पद्म

एक्सेल पर अंकों मे लिखी धनराशि को शब्दों मे स्वतः रूपांतरित करने का आसान तरीका

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एक्सेल पर काम करते समय कई बार आवश्यकता होती है कि अंकों मे लिखी गयी धनराशि को शब्दों (रुपए पैसे) मे भी लिखा जाए (जैसे 1254.25 को One thousand two hundred fifty four and twentyfive paise Only)। यद्यपि एक्सेल मे माइक्रोसॉफ्ट की तरफ से यह प्रयोग सीधे नहीं उपलब्ध कराया गया है। लेकिन इसका उपाय अलग से किया जा सकता है। थोड़े से प्रयास से आप भी ऐसा कर पाएंगे। इसके लिए आपको कुछ कोडिंग की आवश्यकता होगी जिसे आपकी सुविधा के लिए फाइल के रूप मे  उपलब्ध कर दिया है जिसे यहाँ क्लिक कर के डाउनलोड कर लें।

1. सबसे पहले यहाँ क्लिक कर के विजुवल बेसिक की फाइल डाउनलोड कर लें। डाउनलोड की गयी फाइलें .rar फॉर्मेट मे ज़िप की गयी हैं, इन्हें डाउन्लोड करने के बाद डेस्कटॉप या कहीं अन्य स्थान पर एक्सट्रैक्ट कर लें जिससे उनको प्रयोग मे लाया जा सके। इनमे से एक फाइल (RsInword.bas) भारतीय रूपये के फॉर्मेट तथा (spellcurr.bas) इंग्लिश फॉर्मेट मे धनराशि का रूपान्तरण करने के लिए है।

2.माइक्रोसॉफ्ट आफिस मे जाएं और एक्सेल प्रोग्राम खोलें

3. Alt+F11 दबाएँ जिससे विजुवल बेसिक की विंडो खुलेगी।

4. File के टैब मे जा कर Import File का चयन करें और अपनी डाउन्लोड की गयी फाइल(RsInwords.bas) को चुनते हुए आयातित करें।

5. विजुवल बेसिक की विंडो बंद कर दें… अब आपकी एक्सेल शीट इस सुविधा के लिए तैयार है।

6. जिस ब्लॉक मे आपको अंकों का शब्द रूपान्तरण लेना है वहाँ निम्न सूत्र लगाएँ =RsInwords(A1) जहां A1 उस ब्लॉक के लिए है जहाँ धनराशि अंकों मे लिखी जानी है। पूर्णस्क्रीन कैप्चर 13-09-2012 084235.bmp

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कर के देखिये… ज़्यादा कठिन नहीं है… 🙂

हम आम आदमी … (कविता)

