंदर एक साथ इनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए भगवाधारी बाबा पर खौंखिया कर दौड़ पड़े… … बाबा इस अप्रत्याशित हमले से जैसे तैसे जान बचा कर निकले … उधर टोपी वालों ने अलग नाक में दम कर रखा था… रोज़ धरने की धमकी… अनशन की चेतावनी… बंदरों ने अपने कुछ चालाक और कुटिल प्रतिनिधियों को छाँट कर टोपी वालों से निपटने के लिए एक गोल बनाई और जैसे कभी इंसान ने बंदरों को लालच दिया था… आज बंदरों ने टोपीवालों को लालच दी… और टोपी वाले उनकी चाल में फंस गए…
जैसे कभी मनुष्यों ने उन्हें अपनी शर्तों और इशारों पर नचाया था… आज ये मण्डली टोपी वालों को नचाने लगी… रोज़ नई तरह की बातें… रोज़ नए तरह के पैंतरे… और लाख कोशिशों के बाद आज भी बन्दर टोपी वालों पर भारी हैं… टोपी वालों के पास पोथियों में और इतिहास के पन्नों में एक ही तरीका लिखा है इन लंगूरों से निपटने का…और कोई रास्ता अपनाते देख बंदर उन्हें बदनाम करने में लग जाते हैं.. इधर बंदर दिन ब दिन अपनी चालाकियों और गुलाटियों में परिवर्धन करते गए.. अपनी गलतियों से सीखते गए.. अपडेट होते गए… बंदरों ने लालकिले की प्राचीरों पर अपना मोर्चा लगा रखा है …चंद मनुष्यों ने पुराने जंग खाए तमंचे में तेल लगा कर तोपों से मोर्चा लेने की ठान रखी है… फिर से पुराने तरीकों पर अमल करने में लगी है .. बाकी जनता आज भी अपनी टोकरी पेड़ के नीचे रख कर सो रही है ….कई तो यह मानने को भी तैयार नहीं कि उनकी टोकरियों को खाली करने के साथ साथ बंदरों ने उनके तन से कपड़े भी उतार लिए हैं और गाँठ में रखी रोटी भी छीन ली है… उधर बंदर अपनी हर कमियों को सुधार कर मनुष्यों से निपटने के नए नए गुर सीखने में लगे हैं.
सो… टोपीवाले फिर से अनशन की तैयारियाँ कर रहे हैं… फिर से भूख हड़ताल की धमकियाँ दे रहे हैं… उधर सारे बंदर पेड़ छोड़ कर उड़न खटोलों की सवारी कर रहे हैं… और धीरे धीरे मनुष्यों के धन के साथ टोपी (धर्म) और रोटी के साथ कपड़ा और मकानों पर भी नज़र जमाये हुए हैं…. कुछ लोग बंदरों को पहचान कर भी कुछ करने में असमर्थ हैं… कुछ लोग कुछ पहचानने को तैयार नहीं हैं… और कुछ लोग तो उनकी नस्ल में शामिल होने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं….
फिलहाल ……..बंदरों और टोपी वालों में जंग जारी है…
———————padmsingh 9716973262  21-07-2011
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यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह

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यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी

वक्त जालिम है सुन  बेरहम जिंदगी


इक शरारे में पैबस्त है आफताब

आज़माइश न कर बेशरम जिंदगी


ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी

गम  में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी


उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर

साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी


छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम

दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी


चल कहीं इश्क की चाँदमारी करें

कुछ तो होगा वफ़ा का वहम जिंदगी


सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली

कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी


रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी

बेवफा है मगर है   सनम  जिंदगी


धड़धड़ाती हुई रेल का इक सफर

मौत की मंजिलों पर खतम जिंदगी

अहले करम-एहसान करने वाला

शरारा-चिंगारी

आफताब-सूरज

पद्म सिंह – ०६/०१/२०११


छत्तीसगढ़ भवन…ब्लॉग गोष्ठी … संवेदना के आयाम, जीपीएस मोहतरमा और सवा ढाई किलो के हाथ…

bloggerसूचना पहले से थी, अविनाश जी का जी-टाक भी दरवाज़ा खड्का गया …किन्तु इससे पहले ही नुक्कड़ पर ब्लॉगर मिलन की खबर पढ़ कर शाम की कड़कड़ाती ठण्ड में ब्लॉगर्स के गरमागरम विचारों और सुखद सानिध्य का लोभ संवरण नहीं कर सका… ऊपर से बहु प्रतीक्षित पाबला जी से मिलने की कामना ने छत्तीसगढ़ भवन पहुंचना सुनिश्चित कर दिया था…

