पद्म सिंह

कुल मिला कर ज़ीरो…

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SAnjay 006कई महीने हो गए ब्लॉग पर कुछ लिखे हुए…. लिखते रहने के अतिरिक्त कुछ करने की सोच कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा के साथ हो लिया…. हर अनशन, हर मोर्चे, और हर जुलूस मे कभी झंडे लिए तो कभी मोमबत्ती जलाए गले फाड़ता रहा…भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब ज़िन्दाबाद…. लोगों ने अपने एयरकंडीशंड घरों से स्वतः निकल कर मोमबत्ती जलाई और हमारे साथ हो लिए… ऐसा लगने लगा जैसे अब क्रान्ति हो चुकी है… अब हो न हो देश से भ्रष्टाचार के काले बादल छंट जाएँगे… नया सवेरा आने ही वाला है… परन्तु सरकारी पैंतरों और गुलाटी खाते सत्तासीन चुने हुए(वास्तव मे छंटे हुए) प्रतिनिधियों को देख कर लोकतन्त्र और संसद की सर्वोच्चता का असल मतलब… और मकसद दोनों काफी कुछ(जितनी आम जनता की समझ की औकात है) समझ मे आई…. समझ तो आप को भी आ गयी होगी… पर पुनः ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करते हुए एक लोकोक्ति कहना चाहूँगा…

दो टके की हाँडी गयी तो गयी…. कुत्ते की जात तो पहचान मे आई

बस मन मे बहुत खुन्नस है… धीरे धीरे निकलेगी… फिलहाल इसे बाँच लीजिये…. लिख दिया… ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए…

भ्रष्टाचार, काला धन
बाबा का आंदोलन
अन्ना का अनशन
ज्वाइंट  मीटिंग
सरकारी चीटिंग
लोगों का सपोर्ट
बाबा एयरपोर्ट
मान मनौवल
सरकारी सिर फुटौव्वल
बाबा का अनशन
सत्ता  से अनबन
अनशन पर वार
बाबा तड़ीपार
अनशन पर शर्तें
साजिश की परतें
अन्ना को जेल
दमन का नंगा खेल
वार्ता, करार,
सोनिया फरार
राहुल को कमान
राम लीला मैदान
ओमपुरी का बयान,
संसद का अपमान,
अग्निवेश का फोन
मनमोहन का मौन
राहुल का बयान
मीडिया की उड़ान
स्थायी कमेटी,
सिंघवी की हेटी
पासवान की टांग
आरक्षण की मांग
सर्वदलीय मीटिंग
बैकडोर चीटिंग
फेसबुक निगरानी
दमन की कहानी
बार बार मीटिंग
भितरघात चीटिंग
नहीं बनी बात
धाक के पात
हाँ हाँ, ना ना
चीं चीं, काँ काँ
धीरे धीरे आम लोग
पक गए तमाम लोग
अन्ना बन गए हीरो
बंसी बजाए नीरो 
हासिल रहा ज़ीरो…
कुल मिला कर ज़ीरो…

(ज़ीरो मतलब सुन्ना…  “0” मौज करो मुन्ना)

….. पद्म सिंह

मीनू का हर-सिंगार

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दशहरे के बाद के दिन हर पखवारे शीतल होते जाते हैं. सुबह की धूप रुपहली होने लगती है… सुबह घर से निकल कर कुछ दूर यूं ही ठंडी ऑस मे टहलने की मंशा ने अनायास मुझे वहाँ खड़ा कर दिया… उसके घर मे अब ताला पड़ा हुआ है… घर वाले भी गाँव के पैतृक मकान मे जा चुके हैं, पर तुलसी का पेड़ आज भी से वैसे हरा भरा है जैसा उसे आज भी हर शाम दीप जला कर पूजा जाता हो… आज अनायास मै तुलसी के उसी पौधे के पड़ोस मे खड़े रह कर हर-सिंगार के पेड़ से झर रही अगणित तारिकाओं को निहार रहा था तो ऐसे लगा जैसे किसी ने पीछे से पुकारा हो…. “लड्डू वाले भैया”…!!! एक पल को लगा जैसे मै मुस्कुराया भी था, फिर मन भारी हो गया… मुझे पता था ये मेरे मन की अंतरध्वनि थी परन्तु मन एक बारगी थरथरा कर रह गया… बैठ कर हरसिंगार के फूल चुनने लगा… पर एक आवाज़ मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी “लड्डू वाले भैया”….!!!