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हम आम आदमी हैं
किसी ‘खास’ का अनुगमन हमारी नियति है
हमारे बीच से ही बनता है कोई खास
हमारी मुट्ठियाँ देती हैं शक्ति
हमारे नारे देते हैं आवाज़
हमारे जुलूस देते हैं गति
हमारी तालियाँ देती हैं समर्थन ….
तकरीरों की भट्टियों मे
पकाए जाते हैं जज़्बात
हमारे सीने सहते हैं आघात
धीरे धीरे
बढ़ने लगती हैं मंचों की ऊँचाइयाँ
पसरने लगते हैं बैरिकेट्स
पनपने लगती हैं मरीचिकाएं
चरमराने लगती है आकांक्षाओं की मीनार
तभी अचानक होता है आभास
कि वो आम आदमी अब आम नहीं रहा
हो गया है खास
और फिर धीरे धीरे …..
उसे बुलंदियों का गुरूर होता गया
आम आदमी का वही चेहरा
आम आदमी से दूर होता गया
लोगों ने समझा नियति का खेल
हो लिए उदास …
कोई चारा भी नहीं था पास
लेकिन एक दिन
जब हद से बढ़ा संत्रास
(यही कोई ज़मीरी मौत के आस-पास )
फिर एक दिन अकुला कर
सिर झटक, अतीत को झुठला कर
फिर उठ खड़ा होता है कोई आम आदमी
भिंचती हैं मुट्ठियाँ
उछलते हैं नारे
निकलते हैं जुलूस ….
गढ़ी जाती हैं आकांक्षाओं की मीनारें
पकाए जाते हैं जज़्बात
तकरीर की भट्टियों पर
फिर एक भीड़ अनुगमन करती है
छिन्नमस्ता,……!
और एक बार फिर से
बैरीकेट्स फिर पसरते हैं
मंचों का कद बढ़ता है
वो आम आदमी का नुमाइंदा
इतना ऊपर चढ़ता है …
कि आम आदमी तिनका लगता है
अब आप ही कहिएये दोष किनका लगता है?
वो खास होते ही आम आदमी से दूर चला जाता है
और हर बार
आम आदमी ही छ्ला जाता है
चलिये कविता को यहाँ से नया मोड़ देता हूँ
एक इशारा आपके लिए छोड़ देता हूँ
गौर से देखें तो हमारे इर्द गिर्द भीड़ है
हर सीने मे कोई दर्द धड़कता है
हर आँख मे कोई सपना रोता है
हर कोई बच्चों के लिए भविष्य बोता है
मगर यह भीड़ है
बदहवास छितराई मानसिकता वाली
आम आदमी की भीड़
पर ये रात भी तो अमर नहीं है !!
एक दिन ….
आम आदमी किसी “खास” की याचना करना छोड़ देगा
समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई,
वक्त की मजबूत कलाई मरोड़ देगा
जिस दिन उसे भरोसा होगा
कि कोई चिंगारी आग भी हो सकती है
बहुत संभव है बुरे सपने से जाग भी हो सकती है
और मुझे तो लगता है
यही भीड़ एक दिन क्रान्ति बनेगी
और किस्मत के दाग धो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी

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…… पद्म सिंह  09-09-2011(गाजियाबाद)

आदत पालने की आदत

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मेरी बचपन से ही ये आदत है कि मै कोई आदत नहीं पालता… लेकिन आदतें हैं कि पीछा नहीं छोड़तीं…  

यूँ आदतों के भी अजीब किस्से हैं। पढ़ाई के लिए हम  इलाहाबाद मे किराये पर मकान(यहाँ अक्सर मकान को भी रूम कहने का प्रचलन है) ले कर रहते थे। शिक्षा विभाग यूपी बोर्ड वाले शर्मा जी हमारे सह-किरायेदार हुआ करते थे (संभव है अभी भी होंगे)… सुबह सुबह अपने दो सात आठ साल के दो बच्चों को ले कर हमारे आँगन मे आराम से उन्हें नहलाने और खुद भी  नहाने आते थे… ठंड हो या गर्मी के दिन, दोनों को नंगा कर के घंटों इतना रगड़ कर नहलाते, कि देखने वालों की खाल छिल जाती। साथ मे हजारों श्लोकों की स्मृति भी माँजी जाती थी। लगे हाथों अपने अङ्ग्रेज़ी ज्ञान के तड़के भी लगते चलते, सुबह सुबह की पढ़ाई करते हुए उनके वाचनामृत और उनके बच्चों की सिसकारियाँ  कान मे पड़ती रहतीं, फिर पढ़ाई भी क्या होती… उसके बाद शर्मा जी की नित्यक्रिया प्रारम्भ होती… कान पर जनेऊ लपेटे हमारे टॉइलेट का इस्तेमाल,   ब्रश और नहाना भी… ब्रश करते समय मध्यमा और अनामिका को जोड़ कर हलक के अंतिम छोर तक डालकर ऐसा माँजते कि उसकी आवाज़ से दो तीन मकान इधर उधर के लोगों के जिगर मुँह से बाहर आने को तैयार हो जाते। ये सब कुछ उनकी आदत मे शुमार था और जाड़ा, गर्मी, बरसात, अविरल अखंड चलता। 