मै और अविनाश जी दोनों अपनी अपनी कार से लगभग एक ही समय अपने अपने घर से चले थे किन्तु भला हो गूगल बाबा का जिसने थोड़ी बहुत त्रुटि के साथ छतीसगढ़ भवन की स्थिति स्पष्ट कर दी थी… इस लिए अकबर रोड, तीनमूर्ति और कौटिल्य मार्ग होते हुए पन्द्रह मिनट देर से  छतीसगढ़ भवन पहुँच गया…(इस बार पुनः अविनाश जी से पहले:)

अँधेरे में पाश इलाके में खड़ी छत्तीसगढ़भवन का भवन सन्नाटे में डूबा था… फोन मिलाते ही पाबला जी देवदूत जैसे प्रकट हुए …. पहली बार ही गले लग कर दोनों ऐसे मिले जैसे पता नहीं कब के सम्बन्धी हों…(आभासी दुनिया का कमाल..है न?)

P191210_20.13अंदर आते ही पाया कि कई ब्लॉगर पहले से सोफासीन रह कर देर से आने वाले (VIP’s?Smile)का इंतज़ार कर रहे थे… अशोक बजाज जी भी आ चुके थे… आने वाले हर ब्लॉगर मित्रों का उठ कर सहृदयता से स्वागत करने के उपरांत अशोक जी ने सबको एक केबिन नुमा केबिन में लेकर गए जहाँ उनके कुछ राजनैतिक मित्र भी साथ थे… जो संभवतः ब्लोगिंग से सरोकार न होने के कारण उठ कर चले गए… अब यहाँ एक दर्जन ब्लॉगर(खालिस वाले) ही बच गए थे…

P191210_18.45_[01]चर्चा की शुरुआत संक्षिप्त परिचय के बीच ब्लॉग एग्रीगेटर्स को लेकर हुई… मीडिया और ब्लॉगिंग में एक फर्क यह सामने आया कि जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया आज धीरे धीरे राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण कहीं न कहीं निष्पक्षता से दूर हो रही है वहीँ ब्लोगिंग में अभिव्यक्ति की बेलाग स्वतंत्रता अभी कायम है… जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया को  एक तरफ़ा अभिव्यक्ति कह सकते हैं वहीँ ब्लोगिंग में लेखक और पाठक दोनों समानांतर रूप से अपना पक्ष रख सकते हैं… इससे कहीं न कहीं ब्लोगर आत्मानुशासन, और ज़िम्मेदारी के प्रति भी सजग रहता है…शायद यही ब्लोगिंग की सबसे बड़ी शक्ति है.

इसी बीच चाय पेस्ट्री, पेट्टीज और बिस्किट के दौर ने चर्चा को और दिलचस्प बना दिया 🙂

P191210_19.28_[02]चर्चा को नया आयाम देते हुए खुशदीप जी ने  ब्लोगिंग को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम होने की बात करते हुए बताया कि आज हिंदी ब्लोगिंग अंग्रेजी या अन्य भाषाओं की ब्लोगिंग से किस तरह अलग हो सकता है… विशेष रूप से पिछले दो वर्षों से हिंदी ब्लॉग काफी तेज़ी से बढ़े हैं और बहुत सी प्रतिभाएं भी सामने आई हैं… हिंदी ब्लोगिंग ने फिलहाल एक मुकाम प्राप्त कर लिया है और अब समय है इसे एक नया आयाम देने की, जहाँ हम अपने विचारों को आभासी दुनिया के बादलों से वास्तविकता के धरातल पर लाने और अपने विचारों का क्रियान्वयन कर सकते हैं!