जितना पढ़ाई मे मेधावी, उतना ही बात व्यवहार मे प्रखर… माँ बाप की साधारण आर्थिक स्थिति मे भी घर को चाँदी सा चमका कर और करीने से सजा कर रखने का पागलपन था उसे.. माँ बाप भाई सब के बीच सामंजस्य की कड़ी कहलाने वाली वो लड़की समझ मे अपनी उम्र से बड़ी थी…भाई बहनों मे सबसे छोटी लड़की होने के कारण परिवार मे और अपनी चपल स्निग्ध मुस्कान वाली चंचल लड़की पूरे मोहल्ले मे सबकी चहेती थी। गली के नुक्कड़ पर उसका घर होने के कारण सब उसके घर के सामने से ही निकलते। अक्सर ऐसा होता कि मै जब भी उधर से निकलता तो वो हर-सिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी दिख जाती। मेरी नज़र पड़े न पड़े… एक आवाज़ ज़रूर मेरा पीछा करती… “लड्डू वाले भैया”॥… और मेरी नज़र पड़ते ही वो हँसते हुए दोनों हाथ जोड़ देती … नमस्ते भैया … !!!… मेरे लड्डू कहाँ हैं…? ये लगभग रोज़ का नियम था… मेरा ये नाम उसने कब रखा ये ध्यान तो नहीं पर शायद किसी दिन उसने किसी खुशी के मौके पर बोला था आप बड़े भैया हो आप लड्डू खिलाओगे… और उस लड्डू का तकादा रोज़ हुआ करता था… सुबह भी शाम भी ।

हर किसी के लिए एक सुबह ऐसी बनी होती है जिसे वह कभी छू नहीं पाता.. जीवन के रंग-मञ्च पर हर किरदार की एंट्री और एग्जिट दोनों तय है। न एक क्षण इधर और न एक पल उधर। कई बार पलट कर पीछे देखो तो लगता है पूरा जीवन यूं ही सरसराती रेलगाड़ी सा निकल गया है…बिना जाने कि हम आए ही क्यों थे यहाँ…जीवन का अंतिम स्टेशन भी आ जाता है और हम अनजाने  ही उतार दिये जाते हैं।

अचानक एक दिन उठते ही किसी ने बताया मीनू की तबीयत बहुत खराब है। आई सी यू मे है शायद पेट मे कोई गंभीर रोग है। मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ… कल रात ही तो पड़ोस की बर्थ-डे पार्टी मे मेरी बिटिया के साथ एक ही थाली मे खाना खाया था उसने …. हँस रही थी… खिलखिला रही थी.. अपने हाथों से सिला हुआ सूट भी पहना हुआ था उस दिन। फिर सुबह ही अचानक ऐसा क्या हो गया?….. अस्पताल पहुँचने पर देखा तो उसके हाथ पैर पलंग से बाँध दिये गए थे। देह स्याह पड़ रही थी … आँखें उलट रही थीं… बार बार चीत्कार के साथ पूरी देह दोहरी हो रही थी। मुँह से चीखने के अलावा कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी… मुझे देखते ही … भैया!!!!!!! “भैया मुझे बचा लो” की कातर चीत्कार.. जिसे आज भी याद करते हुए मेरा पूरा वजूद सिहर जाता है… इसी चीख के साथ वो अचेत हो चुकी उस लड़की की वो शायद इस दुनिया मे किसी के लिए दी गयी अंतिम पुकार थी। एक दो घंटे बाद उसे वेंटिलेटर पर डाल दिया गया… मुँह मे पाइप लगी होने के कारण कुछ भी बोल पाने मे असमर्थ उसकी  की कातर आखें बहुत कुछ कहना चाह रही थीं… शरीर का बार बार ऐंठना….. ऊपर उठना और धड़ाम से गिर जाना…कल्पना भी नहीं की जा सकती उस पीड़ा की… आखिर उसकी असीम पीड़ा का अंत भी आया … वेंटिलेटर पर 12-13 घण्टे का अस्पतालीय नाटक भोगते हुए… वो कब विदा हो गयी किसी को पता नहीं चला। एक बार फिर कोई प्रेम समाज के बेदर्द पूर्वाग्रह का शिकार हो गया (दो घंटे बाद ही सल्फास की डिबिया भी मिल गयी थी… उधर दूसरे अस्पताल मे एक नौजवान भी इसी तरह वेंटिलेटर पर दम तोड़ रहा था)

