पद्मावलि

हम आम आदमी … (कविता)

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हम आम आदमी हैं
किसी ‘खास’ का अनुगमन हमारी नियति है
हमारे बीच से ही बनता है कोई खास
हमारी मुट्ठियाँ देती हैं शक्ति
हमारे नारे देते हैं आवाज़
हमारे जुलूस देते हैं गति
हमारी तालियाँ देती हैं समर्थन ….
तकरीरों की भट्टियों मे
पकाए जाते हैं जज़्बात
हमारे सीने सहते हैं आघात
धीरे धीरे
बढ़ने लगती हैं मंचों की ऊँचाइयाँ
पसरने लगते हैं बैरिकेट्स
पनपने लगती हैं मरीचिकाएं
चरमराने लगती है आकांक्षाओं की मीनार
तभी अचानक होता है आभास
कि वो आम आदमी अब आम नहीं रहा
हो गया है खास
और फिर धीरे धीरे …..
उसे बुलंदियों का गुरूर होता गया
आम आदमी का वही चेहरा
आम आदमी से दूर होता गया
लोगों ने समझा नियति का खेल
हो लिए उदास …
कोई चारा भी नहीं था पास
लेकिन एक दिन
जब हद से बढ़ा संत्रास
(यही कोई ज़मीरी मौत के आस-पास )
फिर एक दिन अकुला कर
सिर झटक, अतीत को झुठला कर
फिर उठ खड़ा होता है कोई आम आदमी
भिंचती हैं मुट्ठियाँ
उछलते हैं नारे
निकलते हैं जुलूस ….
गढ़ी जाती हैं आकांक्षाओं की मीनारें
पकाए जाते हैं जज़्बात
तकरीर की भट्टियों पर
फिर एक भीड़ अनुगमन करती है
छिन्नमस्ता,……!
और एक बार फिर से
बैरीकेट्स फिर पसरते हैं
मंचों का कद बढ़ता है
वो आम आदमी का नुमाइंदा
इतना ऊपर चढ़ता है …
कि आम आदमी तिनका लगता है
अब आप ही कहिएये दोष किनका लगता है?
वो खास होते ही आम आदमी से दूर चला जाता है
और हर बार
आम आदमी ही छ्ला जाता है
चलिये कविता को यहाँ से नया मोड़ देता हूँ
एक इशारा आपके लिए छोड़ देता हूँ
गौर से देखें तो हमारे इर्द गिर्द भीड़ है
हर सीने मे कोई दर्द धड़कता है
हर आँख मे कोई सपना रोता है
हर कोई बच्चों के लिए भविष्य बोता है
मगर यह भीड़ है
बदहवास छितराई मानसिकता वाली
आम आदमी की भीड़
पर ये रात भी तो अमर नहीं है !!
एक दिन ….
आम आदमी किसी “खास” की याचना करना छोड़ देगा
समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई,
वक्त की मजबूत कलाई मरोड़ देगा
जिस दिन उसे भरोसा होगा
कि कोई चिंगारी आग भी हो सकती है
बहुत संभव है बुरे सपने से जाग भी हो सकती है
और मुझे तो लगता है
यही भीड़ एक दिन क्रान्ति बनेगी
और किस्मत के दाग धो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी

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…… पद्म सिंह  09-09-2011(गाजियाबाद)

आदत पालने की आदत

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मेरी बचपन से ही ये आदत है कि मै कोई आदत नहीं पालता… लेकिन आदतें हैं कि पीछा नहीं छोड़तीं…  

यूँ आदतों के भी अजीब किस्से हैं। पढ़ाई के लिए हम  इलाहाबाद मे किराये पर मकान(यहाँ अक्सर मकान को भी रूम कहने का प्रचलन है) ले कर रहते थे। शिक्षा विभाग यूपी बोर्ड वाले शर्मा जी हमारे सह-किरायेदार हुआ करते थे (संभव है अभी भी होंगे)… सुबह सुबह अपने दो सात आठ साल के दो बच्चों को ले कर हमारे आँगन मे आराम से उन्हें नहलाने और खुद भी  नहाने आते थे… ठंड हो या गर्मी के दिन, दोनों को नंगा कर के घंटों इतना रगड़ कर नहलाते, कि देखने वालों की खाल छिल जाती। साथ मे हजारों श्लोकों की स्मृति भी माँजी जाती थी। लगे हाथों अपने अङ्ग्रेज़ी ज्ञान के तड़के भी लगते चलते, सुबह सुबह की पढ़ाई करते हुए उनके वाचनामृत और उनके बच्चों की सिसकारियाँ  कान मे पड़ती रहतीं, फिर पढ़ाई भी क्या होती… उसके बाद शर्मा जी की नित्यक्रिया प्रारम्भ होती… कान पर जनेऊ लपेटे हमारे टॉइलेट का इस्तेमाल,   ब्रश और नहाना भी… ब्रश करते समय मध्यमा और अनामिका को जोड़ कर हलक के अंतिम छोर तक डालकर ऐसा माँजते कि उसकी आवाज़ से दो तीन मकान इधर उधर के लोगों के जिगर मुँह से बाहर आने को तैयार हो जाते। ये सब कुछ उनकी आदत मे शुमार था और जाड़ा, गर्मी, बरसात, अविरल अखंड चलता। 

बहुत सी आदतें ऐसी होती हैं जिन्हें लोग जानबूझ कर पालते हैं, गाँव मे कजरहा महतो  नाम के एक बुजुर्ग, उनकी आदत भी अजब गजब… उनको कोई "मौसिया" कह भर दे, फिर उसकी शामत समझिए… हरामजादो, बेईमानों, से लेकर माँ बहन तक का सफर एक सांस मे कर डालते, और लोग थे, कि उनकी गाली सुनने के आदी। गलियाँ सुनते और खी खी ठें ठें करते अपने रास्ते चलते … इसी बहाने हंसने का बहाना भी मिल जाता।

अजीब लगता है यह जानकार कि इंसान कहीं न कहीं किसी न किसी रूप मे किसी आदत का शिकार होता है। इन्हीं आदतों के कारण हम किसी के व्यवहार की पहचान भी करते हैं। कोई कैसे चलता है, कैसे खाता है, कैसे बात करता है और कैसे भाव भंगिमा अपनाता है हर बात अनजाने एक आदत का रूप ले लेती हैं। इनमे कुछ आदतें जानबूझ कर पाली जाती हैं तो कुछ व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

bxp64633आफिस के एक सहकर्मी हैं, सिगरेट के इतने शौकीन कि दिन भर मे एक  दो और कभी तीन डिब्बे भी खतम कर देते हैं। उनका दावा है कि उन्हें सिगरेट की आदत थोड़े ही है… शौकिया पीते हैं। जब चाहेंगे छोड़ देंगे। और ऐसा कहते हुए पिछले नौ सालों से देख रहा हूँ।

