व्यंग्य

झमकोइया मोरे लाल !!

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हमारे जिले में शुभ कार्यों में अपने मज़ाक वाले रिश्तों के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए सस्वर गाली गाते हैं होली पर ताज़ी ताज़ी नाज़िल हुई गाली कोे इसी संदर्भ में पढ़ा /गाया जाए। 

यूपी की जनता ने कीन्हा कमाल झमकोइया मोरे लाल 
56 इंच का लगा ऐसा धक्का 
पंचर भई साइकिल निकल गवा चक्का
अंदर से ठट्ठा लगावें सिपाल ….झमकोईयामोरे लाल 

बुआ कहें बबुआ से बड़ा बुरा पटका 
कद्दू जो कटता तो आपस में बंटता 
फाट पड़ा जाने कहाँ से बवाल … झमकोइया मोरे लाल 

घूरे भी ताड़े भी पर नहीं पाए 
अपने ही घर की खबर नहीं पाए 
बुर्के के अंदर से होइगा धमाल ….झमकोईया मोरे लाल

यूपी के लड़िकन की लुटि गयी खटिया 
इतना काम बोला कि डूबि गयी लुटिया
 घरहिन मा मुरगी होइगै हलाल … झमकोइया मोरे लाल 

वारे परधान वारे वा रे अमितवा 
वा रे मनोज वा रे वा रे सम्बितवा
धोती को फाड़ कर दीन्हा रुमाल… झमकोइया मोरे लाल 
©पद्म सिंह #निर्मल हास्य 

बम्बा लगता साँप …

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सर सर चलती हवा रात दिन तन उठता है काँप

जाड़े मे है कठिन नहाना बम्बा लगता साँप….

BATH-HATER-17सर्दियाँ अपने चरम पर हैं। ऐसे मे लिहाफ मे घुस कर फेसबुक और ब्लाग पर राष्ट्र हित की लड़ाई  लड़ते समय पत्नियाँ कभी भी विषय और समय की गंभीरता को नहीं समझ पाती हैं, और आठ बजते बजते संसद (धोती/गृह मंत्रालय) की सर्वोच्चता का हवाला देते हुए नहाने का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर देती हैं। ऐसे मे फेसबुकीय बालाओं के सुप्रभात और शुभकामना संदेशों से आनंदित “पुलकावली सरीर”  भय से काँप उठता है। ऐसे मे “चुनी हुई” प्रतिनिधि का हम “छंटे हुए” लोग कुछ भी नहीं कर पाते और जबरन हमें शरद-शत्रु बम्बा-सर्प के सानिध्य मे धर दिया जाता है। अब इन्हें कौन बताए कि नहाते तो गंदे लोग हैं… वैसे ही …जैसे पुण्य वो करते हैं जो अपने पाप से डरते हैं … यहाँ तो मन चंगा और कठौती मे गंगा… लेकिन कठौती का जल भी कितना कीमती है !!!…. जल ही जीवन है और जीवन की रक्षा करना जीव मात्र का स्वभाव और कर्तव्य है।

ANIMAL IN A BATH 1जल के महत्व के कारण ही दुनिया की तमाम सभ्यताओं को नदियों और समुद्रों के जल ने पाला पोसा… परन्तु  मनुष्य  ने कृतघ्नता की सीमा तोड़ते हुए हुए नहाने की आदत डाल ली… और सबसे ज़्यादा जल बर्बाद करने वाला जीव बन गया।   जहां सरकार से लेकर तमाम स्वयं सेवी संस्थाएं जल बचाने की अपील करते नहीं थक रही हैं, वहीं  मनुष्य अपने जीवन मे लाखों लीटर शुद्ध जल केवल नहाने  पर खर्च कर देता है।  इसके लिए सबसे अधिक भारत जैसे विकासशील देश जिम्मेदार हैं, जहाँ आज भी दक़ियानूसी (Old fashioned) लोग रोज़ नहाने जैसी रूढ़िवादी परम्परा के वाहक हैं। कुछ लोग आधुनिक कहलाने के चक्कर मे यूँ तो अंग्रेजों की छोड़ी हुई चड्डी तक को अपना खानदानी झण्डा बनाने मे गर्व महसूस करते हैं, परंतु उनका हफ्तों न नहाने का मूलमंत्र आज तक नहीं  अपना पाये । समझ मे नहीं आता ऐसे लोग कब और कैसे विकसित होंगे।