अगले दिन दुनिया का दूसरा नाटक भी निभाया गया… पैसे और सिफ़ारिश से पोस्टमारटम रिपोर्ट ठीक कारवाई गयी, पुलिस से सेटिंग की गयी…रात भर मे पानी की थैली मे बदल चुकी लड़की चिता की ज्वाला मे धुआँ बन ऊर्ध्वगामी हो गयी… सब कुछ ठीक ठाक हो गया.. तमाम मेहमान जुटे, सांत्वनाएं दी गईं,,,बाकी बची दवाइयाँ वापस कर पैसे लिए गए… और चार पाँच दिन मे सब खत्म… दुनिया अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ी…. पिता और भाई के चेहरे पर कोई खास  शिकन नहीं थी …कहीं न कहीं उनके चेहरे पर काम ठीक से निपट जाने का संतोष झलक रहा था, पुलिस केस का डर  पहले से ही सता रहा था… और फिर शायद उनकी नज़र मे ‘ऐसी लड़की’ का जाना …. जो हुआ ठीक हुआ… और फिर शादी ब्याह के पाँच-सात  लाख रूपये का खर्च भी बच गया था…!

हर-सिंगार सब कुछ वहीं खड़ा देखता रहा… उस समय हर सिंगार की उम्र भी फूलने फलने की नहीं थी… अब उसमे फूल आने लगे हैं… परंतु इन्सानों की दुनिया मे फलने फूलने के लिए इसकी कीमत अपनी आत्मा, अपने हृदय की धड़कनें झूठी प्रतिष्ठा और दक़ियानूसी परम्पराओं के हाथ गिरवी रख कर देनी होती है… और कई बार अपना जीवन दे कर भी।

मै कभी लड्डू नहीं ला पाया उसके लिए… अब लाने का कोई लाभ भी नहीं… कोई एक बड़ा कर्ज़ मेरे सिर छोड़ कर चला गया है। हर-सिंगार महक रहा है… जब तक यहाँ रहूँगा हर-सिंगार को सींचता और पोसता रहूँगा… संभव है कर्ज़ कुछ तो कम जाय।

….. पद्म सिंह 18-10-2011

 

टिक ! टॉक !……टिक ! टॉक !……टिक ! टॉक !……

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टिक ! टॉक !……टिक ! टॉक !……टिक ! टॉक !……

उलटी गिनती शुरू हो चुकी है…..

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तमाम उच्चकोटीय ब्लॉगर उड़न भर चुके हैं….

हिंदी ब्लागिंग और साहित्य के सफर में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पड़ाव आने में अब चंद घंटे शेष हैं…. जहाँ दिल्ली ने दूर दूर से आने वाले मेहमानों के लिए पलक पाँवड़े बिछा रखे हैं वहीँ आने मेहमानों के दिल भी उछाह और उल्लास से लबरेज़ हो रहे हैं…. कुछ सवारियाँ चल चुकी हैं कुछ प्रयाण के लिए तैयार हैं….