इन्हीं आदतों मे आदतें बखान करने की आदतें भी शुमार होती हैं… मौका मिलते ही अपनी आदतें बखान करना शुरू… मै तो सीधा सादा आदमी… मुझे छक्का पंजा नहीं आता भाई …  भई मै तो सुबह चार बजे उठ जाता हूँ…जाड़ा हो या बरसात  भई मै तो बिना नहाये भोजन नहीं करता… भई बिना सुर्ती खाये ठीक से उतरती नहीं मेरी तो… आदि आदि …

आदतों का आलम ये कि बहुत कम लोग अपनी आदतों के प्रति सजग होते हैं। कुछ आदतें विरासत मे मिलती हैं, कुछ अनजाने आस पड़ोस के परिवेश से तो कुछ खुद ही पाली जाती हैं। लेकिन हर तरह की आदतें कभी धनात्मक तो कभी ऋणात्मक रूप से व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं।

ऐसे ही एक बेहद ज़िंदादिल परिचित को नशे के रूप मे एक प्रसिद्ध खांसी की दवा पीने का शौक था । लाख समझाया लेकिन दावा वही,….. कोई नशेड़ी थोड़े ही हूँ… चाहूँ तो आज छोड़ दूँ… और आज लगभग दो साल उन्हें दुनिया छोड़े हो चुके हैं।  

बात बात मे गाली बकने या अपशब्द बोलने की आदत लगभग हर जगह देखने को मिल जाती है… दिल्ली और आसपास NCR क्षेत्र मे बहन की गाली लोग तकिया कलाम की तरह इस्तेमाल करते हैं, कभी कभी तो लगता है दिन भर मे जितनी बार बहन को याद करते हैं… भगवान का नाम लिया होता तो तर जाते। लेकिन आदत तो आदत है। कई बार भूल जाते हैं कि कहाँ बैठे हैं और किससे बात कर रहे हैं।

ispc013051यद्यपि कुछ आदतें अच्छी कही जा सकती हैं, परन्तु आदतें कहीं न कहीं आत्मनियंत्रण को खोना भर है। जब हम किसी आदत के शिकार होते हैं तो स्वयं को ही मूर्ख बना रहे होते हैं। किसी आदत का गुलाम होना दुनिया के साथ सहज तादात्म्य को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि किसी विषय पर विस्तृत  दृष्टिकोण भी प्रभावित होता है। अच्छी और बुरी आदतें विचार का एक अलग मुद्दा हो सकती हैं लेकिन आदतों का गुलाम होना कहीं न कहीं व्यक्तित्व को एकांगी बनाता है। आत्मावलोकन आदतों से बचने/समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

अगर आदतें होश पूर्वक या कहें विवेक पूर्वक पाली जाएँ तो अच्छे परिणाम आने की ज़्यादा संभावनाएं हैं..

शुभकामनायें ….. पद्म सिंह

क्या कहें ?

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स्थान – हास्पिटल का जनरल वार्ड

चार महीने हो गए हैं अस्पताल मे …जिनमे दो महीने  से ICU मे कटे है…

आज मरीज जो जनरल वार्ड मे शिफ्ट कर दिया गया है। अनुमान के हिसाब से तीन चार लाख का खर्चा हो चुका है अभी तक। डाक्टर कुछ साफ साफ नहीं बताते…कहते हैं हम पूरी कोशिश कर रहे हैं…

उम्र करीब पचपन साल… तीन बेटियाँ और दो बेटे जिनको पढ़ाने लिखने और शादी ब्याह मे  बाल झक सफ़ेद हो चुके हैं…एक बेटे की शादी अभी पिछले साल बड़े धूम से की थी… आज बूढ़ी हो चुकी माँ, बहन, और कुछ और रिशतेदारों के साथ  बहू भी आई है… जींस टीशर्ट और माँग मे छोटा सा टीका लगाए… सब के चेहरे पर आश्वासन और सपाट भाव मिले जुले हैं…थोड़ी देर मरीज को सभी मेहमान बेचारगी भरी नज़रों से देखते और आश्वासन देते हैं… यह जानते हुए कि इसका कोई अर्थ नहीं … चार महीने अस्पताल मे सेवा करते परिवारजन बहुत गहरे हार चुके हैं… शायद मान चुके हैं जो होना हो जल्दी हो।

बड़ा बेटा  फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलता है… पढ़ाई खतम कर के बच्चों को अंग्रेज़ी स्पीकिंग का ट्यूशन पढ़ता है…   बेटा सुबह आया था ..दिन मे किसी कंपनी मे काम, ट्यूशन और शाम की इंगलिश स्पीकिंग क्लास लेता है इस लिए उसे समय कम मिलता है…  छोटा बेटा पंद्रह के आसपास है… हास्पिटल की गैलरी मे टहलता हुआ मोबाइल के इयरफोन से गाने सुन रहा है…गुजरते हुए हाल पूछा तो कंधे उचका कर मुंह बिचका दिया जैसे पता नहीं देख लो जाकर…  उसके लिए (या शायद परिवार के लिए)इतने दिनो अस्पताल के चक्कर काटते काटते सामान्य सी बात हो गयी है।

कल रिशतेदार औरतों  मे अलग हट कर बातें हो रही थीं….

… इनके बाद तो अभी बहुत जिम्मेदारियाँ बची रह जाएंगी। एक बेटी और एक बेटा शादी करने को बचे है। बड़ा बेटा भी अभी किसी अच्छी सर्विस मे नहीं है,,, कच्ची गृहस्थी है… इस बात पर कोई ज़्यादा व्यवहारिक महिला कहती हैं… खैर सरकारी सर्विस है… एक लड़का तो लग ही जाएगा इनकी जगह… कम से कम उसकी ज़िंदगी तो बन जाएगी। रही बात इलाज के खर्चे की… तो विभाग खर्चा दे ही देगा…

कहते हैं छोटा बेटा किसी लड़की के साथ दुष्कर्म करने के प्रयास मे जेल मे रह चुका है… इसी सदमे ने मरीज को तोड़ दिया है…. तभी से किसी ने मरीज को हँसते हुए नहीं देखा है…

आज बड़ा लड़का बड़े से अच्छे मोटे फ्रेम मे  बड़ी सी फोटो फ्रेम करवा कर ले आया है… वो वाली फोटो जिसमे कोट और टाई पहने कुर्सी पर बैठे हैं…बाल काले और मूँछें चमकदार हैं…  हारा  थका और बीमार चेहरा देखना कौन चाहता है …

उधर मरीज भी अपनी स्थिति से निराश हो चुका सा लगता है… किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता… सूनी आँखों से खिड़की के बाहर का आकाश देखते हुए अचानक किसी खयाल पर कराह उठता है… बेचैनी और हताशा और फोड़े जैसे दुखते शरीर  ने पूरी दुनिया से जैसे रुचि समाप्त कर दी है… शायद मरीज ने भी मान लिया है जो होना है जल्दी हो….