मॉल और मल्टीस्टोर्स संस्कृति के ज़माने मे रोज़ नहाने वाले देश को लाखों रूपये के राजस्व और टैक्स का चूना लगा रहे हैं। रोज़ नहाने से जहाँ डियोडरेंट बनाने वाली कंपनियाँ निरंतर घाटे मे जा रही हैं वहीं टिश्यू पेपर,हेयर जेल, फेस वाश,  क्रीम और पाउडर की बाज़ार ठंडी पड़ी हुई है। खैर मनाइए आज के कुछ विकासवादी आधुनिक युवाओं का, जिन्होंने जल बचाने के लिए कौवा-स्नान जैसे आधुनिक तरीके विकसित कर लिए हैं  जिसके अंतर्गत  चारों पंजे और  गर्दन से ऊपर का हिस्सा जो आम जनता के दर्शनार्थ खुले होते है, को  जलाचमन अथवा के द्वारा शुद्ध करने  का प्रावधान है।

अपने आप को धार्मिक और मार्मिक मानने वाले भी समझ लें कि रोज़ नहाने वालों को सीधे सीधे जीवहत्या का पाप लगता है। नहाने वाले कभी सूक्ष्मदर्शी लेकर तो नहाते नहीं, उन्हें क्या पता कि उसके एक बार नहाने से लाखों निरीह जंतुओं की बस्तियाँ एक लोटे सुनामी  से ही तबाह हो जाती हैं। अकारण ही वे त्वचारोमों के अभयारण्य मे विचरण करते हुए और रोम कूपों के रक्त से अपनी पिपासा शांत करते जंतुओं की हत्या के  भागी बनतेहैं। इस जघन्य समूहिक संहार के  हम  “सः नाववतु सः नौ भुनक्तु” की अवधारणा को भी बिसरा देते हैं, और  ‘अपने ही खून’ की हत्या कर बैठते हैं।

एक बार नहाने से  औसतन बीस लीटर बहुमूल्य जल की क्षति होती है। और सर्दियों मे तो नहाने का खर्च ही बहुत  है । पानी गरम करने की मशीन, गरम करने के लिए बिजली का खर्च,  और नहाने से हुए सर्दी बुखार के लिए डाक्टर का खर्च, सब मिला कर नहाना एक घाटे के सौदे के सिवा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त साबुन, शैम्पू, कंडीशनर, कलोन, जैसे फालतू खर्च अलग। इन्हीं समस्याओं को ध्यान मे रखते हुए पण्डितों  ने आचमन की अवधारणा को जन्म दिया। बस आचमनी मे जल लीजिये और मन्त्र बोलिए “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु “…… और सिर के ऊपर छिड़क लीजिये। जब एक आचमनी मे सातों नदियों का स्नान संभव है तो शरीर को खामखा कष्ट क्यों देना।

यूं भी अनुभवी लोगों ने केवल तीन स्नान ही महत्वपूर्ण बताए गए हैं, जन्म के समय, विवाह के समय और अंतिम स्नान… फिर बीच मे नहा कर उनके अनुभवों का महत्व कम क्यों करना। अगर ज़्यादा ही इच्छा हो तो मकरसंक्रान्ति का स्नान  अपवाद स्वरूप लिया जा सकता है। फिर भी कुछ लोग रूढ़िवादी होते हैं और गाहे-बगाहे स्नान करने का दुस्साहस कर बैठते हैं, क्योंकि उन्हें स्नान के सही समय का पता नहीं होता।  फिर भी लकीर के फकीरों के लिए स्नान करने के समय का पता करने का एक आसान सा तरीका  ज्ञानियों ने और बताया है…जब खुजाने की दिशा  होरीजेंटल से बदल कर  वरटिकल हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि अब वह उचित समय आ गया है।

