आज़ाद पुलिस

आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३)

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ब्लॉगिंग केवल आभासी नहीं रह गयी है, इस बात का अनुभव मुझे उसी दिन से हो गया था जिस दिन मैंने अपनी पोस्ट “आज़ाद पुलिस” लिखा… पोस्ट नीरस थी और किसी के व्यक्तिगत

जीवन को प्रभावित नहीं करती थी इस लिए प्रतिक्रियाएँ भले ही कम मिलीं हों .. लेकिन जो भी प्रतिक्रियाएँ मिलीं वो मेरी पोस्ट और लेखन को सार्थक करने के लिए पर्याप्त थी. पोस्ट पढ़ कर यूँ तो कई लोगों की प्रतिक्रियाएँ आईं लेकिन इस सम्बन्ध में श्री जय कुमार झा जी की मेल मुझे लगातार आती रही…उन्होंने बार बार ब्रह्मपाल जी से मिलने की उत्कट इच्छा व्यक्त की … कई बार मोबाइल पर बात चीत होने के बाद दिनांक18/07/2010 को ब्रह्मपाल जी से मुलाकात करने की बात तय हो गयी …झा जी नरेला से आ रहे थे .. तय समय पर मैंने उन्हें आनंद विहार बस अड्डे से लिया और ब्रह्मपाल से मिलने निकल पड़े…  यहाँ मै यह उल्लेख भी करना चाहता हूँ कि श्री जय कुमार झा जी hprd से जुड़े हुए हैं और ईमानदारी और मानवता के प्रति कृतसंकल्प हैं … दिल्ली ब्लॉगर मीट में जो लोग रहे होंगे वो मिल चुके होंगे …  गर्मी इतनी भीषण, कि दोनों ही पसीने से पूरे के पूरे भीग    चुके थे… और आधे घंटे में हम ब्रह्मपाल जी(आज़ाद पुलिस) के पास थे ..

P180710_12.24ब्रह्मपाल जी हमें गली के बाहर ही मिल गए और अपने साथ अपने आशियाने ले गए… आशियाने के नाम पर नंदग्राम के बरात घर का बरामदा था, जहाँ उनका परिवार काफी दिनों से रहता है… बरात घर में घुसते ही आज़ाद पुलिस के पोस्टर बैनर आदि देख कर सहज ही अनुभव होता है कि ब्रह्मपाल जी अपने कार्यों के लिए कितने समर्पित हैं…. बाहर ही बोर्ड लगा था तिरंगा गुटखा राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता है … जब हम खुले पड़े बरात घर के हाल में पहुंचे तो ब्रह्मपाल जी ने जमीन पर ही चटाई बिछा कर हमारा स्वागत किया (कुल दो प्लास्टिक की कुर्सियों में एक ही की चारों टाँगें सलामत थीं)… चटाई बिछा कर हम दोनों बैठ गए … ब्रह्मपाल जी ने मना करते हुए भी कोल्ड ड्रिंक आदि की व्यवस्था की P180710_11.59_[02]जय कुमार जी ने ब्रह्मपाल जी से उनके बारे में पूछना प्रारम्भ किया… झा जी ने ब्रह्मपाल के पारिवारिक जीवन, उनके संघर्ष से लेकर उनके अंतर्मन तक की थाह ली … जैसे जैसे पूछते गए हमारे सामने टिन के बक्से में से पेपर कटिंग और सरकार को अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के लिए लिए लिखे गए पत्रों, फोटो, और पेपर कटिंग्स का अम्बार लगता गया …कहीं पुलिस की नाकारा व्यवस्था के खिलाफ धरने की बातें, कहीं जिलाधिकारी के आफिस पर ताला जड़ते हुए … कहीं सरकार की नीतियों के विरोध स्वरुप विकास P180710_12.22_[01] के दावे करते पोस्टरों पर कालिख पोतते हुए गिरफ्तारी देते हुए तो कभी पल्स पोलियो की सफलता के लिए अपने रिक्शे सहित स्कूली बच्चों की अगुवाई करते हुए ब्रह्मपाल जी की फोटुओं और पेपर कटिंग्स का अम्बार हमारे सामने था… शिकायत पत्रों की भाषा भले उतनी सटीक न रही हो पर भावना और संकल्प कूट कूट कर दिख रही थी एक एक कटिंग और पत्रों में  और सच कहें तो हमें इतना कुछ देखने सुनने में भी पसीने छूट रहे थे…