कैंसर अपने अंतिम दौर मे है… फोटो फ्रेम सूखी चन्दन की  माला का इंतज़ार कर रहा है !!

…… पद्म सिंह

(यह प्रसंग सत्य घटना पर आधारित है)

यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह

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यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी

वक्त जालिम है सुन  बेरहम जिंदगी


इक शरारे में पैबस्त है आफताब

आज़माइश न कर बेशरम जिंदगी


ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी

गम  में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी


उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर

साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी


छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम

दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी


चल कहीं इश्क की चाँदमारी करें

कुछ तो होगा वफ़ा का वहम जिंदगी


सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली

कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी


रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी

बेवफा है मगर है   सनम  जिंदगी


धड़धड़ाती हुई रेल का इक सफर

मौत की मंजिलों पर खतम जिंदगी

अहले करम-एहसान करने वाला

शरारा-चिंगारी

आफताब-सूरज

पद्म सिंह – ०६/०१/२०११


छत्तीसगढ़ भवन…ब्लॉग गोष्ठी … संवेदना के आयाम, जीपीएस मोहतरमा और सवा ढाई किलो के हाथ…

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bloggerसूचना पहले से थी, अविनाश जी का जी-टाक भी दरवाज़ा खड्का गया …किन्तु इससे पहले ही नुक्कड़ पर ब्लॉगर मिलन की खबर पढ़ कर शाम की कड़कड़ाती ठण्ड में ब्लॉगर्स के गरमागरम विचारों और सुखद सानिध्य का लोभ संवरण नहीं कर सका… ऊपर से बहु प्रतीक्षित पाबला जी से मिलने की कामना ने छत्तीसगढ़ भवन पहुंचना सुनिश्चित कर दिया था…

मै और अविनाश जी दोनों अपनी अपनी कार से लगभग एक ही समय अपने अपने घर से चले थे किन्तु भला हो गूगल बाबा का जिसने थोड़ी बहुत त्रुटि के साथ छतीसगढ़ भवन की स्थिति स्पष्ट कर दी थी… इस लिए अकबर रोड, तीनमूर्ति और कौटिल्य मार्ग होते हुए पन्द्रह मिनट देर से  छतीसगढ़ भवन पहुँच गया…(इस बार पुनः अविनाश जी से पहले:)

अँधेरे में पाश इलाके में खड़ी छत्तीसगढ़भवन का भवन सन्नाटे में डूबा था… फोन मिलाते ही पाबला जी देवदूत जैसे प्रकट हुए …. पहली बार ही गले लग कर दोनों ऐसे मिले जैसे पता नहीं कब के सम्बन्धी हों…(आभासी दुनिया का कमाल..है न?)

P191210_20.13अंदर आते ही पाया कि कई ब्लॉगर पहले से सोफासीन रह कर देर से आने वाले (VIP’s?Smile)का इंतज़ार कर रहे थे… अशोक बजाज जी भी आ चुके थे… आने वाले हर ब्लॉगर मित्रों का उठ कर सहृदयता से स्वागत करने के उपरांत अशोक जी ने सबको एक केबिन नुमा केबिन में लेकर गए जहाँ उनके कुछ राजनैतिक मित्र भी साथ थे… जो संभवतः ब्लोगिंग से सरोकार न होने के कारण उठ कर चले गए… अब यहाँ एक दर्जन ब्लॉगर(खालिस वाले) ही बच गए थे…

P191210_18.45_[01]चर्चा की शुरुआत संक्षिप्त परिचय के बीच ब्लॉग एग्रीगेटर्स को लेकर हुई… मीडिया और ब्लॉगिंग में एक फर्क यह सामने आया कि जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया आज धीरे धीरे राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण कहीं न कहीं निष्पक्षता से दूर हो रही है वहीँ ब्लोगिंग में अभिव्यक्ति की बेलाग स्वतंत्रता अभी कायम है… जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया को  एक तरफ़ा अभिव्यक्ति कह सकते हैं वहीँ ब्लोगिंग में लेखक और पाठक दोनों समानांतर रूप से अपना पक्ष रख सकते हैं… इससे कहीं न कहीं ब्लोगर आत्मानुशासन, और ज़िम्मेदारी के प्रति भी सजग रहता है…शायद यही ब्लोगिंग की सबसे बड़ी शक्ति है.

इसी बीच चाय पेस्ट्री, पेट्टीज और बिस्किट के दौर ने चर्चा को और दिलचस्प बना दिया 🙂

P191210_19.28_[02]चर्चा को नया आयाम देते हुए खुशदीप जी ने  ब्लोगिंग को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम होने की बात करते हुए बताया कि आज हिंदी ब्लोगिंग अंग्रेजी या अन्य भाषाओं की ब्लोगिंग से किस तरह अलग हो सकता है… विशेष रूप से पिछले दो वर्षों से हिंदी ब्लॉग काफी तेज़ी से बढ़े हैं और बहुत सी प्रतिभाएं भी सामने आई हैं… हिंदी ब्लोगिंग ने फिलहाल एक मुकाम प्राप्त कर लिया है और अब समय है इसे एक नया आयाम देने की, जहाँ हम अपने विचारों को आभासी दुनिया के बादलों से वास्तविकता के धरातल पर लाने और अपने विचारों का क्रियान्वयन कर सकते हैं!

खुशदीप जी ने इस बात पर बल दिया कि ब्लोगिंग के साथ साथ अपनी संवेदना के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है. आज आधुनिकता और बाज़ारवाद ने बुजुर्गों को किसी हद तक अलग थलग किया है. उन्होंने बताया कि वो रोज़ अपने पास के वृद्धाश्रम जा कर कुछ समय बिताते हैं.. इस से जहाँ उन्हें अनुभव के अमूल्य खजाने मिलते हैं वहीँ वहाँ के बुजुर्गों को अपने एकाकी जीवन में खुशियों के रंग परवान चढते हैं… इस विषय पर सुरेश यादव जी के रैन बसेरों और बुजुर्गों के प्रति अपने अनुभवों को सुनने से अनायास ही लगने लगा कि कोई इंसान अपने बुजुर्गों के प्रति कितना कठोर और हृदयहीन हो सकता है. इसी से सम्बंधित उनके द्वारा सुनाई गयी एक प्रेरणात्मक  कहानी ने सभी को बुजुर्गों के प्रति संवेदना से भर दिया.