funny-kitten-500x466-customवर्षों से भारत देश की विडम्बना रही है कि तमाम ज्ञानी अपने ज्ञान को बिना किसी को बांटे चले गए… इसी लिए …यह लेख मैंने उन पीड़ित पुरुषों के लिए लिख दिया जो गृह मंत्रालय की ज़्यादतियों के शिकार हैं, ताकि सनद रहे …. और वक्त पर काम आए….अगर कोई भीगी बिल्ली बने रहना  नहीं चाहता ….तो इस लेख को हृदयंगम कर ले,… गृह मंत्रालय तक पहुँचा दे ….अन्यथा बना रहे लकीर का फकीर, रूढ़िवादी, पिछड़ी सोच का।

निर्मल हास्य…

फोटो- गूगल से साभार

कुल मिला कर ज़ीरो…

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SAnjay 006कई महीने हो गए ब्लॉग पर कुछ लिखे हुए…. लिखते रहने के अतिरिक्त कुछ करने की सोच कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा के साथ हो लिया…. हर अनशन, हर मोर्चे, और हर जुलूस मे कभी झंडे लिए तो कभी मोमबत्ती जलाए गले फाड़ता रहा…भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब ज़िन्दाबाद…. लोगों ने अपने एयरकंडीशंड घरों से स्वतः निकल कर मोमबत्ती जलाई और हमारे साथ हो लिए… ऐसा लगने लगा जैसे अब क्रान्ति हो चुकी है… अब हो न हो देश से भ्रष्टाचार के काले बादल छंट जाएँगे… नया सवेरा आने ही वाला है… परन्तु सरकारी पैंतरों और गुलाटी खाते सत्तासीन चुने हुए(वास्तव मे छंटे हुए) प्रतिनिधियों को देख कर लोकतन्त्र और संसद की सर्वोच्चता का असल मतलब… और मकसद दोनों काफी कुछ(जितनी आम जनता की समझ की औकात है) समझ मे आई…. समझ तो आप को भी आ गयी होगी… पर पुनः ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करते हुए एक लोकोक्ति कहना चाहूँगा…

दो टके की हाँडी गयी तो गयी…. कुत्ते की जात तो पहचान मे आई

बस मन मे बहुत खुन्नस है… धीरे धीरे निकलेगी… फिलहाल इसे बाँच लीजिये…. लिख दिया… ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए…

भ्रष्टाचार, काला धन
बाबा का आंदोलन
अन्ना का अनशन
ज्वाइंट  मीटिंग
सरकारी चीटिंग
लोगों का सपोर्ट
बाबा एयरपोर्ट
मान मनौवल
सरकारी सिर फुटौव्वल
बाबा का अनशन
सत्ता  से अनबन
अनशन पर वार
बाबा तड़ीपार
अनशन पर शर्तें
साजिश की परतें
अन्ना को जेल
दमन का नंगा खेल
वार्ता, करार,
सोनिया फरार
राहुल को कमान
राम लीला मैदान
ओमपुरी का बयान,
संसद का अपमान,
अग्निवेश का फोन
मनमोहन का मौन
राहुल का बयान
मीडिया की उड़ान
स्थायी कमेटी,
सिंघवी की हेटी
पासवान की टांग
आरक्षण की मांग
सर्वदलीय मीटिंग
बैकडोर चीटिंग
फेसबुक निगरानी
दमन की कहानी
बार बार मीटिंग
भितरघात चीटिंग
नहीं बनी बात
धाक के पात
हाँ हाँ, ना ना
चीं चीं, काँ काँ
धीरे धीरे आम लोग
पक गए तमाम लोग
अन्ना बन गए हीरो
बंसी बजाए नीरो 
हासिल रहा ज़ीरो…
कुल मिला कर ज़ीरो…