इधर रवीन्द्र प्रभात जी की परिकल्पना, गिरिराज शरण अग्रवाल जी के संकल्प,  अविनाश वाचस्पति जी की प्रतिबद्धता और  नुक्कड़ समूह की अथक परिश्रम  ने से दिल्ली के हिंदी भवन हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार और ब्लागर्स के मिलन के लिए शिद्दत से तैयार और बेकरार है….

इसे कुछ दिन पहले हिंदी साहित्य और ब्लागिंग को लेकर हुए मंथन के धनात्मक प्रभाव का नमूना मानिए जब अंतरजाल, ब्लागिंग और हिंदी साहित्य एक ही मंच पर एक साथ सह अस्तित्व की परिकल्पना के साथ उपस्थिति दर्ज करा रहे होंगे.  यह समारोह अपने आप में अनूठा समारोह होगा जहाँ अकादमिक साहित्य और अंतर्जालीय अभिव्यक्ति के परस्पर हिंदी हित में एकजुट होने की नयी संभावनाएँ तलाशेगा…

इस समारोह में दूर दूर से सशरीर उपस्थित हो रहे तमाम ब्लागर और साहित्यकारों के अतिरिक्त जबलपुर से पधार रहे  स्वनामधन्य पॉडकास्टर श्री गिरीश जी बिल्लोरे द्वारा  अंतरजाल पर समारोह के जीवंत प्रसारण के माध्यम से देश विदेश से सैकड़ों ब्लागर समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाले हैं…

नई दिल्ली आई टी ओ के पास 11 दीन दयाल मार्ग पर हिंदी भवन के सभागार में दिनांक 30 अप्रैल को हिंदी साहित्यकारों एवं हिंदी ब्लागर्स का एक मंच पर उपस्थित होना निश्चित रूप से हिंदी के हित में एक ऐतिहासिक पड़ाव होगा…

दिल्ली और आसपास रहने वाले ब्लागर्स  के लिए तमाम ऐसे मित्रों से मिलने का स्वर्णिम अवसर होगा जिनकी आभासी छवि अपने दिलों में संजोये उन्हें पढते सुनते रहे हैं…

हम दिल्ली और एन सी आर वाले सभी ब्लॉगर और साहित्यकारों की तरफ से  बाहर से आने वाले सभी ब्लागर्स का हार्दिक स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि यह समारोह अपने आप में एक अनुपम और अविस्मरणीय छवि हमारे आपके दिलों में छोड़ जाएगा…

हम स्वागत करते हैं सभी आगंतुकों का…

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दिल्ली के बाहर से आने वाले मेहमानों को अवगत कराना चाहूँगा कि हिंदी भवन नयी दिल्ली स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर आई टी ओ के समीप स्थित है… यह तिलक ब्रिज रेलवे स्टेशन से पैदल दूरी पर है… फिर भी किसी प्रकार की समस्या अथवा द्विविधा की स्थिति में निम्न फोन नंबरों पर संपर्क करें…

अविनाश वाचस्पति- 9868166586

पद्म सिंह  -9716973262

रवीन्द्र प्रभात –09415272608

हिंदी ब्लॉगिंग पर दो पुस्तकें विशेष रूप से इस समारोह की शोभा होंगी जिनका विमोचन इस समारोह की विशेष उपलब्धि होगी… यह अपने आप में शायद पहली किताब होगी जिसकी लगभग 150 से अधिक प्रतियाँ प्रकाशित होने से पूर्व बिक चुकी हैं….

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हम पुनःसभी आगंतुकों का स्वागत करते हैं …

 

मुदित हुआ मन आँगन मधुमित पवन हुई है

सुनने को पदचाप हृदय गति थमी हुई है

स्वागत करते हैं हम सब दिल खोल आपका

राहों राहों अपलक आँखें जमी हुई हैं

आते हैं वो जिनसे ख्वाबों में मिलते थे

जिनसे पुष्प ह्रदय में नित नूतन खिलते थे

जिनके आभासी स्वरुप दिल में बसते थे

जिनसे दिल की कहते थे रोते हँसते थे….