खुशदीप जी ने इस बात पर बल दिया कि ब्लोगिंग के साथ साथ अपनी संवेदना के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है. आज आधुनिकता और बाज़ारवाद ने बुजुर्गों को किसी हद तक अलग थलग किया है. उन्होंने बताया कि वो रोज़ अपने पास के वृद्धाश्रम जा कर कुछ समय बिताते हैं.. इस से जहाँ उन्हें अनुभव के अमूल्य खजाने मिलते हैं वहीँ वहाँ के बुजुर्गों को अपने एकाकी जीवन में खुशियों के रंग परवान चढते हैं… इस विषय पर सुरेश यादव जी के रैन बसेरों और बुजुर्गों के प्रति अपने अनुभवों को सुनने से अनायास ही लगने लगा कि कोई इंसान अपने बुजुर्गों के प्रति कितना कठोर और हृदयहीन हो सकता है. इसी से सम्बंधित उनके द्वारा सुनाई गयी एक प्रेरणात्मक  कहानी ने सभी को बुजुर्गों के प्रति संवेदना से भर दिया.

P191210_19.29_[03]इधर गोष्ठी चल रही थी उधर पाबला जी पूरी गतिविधि को अपने चतुर कैमरे में समेटने में लगे थे… उनका कैमरा एक इशारे पर लगातार आठ फोटो खींच रहा था … इसी बीच चाय, पेस्ट्री, पेट्टीज़ के साथ मिठाइयों और अल्पाहार का भी दौर चला… थोड़ी देर में सहमति बनी कि हाल में बैठ कर इस विषय पर एक लाइव पोस्ट भी ठोंक दी जाय.. सो लग गए सब के सब अपने अपने हथियार से जूझने … खुशदीप जी जहाँ रिपोर्टिंग में लगे वहीँ मै और अविनाश जी कैमरे से फोटो फोन में और फोन से लैपटॉप में लाने से लेकर उसे कम्प्रेस कर पोस्ट तक पहुँचाने में अपने दिमागी घोड़े खोले हुए थे…

इधर नुक्कड़ पर पोस्ट पब्लिश हो रही थी उधर भाई ललित शर्मा ने फोन पर सब को बधाई देते हुए सब का हाल पूछ रहे थे… अशोक बजाज जी भी ब्लॉगर्स से मिल कर अभिभूत से दिखे… उनकी खुशी देखते बनती थी… संजू तनेजा, राजीव कुमार तनेजा, सुरेश कुमार यादव, मैने , शाहनवाज़ सिद्दीकी, अविनाश वाचस्पति, कनिष्क कश्यप, अशोक बजाज, खुशदीप सहगल, बीएस पाबला, कुमार राधारमण और जयराम विप्लव जी आदि ने इस ब्लॉग गोष्ठी की सुखद अनुभवों को समेटे हुए विदा लिया …

रात ने दस्तक दे दी थी… बाहर ठण्ड सीने से लगने को तैयार खड़ी थी… बाहर आ कर तय हुआ कि पाबला जी, शाहनवाज़, जयराम, राधारमण (सर्व जी)मेरे साथ ही चले .. पाबला जी ने अपनी तकनीकी ज्ञान का ज़बरदस्त अनुभव कराया अपने फोन के जीपीएस तकनीक का प्रयोग कर के….. मै कार ड्राइव कर रहा था पाबला जी के मोबाइल की मशीनी मोहतरमा डैशबोर्ड पर आराम से लेटी हुई रास्ता बता रही थी,.. कमेंट्री के जैसे…शुद्ध और परिष्कृत हिंदी में… पाँच सौ मीटर जा कर दो रास्ते छोड़ कर बाएं मुड़ें, अब दाहिने मुड़ें… और हम सब लोग चमत्कृत थे कि उसे मेरी कार की स्पीड तक ठीक ठीक पता थी… गीता कालोनी की तरफ मुड़ते ही हमने थोड़ा रास्ता बदला… वो फिर बोली “मार्ग  की पुनर्गणना की जा रही है” उसने जब भी हिसाब लगा कर मुड़ने के संकेत दिए हम सीधे चलते रहे… कोई और होता तो शायद झल्ला कर कहता … आखिर ठहरे निरे ब्लॉगर हीSmile लेकिन जीपीएस मोहतरमा पुनर्गणना करती रहीं… अंत में तीक्ष्ण मोड़ मुड़ने के संकेत पर हमें पता चला कि हम अंतिम मोड़ भी छोड़ आये थे … और तीक्ष्ण मोड़ मुडना पड़ा … आखिर मोहतरमा ने अजय झा के घर तक पहुंचा कर ही दम लिया… अजय झा अपने शयन लिबास में घर से बाहर मिले और थोड़ी देर बाते कर हम पाबला जी के “सवा ढाई किलो के हाथ” से हाथ मिला कर अपने अपने  घर की ओर कूच कर गए.