(ज़ीरो मतलब सुन्ना…  “0” मौज करो मुन्ना)

….. पद्म सिंह

बंदर बनाम टोपीवाले …

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एक कहानी बचपन से सुनते आये हैं… एक टोपी वाला जंगल से गुज़र रहा था. दोपहरी चटख रही थी. दो घड़ी आराम करने की नीयत से वह एक पेड़ के नीचे अपनी टोपियों की टोकरी रखकर सो गया… थोड़ी देर में जब उसकी तन्द्रा टूटती है तो उसने देखा कि बंदरों के एक झुण्ड ने उसकी टोपियाँ उठा ली हैं और लेकर पेड़ पर चढ गए हैं. टोपी वाला पहले तो बहुत मिन्नतें की लेकिन बंदर तो बंदर… अनुनय विनय का तरीका काम न आने पर टोपीवाले ने सहज बुद्धि का इस्तेमाल किया और बंदरों की नकल करने की आदत का फायदा उठाया. उसने टोकरी में बची हुई एक टोपी को बंदरों को दिखाते हुए अपने सर पर पहन ली… जैसा की बंदरों की आदत होती है… टोपीवाले की नकल करते हुए बंदरों ने भी टोपी सर पर रख ली…जब टोपीवाला टोपी हाथ में ले लेता तो बंदर भी टोपी हाथ में ले लेते… अंत में टोपीवाले ने अपनी टोपी सर से उतार कर जोर से ज़मीन पर दे मारी… लेकिन ये क्या ? एक भी बंदर ने ऐसा नहीं किया ? बल्कि लगे खिलखिला कर हँसने…बल्कि बंदरों ने टोपी फिर से अपने सिर पर धारण कर ली… टोपी वाला अचंभित…उसने लाख दिमाग लगाया लेकिन माजरा कुछ समझ में नहीं आया…
हर टोपीवाला अपने इतिहास से सीखता है कि अपनी टोपी बचाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं…उनसे पहले के टोपीवालों ने अपनी टोपियाँ कैसे बचाई थीं?… और हमेशा उन्हीं तरीकों का प्रयोग भी करते रहे… लेकिन उधर बंदरों ने भी पीढ़ी दर पीढ़ी टोपी वालों का खेल देखा था… बंदरों ने टोपीवालों की चालाकियों को बखूबी समझ लिया था और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी टोपी वालों की चालाकियों से सचेत कर दिया…. समय के साथ साथ साथ सभी ने अपनी गलतियों से सीख ली और समझ लिया था कि टोपी वाले कैसे उनकी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं… जबकि टोपी वाले पीढ़ी दर पीढ़ी बंदरों को एक ही तरीके से जीतने की कोशिश करते रहे …और कभी कल्पना नहीं की थी कि बंदर भी कभी अपनी पुरानी कमियों से सीख लेकर कहीं अधिक चालाक हो जायेंगे… यही कारण कि बंदरों ने अचानक नयी गुलाटी खाई और टोपी वालों को चारों खाने चित कर दिया…