P180710_12.01 इसी बीच मोहल्ले के एक सज्जन और आज़ाद पुलिस के सक्रिय सहयोगी श्री मनोज जी (चित्र में सफ़ेद शर्ट में) भी हमसे मिलने आये और अपनी सोच और आगे की योजनाओं के बारे में बात की …आज़ाद पुलिस की सोच यह है कि अगर समाज का हर व्यक्ति समाज के उत्थान के लिए खुद पहल करे तो शायद कोई कारण नहीं कि परिवर्तन न हो कर रहे …. आज पुलिस और प्रशासन बहुत से दबावों के अधीन कार्य करती है … चाहे वो उच्च अधिकारी हो, अथवा नेताओं की जमात हो … इसी को चुनौती देते हुए आज़ाद पुलिस की सोच का उदय होता है … “आज़ाद पुलिस” जो हर इंसान हो सकता है … जो भी अपने सामाजिक परिवेश के प्रति सजग है … उसके सुधार के लिए पहल कर सकता है … वो ही  समाज का रखवाला है… आज़ाद पुलिस है … जिसपर किसी नेता या अधिकारी का दबाव नहीं होता …  “हर वो व्यक्ति आज़ाद पुलिस है जिसमे अपने देश समाज की रक्षा करने का जज्बा और संकल्प हो”

P180710_12.20_[01] जय कुमार झा जी ने मुझे जाते हुए बताया  था कि hprd किसी भी व्यक्ति को अपने स्तर से जांच करने के बाद ही मान्यता देता है इस लिए मुझे ठीक से इस व्यक्ति की मंशा और ईमानदारी  की जांच करनी होगी … और अंततः झा जी ने आश्वस्त होते हुए http://hprdindia.org/ की ओर से ब्रह्मपाल जी को एक प्रशस्ति पत्र और 500/- का अनुदान प्रदान किया … और आश्वासन दिया कि ब्रह्मपाल जैसे लोगों के लिए हम हमेशा कृतसंकल्प हैं और रहेंगे …

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ब्रह्मपाल जी हमसे मिल कर बहुत खुश लग रहे थे और बोलते हुए भावुक हो उठे कि पन्द्रह वर्षों में पहली बार आपकी तरह कोई बैठ कर मेरी बातें सुनने आया है मेरे पास … बीच में कई लोग जुड़े भी लेकिन खोखले आश्वासन के अलावा आजतक कुछ नहीं मिला कभी … अब मुझे कुछ मिले न मिले लेकिन इतना तो संतोष है कि मेरी बात किसी के कानों तक पहुंची तो सही ….अभी तो बहुत कुछ और बताने और दिखाने को था आज़ाद पुलिस के पास …हजारों पत्रों की प्रति और रिक्शा चला कर कमाए हुए पैसे से सैकड़ों रजिस्ट्रियों की रसीद  देख कर कोई इस इंसान को जुनूनी ही कहेगा… चिट्ठियों और पेपर कटिंग्स से भरी दूसरी गठरी खोलने से पहले ही हमने उन्हें मना कर दिया और आगे भी  मिलते जुलते रहने का आश्वासन दिया …

P180710_12.23_[01] हम लोगों ने आगे की योजनाओं के बारे में भी बहुत सी बातें कीं… कि किस तरह से कौन से मुद्दे पर किस स्तर का संघर्ष किया जाए … समाज के सीधे सादे और ईमानदार लोगों पर अत्याचार और अन्याय के लिए लड़ाई में धार कैसे लाई जा सकती है … हर संघर्ष के लिए धन की जरूरत होती है … इसके लिए जनता के सहयोग से एक फंड की स्थापना की जरूरत पर भी विचार किया गया जिस से पुलिस और प्रशासन से परेशान सीधे सादे लोगों का यथा योग्य सहयोग किया जा सके …

P180710_12.25 जय कुमार झा जी के साथ आज़ाद पुलिस से मुलाक़ात करना बहुत सुखद रहा … हम दोनों पसीने से भीग चुके थे …  हमने ब्रह्मपाल जी के साथ एक फोटो खिंचवाने और भविष्य में अन्य सकारात्मक संघर्षों में साथ रहने के आश्वासन के बाद विदा ली .. जाते जाते ब्रह्मपाल जी के आग्रह पर तीनों ने एक साथ फोटो भी खिंचवाई ..