बेटा!!… मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं ….समझे?

चौथी क्लास की कोई दोपहर रही होगी … लेकिन जेहन में अभी भी उतनी उजली है… रघुनाथ मुंशी जी ने पूरे क्लास को संबोधित किया … गाना वाना आवत है कौनो को ? सरकारी प्राइमरी और कान्वेंट की नर्सरी में फर्क के नाम पर बहुत कुछ होता है…  कहना ही क्या … फ़िलहाल … जाने कैसे और क्यों मुझे खड़ा किया गया और “कौनो गाना सुनाव बेटा" का आदेश मिला… उस समय अकल कम ही होती थी मेरे पास… अपने आप को देश भक्त समझा करता था(शायद आज भी)… इसीलिए बहुत सारे देश भक्ति के गाने याद रहा करते थे … मुंशी जी का आदेश था … महुवे के पेड़ के नीचे (जहाँ अब ग्राम सभा का खडंजा बिछ गया है  वहीँ) काँपती टांगों पर खड़े हो कर  लगभग बेसुध सा अपने जीवन का पहला सार्वजनिक गीत गाया था  … जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा .. वो भारत देश है मेरा … वो भारत देश है मेरा …

बाद में पता चला मेरा चयन रेडक्रास की स्कूल टीम के लिए किया गया था… मै अपनी क्लास में सबसे छोटा दीखता था( शायद था भी) क्योकि उस समय के जी और नर्सरी नहीं होती थी … “पहली”, फिर “बड़ी” और फिर सीधे दुसरे क्लास में … मैंने दूसरा क्लास नहीं पढ़ा .. सीधे पहले से तीसरे में.. इस लिए सब से छोटा था.  टीम की तैयारियां पूरे जोरों पर होतीं… ग्रुप में आठ लड़के …कुछ तो ढपोंगे थे … रेडक्रोंस के लिए तैयार नाटक के डायलोग याद करते, डिप्थीरिया, काली खाँसी और टिटनेस का टीका “DPT” सीखते… बैसिलस कालवेटिव ज्युरिल(BCG) के टीके याद करते … चेचक के समय क्या क्या सावधानियां होनी चाहिए… इमरजेंसी में मुंह से सांस देना, फिर एक दो तीन .. तीन बार सीने पर दबाव देना फिर एक…दो.. तीन … सांस देना … मतलब कि बहुत कुछ… जनपद स्तर, मंडल स्तर और राज्य स्तर या नेशनल… जहाँ भी गयी टीम प्रथम स्थान ही लेकर आई …

एक थे  राम नारायण पंडिज्जी ( पंडिज्जी माने गुरु जी)….. जिसने लोटपोट कोमिक्स पढ़ी हो वो डाक्टर झटका को हुबहू याद कर लें… ऐसे ही थे पंडिज्जी … “ब्बता रहा हूँ जो है…समझे? " उनका तकिया कलाम होता … ब्बता रहा हूँ जो है ऐसा ..समझे??ब्बता रहा हूँ जो है वैसा …समझे??…. वैसे तो पंडिज्जी क्राफ्ट के मास्टर थे लेकिन काम था टीम बनाना और लड़वाना.. रेडक्रोस, सेंटजान एम्बुलेंस,मेकेंजी, और स्काउटिंग आदि कोई भी कम्पटीशन हो … पंडित जी हर विधा में निपुण… साम दाम दंड भेद सारे के सारे  उनकी उंगलियों पर…रघुनाथ मुंशी जी उनके सहयोगी हुआ करते…क्राफ्ट के मास्टर होने के कारण खूबसूरत डायरियां बनाते जिनमे हम रेडक्रास के कैडेट्स द्वारा किये गए स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों और जागरूकता अभियानों का ब्यौरा होता…