बहुत सी आदतें ऐसी होती हैं जिन्हें लोग जानबूझ कर पालते हैं, गाँव मे कजरहा महतो  नाम के एक बुजुर्ग, उनकी आदत भी अजब गजब… उनको कोई "मौसिया" कह भर दे, फिर उसकी शामत समझिए… हरामजादो, बेईमानों, से लेकर माँ बहन तक का सफर एक सांस मे कर डालते, और लोग थे, कि उनकी गाली सुनने के आदी। गलियाँ सुनते और खी खी ठें ठें करते अपने रास्ते चलते … इसी बहाने हंसने का बहाना भी मिल जाता।

अजीब लगता है यह जानकार कि इंसान कहीं न कहीं किसी न किसी रूप मे किसी आदत का शिकार होता है। इन्हीं आदतों के कारण हम किसी के व्यवहार की पहचान भी करते हैं। कोई कैसे चलता है, कैसे खाता है, कैसे बात करता है और कैसे भाव भंगिमा अपनाता है हर बात अनजाने एक आदत का रूप ले लेती हैं। इनमे कुछ आदतें जानबूझ कर पाली जाती हैं तो कुछ व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

bxp64633आफिस के एक सहकर्मी हैं, सिगरेट के इतने शौकीन कि दिन भर मे एक  दो और कभी तीन डिब्बे भी खतम कर देते हैं। उनका दावा है कि उन्हें सिगरेट की आदत थोड़े ही है… शौकिया पीते हैं। जब चाहेंगे छोड़ देंगे। और ऐसा कहते हुए पिछले नौ सालों से देख रहा हूँ।

इन्हीं आदतों मे आदतें बखान करने की आदतें भी शुमार होती हैं… मौका मिलते ही अपनी आदतें बखान करना शुरू… मै तो सीधा सादा आदमी… मुझे छक्का पंजा नहीं आता भाई …  भई मै तो सुबह चार बजे उठ जाता हूँ…जाड़ा हो या बरसात  भई मै तो बिना नहाये भोजन नहीं करता… भई बिना सुर्ती खाये ठीक से उतरती नहीं मेरी तो… आदि आदि …

आदतों का आलम ये कि बहुत कम लोग अपनी आदतों के प्रति सजग होते हैं। कुछ आदतें विरासत मे मिलती हैं, कुछ अनजाने आस पड़ोस के परिवेश से तो कुछ खुद ही पाली जाती हैं। लेकिन हर तरह की आदतें कभी धनात्मक तो कभी ऋणात्मक रूप से व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं।

ऐसे ही एक बेहद ज़िंदादिल परिचित को नशे के रूप मे एक प्रसिद्ध खांसी की दवा पीने का शौक था । लाख समझाया लेकिन दावा वही,….. कोई नशेड़ी थोड़े ही हूँ… चाहूँ तो आज छोड़ दूँ… और आज लगभग दो साल उन्हें दुनिया छोड़े हो चुके हैं।  

बात बात मे गाली बकने या अपशब्द बोलने की आदत लगभग हर जगह देखने को मिल जाती है… दिल्ली और आसपास NCR क्षेत्र मे बहन की गाली लोग तकिया कलाम की तरह इस्तेमाल करते हैं, कभी कभी तो लगता है दिन भर मे जितनी बार बहन को याद करते हैं… भगवान का नाम लिया होता तो तर जाते। लेकिन आदत तो आदत है। कई बार भूल जाते हैं कि कहाँ बैठे हैं और किससे बात कर रहे हैं।

ispc013051यद्यपि कुछ आदतें अच्छी कही जा सकती हैं, परन्तु आदतें कहीं न कहीं आत्मनियंत्रण को खोना भर है। जब हम किसी आदत के शिकार होते हैं तो स्वयं को ही मूर्ख बना रहे होते हैं। किसी आदत का गुलाम होना दुनिया के साथ सहज तादात्म्य को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि किसी विषय पर विस्तृत  दृष्टिकोण भी प्रभावित होता है। अच्छी और बुरी आदतें विचार का एक अलग मुद्दा हो सकती हैं लेकिन आदतों का गुलाम होना कहीं न कहीं व्यक्तित्व को एकांगी बनाता है। आत्मावलोकन आदतों से बचने/समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

अगर आदतें होश पूर्वक या कहें विवेक पूर्वक पाली जाएँ तो अच्छे परिणाम आने की ज़्यादा संभावनाएं हैं..