P191210_19.29_[03]इधर गोष्ठी चल रही थी उधर पाबला जी पूरी गतिविधि को अपने चतुर कैमरे में समेटने में लगे थे… उनका कैमरा एक इशारे पर लगातार आठ फोटो खींच रहा था … इसी बीच चाय, पेस्ट्री, पेट्टीज़ के साथ मिठाइयों और अल्पाहार का भी दौर चला… थोड़ी देर में सहमति बनी कि हाल में बैठ कर इस विषय पर एक लाइव पोस्ट भी ठोंक दी जाय.. सो लग गए सब के सब अपने अपने हथियार से जूझने … खुशदीप जी जहाँ रिपोर्टिंग में लगे वहीँ मै और अविनाश जी कैमरे से फोटो फोन में और फोन से लैपटॉप में लाने से लेकर उसे कम्प्रेस कर पोस्ट तक पहुँचाने में अपने दिमागी घोड़े खोले हुए थे…

इधर नुक्कड़ पर पोस्ट पब्लिश हो रही थी उधर भाई ललित शर्मा ने फोन पर सब को बधाई देते हुए सब का हाल पूछ रहे थे… अशोक बजाज जी भी ब्लॉगर्स से मिल कर अभिभूत से दिखे… उनकी खुशी देखते बनती थी… संजू तनेजा, राजीव कुमार तनेजा, सुरेश कुमार यादव, मैने , शाहनवाज़ सिद्दीकी, अविनाश वाचस्पति, कनिष्क कश्यप, अशोक बजाज, खुशदीप सहगल, बीएस पाबला, कुमार राधारमण और जयराम विप्लव जी आदि ने इस ब्लॉग गोष्ठी की सुखद अनुभवों को समेटे हुए विदा लिया …

रात ने दस्तक दे दी थी… बाहर ठण्ड सीने से लगने को तैयार खड़ी थी… बाहर आ कर तय हुआ कि पाबला जी, शाहनवाज़, जयराम, राधारमण (सर्व जी)मेरे साथ ही चले .. पाबला जी ने अपनी तकनीकी ज्ञान का ज़बरदस्त अनुभव कराया अपने फोन के जीपीएस तकनीक का प्रयोग कर के….. मै कार ड्राइव कर रहा था पाबला जी के मोबाइल की मशीनी मोहतरमा डैशबोर्ड पर आराम से लेटी हुई रास्ता बता रही थी,.. कमेंट्री के जैसे…शुद्ध और परिष्कृत हिंदी में… पाँच सौ मीटर जा कर दो रास्ते छोड़ कर बाएं मुड़ें, अब दाहिने मुड़ें… और हम सब लोग चमत्कृत थे कि उसे मेरी कार की स्पीड तक ठीक ठीक पता थी… गीता कालोनी की तरफ मुड़ते ही हमने थोड़ा रास्ता बदला… वो फिर बोली “मार्ग  की पुनर्गणना की जा रही है” उसने जब भी हिसाब लगा कर मुड़ने के संकेत दिए हम सीधे चलते रहे… कोई और होता तो शायद झल्ला कर कहता … आखिर ठहरे निरे ब्लॉगर हीSmile लेकिन जीपीएस मोहतरमा पुनर्गणना करती रहीं… अंत में तीक्ष्ण मोड़ मुड़ने के संकेत पर हमें पता चला कि हम अंतिम मोड़ भी छोड़ आये थे … और तीक्ष्ण मोड़ मुडना पड़ा … आखिर मोहतरमा ने अजय झा के घर तक पहुंचा कर ही दम लिया… अजय झा अपने शयन लिबास में घर से बाहर मिले और थोड़ी देर बाते कर हम पाबला जी के “सवा ढाई किलो के हाथ” से हाथ मिला कर अपने अपने  घर की ओर कूच कर गए.

आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-४ (मुंबई में पुलिस का चालान काटेगी आज़ाद पुलिस)

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आशा है मेरी पिछली पोस्टों आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-१, आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा- २ और आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३) के माध्यम से आज़ाद पुलिस से आप पर्याप्त परिचित होंगे …नहीं हैं तो कृपया उक्त पोस्टें पढ़ें…. इन पोस्टों को पढ़ कर मीडिया और ब्लॉगजगत से जुड़े हुए बहुत से लोगों द्वारा प्रतिक्रियाएं मिली थीं… कुछ संस्थाओं और लोगों ने स्वयं ब्रह्मपाल से मिल कर उनके संघर्ष और जज्बे को समझा-जाना … कुछ ने आर्थिक सहायता भी दी… लेकिन इस सहायता राशि को भी अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए न रख कर समाज सेवा में अर्पित कर दिए गए….  तीन दिन पहले कहीं रास्ते में फिर से ब्रह्मपाल से मेरा मिलना हो गया… बातें होती रहीं… आज़ाद पुलिस के अगले मिशन के बारे में पूछने पर पता चला कि निकट भविष्य में आजाद पुलिस द्वारा एक गुटखे पर तिरंगे झंडे की तस्वीर और नाम का बेजा इस्तेमाल करने से तिरंगे का अपमान होता है. इस कंपनी के विरोध में जैसा कि ब्रह्मपाल ने अनेक बार प्रशासन को आगाह दिया था प्रशासन तक बात बखूबी पहुँच भी  चुकी थी लेकिन ब्रह्मपाल की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही साबित हुई और उस कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी… इस कंपनी के विरोध में शीघ्र धरने पर बैठने हेतु उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना भेजी जा रही है… 

Top.bmpइसके अतिरिक्ति जिस पुलिस और प्रशासन ने कभी ब्रह्मपाल की सुध नहीं ली… उसकी आवाज़ बंद करने के लिए  सिरफिरा करार देते हुए बेवजह बार बार जेल में ठूंसती रही उसी पुलिस की कार्यप्रणाली के सुधार के सपने देखने वाला ब्रह्मप्रकाश(आज़ाद पुलिस) कुछ ही महीने में मुंबई पुलिस की खबर लेने मुंबई जाने वाला है… बताया कि २१ मई २०११   को अपने रिक्शे सहित मुंबई जाकर मुंबई पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार और मौलिक कमियों को उजागर करने का प्रयास करेगा … इसके लिए आज़ाद पुलिस का अनोखा तरीका है पुलिस का चालान करना… ये जुनूनी वन मैन आर्मी अपनी स्वयं की चालान बुक रखता है… जहाँ कहीं पुलिस की कमियाँ देखता है… तुरंत चालान काटता है … चालान पर उस पुलिस वाले के हस्ताक्षर भी करवाता है और चालान एस एस पी अथवा उनसे उच्चतर अधिकारी को बकायदा कार्यवाही करने के अनुरोध के साथ प्रस्तुत किया जाता है… इस प्रयास में कई बार पुलिस का कोप-भाजन बनने, मार खाने, हवालात जाने के बावजूद उसके जज्बे में कोई कमी नहीं आती और अपना संघर्ष जारी रखता है,  मुंबई जाने के सम्बन्ध में   दिल्ली पंजाब केसरी समाचार पत्र ने दिनांक ०१-१२-१० के अंक में खबर को प्रमुखता दी है…