हम पूरे मनोयोग से जीतने के लिए ही निकलते थे … हम जहाँ भी जाते पूरा लाव लश्कर साथ चलता … मै छोटा था … मुश्किल से अपनी अटैची उठा पाता.. बेडिंग  कोई सहपाठी या पंडित जी ही उठाते … ट्रेन में, बस में, होटल में  जहाँ भी जाते खूब धमाल मचाते…. गाते हुए, हँसते हुए खूब मज़े करते …  (Smile

जो भी मेडल हम जीतते वे हमें नहीं मिलते थे बल्कि स्कूल में अनुदान के रूप में ले लिए जाते …. अगले साल आने वाली प्रतियोगिताओं के बच्चे उन्हें लगा कर परेड में भाग लेते थे … इस तरह सब से ज्यादा मेडल हमारी टीम के होते थे.

ये सब यूँ लिखा मैंने …. कि पंडिज्जी को सारी कलाएं आती थीं… टीम के बच्चों को खूब खिलाते पिलाते…खूब सिखाते भी …जिस होटल पर टोली पहुँचती होटल वाला खुश…छह सात दिनों के लिए ढेर सारे ग्राहक मिल जाते लेकिन  वो बात अलग, कि टीम की वापसी के समय पंडिज्जी के पास तीन चार दर्जन गिलास और कुछ इससे ज्यादा ही दर्जन चम्मचादि हुआ करते … Winking smile  होता यह था कि जिस होटल वाले ने परेशान किया,अच्छा खाना नहीं दिया या शोषण किया  उसका बदला पंडिज्जी ऐसे ही लेते थे…

अगले दिन आगरा में कम्पटीशन का फाइनल  था… रेडक्रास और  सेंटजान एम्बुलेंस का… हम सब कल होने वाले वाइवा और प्ले की तैयारियों में व्यस्त थे…देर रात पंडिज्जी लगभग बीस पच्चीस सर्टिफिकेट, जिन्हें कल विजेताओं को वितरित किया जाना था लिए हुए कमरे में घुसे ….सभी सर्टिफिकेट्स पर तीन या चार अधिकारिकों के हस्ताक्षर पहले से थे… सिर्फ नाम भरा जाना था … सुन्दर सुन्दर हर्फों में सब टीम मेम्बर्स के नाम लिखे गए…प्रथम स्थान की घोषणा भी लिखी गयी …. और कमाल देखिये … कल आने वाले दिन में हम प्रथम घोषित किये गए और अपने हाथों से लिखे सर्टिफिकेट भी प्राप्त किये …

हमसे रहा नहीं गया तो पूछ बैठे … पंडिज्जी ! सर्टिफिकेट पर आपने कल ही प्रथम स्थान प्राप्त किया" लिख दिया था … ये कैसे हुआ… पंडिज्जी ने पान खाया हुआ मुंह थोड़ा ऊपर उठाया और अत्यंत रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए बोले….

ब्बता रहा हूँ जो है……बेटा….!!!    मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं …समझे?

(हुआ यह था कि किसी स्कूल वालों ने पंडित जी को चैलेन्ज दे दिया था.. इस बार कम्पटीशन जीत के दिखाओ)

पिछले दिनों गाँव गया तो अचानक पंडिज्जी से मुलाक़ात हो गयी…पंडिज्जी पणाम!  …बहुत खुश हुए अपने पुराने “टोली नायक” से मिल कर …  पंडिज्जी की उमर ढल चुकी है…रिटायर हो चुके हैं … अपने पुत्र धौताली के साथस्कूल खोला है … हाई स्कूल और इंटरमीडियेट में गारंटीड सफलता के लिए सारे जुगाड़ युक्त स्कूल… Smile