यही नहीं कालान्तर में धीरे धीरे बंदरों ने अपनी नस्ल को और उन्नत करने के लिए एक संकर नस्ल की मादा को  अपने परिवार में लाये.. संकर नस्ल हमेशा चालाक होती है ये वैज्ञानिकों का कहना है.. फिर चालाक बंदरों ने मनुष्यों जैसे वेश धर लिए और मनुष्यों में जा मिले.. कईयों ने सफ़ेद खद्दर के कुर्ते बनवाए सर पर गाँधी टोपी पहनी और चुनाव लड़ते हुए इंसानी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए सत्ता में भी अपनी पैठ बना ली…अपने हिसाब से क़ानून बनाने लग गए.. अपने वंशजों को समाज के हर क्षेत्र में फैला दिए.. किसी को उद्योगपति, किसी को मठाधीश बनाए तो किसी को सरकारी मशीनरी में फिट कर दिया… मनुष्यों के वेश में मनुष्यों को लूटने के लिए सिंडिकेट बना लिए… मनुष्यों द्वारा दुरियाए जाने वाले बंदरों ने मनुष्यों पर ही राज करना शुरू कर दिया… अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुसार तरह तरह की गुलाटियाँ खाना और कलाबाजियाँ करना नहीं भूले…. बंदरों ने इस बार मनुष्यों की मान मर्यादा की प्रतीक टोपी को निशाना नहीं बनाया बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी धन दौलत पर हाथ साफ़ करने लगे और अरबों खरबों रूपये हड़प कर उड़न खटोलों पर जा चढ़े और विदेशों में छुपा आये..अपने पास रखने का जोखिम भी नहीं उठाया क्योंकि बंदर अपनी आदतों को जान चुके थे.. किसी तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते थे . इधर इंसान हलाकान परेशान होने लगे लेकिन हमेशा अपनी लालच का शिकार हो इन्हीं बंदरों को चुन कर सत्तासीन करते रहे… कुछ लोगों को इन बंदरों पर शक भी हुआ और कुछ की तन्द्रा भी टूटी… समस्या विकट थी… चारों तरफ धन दौलत के अम्बार लेकर उड़न खटोलों पर चढ़े हुए बंदर ही बंदर और अपना पेट पालने में हैरान हलाकान औंघाई हुई जनता… खलबली तब मची जब चंद जागे हुए लोगों द्वारा समस्या के हल खोजे जाने लगे…
इंसान सदा से हर समस्या का हल धर्म-गुरुओं, परम्पराओं और पुरातन-पोथियों में खोजता रहा है, “महाजनो येन गतः स पन्थाः” की तर्ज़ पर आँख मूँदे झुण्ड की शक्ल में चलता रहा है. इस बार भी इतिहास खंगाले गए… पोथियाँ पलटी गयीं… पर इन्हें इतिहास में फिर एक टोपीवाला ही मिला जिसका रास्ता ही सबसे प्रभावी लगा… मिल जुल कर कुछ लोग एक टोपी वाला खोज लाये… क्योंकि उनका अनुभव बताता था कि टोपी वाले ही उत्पाती बंदरों से निपटते आये हैं… साथ ही एक भगवा धारी बाबा ने अपनी तरफ से मोर्चा खोल दिया… अब बंदरों में खलबली मच गयी…. घबराए हुए बंदरों की अम्मा ने उन्हें समझाया बेटा ये इंसान हैं.. ये पीढ़ी दर पीढ़ी लकीर के फ़कीर होते हैं… इनकी हर अगली चाल को हम हिंदी सिनेमा के सीन की तरह आसानी से भांप सकते हैं… ये ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे … अनशन करेंगे… भूखे रहेंगे… सड़कों पर चिल्लायेंगे…भाषण बाज़ी करेंगे… सोशल साइट्स पर हमें कोसेंगे..गरियायेंगे … क्योंकि इनकी परंपरा यही कहती है… अहिंसा परमो धर्मः… पंचशील सिद्धांत…बस यही सब … तो इन मनुष्यों से घबराने की ज़रूरत नहीं है…