यहाँ अवगत कराना चाहूँगा कि ब्रह्मपाल के अनुसार किसी सहायता अथवा अनुदान राशि का एक पैसा अपनी जीविका के लिए प्रयोग नहीं करता…  आज़ाद पुलिस को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने के लिए उसे  एक कैमरे की आवश्यकता थी … जय कुमार झा जी की सलाह पर इस तरह के ईमानदार और आम जनता के लिए होने वाले संघर्ष पर छोटी-छोटी सहयोग राशि के लिए hprd   के लिए अपने वेतन से प्रतिमाह ५० रूपए का एक छोटा सा फंड बनाना शुरू कर दिया था… आशा है इस प्रयास के लिए मेरे फंड से शीघ्र ही एक कैमरा लिया जा सकेगा…

आज़ाद पुलिस की मुहिम और संघर्ष के प्रति ब्लॉग जगत में भी कई मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहा है…हाल ही में ब्लॉग जगत के कुछ सक्षम मित्रों की संवेदनाएं ब्रह्मपाल के प्रति शिद्दत से दिखी … इस बात से आज़ाद पुलिस की नगण्य सी मुहिम परवान चढेगी ऐसा विश्वास है… इस पोस्ट के माध्यम से आप सब से अपील है कि आज़ाद पुलिस की मुंबई मुहिम पर यथा संभव यथा योग्य सहयोग करें…

आज़ाद पुलिस की आगे की गतिविधियों के लिए नया ब्लॉग बना दिया गया है जिससे लोग आसानी से आज़ाद पुलिस और उसकी मुहिम से सीधे जुड़ सकें… ब्लॉग पर जाने के लिए क्लिक करें <आज़ाद पुलिस> पर

आपका पद्म सिंह ९७१६९७३२६२

एक घर,दो जोड़े,तीन दिन,चार शादियाँ, और पांच ब्लॉगर

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मै नहीं जानता था वो कौन हैं… अब तो ये भी याद नहीं कि आर्कुट पर क्यों और किस तरह से जुड़े हम… वैसे तो मेरी फितरत है कि खामखा  दबंग दिखने/दिखाने वालों और बनावटी उसूलों वालों को या तो जल्दी नज़दीक नहीं आने देता या उसकी तरफ को मुंह कर के ….. नहीं करता क्योकि मै मानता हूँ जंगल में एक ही शेर रह सकता है…दो ही बात होगी …. या तो वो नहीं रहेगा … या मै ही रहूँगा Winking smile.

लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ….आर्कुटिंग, सामान्य परिचय और चैटिंग से होते हुए स्नेह और सम्मान के सम्बन्ध किस सीमा तक पगाढ़ हुए इसे गूंगे का गुड़ ही रहने दीजिए… अगर यह प्रश्न उठता है कि माँ यशोदा ने कृष्ण को दूसरे का पुत्र होते हुए भी   इतना स्नेह प्रेम कैसे  दिया तो शायद इसकी मिसाल हमारा सम्बन्ध हो सकता है.

gdgदिन निकलते रहे..रातें गुज़रती रहीं…. शायद तमाम जन्मों के पुण्यों ने अपना असर दिखाया और वो अवसर आया जब आभासी दुनिया से निकल कर हमारे मिलने का मार्ग प्रशस्त होता दिखा. फोन आया कि बेटी की शादी की बात दिल्ली में चल रही है… एक लड़का है किसी ऑटो पार्ट्स की दूकान पर काम करता है… करोल बाग में… अगर हो सके तो देखो जा कर कैसा है… मैंने अपना गरीब रथ(दस वर्षीया द्विचक्रिका) तुरंत जोता और पहुँच गए करोल बाग.. दिए गए पते पर पहुंचा तो पाया कि लड़का तो सच में ऑटो पार्ट्स की दूकान पर काम करता है… लेकिन वो बाइक पार्ट्स बनाने वाली बहुत बड़ी कंपनी का आफिस था और लड़का उसमे मालिक के तौर पर काम करता था … हद है!…. लड़का स्मार्ट,(आशुतोष राणा जैसा लुक), मितभाषी  और दमदार आवाज़ का मालिक (सुरेश ओबेरॉय जैसी) जो देखना था देखा और अपन ने बात फाइनल कर दिया..

ghhgपुत्री की शादी पक्की होती, इससे पहले पुत्र की शादी पक्की हो गयी… डेट निकली 18 नवम्बर 2010 स्थान चित्तौड़ गढ़ …. सब तरफ इन्विटेशन भी भेज दिए गए… 22 नवम्बर को भांजे की शादी में लखनऊ भी जाना था और चित्तौड़ से लखनऊ के लिए सीधे कोई ट्रेन नहीं है(जनरल नॉलेज के लिए नोट करें) इस लिए पाबला जी और ललित जी  के सहयोग से तय हुआ कि वापसी में कोटा से लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़ी जाय. आनन् फानन में तैयारियां ऐसे परिवार से मिलने की pp… जिसे कभी देखा नहीं… कोई सम्बन्ध नहीं.. कभी मिले नहीं… व्यग्रता और बढ़ गयी जब हज़रत निजामुद्दीन से ट्रेन ने सीटी दे कर प्लेटफार्म छोड़ा…  ट्रेन सुबह चार बजे के आसपास पहुंचनी थी … खबर थी कि चित्तौड़ में दो तीन दिन से भारी बरसात हो रही है… इस लिए मैंने ट्रेन का टाइम नहीं बताया था कि खामखा इतनी सुबह स्टेशन पर किसी को बुला कर परेशान क्यों करना … ट्रेन करीब आधे घंटे लेट थी … लेकिन स्टेशन पर पहुचते ही फोन ने जेब में दस्तक दी… पता चला एक घंटे पहले से एक फोर्चुनर हमारा Uncle auntyइंतज़ार कर रही थी…मुझे पहले किसी ने देखा नहीं था …कमल पुरी  गोस्वामी जी(मेरे लिए अंकलजी)  ने मेरी फोटो देखी थी नेट पर … बोले दूर से छह फुट्टे को पहचान लूँगा … और ऐसा ही हुआ … गेट पर खड़े दूर से ही पहचान लिया….. पिछली बोगी से एक फैमिली और उतरीथी…. बाद में पता चला हमारा गंतव्य एक ही था…मुंबई से इंदु जी की बेस्ट फ्रैंड तुहिना जीअपने पति और अपने भाई प्रद्युम्न जी  तथा उनकी पुत्री पिऊ( ईशानी) के साथ गुडगाँव से इसी ट्रेन से आये थे…. दोनों परिवार जब गाड़ी में लादे गए(सामान ही बहुत हो गया था) तब पता चला कि घर तो यहाँ से पन्द्रह किलोमीटर दूर था… हमारे पहुँचने तक अँधेरा छंटा भी नहीं था लेकिन सारे घर वाले जगे हुए थे और द्वार पर खड़े थे… इंदु माँ शायद काफी देर से बाहर ही हमारा इंतज़ार कर रही थीं … आते ही हम बहुत देर तक गले लग कर ममत्व और स्नेह का रसपान करते रहे.