पावन बेला मित्र मिलन की आ पहुंची है

आशाओं को पंख मिले,    छाती हुलसी है

स्वागत है स्वीकारो अब आतिथ्य हमारा

भूलो हँस कर जो कुछ कमी बची रहती है

…… आपका पद्म सिंह 9716973262

आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-४ (मुंबई में पुलिस का चालान काटेगी आज़ाद पुलिस)

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आशा है मेरी पिछली पोस्टों आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-१, आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा- २ और आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३) के माध्यम से आज़ाद पुलिस से आप पर्याप्त परिचित होंगे …नहीं हैं तो कृपया उक्त पोस्टें पढ़ें…. इन पोस्टों को पढ़ कर मीडिया और ब्लॉगजगत से जुड़े हुए बहुत से लोगों द्वारा प्रतिक्रियाएं मिली थीं… कुछ संस्थाओं और लोगों ने स्वयं ब्रह्मपाल से मिल कर उनके संघर्ष और जज्बे को समझा-जाना … कुछ ने आर्थिक सहायता भी दी… लेकिन इस सहायता राशि को भी अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए न रख कर समाज सेवा में अर्पित कर दिए गए….  तीन दिन पहले कहीं रास्ते में फिर से ब्रह्मपाल से मेरा मिलना हो गया… बातें होती रहीं… आज़ाद पुलिस के अगले मिशन के बारे में पूछने पर पता चला कि निकट भविष्य में आजाद पुलिस द्वारा एक गुटखे पर तिरंगे झंडे की तस्वीर और नाम का बेजा इस्तेमाल करने से तिरंगे का अपमान होता है. इस कंपनी के विरोध में जैसा कि ब्रह्मपाल ने अनेक बार प्रशासन को आगाह दिया था प्रशासन तक बात बखूबी पहुँच भी  चुकी थी लेकिन ब्रह्मपाल की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही साबित हुई और उस कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी… इस कंपनी के विरोध में शीघ्र धरने पर बैठने हेतु उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना भेजी जा रही है… 

Top.bmpइसके अतिरिक्ति जिस पुलिस और प्रशासन ने कभी ब्रह्मपाल की सुध नहीं ली… उसकी आवाज़ बंद करने के लिए  सिरफिरा करार देते हुए बेवजह बार बार जेल में ठूंसती रही उसी पुलिस की कार्यप्रणाली के सुधार के सपने देखने वाला ब्रह्मप्रकाश(आज़ाद पुलिस) कुछ ही महीने में मुंबई पुलिस की खबर लेने मुंबई जाने वाला है… बताया कि २१ मई २०११   को अपने रिक्शे सहित मुंबई जाकर मुंबई पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार और मौलिक कमियों को उजागर करने का प्रयास करेगा … इसके लिए आज़ाद पुलिस का अनोखा तरीका है पुलिस का चालान करना… ये जुनूनी वन मैन आर्मी अपनी स्वयं की चालान बुक रखता है… जहाँ कहीं पुलिस की कमियाँ देखता है… तुरंत चालान काटता है … चालान पर उस पुलिस वाले के हस्ताक्षर भी करवाता है और चालान एस एस पी अथवा उनसे उच्चतर अधिकारी को बकायदा कार्यवाही करने के अनुरोध के साथ प्रस्तुत किया जाता है… इस प्रयास में कई बार पुलिस का कोप-भाजन बनने, मार खाने, हवालात जाने के बावजूद उसके जज्बे में कोई कमी नहीं आती और अपना संघर्ष जारी रखता है,  मुंबई जाने के सम्बन्ध में   दिल्ली पंजाब केसरी समाचार पत्र ने दिनांक ०१-१२-१० के अंक में खबर को प्रमुखता दी है…