एक तरफ बाबा और एक तरफ टोपी वाला … दोनों तरफ से बंदरों पर दबाव बढ़ने लगा… यहाँ तक कि उन्हें मनुष्यों के वेश में रहना मुश्किल हो गया… और खीज में एक दिन बंदरों की मूल प्रवृत्ति उजागर हो ही गयी और खिसियाये हुए बंदर एक साथ इनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए भगवाधारी बाबा पर खौंखिया कर दौड़ पड़े… … बाबा इस अप्रत्याशित हमले से जैसे तैसे जान बचा कर निकले … उधर टोपी वालों ने अलग नाक में दम कर रखा था… रोज़ धरने की धमकी… अनशन की चेतावनी… बंदरों ने अपने कुछ चालाक और कुटिल प्रतिनिधियों को छाँट कर टोपी वालों से निपटने के लिए एक गोल बनाई और जैसे कभी इंसान ने बंदरों को लालच दिया था… आज बंदरों ने टोपीवालों को लालच दी… और टोपी वाले उनकी चाल में फंस गए…
जैसे कभी मनुष्यों ने उन्हें अपनी शर्तों और इशारों पर नचाया था… आज ये मण्डली टोपी वालों को नचाने लगी… रोज़ नई तरह की बातें… रोज़ नए तरह के पैंतरे… और लाख कोशिशों के बाद आज भी बन्दर टोपी वालों पर भारी हैं… टोपी वालों के पास पोथियों में और इतिहास के पन्नों में एक ही तरीका लिखा है इन लंगूरों से निपटने का…और कोई रास्ता अपनाते देख बंदर उन्हें बदनाम करने में लग जाते हैं.. इधर बंदर दिन ब दिन अपनी चालाकियों और गुलाटियों में परिवर्धन करते गए.. अपनी गलतियों से सीखते गए.. अपडेट होते गए… बंदरों ने लालकिले की प्राचीरों पर अपना मोर्चा लगा रखा है …चंद मनुष्यों ने पुराने जंग खाए तमंचे में तेल लगा कर तोपों से मोर्चा लेने की ठान रखी है… फिर से पुराने तरीकों पर अमल करने में लगी है .. बाकी जनता आज भी अपनी टोकरी पेड़ के नीचे रख कर सो रही है ….कई तो यह मानने को भी तैयार नहीं कि उनकी टोकरियों को खाली करने के साथ साथ बंदरों ने उनके तन से कपड़े भी उतार लिए हैं और गाँठ में रखी रोटी भी छीन ली है… उधर बंदर अपनी हर कमियों को सुधार कर मनुष्यों से निपटने के नए नए गुर सीखने में लगे हैं.
सो… टोपीवाले फिर से अनशन की तैयारियाँ कर रहे हैं… फिर से भूख हड़ताल की धमकियाँ दे रहे हैं… उधर सारे बंदर पेड़ छोड़ कर उड़न खटोलों की सवारी कर रहे हैं… और धीरे धीरे मनुष्यों के धन के साथ टोपी (धर्म) और रोटी के साथ कपड़ा और मकानों पर भी नज़र जमाये हुए हैं…. कुछ लोग बंदरों को पहचान कर भी कुछ करने में असमर्थ हैं… कुछ लोग कुछ पहचानने को तैयार नहीं हैं… और कुछ लोग तो उनकी नस्ल में शामिल होने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं….
फिलहाल ……..बंदरों और टोपी वालों में जंग जारी है…
———————padmsingh 9716973262  21-07-2011