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ये चित्तौद्गढ़ की आदित्य विडला ग्रुप की सीमेंट फैक्ट्री की आफिसर्स कालोनी का ब्लॉक नंबर B-9 और B-10 था… हर्ष, आह्लाद, संकोच, स्नेह, आश्चर्य और जाने किन किन भावों में डूबते उतराते रहे हम.. जब तक कि हमारे लिए चाय नाश्ते का प्रबंध होता … इंदु माँ ने घर में पहले मिलने वाले दो मेहमानों (अंजलि पुरी गोस्वामी और कविता जी  से परिचय क्रमशः अपनी भतीजी और कज़न के रूप में करवाया  ….

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हमारा सामान ब्लॉगर ब्लाक के ऊपर वाले कमरे में रखवा दिया गया था…ये वाला ब्लाक B-10 ब्लॉगर्स के लिए विशेष रूप से सजाया गया था… सीढियां चढ़ते हुए मै आश्चर्य और हर्षातिरेक से स्तब्ध था … ब्लाक की दीवारों सीढ़ियों से ले कर हर कमरे ब्लॉगर्स के चित्रों, राजस्थानी पेंटिंग्स  और मोहक फूलों तथा चाँद आदि के सुन्दर फ्लेक्स से सजाया गया था…. हर कमरा ताज़े फूलों के गुलदस्ते सहित नयी चादरों और पर्दों से सुसज्जित था… बाथरूम में साबुन, तेल,मंजन और गर्म पानी जैसी सभी आवश्यक सुविधाओं  की पहले से व्यवस्था थी…. कपड़े धोने, खाना बनाने,सफाई करने सहित लगभग हर सुविधा हेतु बीसों वोलेंटियर हर समय तत्पर…P161110_13.36_[02]

सुबह हो चुकी थी…इस अति सुन्दर या कहें मनोरम कालोनी को कालोनी न कह कर पर्यटन उद्यान कहना अधिक उचित होगा….  चार पांच दिन से बारिश के कारण मौसम रूमानी हो रहा था… पत्तियाँ धुली हुई और डालियाँ सफ़ेद चमेली के फूलों से लदी और गमकती हुई … नहाते, आराम करते, बतियाते पूरा दिन काफूर हो गया …

P191110_12.26कोटा से भाई ललित शर्मा  का फोन आया कि पूर्वनिश्चित योजना के अनुसार 17 की  सुबह उसी ट्रेन से कोटा से अख्तर खान अकेला से मिलते हुए दिनेशराय द्विवेदी जी को ले कर चित्तौड़ पहुँच रहे हैं…(कोटा वृत्तांत उनके ब्लॉग पर) अतः सुबह समय से जागने के लिए मोबाइल यंत्र का सहारा लिया और समय पर गोस्वामी जी के साथ स्टेशन से ललित जी को भी ले आये… सोचा था मूंछों से पहचान लेंगे … लेकिन उससे पहले उन्होंने हमें पहचान लिया और हम वापस चित्तौड़ से आदित्य कालोनी की तरफ निकल पड़े …

17 November 2010 चित्तौडगढ़ Gift with a bow

आज नवम्बर २०१० की सत्रह तारीख है…  यहाँ मै स्पष्ट कर दूँ कि इस घर में चार शादियाँ एक साथ होनी हैं… आदित्य गोस्वामी(इंदु जी के पुत्र) सौ० डॉली (होने वाली पुत्र वधू) सौ० अपूर्वा( पुत्री) और सम्राट(होने वाले दामाद)…  जहाँ सम्राट मम्मी पापा सहित गेस्ट हाउस में रुके थे.. वहीँ बहू के परिजन जबल पुर से आज आने वाले थे… सारे इंतजाम इधर ही होने हैं… दर्जनों वोलेंटियर तैयारी को अंजाम दे रहे हैं… मेहमानों के पास एकमात्र महत्वपूर्ण काम है… जब जो मन करे खाओBowl और मस्ती करो…Coffee cupMug गाना गाओ… डीजे पर डांस करो…. और जहाँ कोई रस्म हो उधर शामिल हो जाओ…खाना तैयार होता तो सारे मेहमान मिलकर ठहाके लगाते… मस्ती करते हुए खाना खाते..

आने वाले ब्लॉगर्स में अब तक मै, मेरी पत्नी, और ललित शर्मा जी ही पहुँच पाए थे… समीर लाल जी जबलपुर के लिए प्रस्थान कर चुके थे, दिनेश राय द्विवेदी, पाबला जी, अनामिका जी और सतीश सक्सेनाजी अपनी अपनी समस्याओं में फंस कर रह गए.. अंत तक आने का दावा करने वाले महफूज़ भी नहीं आये… इस लिए धमाल का पूरा जिम्मा ललित जी और मेरे ऊपर था…

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कोई काम था नहीं सिवाय मस्ती करने के … तय किया कि आदित्य बिड़ला सीमेंट फैक्ट्री का भ्रमण करना अच्छा रहेगा… तमन्ना जुबां पे लाई गयी… तुरंत छह पास और दो बोलेरो मंगवाई गई … ललित जी, हम और तुहिना जी का परिवार फैक्ट्री देखने निकल पड़े …

 

फैक्ट्री में जिस शख्शियत से हमारी मुलाक़ात हुई उनको बाहर से लोग बिड़ला फैक्ट्री के वोईस चेयरमैन के रूप में जानते हैं…लेकिन चंद लोग उनके अंतरतम को महसूस करते हैं… और जो महसूस कर सकते हैं उन्होंने पाया है कि उनका पद जितना ऊपर से बड़ा है व्यक्तित्व भीतर से उससे कहीं अधिक ऊंचा … इसके लिए शायद अलग से पोस्ट लिखनी पड़ सकती है… फ़िलहाल… ये हैं श्री शिव कुमार तिवारी जी..  वाइस चेयर मैन आदित्य  बिड़ला सीमेंट फैक्ट्री चित्तौड़… जिन्हें हम एन्जिलजी कहते हैं…करीब दो घंटे तक उनके केबिन में बैठे हम सीमेंट और सीमेंट निर्माण के बारे में क्लास अटेंड करते रहे….फिर फैक्ट्री और सीमेंट निर्माण के बारे में बहुत कुछ दिखाया बताया… हमारे साथ फिलिप्स कंपनी के एशिया ज़ोन के डाइरेक्टर और तुहिना जी के अतिरिक्त उनके  भाई प्रद्युम्न जी और उनकी बेटी पीहू भी थे …. तुहिना जी ने इतने प्रश्न पूँछे कि हमें शक हो गया कि हो न हो वो घर जाते ही सीमेंट प्लांट लगाने वाली हैं ‘Winking smile