शुभकामनायें ….. पद्म सिंह

क्या कहें ?

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स्थान – हास्पिटल का जनरल वार्ड

चार महीने हो गए हैं अस्पताल मे …जिनमे दो महीने  से ICU मे कटे है…

आज मरीज जो जनरल वार्ड मे शिफ्ट कर दिया गया है। अनुमान के हिसाब से तीन चार लाख का खर्चा हो चुका है अभी तक। डाक्टर कुछ साफ साफ नहीं बताते…कहते हैं हम पूरी कोशिश कर रहे हैं…

उम्र करीब पचपन साल… तीन बेटियाँ और दो बेटे जिनको पढ़ाने लिखने और शादी ब्याह मे  बाल झक सफ़ेद हो चुके हैं…एक बेटे की शादी अभी पिछले साल बड़े धूम से की थी… आज बूढ़ी हो चुकी माँ, बहन, और कुछ और रिशतेदारों के साथ  बहू भी आई है… जींस टीशर्ट और माँग मे छोटा सा टीका लगाए… सब के चेहरे पर आश्वासन और सपाट भाव मिले जुले हैं…थोड़ी देर मरीज को सभी मेहमान बेचारगी भरी नज़रों से देखते और आश्वासन देते हैं… यह जानते हुए कि इसका कोई अर्थ नहीं … चार महीने अस्पताल मे सेवा करते परिवारजन बहुत गहरे हार चुके हैं… शायद मान चुके हैं जो होना हो जल्दी हो।

बड़ा बेटा  फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलता है… पढ़ाई खतम कर के बच्चों को अंग्रेज़ी स्पीकिंग का ट्यूशन पढ़ता है…   बेटा सुबह आया था ..दिन मे किसी कंपनी मे काम, ट्यूशन और शाम की इंगलिश स्पीकिंग क्लास लेता है इस लिए उसे समय कम मिलता है…  छोटा बेटा पंद्रह के आसपास है… हास्पिटल की गैलरी मे टहलता हुआ मोबाइल के इयरफोन से गाने सुन रहा है…गुजरते हुए हाल पूछा तो कंधे उचका कर मुंह बिचका दिया जैसे पता नहीं देख लो जाकर…  उसके लिए (या शायद परिवार के लिए)इतने दिनो अस्पताल के चक्कर काटते काटते सामान्य सी बात हो गयी है।

कल रिशतेदार औरतों  मे अलग हट कर बातें हो रही थीं….

… इनके बाद तो अभी बहुत जिम्मेदारियाँ बची रह जाएंगी। एक बेटी और एक बेटा शादी करने को बचे है। बड़ा बेटा भी अभी किसी अच्छी सर्विस मे नहीं है,,, कच्ची गृहस्थी है… इस बात पर कोई ज़्यादा व्यवहारिक महिला कहती हैं… खैर सरकारी सर्विस है… एक लड़का तो लग ही जाएगा इनकी जगह… कम से कम उसकी ज़िंदगी तो बन जाएगी। रही बात इलाज के खर्चे की… तो विभाग खर्चा दे ही देगा…

कहते हैं छोटा बेटा किसी लड़की के साथ दुष्कर्म करने के प्रयास मे जेल मे रह चुका है… इसी सदमे ने मरीज को तोड़ दिया है…. तभी से किसी ने मरीज को हँसते हुए नहीं देखा है…

आज बड़ा लड़का बड़े से अच्छे मोटे फ्रेम मे  बड़ी सी फोटो फ्रेम करवा कर ले आया है… वो वाली फोटो जिसमे कोट और टाई पहने कुर्सी पर बैठे हैं…बाल काले और मूँछें चमकदार हैं…  हारा  थका और बीमार चेहरा देखना कौन चाहता है …

उधर मरीज भी अपनी स्थिति से निराश हो चुका सा लगता है… किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता… सूनी आँखों से खिड़की के बाहर का आकाश देखते हुए अचानक किसी खयाल पर कराह उठता है… बेचैनी और हताशा और फोड़े जैसे दुखते शरीर  ने पूरी दुनिया से जैसे रुचि समाप्त कर दी है… शायद मरीज ने भी मान लिया है जो होना है जल्दी हो….