इतनी भीषण गर्मी के बावजूद  ब्रह्मपाल के पास एक अदद टेबल फैन तक नहीं था … अन्य किसी सुविधा की क्या बात करना … जमीन पर सोना, अपने दो बेटों और पत्नी के साथ …. एक अदद रिक्शा ही जीविका और संघर्ष दोनों के लिए आर्थिक श्रोत है … अन्य कहीं से कोई सहायता नहीं मिली कभी … हाँ अगर कुछ है ब्रह्मपाल जी के पास तो वो है भ्रष्टाचार और शासन की लापरवाही के विरूद्ध लोहा लेने की उत्कट इच्छा शक्ति और परमार्थ कुछ कर गुजरने का जूनून …

P180710_12.20_[02]आम इंसान के हित में किसी भी प्रकार के सहयोग के लिए ब्रह्मपाल के नम्बर 09654829179  या मेरे नम्बर –9716973262 पर संपर्क कर सकते हैं …

किसी भी तरह के सहयोग के सम्बन्ध में इस पर मेल करना न भूलें …

azadpolice@gmail.com

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आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा -१)

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P100710_10.16_[03]पिछले दस वर्षों से आते जाते देखा है उसे …पुलिस वाले उसे देखते ही अपनी ड्यूटी पर सचेत हो जाते हैं …. खाली सर वाले पुलिस वाले तुरंत सिर पर टोपी पहन लेते हैं … और रिश्वत लेते हाथ  इसे देखते ही यकायक रुक जाते हैं … कृषकाय… साधारण सा दिखने वाला   इंसान…. खाकी वर्दी, सर पर पुलिस की टोपी… और हाथ मे पुलिस जैसा ही डंडा लिए हुए वो अपना पुराना सा रिक्शा खींचते हुए… शहर मे कहीं भी कभी भी दिखाई दे जाता है…. यूँ तो कोई विशेष बात नहीं लगती  है इसमें  .. लेकिन एक बात और होती है जो बरबस लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करती है…. उसके  रिक्शे के आगे पीछे हर जगह “आज़ाद पुलिस” लिखा हुआ है … रिक्शे के पीछे  भी “आजाद पुलिस” और “हम बदलेंगे जग बदलेगा” और “भ्रष्टाचार के  खिलाफ” “अंधा क़ानून”  जैसे स्लोगन लिखे हुए होते हैं …वो चलाता तो रिक्शा है लेकिन अपने आपको आज़ाद पुलिस कहता है.. पल्स पोलियो, दहेज विरोध तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ बैनर लगा कर लोगों को जागृत करने वाले इस व्यक्ति के बारे मे कई बार उत्सुकता हुई कि यह कौन है … यह आजाद पुलिस क्या है ? कौन है वह व्यक्ति जो अपने  आप को आजाद पुलिस कहता है ?आखिर क्यों धूमता है वो अपनी रिक्शे पर आजाद पुलिस का बोर्ड लगा P100710_10.16कर ? आज सुबह अचानक जब उसका रिक्शा सामने से गुज़रा तो मुझसे रहा नही गया और मैंने उसकी वास्तविकता जानने का मन बना लिया …