यहाँ अवगत कराना चाहूँगा कि ब्रह्मपाल के अनुसार किसी सहायता अथवा अनुदान राशि का एक पैसा अपनी जीविका के लिए प्रयोग नहीं करता…  आज़ाद पुलिस को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने के लिए उसे  एक कैमरे की आवश्यकता थी … जय कुमार झा जी की सलाह पर इस तरह के ईमानदार और आम जनता के लिए होने वाले संघर्ष पर छोटी-छोटी सहयोग राशि के लिए hprd   के लिए अपने वेतन से प्रतिमाह ५० रूपए का एक छोटा सा फंड बनाना शुरू कर दिया था… आशा है इस प्रयास के लिए मेरे फंड से शीघ्र ही एक कैमरा लिया जा सकेगा…

आज़ाद पुलिस की मुहिम और संघर्ष के प्रति ब्लॉग जगत में भी कई मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहा है…हाल ही में ब्लॉग जगत के कुछ सक्षम मित्रों की संवेदनाएं ब्रह्मपाल के प्रति शिद्दत से दिखी … इस बात से आज़ाद पुलिस की नगण्य सी मुहिम परवान चढेगी ऐसा विश्वास है… इस पोस्ट के माध्यम से आप सब से अपील है कि आज़ाद पुलिस की मुंबई मुहिम पर यथा संभव यथा योग्य सहयोग करें…

आज़ाद पुलिस की आगे की गतिविधियों के लिए नया ब्लॉग बना दिया गया है जिससे लोग आसानी से आज़ाद पुलिस और उसकी मुहिम से सीधे जुड़ सकें… ब्लॉग पर जाने के लिए क्लिक करें <आज़ाद पुलिस> पर

आपका पद्म सिंह ९७१६९७३२६२

दिल्ली में उतरी उड़न तश्तरी …१३-११-२०१०

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सबसे पहले पहुंचे हम खबर थी कि आज दिल्ली में उड़नतश्तरी का उतरना पूर्व निर्धारित है,..  कनाट प्लेस में शिवाजी स्टेडियम के निकट निर्धारित स्थल पर सब से पहले पहुँचने वालों में मै और अविनाश वाचस्पति जी रहे ….   धीरे धीरे एक एक ब्लॉगर का अवतरण होता रहा …

 

 

थोड़ी देर में ही उड़नतश्तरी अपनी स्वर्णिम आभा के साथ प्रांगण में उतरी …. फिर मिलने मिलाने का दौर चला,,,P131110_18.01

आगे क्या हुआ सब पता चलेगा फिलहाल नजारा करिये फोटो शूट का …….

 

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मिलते हैं अगली पोस्ट के साथ शीघ्र ही …

मै कैमरे के पीछे था … इस लिए मुझे भी इधारीच अनुभब कर लें ….फोटो कैसी लगी अपना विचार अवश्य दें Smile

बेटा!!… मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं ….समझे?

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चौथी क्लास की कोई दोपहर रही होगी … लेकिन जेहन में अभी भी उतनी उजली है… रघुनाथ मुंशी जी ने पूरे क्लास को संबोधित किया … गाना वाना आवत है कौनो को ? सरकारी प्राइमरी और कान्वेंट की नर्सरी में फर्क के नाम पर बहुत कुछ होता है…  कहना ही क्या … फ़िलहाल … जाने कैसे और क्यों मुझे खड़ा किया गया और “कौनो गाना सुनाव बेटा" का आदेश मिला… उस समय अकल कम ही होती थी मेरे पास… अपने आप को देश भक्त समझा करता था(शायद आज भी)… इसीलिए बहुत सारे देश भक्ति के गाने याद रहा करते थे … मुंशी जी का आदेश था … महुवे के पेड़ के नीचे (जहाँ अब ग्राम सभा का खडंजा बिछ गया है  वहीँ) काँपती टांगों पर खड़े हो कर  लगभग बेसुध सा अपने जीवन का पहला सार्वजनिक गीत गाया था  … जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा .. वो भारत देश है मेरा … वो भारत देश है मेरा …