कैंसर अपने अंतिम दौर मे है… फोटो फ्रेम सूखी चन्दन की  माला का इंतज़ार कर रहा है !!

…… पद्म सिंह

(यह प्रसंग सत्य घटना पर आधारित है)

यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह

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यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी

वक्त जालिम है सुन  बेरहम जिंदगी


इक शरारे में पैबस्त है आफताब

आज़माइश न कर बेशरम जिंदगी


ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी

गम  में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी


उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर

साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी


छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम

दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी


चल कहीं इश्क की चाँदमारी करें

कुछ तो होगा वफ़ा का वहम जिंदगी


सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली

कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी


रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी

बेवफा है मगर है   सनम  जिंदगी


धड़धड़ाती हुई रेल का इक सफर

मौत की मंजिलों पर खतम जिंदगी

अहले करम-एहसान करने वाला

शरारा-चिंगारी

आफताब-सूरज

पद्म सिंह – ०६/०१/२०११


छत्तीसगढ़ भवन…ब्लॉग गोष्ठी … संवेदना के आयाम, जीपीएस मोहतरमा और सवा ढाई किलो के हाथ…

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bloggerसूचना पहले से थी, अविनाश जी का जी-टाक भी दरवाज़ा खड्का गया …किन्तु इससे पहले ही नुक्कड़ पर ब्लॉगर मिलन की खबर पढ़ कर शाम की कड़कड़ाती ठण्ड में ब्लॉगर्स के गरमागरम विचारों और सुखद सानिध्य का लोभ संवरण नहीं कर सका… ऊपर से बहु प्रतीक्षित पाबला जी से मिलने की कामना ने छत्तीसगढ़ भवन पहुंचना सुनिश्चित कर दिया था…

मै और अविनाश जी दोनों अपनी अपनी कार से लगभग एक ही समय अपने अपने घर से चले थे किन्तु भला हो गूगल बाबा का जिसने थोड़ी बहुत त्रुटि के साथ छतीसगढ़ भवन की स्थिति स्पष्ट कर दी थी… इस लिए अकबर रोड, तीनमूर्ति और कौटिल्य मार्ग होते हुए पन्द्रह मिनट देर से  छतीसगढ़ भवन पहुँच गया…(इस बार पुनः अविनाश जी से पहले:)

अँधेरे में पाश इलाके में खड़ी छत्तीसगढ़भवन का भवन सन्नाटे में डूबा था… फोन मिलाते ही पाबला जी देवदूत जैसे प्रकट हुए …. पहली बार ही गले लग कर दोनों ऐसे मिले जैसे पता नहीं कब के सम्बन्धी हों…(आभासी दुनिया का कमाल..है न?)

P191210_20.13अंदर आते ही पाया कि कई ब्लॉगर पहले से सोफासीन रह कर देर से आने वाले (VIP’s?Smile)का इंतज़ार कर रहे थे… अशोक बजाज जी भी आ चुके थे… आने वाले हर ब्लॉगर मित्रों का उठ कर सहृदयता से स्वागत करने के उपरांत अशोक जी ने सबको एक केबिन नुमा केबिन में लेकर गए जहाँ उनके कुछ राजनैतिक मित्र भी साथ थे… जो संभवतः ब्लोगिंग से सरोकार न होने के कारण उठ कर चले गए… अब यहाँ एक दर्जन ब्लॉगर(खालिस वाले) ही बच गए थे…