रिक्शा किनारे लगवा कर मैंने जब अपनी उत्सुकता उसके सामने रखी तो उसने अपने बारे मे जो कुछ बताया वो सुन और देख कर मै हतप्रभ रह गया …. जब मैंने उससे उसके बारे मे पूछा तो उसने कहा भाई साहब मै   तो लेखक हूँ… मैंने अपना जीवन न्याय के लिए संघर्ष और गरीबी मे काट दिया है……लेकिन आज तक मुझे प्रशासन या न्याय व्यवस्था से न्याय नहीं मिल सका है … पिछले पन्द्रह सालों से मै प्रशासन के लचर रवैये और दमनात्मक नीतियों का जीता जागता उदाहरण हूँP100710_10.16_[02]… सरकार की कोई भी नीति गरीबों और लाचारों तक न् पहुँच पाने का कारण है प्रशासन का लचर और गैर जिम्मेदाराना रवैया … उत्सुकतावश उसके बारे मे मैंने कुछ और जानने की नीयत से उसके जीवन के बारे मे पुछा … तो उसने अपनी कहानी प्रमाणों के साथ(जो उसके रिक्शे मे ही गद्दी के नीचे रखे थे) एक एक कर मेरे हाथ पर रख दिए . इसने अपने बारे मे जो कुछ बताया उसे आगे लिखता हूँ .

बात चीत मे शिष्ट और प्रवाहमयी व्यावहारिक बातें करने वाले इस व्यक्ति ने अपना नाम ब्रह्मपाल प्रजापति बताया… सात भाइयों और एक बहन के बीच ब्रह्मपाल का गरीबी ने बचपन से ही साथ नहीं छोड़ा… बचपन मे पढ़ने की इच्छा रखने वाले ब्रह्मपाल गरीबी के कारण केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़ सके बारह वर्ष की कच्ची उम्र मे परिवार के भरण पोषण का जिम्मा ब्रह्मपाल पर होने के कारण चाय की दूकान पर नौकरी करनी पड़ी … खेलने कूदने और पढ़ने की उम्र मे इनके सामने परिवार की दो जून की रोटी का ही लक्ष्य था … लेकिन स्कूल छोड़ने की टीस हमेशा चुभती रही … स्वाभिमान ब्रह्मपाल के स्वभाव मे कूट कूट कर भरा था.. यही कारण था कि वो चाय की दूकान पर नौकरी अधिक दिन न् कर सका और मालिक की गाली गलौच से परेशान हो कर दिल्ली आ गया जहाँ उसने अथक मेहनत कर के कुछ रूपये जोड़ लिए … अपनी दमित इच्छाओं के वशीभूत ब्रह्मपाल ने जीविकोपार्जन के लिए बम्बई का रुख किया और मेहनत करते हुए परिवार को पैसे भेजता रहा …

कुछ सालों बाद परिवार वालों की जिद पर जब ब्रह्मपाल अपने गाँव वापस आया तो फिर बम्बई नहीं गया और परचून की दूकान खोल ली … इसी बीच अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के वशीभूत ब्रह्मपाल ने  कक्षा दो तक की शिक्षा के बावजूद भी अनेक कविताओं और लघु उपन्यासों की रचना की . उसकी इच्छा थी कि उसके उपन्यास पर अगर कोई फिल्म बना दे तो उसकी गरीबी दूर हो जाय.

इसी बीच ब्रह्मपाल का परिचय हापुड़ निवासी एक व्यक्ति शम्भूनाथ शर्मा से हुआ … शम्भूनाथ शर्मा ने जब उसका उपन्यास पढ़ा और लालच दिया कि यदि तुम आठ हजार रुपये का इन्जाम करो तो तुम्हारी उपन्यास पर फिल्म बनवा दूँगा … मेरे जानने वाले बहुत से लोग फिल्म इंडस्ट्री मे हैं …फिर तुम्हें लोग “गम के आँसू” के लेखक के रूप मे जानेंगे …. घर की माली हालत खराब होने के बावजूद ब्रह्मपाल ने आठ हजार रुपयों का इंतजाम किया और कहानी सहित शम्भूनाथ को दे दिया …शम्भूनाथ ने वो कहानी अपनी कह कर किसी प्रोड्यूसर को बेच दी …और ब्रह्मपाल को दुत्कार कर भगा दिया …  इस कहानी पर फिल्म भी बनी…  ब्रह्मपाल का अब तक का जीवन दुःख और संघर्षों से घिरा रहा…. लेकिन यहाँ से उसके संघर्षों का दूसरा अध्याय प्रारंभ होने वाला था…

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