मंजन घिसते हैं पिया, मुन्नी है बदनाम …

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मनमोहन मजबूर हैं गठबंधन सरकार

मंहगाई की मांग पर फैला भ्रष्टाचार

फैला भ्रष्टाचार, करें जनता का दोहन

गठबंधन के मारे बेचारे मनमोहन

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जमा विदेशी बैंक मे नेताओं की लाज

इसी फेर मे सब पड़े कौन खुजाये खाज

कौन खुजाये खाज राज खोलें भी कैसे

भारी तिजोरी लूट पाट कर जैसे तैसे

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हींग लगे ना फिटकरी जमे अनोखा रंग

राजनीति के मज़े हम देख रह गए दंग

राज नीति के मज़े, मज़े की  बाबा गीरी

भोली जनता के धन से भर रहे तिजोरी

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जिसकी जितनी चाकरी उसकी उतनी धार

मैडम के दरबार मे चमचों की भरमार

किसे पता किस्मत वाले ताले खुल जावें   

मजबूरी मे कब प्रधान मंत्री बन जावें

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कलमाड़ी मायूस हैं, राजा से गए हार

अवसर था बेहद बड़ा छोटी पड़ गयी मार

छोटी पड़ गयी मार, प्रभू फिर दे दो मौका

फिर से देखो कलमाड़ी का छक्का चौका

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राजनीति का राज है लूट सके तो लूट

हाथ मसल पछताएगा, कुर्सी जाये छूट

जल्दी जल्दी लूट इसी कुर्सी के बूते

वरना जनता आती है ले ले कर जूते

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होली का आगाज है, मन मे भरी उमंग

पर मंहगाई देख कर, जनता रह गयी दंग

जैसे आनन फानन मे, प्याज उगाई यार

फिर से कुछ जादू करो, प्यारे शरद पवार

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दुष्ट मनचले पा गए  हैं  जैसे बरदान

फैली जब से खबर है शीला हुई जवान

शीला हुई जवान,  नयी    पीढ़ी बौराई  

मंजन घिसते हैं पिया, मुन्नी है  बदनाम

 

 

 

हे प्रभु इस शहर को ये क्या हो गया है ?

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प्रभू ….

अब से पहले शहर की ये हालत न थी,,,, आज क्या हो गया…. आज क्या हो गया…

ये गाजियाबाद शहर को हो क्या गया है…  मैंने तो खुद को चिकोटी काट कर देखता हूँ कि कहीं ये सपना तो नहीं है? जो अधिकारी अपने ए सी रूम्स मे आराम कुर्सी पर बैठे विभागीय फोन पर बतियाया करते थे एक हफ्ते से  काम के आगे दिन रात नहीं देख रहे हैं। सरकारी मैडमें सब्जी खरीदने के लिए रिक्शे का इस्तेमाल कर रही हैं। सरकारी बाबू छुट्टियों और इतवार के दिन भी नहा धो कर सुबह से अपनी कुर्सी पर विराजमान हैं। पिछले तीन दिन  से रोगाणुओं कीटाणुओं की शामत आ गयी है। लगातार रात दिन एक कर के उनके आशियाने उजाड़े जा रहे हैं। सुवरों को उनके  क्रीड़ास्थल से बेदखल किया जा रहा है।

पिछले पाँच सालों से अंतर्ध्यान अवस्था मे कार्य करने वाले सफाई कर्मचारी और मोटी ताज़ी जमादारिनें मुंह पर कपड़ा बांधे झुंड के झुंड  इधर से उधर घूमते नज़र आने लगे हैं। वो कहते हैं न … घूरे के भी दिन लौटते हैं… पुराने और उपेक्षित पड़े सड़े गले कूड़ेदानों को रंग पोत कर ताज़ा दम कर दिया गया है । जिस गली मे पिछले चार साल से कीचड़ के ग्लेशियर पसरे रहते  थे आज उनपर टाइल्स अपनी चमक बिखेर रही है। रातों रात सड़कों पर टनों चूना ऐसे बिखेरा गया है कि मच्छरों का जीना दूभर हो गया है। सारे डिवाइडर रंगे पुते नज़र आ रहे हैं। चौराहों पर स्वागत पोस्टर पर मुस्कुराते हुए तमाम छुट्भइए नेताओं की चेहरे नज़र आने लगे हैं।

कल ही आटो वाला पुलिस वाले को बोल रहा था … अगली चक्कर मे दूंगा …और मुस्कुराता हुआ निकल लिया … इस पर पुलिस वाला बोला … बेटा तीन चक्कर यही बोल चुके हो… परसों हम भी देखेंगे बेटा…

अधिकारियों के फोन उनके कानों से परमानेंट चिपक गए लगते हैं। कुछ एक तो दस्त की दवा लेते भी नज़र आए… रात मे जनरेटर की रोशनी मे लेबर और उनके बच्चे रंगाई पुताई करने से (मुंह मांगी कीमत पर) हलाकान हुए जा रहे हैं।

जनता मुस्कुरा कर पूरे मज़े ले रही है…. कोई कह रहा था… बहन जी से फटती है इनकी 🙂

 

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