बाद में पता चला मेरा चयन रेडक्रास की स्कूल टीम के लिए किया गया था… मै अपनी क्लास में सबसे छोटा दीखता था( शायद था भी) क्योकि उस समय के जी और नर्सरी नहीं होती थी … “पहली”, फिर “बड़ी” और फिर सीधे दुसरे क्लास में … मैंने दूसरा क्लास नहीं पढ़ा .. सीधे पहले से तीसरे में.. इस लिए सब से छोटा था.  टीम की तैयारियां पूरे जोरों पर होतीं… ग्रुप में आठ लड़के …कुछ तो ढपोंगे थे … रेडक्रोंस के लिए तैयार नाटक के डायलोग याद करते, डिप्थीरिया, काली खाँसी और टिटनेस का टीका “DPT” सीखते… बैसिलस कालवेटिव ज्युरिल(BCG) के टीके याद करते … चेचक के समय क्या क्या सावधानियां होनी चाहिए… इमरजेंसी में मुंह से सांस देना, फिर एक दो तीन .. तीन बार सीने पर दबाव देना फिर एक…दो.. तीन … सांस देना … मतलब कि बहुत कुछ… जनपद स्तर, मंडल स्तर और राज्य स्तर या नेशनल… जहाँ भी गयी टीम प्रथम स्थान ही लेकर आई …

एक थे  राम नारायण पंडिज्जी ( पंडिज्जी माने गुरु जी)….. जिसने लोटपोट कोमिक्स पढ़ी हो वो डाक्टर झटका को हुबहू याद कर लें… ऐसे ही थे पंडिज्जी … “ब्बता रहा हूँ जो है…समझे? " उनका तकिया कलाम होता … ब्बता रहा हूँ जो है ऐसा ..समझे??ब्बता रहा हूँ जो है वैसा …समझे??…. वैसे तो पंडिज्जी क्राफ्ट के मास्टर थे लेकिन काम था टीम बनाना और लड़वाना.. रेडक्रोस, सेंटजान एम्बुलेंस,मेकेंजी, और स्काउटिंग आदि कोई भी कम्पटीशन हो … पंडित जी हर विधा में निपुण… साम दाम दंड भेद सारे के सारे  उनकी उंगलियों पर…रघुनाथ मुंशी जी उनके सहयोगी हुआ करते…क्राफ्ट के मास्टर होने के कारण खूबसूरत डायरियां बनाते जिनमे हम रेडक्रास के कैडेट्स द्वारा किये गए स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों और जागरूकता अभियानों का ब्यौरा होता…

हम पूरे मनोयोग से जीतने के लिए ही निकलते थे … हम जहाँ भी जाते पूरा लाव लश्कर साथ चलता … मै छोटा था … मुश्किल से अपनी अटैची उठा पाता.. बेडिंग  कोई सहपाठी या पंडित जी ही उठाते … ट्रेन में, बस में, होटल में  जहाँ भी जाते खूब धमाल मचाते…. गाते हुए, हँसते हुए खूब मज़े करते …  (Smile

जो भी मेडल हम जीतते वे हमें नहीं मिलते थे बल्कि स्कूल में अनुदान के रूप में ले लिए जाते …. अगले साल आने वाली प्रतियोगिताओं के बच्चे उन्हें लगा कर परेड में भाग लेते थे … इस तरह सब से ज्यादा मेडल हमारी टीम के होते थे.