तुम मुझे टीप देना सनम….टीपने तुमको आयेंगे हम

computer-animated 

तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम 
ऐसे याराना चलता रहे
ब्लॉग की राह के हम कदम

एग्रीगेटर सजा  कर थके 0002
मेल सबको लगा कर पके
कोई झाँका नहीं इस तरफ
राह कोई कहाँ तक तके
हम भी चर्चा बना लें कोई
सारी मुश्किल समझ लो  खतम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम

0008 कोई एसो सियेशन गढो 
कभी टंकी पे जाओ चढ़ो
अपनी गलती को मानो नहीं
दोष औरों के माथे मढ़ो
माडरेशन लगा कर रखो
हम भी देखेंगे किसमे है दम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम 

कभी गूगल से फोटो चुरा 0007
कोई कंटेंट मारो खरा
हेरा फेरी  करो, चेप दो
कोई माने तो माने  बुरा
ब्लॉग अपना है जो मन करो
कोई दिल में न रखना भरम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम 

रात दिन पोस्ट लिख लिख मरे 0019
टिप्पणी फिर भी मिलती नहीं
जब तलक टांग खींचो नहीं
भीड़ मजमे को मिलती नहीं
फूल से कुछ नहीं हो अगर
भीड़ में फोड़  दो आज बम  0055
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम

 

 

(जस्ट खुराफात …:) )बुक

………आपका पद्म

जो हल निकाला तो सिफर निकले

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रात कब बीते कब सहर निकले

इसी सवाल में उमर निकले


तमाम उम्र धडकनों का हिसाब

जो हल निकाला तो सिफर निकले


बद्दुआ दुश्मनों को दूँ जब भी

रब करे सारी बेअसर निकले


हर किसी को रही अपनी ही तलाश

जहाँ गए जिधर जिधर निकले


खुद  ही  काज़ी रहे  गवाह भी थे

फिर भी इल्ज़ाम मेरे सर निकले


किसी कमज़र्फ की दौलत शोहरत

यूँ लगे चींटियों को पर निकले


उजले कपड़ों की जिल्द में अक्सर

अदब-ओ-तहजीब मुख्तसर निकले

….आपका पद्म ..06/09/2010

घुमक्कड़ी -१ तुगलकाबाद किला (दिल्ली)

 

Map picture

आते जाते घुमते फिरते जहाँ कुछ रोचक मिलेगा आगे घुमक्कड़ी के अंतर्गत प्रस्तुत करता रहूँगा … फिलहाल कुछ दिन पहले जमा की गयी तुगलकाबाद (दिल्ली) किले की एक संक्षिप्त रपट –

दिल्ली के दक्षिणी छोर पर बदरपुर बार्डर से लगभग  तीन किलोमीटर  पश्चिम की ओर जाते समय विशाल पर्वत श्रृंखला जैसी किले की प्राचीरें दिखती हैं … मुग़ल शासक गयासुद्दीन तुगलक (1321-1325 AD) ने दिल्ली पर चढ़ाई करने पर इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया. 1321 से 1323 तक उसने  कूटनीतिक कारणों से उसने अपनी राजधानी शहर के चारों तरफ़ एक विस्तृत और विशाल किले का निर्माण करवाया. यह किला अपने आपमें पत्थरों को ढो और एकत्र कर बनाए गए किसी भी P050110_01.57_[01]स्थापत्य की विशालता मे अपना एक स्थान रखता है. किला लगभग छह किलोमीटर के परिक्षेत्र मे लगभग अष्टभुजी आकृति जैसा पसरा हुआ है. दस से पन्द्रह मीटर ऊंची और मलवे तथा पत्थरों से निर्मित इसकी दीवारों पर जगह जगह विशाल बुर्ज और झरोखे बने हुए हैं. परकोटों मे भी झरोखे इस तरह से बनाए गए हैं कि वाह्य आक्रमण से निपटने मे अंदर बैठी सेना को कम से कम नुक्सान हो. किले मे तेरह भीमकाय द्वार तथा तीन अंदरूनी द्वार हैं जिन तक जाने के लिए भी रास्ते इस तरह से बने हैं कि किसी बाहरी अतिक्रमण को परकोटों से सीधे देखा जा सके.S