P191210_18.45_[01]चर्चा की शुरुआत संक्षिप्त परिचय के बीच ब्लॉग एग्रीगेटर्स को लेकर हुई… मीडिया और ब्लॉगिंग में एक फर्क यह सामने आया कि जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया आज धीरे धीरे राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण कहीं न कहीं निष्पक्षता से दूर हो रही है वहीँ ब्लोगिंग में अभिव्यक्ति की बेलाग स्वतंत्रता अभी कायम है… जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया को  एक तरफ़ा अभिव्यक्ति कह सकते हैं वहीँ ब्लोगिंग में लेखक और पाठक दोनों समानांतर रूप से अपना पक्ष रख सकते हैं… इससे कहीं न कहीं ब्लोगर आत्मानुशासन, और ज़िम्मेदारी के प्रति भी सजग रहता है…शायद यही ब्लोगिंग की सबसे बड़ी शक्ति है.

इसी बीच चाय पेस्ट्री, पेट्टीज और बिस्किट के दौर ने चर्चा को और दिलचस्प बना दिया 🙂

P191210_19.28_[02]चर्चा को नया आयाम देते हुए खुशदीप जी ने  ब्लोगिंग को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम होने की बात करते हुए बताया कि आज हिंदी ब्लोगिंग अंग्रेजी या अन्य भाषाओं की ब्लोगिंग से किस तरह अलग हो सकता है… विशेष रूप से पिछले दो वर्षों से हिंदी ब्लॉग काफी तेज़ी से बढ़े हैं और बहुत सी प्रतिभाएं भी सामने आई हैं… हिंदी ब्लोगिंग ने फिलहाल एक मुकाम प्राप्त कर लिया है और अब समय है इसे एक नया आयाम देने की, जहाँ हम अपने विचारों को आभासी दुनिया के बादलों से वास्तविकता के धरातल पर लाने और अपने विचारों का क्रियान्वयन कर सकते हैं!

खुशदीप जी ने इस बात पर बल दिया कि ब्लोगिंग के साथ साथ अपनी संवेदना के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है. आज आधुनिकता और बाज़ारवाद ने बुजुर्गों को किसी हद तक अलग थलग किया है. उन्होंने बताया कि वो रोज़ अपने पास के वृद्धाश्रम जा कर कुछ समय बिताते हैं.. इस से जहाँ उन्हें अनुभव के अमूल्य खजाने मिलते हैं वहीँ वहाँ के बुजुर्गों को अपने एकाकी जीवन में खुशियों के रंग परवान चढते हैं… इस विषय पर सुरेश यादव जी के रैन बसेरों और बुजुर्गों के प्रति अपने अनुभवों को सुनने से अनायास ही लगने लगा कि कोई इंसान अपने बुजुर्गों के प्रति कितना कठोर और हृदयहीन हो सकता है. इसी से सम्बंधित उनके द्वारा सुनाई गयी एक प्रेरणात्मक  कहानी ने सभी को बुजुर्गों के प्रति संवेदना से भर दिया.

P191210_19.29_[03]इधर गोष्ठी चल रही थी उधर पाबला जी पूरी गतिविधि को अपने चतुर कैमरे में समेटने में लगे थे… उनका कैमरा एक इशारे पर लगातार आठ फोटो खींच रहा था … इसी बीच चाय, पेस्ट्री, पेट्टीज़ के साथ मिठाइयों और अल्पाहार का भी दौर चला… थोड़ी देर में सहमति बनी कि हाल में बैठ कर इस विषय पर एक लाइव पोस्ट भी ठोंक दी जाय.. सो लग गए सब के सब अपने अपने हथियार से जूझने … खुशदीप जी जहाँ रिपोर्टिंग में लगे वहीँ मै और अविनाश जी कैमरे से फोटो फोन में और फोन से लैपटॉप में लाने से लेकर उसे कम्प्रेस कर पोस्ट तक पहुँचाने में अपने दिमागी घोड़े खोले हुए थे…