ये सब यूँ लिखा मैंने …. कि पंडिज्जी को सारी कलाएं आती थीं… टीम के बच्चों को खूब खिलाते पिलाते…खूब सिखाते भी …जिस होटल पर टोली पहुँचती होटल वाला खुश…छह सात दिनों के लिए ढेर सारे ग्राहक मिल जाते लेकिन  वो बात अलग, कि टीम की वापसी के समय पंडिज्जी के पास तीन चार दर्जन गिलास और कुछ इससे ज्यादा ही दर्जन चम्मचादि हुआ करते … Winking smile  होता यह था कि जिस होटल वाले ने परेशान किया,अच्छा खाना नहीं दिया या शोषण किया  उसका बदला पंडिज्जी ऐसे ही लेते थे…

अगले दिन आगरा में कम्पटीशन का फाइनल  था… रेडक्रास और  सेंटजान एम्बुलेंस का… हम सब कल होने वाले वाइवा और प्ले की तैयारियों में व्यस्त थे…देर रात पंडिज्जी लगभग बीस पच्चीस सर्टिफिकेट, जिन्हें कल विजेताओं को वितरित किया जाना था लिए हुए कमरे में घुसे ….सभी सर्टिफिकेट्स पर तीन या चार अधिकारिकों के हस्ताक्षर पहले से थे… सिर्फ नाम भरा जाना था … सुन्दर सुन्दर हर्फों में सब टीम मेम्बर्स के नाम लिखे गए…प्रथम स्थान की घोषणा भी लिखी गयी …. और कमाल देखिये … कल आने वाले दिन में हम प्रथम घोषित किये गए और अपने हाथों से लिखे सर्टिफिकेट भी प्राप्त किये …

हमसे रहा नहीं गया तो पूछ बैठे … पंडिज्जी ! सर्टिफिकेट पर आपने कल ही प्रथम स्थान प्राप्त किया" लिख दिया था … ये कैसे हुआ… पंडिज्जी ने पान खाया हुआ मुंह थोड़ा ऊपर उठाया और अत्यंत रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए बोले….

ब्बता रहा हूँ जो है……बेटा….!!!    मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं …समझे?

(हुआ यह था कि किसी स्कूल वालों ने पंडित जी को चैलेन्ज दे दिया था.. इस बार कम्पटीशन जीत के दिखाओ)

पिछले दिनों गाँव गया तो अचानक पंडिज्जी से मुलाक़ात हो गयी…पंडिज्जी पणाम!  …बहुत खुश हुए अपने पुराने “टोली नायक” से मिल कर …  पंडिज्जी की उमर ढल चुकी है…रिटायर हो चुके हैं … अपने पुत्र धौताली के साथस्कूल खोला है … हाई स्कूल और इंटरमीडियेट में गारंटीड सफलता के लिए सारे जुगाड़ युक्त स्कूल… Smile

तुम मुझे टीप देना सनम….टीपने तुमको आयेंगे हम

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तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम 
ऐसे याराना चलता रहे
ब्लॉग की राह के हम कदम

एग्रीगेटर सजा  कर थके 0002
मेल सबको लगा कर पके
कोई झाँका नहीं इस तरफ
राह कोई कहाँ तक तके
हम भी चर्चा बना लें कोई
सारी मुश्किल समझ लो  खतम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम

0008 कोई एसो सियेशन गढो 
कभी टंकी पे जाओ चढ़ो
अपनी गलती को मानो नहीं
दोष औरों के माथे मढ़ो
माडरेशन लगा कर रखो
हम भी देखेंगे किसमे है दम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम 

कभी गूगल से फोटो चुरा 0007
कोई कंटेंट मारो खरा
हेरा फेरी  करो, चेप दो
कोई माने तो माने  बुरा
ब्लॉग अपना है जो मन करो
कोई दिल में न रखना भरम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम 

रात दिन पोस्ट लिख लिख मरे 0019
टिप्पणी फिर भी मिलती नहीं
जब तलक टांग खींचो नहीं
भीड़ मजमे को मिलती नहीं
फूल से कुछ नहीं हो अगर
भीड़ में फोड़  दो आज बम  0055
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम

 

 

(जस्ट खुराफात …:) )बुक

………आपका पद्म