तुगलकाबाद किले के अंदरूनी भाग मे नगर की गलियाँ घर और बरामदे जैसे निर्माण आज बर्बाद और ध्वंस स्थिति मे बिखरे पड़े हैं… पूरे किले मे शायद एक दो ही निर्माण ऐसे हैं जिनकी छतें सलामत हैं. किले के अंदर एक स्थल को विजय महल के नाम से जाना जाता है जहाँ पर कुछ हाल, कमरे आदि जैसी आकृतियाँ है… किले से बाहर जाने के लिए सुरंग आदि का भी निर्माण किया गया था जो अब दिखाई नहीं देती हैं.  किले मे सात पानी के टैंक और पानी एकत्र करने के लिए विशाल हौज़ का निर्माण भी किया गया था.  P050110_01.55

इस समय किला ध्वंस स्थिति मे है… इसकी विशालता प्रभावित करती है किन्तु अब दीवारों के अतिरिक्त कुछ भी ठीक हालत मे नहीं है… दिल्ली मे होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के कारण इस किले के दिन भी बहुर आये हैं… दीवारों से उखड़  चुके पत्थरों को पुरानी तकनीक के सहारे ही जोड़ा जा रहा है …

P050110_00.41_[02] कार्य स्थल पर पुरातत्व विभाग के एक रिटायर्ड जूनियर इंजीनियर की देख रेख मे काम चल रहा था.. पूछने पर बताया कि पुराने समय मे सीमेंट नहीं होता था इस लिए देसी तरीकों से किले और अन्य भवनों का निर्माण किया जाता था… उन्होंने बताया कि जुड़ाई के लिए चूना, सुर्की(लाल रंग का गेरू जैसा पदार्थ) और बदरपुर को मिला कर अच्छी तरह से पेराई की जाती थी…P050110_00.41 जबकि  प्लास्टर के लिए चूना, सुर्की,मेथी, बेल की गिरी,उड़द की दाल, गुड़ का चोटा(पुराना गुड़) और सन(पटसन) को मिला कर पेराई की जाती थी… जो सदियों तक के लिए मौसम धूप पानी से बिना प्रभावित हुए मज़बूत बना रहता था…

 

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लाल किले से काफी बड़े लगभग खंडहर मे बदल चुके इस किले के आसपास शहर ने अपने पंजे गाड़ दिए हैं … कुछ घुमंतू जातियों ने अपने टेंट लगा कर कबाड़ या अन्य इस तरह के कारोबार करने लगी हैं.मुख्य शहर से किनारे की ओर होने के कारण कम लोग ही उधर जाते हैं इस लिए किला उपेक्षित सा ही है…. लेकिन किले की विशालता और फैलाव अच्छा लगता है … जिन्हें खंडहरों और इतिहास देखने का शौक है उनके लिए रोचक जगह है दिल्ली में देखने के लिए ….

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P050110_02.26 किले के दक्षिण की तरफ गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा भी है जो तुगलक द्वारा ही  किले के बाद में बनवाया गया था … देखरेख और सफाई आदि होने के कारण मकबरा अभी अच्छी हालत में है … 

इसके निर्माण के सम्बन्ध में संलग्न शिलालेख से जानकारी ली जा सकती है… मकबरे के कुछ अन्य चित्र संलग्न कर रहा हूँ –

 

 

 

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तुगलकाबाद किले के सामने ही ‘कायामाया’ नाम का आयुर्वेदिक अस्पताल है जिसके संस्थापक स्वर्गीय कवि नानक चंद शर्मा दिल्ली के आयुर्वेदाचार्यों में अग्रणी स्थान रखते थे … ये अस्पताल तत्कालीन प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर जी के द्वारा स्थापित और उद्घाटित किया गया था … आज कल शर्मा जी की पुत्र वधू अस्पताल चला रही हैं … विशेषतः महिला रोगों के लिए बहुत कारगर चिकित्सा यहाँ उपलब्ध है … ये स्वानुभूत है P050110_01.32_[01] P050110_01.32