इधर नुक्कड़ पर पोस्ट पब्लिश हो रही थी उधर भाई ललित शर्मा ने फोन पर सब को बधाई देते हुए सब का हाल पूछ रहे थे… अशोक बजाज जी भी ब्लॉगर्स से मिल कर अभिभूत से दिखे… उनकी खुशी देखते बनती थी… संजू तनेजा, राजीव कुमार तनेजा, सुरेश कुमार यादव, मैने , शाहनवाज़ सिद्दीकी, अविनाश वाचस्पति, कनिष्क कश्यप, अशोक बजाज, खुशदीप सहगल, बीएस पाबला, कुमार राधारमण और जयराम विप्लव जी आदि ने इस ब्लॉग गोष्ठी की सुखद अनुभवों को समेटे हुए विदा लिया …

रात ने दस्तक दे दी थी… बाहर ठण्ड सीने से लगने को तैयार खड़ी थी… बाहर आ कर तय हुआ कि पाबला जी, शाहनवाज़, जयराम, राधारमण (सर्व जी)मेरे साथ ही चले .. पाबला जी ने अपनी तकनीकी ज्ञान का ज़बरदस्त अनुभव कराया अपने फोन के जीपीएस तकनीक का प्रयोग कर के….. मै कार ड्राइव कर रहा था पाबला जी के मोबाइल की मशीनी मोहतरमा डैशबोर्ड पर आराम से लेटी हुई रास्ता बता रही थी,.. कमेंट्री के जैसे…शुद्ध और परिष्कृत हिंदी में… पाँच सौ मीटर जा कर दो रास्ते छोड़ कर बाएं मुड़ें, अब दाहिने मुड़ें… और हम सब लोग चमत्कृत थे कि उसे मेरी कार की स्पीड तक ठीक ठीक पता थी… गीता कालोनी की तरफ मुड़ते ही हमने थोड़ा रास्ता बदला… वो फिर बोली “मार्ग  की पुनर्गणना की जा रही है” उसने जब भी हिसाब लगा कर मुड़ने के संकेत दिए हम सीधे चलते रहे… कोई और होता तो शायद झल्ला कर कहता … आखिर ठहरे निरे ब्लॉगर हीSmile लेकिन जीपीएस मोहतरमा पुनर्गणना करती रहीं… अंत में तीक्ष्ण मोड़ मुड़ने के संकेत पर हमें पता चला कि हम अंतिम मोड़ भी छोड़ आये थे … और तीक्ष्ण मोड़ मुडना पड़ा … आखिर मोहतरमा ने अजय झा के घर तक पहुंचा कर ही दम लिया… अजय झा अपने शयन लिबास में घर से बाहर मिले और थोड़ी देर बाते कर हम पाबला जी के “सवा ढाई किलो के हाथ” से हाथ मिला कर अपने अपने  घर की ओर कूच कर गए.

आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-४ (मुंबई में पुलिस का चालान काटेगी आज़ाद पुलिस)

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आशा है मेरी पिछली पोस्टों आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-१, आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा- २ और आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३) के माध्यम से आज़ाद पुलिस से आप पर्याप्त परिचित होंगे …नहीं हैं तो कृपया उक्त पोस्टें पढ़ें…. इन पोस्टों को पढ़ कर मीडिया और ब्लॉगजगत से जुड़े हुए बहुत से लोगों द्वारा प्रतिक्रियाएं मिली थीं… कुछ संस्थाओं और लोगों ने स्वयं ब्रह्मपाल से मिल कर उनके संघर्ष और जज्बे को समझा-जाना … कुछ ने आर्थिक सहायता भी दी… लेकिन इस सहायता राशि को भी अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए न रख कर समाज सेवा में अर्पित कर दिए गए….  तीन दिन पहले कहीं रास्ते में फिर से ब्रह्मपाल से मेरा मिलना हो गया… बातें होती रहीं… आज़ाद पुलिस के अगले मिशन के बारे में पूछने पर पता चला कि निकट भविष्य में आजाद पुलिस द्वारा एक गुटखे पर तिरंगे झंडे की तस्वीर और नाम का बेजा इस्तेमाल करने से तिरंगे का अपमान होता है. इस कंपनी के विरोध में जैसा कि ब्रह्मपाल ने अनेक बार प्रशासन को आगाह दिया था प्रशासन तक बात बखूबी पहुँच भी  चुकी थी लेकिन ब्रह्मपाल की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही साबित हुई और उस कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी… इस कंपनी के विरोध में शीघ्र धरने पर बैठने हेतु उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना भेजी जा रही है… 