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शाम होते होते सीमेंट फैक्ट्री की यादें सँजोते हम वापस आ गए … रात क्लब के हाल में महिला संगीत का प्रोग्राम था… खाना शाना उधर ही होना था… शाम होते होते सारी तैयारियां हो चुकी थीं,.. चार पांच गाड़ियां मेहमानों को क्लब तक छोड़ रही थीं… क्लब का हाल बहुत खूबसूरती के साथ सजाया गया था… डीजे की धुन के साथ … सारे के सारे मेहमान थिरक रहे थे… शाम धीरे धीरे ढल रही थी… आह्लाद और उमंग Lalit sharmaके नशे में सारे मेहमान मस्त थे…. इंदु जी ने पुराने गीतों के ढेर सारे गीतों के लिरिक्स को प्रिंट करवा कर किताब की शक्ल दे रखी थी, जिससे गीत गाते समय किसी को गीत के बोल न भूलें… डीजे बंद करवा दिया गया… ढोल की थाप पर गीतों की सरिता कुछ यूँ बही कि रात कब गहरा गयी पता ही नहीं चला… इंदु जी की भतीजी अंजलि पुरी गोस्वामी जी, इंदु जी और बैठे,(या कहें पसरेगले से) से मैंने गाने की महफ़िल को तीन चार चाँद लगाने की पूरी कोशिश की…

 

P171110_23.00_[01]रात गहराने लगी …  होने वाले दामाद सम्राट जी की फरमाइश पर एक बेहद भावुक कर देने वाला गीत बजाया गया …”ये तो सच है कि भगवान है… है मगर फिर भी अनजान है… धरती पर रूप माँ बाप का… ये विधाता की पहचान है… फ्लोर पर सभी सम्बन्धी, दूल्हा दुल्हन और भाईयों ने मिल कर गीत पर थिरकने लगे… धीरे धीरे माहौल इतना भावुक हो चला कि वहाँ उपस्थित शायद सभी की आँखों में आँसू थे,… विवाह! एक स्त्री के लिए दूसरे जन्म जैसा… एक घर की सारी यादों को पलकों में मोतियों से सजाते हुए दूसरे घर को जीवन भर के लिए अपनाते समय विछोह का पल… कुछ पलों के लिए सभी आँखें नम और गले रुद्ध हो चले….

गीत समाप्त हुआ…और प्रारम्भ हुई अपूर्वा और सम्राट के जीवन सहयात्रा की पहली पौड़ी… दूल्हे सम्राट  अपूर्वा को हाथ पकड़ कर मंच पर ले जाते हैं… परिवार और समाज सहित ईश्वर को साक्षी मानते हुए दूल्हे ने दुल्हन की मांग में सिंदूर सजा दिया …

विवाह संपन्न हुआ..!!!!

18 November 2010 की सुबह…

P181110_13.05_[01]रात का रूमानी उत्सव अभी मन और आँखों से उतरा नहीं था… ललित शर्मा जी  देर तक सोते रहे…शायद उतरी उनकी भी नहीं थी अभी तक… लेकिन नाश्ते के टाइम तक सब लोग नहा धो कर फिर तैयार थे… शाम को एक और विवाह होना था, एक रिश्ता फिर अपना अस्तित्व रचने को तैयार था… दिन भर करते क्या… तात्कालिक योजना के तहत मै अपने परिवार और ललित जी के साथ चित्तौडगढ़ का किला देखने के लिए तैयार था… थोड़ी देर में हम शेवरले-युवा पर चित्तौड़गढ़ की ओर निकल चुके थे…

चित्तौडगढ़ का किला  अपनी विशालता और भव्यता के साथ पहाड़ी के शीर्ष पर पसरा हुआ कई किलोमीटर दूर से ही दिखने लगता है…किले के सातों द्वार पार करते हुए हम राजस्थान की वीरगाथाओं और आन बान शान से अभिभूत होने लगे थे… अंतिम द्वार पार करते ही संग्रहालय सामने था… संग्रहालय में विभिन्न अस्त्र शस्त्र और जिरह बख्तर आदि की भव्यता देखने लायक थी… दस रूपये की अतिरिक्त टिकट पर हम अपनी कार ले कर पूरा किला देख सकते थे… अतः वही किया…

P181110_13.08विजय स्तंभ के सामने कार पार्क कर जैसे ही विजय स्तंभ की और बढे, द्वार पर बड़े बड़े पके शरीफे बिकते हुए दिखे..… मुझे अच्छे लगते हैं शरीफे… मेरी बेटी को भी.. अतः शरीफे लिए और जैसे ही हम प्रांगण में घुसे लंबे चौड़े कुछ लंगूरों ने शरीफों पर नीयत खराब कर ली.. लाख कोशिशों के बावजूद एक बहुत बड़ा लंगूर आया और मेरे हाथ पैर  पकड़ कर बैठ गया… बिलकुल ऐसेP181110_13.14 जैसे कुम्भ के मेले में बिछड़ा भाई मिल गया हो… कोई चारा नहीं था… एक शरीफा उन्हें भेंट किया और आगे बढे….लंगूर जी शरीफा खा कर शरीफों जैसे किले की प्राचीर पर बैठे अपने कुटुंब से जा मिले… ललित जी ने दूसरे शरीफे को बचाने की ज़िम्मेदारी स्वयं पर डाली और टीशर्ट में शरीफा सहित हाथ घुसाए(आतंकवादियों जैसे) तब तक घूमते रहे जब तक कि मौका देख कर शरीफा और शरीफा कथा समाप्त नहीं हो गई…

P181110_14.10_[02]प्राचीन शिव मंदिर, विशाल जलाशय, शरीफे के बाग  और किले के अन्य महल देखते हुए हम रानी पद्मिनी के महल के सामने थे, महल देख कर निकले तो महल के सामने दुकानों की कतारें दिखीं… देखा तो उधर राजस्थानी परिधान में घोड़े और ऊंट की सवारी पर फोटो खींचने की कई दुकानेंP181110_14.30_[01] थीं… उत्सुकता और यादगार संजोने के लिए मेरी बेटी, मैडम  और ललित जी सब  ने बड़े जबरदस्त अंदाज़ में फोटो शेसन करवाया.. फोटो मिलते ही समय को ध्यान में रखते हुए वापसी के लिए प्रस्थान किया… रास्ते में कार रोक कर शरीफे के बाग से ढेर सारे शरीफे तोड़ना नहीं भूले … आखिर हम भी ब्लॉगर ठहरे.. यूँ ही कैसे जाने देते (Smile)