Top.bmpइसके अतिरिक्ति जिस पुलिस और प्रशासन ने कभी ब्रह्मपाल की सुध नहीं ली… उसकी आवाज़ बंद करने के लिए  सिरफिरा करार देते हुए बेवजह बार बार जेल में ठूंसती रही उसी पुलिस की कार्यप्रणाली के सुधार के सपने देखने वाला ब्रह्मप्रकाश(आज़ाद पुलिस) कुछ ही महीने में मुंबई पुलिस की खबर लेने मुंबई जाने वाला है… बताया कि २१ मई २०११   को अपने रिक्शे सहित मुंबई जाकर मुंबई पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार और मौलिक कमियों को उजागर करने का प्रयास करेगा … इसके लिए आज़ाद पुलिस का अनोखा तरीका है पुलिस का चालान करना… ये जुनूनी वन मैन आर्मी अपनी स्वयं की चालान बुक रखता है… जहाँ कहीं पुलिस की कमियाँ देखता है… तुरंत चालान काटता है … चालान पर उस पुलिस वाले के हस्ताक्षर भी करवाता है और चालान एस एस पी अथवा उनसे उच्चतर अधिकारी को बकायदा कार्यवाही करने के अनुरोध के साथ प्रस्तुत किया जाता है… इस प्रयास में कई बार पुलिस का कोप-भाजन बनने, मार खाने, हवालात जाने के बावजूद उसके जज्बे में कोई कमी नहीं आती और अपना संघर्ष जारी रखता है,  मुंबई जाने के सम्बन्ध में   दिल्ली पंजाब केसरी समाचार पत्र ने दिनांक ०१-१२-१० के अंक में खबर को प्रमुखता दी है…

यहाँ अवगत कराना चाहूँगा कि ब्रह्मपाल के अनुसार किसी सहायता अथवा अनुदान राशि का एक पैसा अपनी जीविका के लिए प्रयोग नहीं करता…  आज़ाद पुलिस को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने के लिए उसे  एक कैमरे की आवश्यकता थी … जय कुमार झा जी की सलाह पर इस तरह के ईमानदार और आम जनता के लिए होने वाले संघर्ष पर छोटी-छोटी सहयोग राशि के लिए hprd   के लिए अपने वेतन से प्रतिमाह ५० रूपए का एक छोटा सा फंड बनाना शुरू कर दिया था… आशा है इस प्रयास के लिए मेरे फंड से शीघ्र ही एक कैमरा लिया जा सकेगा…

आज़ाद पुलिस की मुहिम और संघर्ष के प्रति ब्लॉग जगत में भी कई मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहा है…हाल ही में ब्लॉग जगत के कुछ सक्षम मित्रों की संवेदनाएं ब्रह्मपाल के प्रति शिद्दत से दिखी … इस बात से आज़ाद पुलिस की नगण्य सी मुहिम परवान चढेगी ऐसा विश्वास है… इस पोस्ट के माध्यम से आप सब से अपील है कि आज़ाद पुलिस की मुंबई मुहिम पर यथा संभव यथा योग्य सहयोग करें…

आज़ाद पुलिस की आगे की गतिविधियों के लिए नया ब्लॉग बना दिया गया है जिससे लोग आसानी से आज़ाद पुलिस और उसकी मुहिम से सीधे जुड़ सकें… ब्लॉग पर जाने के लिए क्लिक करें <आज़ाद पुलिस> पर

आपका पद्म सिंह ९७१६९७३२६२