P181110_13.47वापस पहुँचने पर आदेश हुआ कि जल्दी तैयार हो जाओ… शाम पांच बजे बरात निकलनी है, जल्दी जल्दी सब तैयार हुए … तब तक बरात लगभग निकलने को तैयार थी…लेकिन भाई ललित जी शर्मा  निकलने को तैयार नहीं थे… अब उनकी तैयारी के लिए किसी तीसरे को मय कार तैयार किया… खोजते बूझते दवा का प्रबंध हुआ और फिर सब तैयार…. Smile with tongue outMartini glass

P181110_20.01बरात अपनी भव्यता के साथ गाजे बाजे के साथ मंदिर होते हुए कालोनी के क्लब हाल तक पहुंची…. आज फिर से एक दौर चला… यथा योग्य… डीजे, डांस, और ड्रिंक…  अचानक कोई जाना पहचाना चेहरा सामने था… चित्तौड़ से युवा और इस शादी का पाँचवाँ  ब्लॉगर शेखर कुमावत … शेखर के साथ काफी देर तक बातें होती रहीं… रात ढलती रही… बाहर दावत चल रही थी अंदर डीजे और डांस… उधर विवाह की तैयारियाँ भी पूरी हो चुकी थीं… अतः इधर से सब लोग वापस आये… रात में मंडप में विवाह संपन्न होना था … लेकिन जब हमारी आँख खुली तो दूल्हा दुल्हन परिणय सूत्र में बंध चुके थे..

19 November 2010

P191110_08.43कहावत है कि शादी के बाद का  दिन सब से बोरिंग होता है… महीनों से चढा खुमार उतरने लगता है… इस दिन घर सब से ज्यादा अव्यवस्थित और बिखरा हुआ लगता है… थकान और आलस्य अपने चरम पर होती है… ऐसे में घर समेटना… मेहमानों को विदा करना… और फिर कहीं याद आती हैं अपनी दवाइयाँ… ललित जी की ट्रेन शाम को थी… उन्होंने दिन भर सोने का प्लान बनाया और कमरा बंद कर P191110_12.28ध्यानावस्थित हो गए… मै अपनी आदत से मजबूर दिन में सो नहीं पाता .., दिन भर गप्पें मारी, आराम किया.. थोड़ा घर समेटने में हाथ बटाया(लोगों ने ऐसा ही समझा) और पूरा दिन निकाल दिया … तीसरे प्रहर ललित जी, मै और इंदु जी तीनों तब तक के लिए गप्पाष्टक में डूब गए… जब तक कि ललित जी की ट्रेन का टाइम नज़दीक नहीं आ गया…

स्टेशन पर छोड़ते हुए शेखर कुमावत भी आ गए थे… तीन दिन के अविस्मरणीय साथ के बाद ललित जी को पुनः शीघ्र  मिलने के वादे के साथ विदा किया… और वापस कालोनी… हमारी ट्रेन कल सुबह जो थी…

हमारी ट्रेन कोटा(जो चित्तौड़ से २०० किलोमीटर दूर है) से लखनऊ के लिए थी… कोटा सुबह १० बजे तक पहुँचने का कोई साधन नहीं था… इंदु जी ने कब और कैसे मेरे लिए कोटा तक के लिए टैक्सी का प्रबंध किया मुझे नहीं पता … सुबह पांच बजे टैक्सी दरवाज़े पर थी…इंदु माँ ने ममत्व का आँचल डाल भावभीनी विदाई की… इस से पहले कि पौ फटती… सब को सोता हुआ छोड़…अप्रतिम, अनुपम, स्नेह, सौहार्द्र, ममत्व और अपनापे की नगरी छोड़ कर तीन चार दिनों तक बिताए हुए अतुलनीय आह्लाद के क्षणों को दिल के कोने में संजोये हुए… आँखों में एक कतरा कृतज्ञता के मोती लिए हम चित्तौड़ से दूर हो रहे थे…. सूरज का गोला धीरे धीरे लाल हो रहा था…….!!!

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आइये परिचय करवाते हैं मुख्य मुख्य स्मरणीय व्यक्तित्वों से –

Garima

१-गरिमा जी- इंदु जी की सहकर्मी(टीचर मैम) महीनों से शादी की अथक तैयारियों के लिए ज़िम्मेदार.

suvidhi, Garima

२-सुविधि जी- एक और टीचर मैम, इंदु जी का दाहिना२ (शायद बायाँ भी) हाथ…

Causon Sister

३-कविता जी- इंदु जी की कज़न- गंभीर, शान्त, सौम्य, जिम्मेदार और ग्रेसफुल व्यक्तित्व…

 

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४-अंजली पुरी गोस्वामी(मीका जी)- इंदु जी की भतीजी, बहुत सुन्दर, सर्वगुण संपन्न, ड्रेसिंग सेन्स-ऑसम, डांस, संगीत और व्यावहार कुशल… मितभाषी और … और भी बहुत कुछ …

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५-अनीता सिंह(ब्लॉगर) मेरी धर्मपत्नी…

आगे क्या कहूँ… मै नहीं मेरी आत्मा जानती है.. आप खुद समझदार हैंWinking smile

 

Lunch

६-बाएं से मीका जी,अंजू (इंदु जी के कजन की पत्नी  छोटी भाभी कम सहेली ज्यादा भाभी), और इंदु जी की छोटी भाभी कानू जी (बहुत सहनशील,धैर्यवान और सुन्दर और महान  व्यक्तित्व)

 

Tuhina७-तुहिना जी(इंदु जी की बेस्ट गर्ल फ्रैंड)- क्या लिखूं, अपने जैसी अकेली शख्शियत, हिंदी भी अंग्रेजी में बोलती हैं, फीका खाना खाती हैं.. डाईट से ले कर घुलना मिलना सब कुछ वेल कंट्रोल्ड….कुल मिला कर सुपर स्पेसियालिटी टाइप…

Pradyumn

८-प्रद्यूत सिन्हा  जी- (तुहिना जी के भाई) फिलिप्स ग्रुप में जोनल डाइरेक्टर… सीधे  सादे.. हँसमुख, मिलनसार, और सरल व्यक्तित्व.

 

mika ki mammy

९-रजनी एस आर पुरी.. (मीका कि मम्मी और इंदु जी की सबसे बड़ी भाभी)

अ ग्रेसफुल लेडी…

 

इसके अतिरिक्त और बहुत से स्मरणीय मेहमानों के साथ  अजयपुरी, वीरेन, अथर्व, अनंजय,सजल, साक्षी, प्रद्युम्न जी की बेटी पीहू, मेरी बेटी निहारिका और खुशी और सभी बच्चा गैंग