पद्मसिंह

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

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क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी

 

स्वप्न बंधे जंजीरों में

आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ

आज समय विपरीत सही

विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ

स्वेद लिखेगा आने वाले

कल को बाज़ी किसकी होगी

झंझावात रुके हैं किससे

राहें होँ अवरुद्ध, भले होँ

जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य

कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षो का फल लाएगी …

 

हमने सीखा नहीं समय से

डर जाना घुट कर मर जाना

क्रान्ति और संघर्ष रहा है

परिवर्तन का ताना बाना

दुर्दिन के खूनी पंजों से

खेंच सुपल फिर वापस लाना

ठान लिया तो ठान लिया

पाना  है या कट कर मर जाना

थर्रायेंगे दिल दुश्मन के

वो भीषण हलचल लाएगी

क्रांति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी….

 

याचक बन कर जीना कैसा

घुट घुट आंसू पीना कैसा

रोशन होकर ही जीना है

धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा 

घात लगा कर गलियों गलियों

गद्दारों की फ़ौज खड़ी है

तूफानों  से घबरा जाए

वो भी कहो सफीना कैसा

हर पगडण्डी राजमार्ग तक

आज नहीं तो कल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी ….

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जीवन और स्मृति 

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वो पहला दिन था ! जब मैं त्रिभुवन जी की साइकिल के आगे डण्डे पर बैठ कर स्कूल पहुँचा था। स्कूल के ही दो कमरे ब्लॉक ऑफिस के काम आते थे तो कुछ लोहे की सरकारी रंगीन बैलगाड़ियाँ स्कूल में ही खड़ी थीं। 25 पैसे फीस होती थी उस समय पहली क्लास की…चन्द पन्नों की एक ही किताब “हिन्दी बाल पोथी”.. महुए के पेड़ के नीचे बैटरी की कालिख से लकड़ी की पट्टी काली करना और सुलेख लिखना, महुए के पेड़ पर जहरीली चींटियां और 3 पैसे की एक पुड़िया “लकी” स्याही… सब इतना स्पष्ट याद है कि लगता है कल की बात है… पहली क्लास में एक लड़की (शायद सुशीला नाम था) मेरे से कुछ बड़ी थी, उसके साथ रहना मुझे बहुत सुखद लगता था, अक्सर हम घर से लाए पराँठे आपस मे शेयर भी करते…साथ साथ स्कूल के पिछवाड़े वाले बाग में घूमते और झरबेरी खाते। (अब सोचता हूँ तो लगता है क्या उस उम्र में भी कुछ प्यार व्यार जैसा तो नहीं रहा होगा?) लगभग 40 साल के इस अन्तराल में अगर वो याद रह गयी है तो कुछ विशेष तो थी ही… 

आज एक लम्बा समय निकल चुका है, देखते देखते लगभग 45 साल सर्र से निकल गए… सुबह, शाम, सुबह शाम… बहुत कुछ स्मृति में शेष है, ट्रिलियन ट्रिलियन डेटा मस्तिष्क तन्तुओं में सोया पड़ा है… 

तमाम ऐसी घटनाएँ जिन्हें हम खुद ही याद नही करना चाहते, लेकिन याद रह जाती हैं… बहुत से ऐसे पल जो समय की धूल में अदृश्य हो चुके हैं… कभी सोच कर देखिये आपकी स्मृति बचपन में कितने पीछे तक जा पाती है… क्या आपको माँ की गोद याद है ?.. क्या याद है कि आपके बचपन के सबसे पुराने खिलौने क्या थे ?…  मुझे लगता है मैं अपने बचपन के तीसरे साल तक की स्मृति में जा सकता हूँ…

ओशो कहते हैं अपने पूर्व जन्म की स्मृति में जाना सम्भव है… यहाँ तक कि बचपन के 6 माह तक बालक को अपने पूर्व जन्म की स्मृति होती है… समस्या यह है कि स्मृति में पीछे जाना टेप को उल्टा बजाने जैसा है… अगर हम स्मृति में पीछे जा भी पाए तो समझ पाना सम्भव नही होता…थोड़ी स्मृतियाँ जो टुकड़ों में रह जाती हैं वो टेप को रिवर्स कर के फिर सीधा बजाने जैसा है।

मनोविज्ञान में स्मृति एक पूरा विषय ही अलग है… स्मृति के विषय में आपकी अभिरुचि, सम्वेदना, अभिप्रेरणा ही नही चेतन और अचेतन में पड़ी इच्छाएँ और अनुभव भी प्रभावित करते हैं। 

तो एक बार प्रयास करिये आप अपने बचपन मे कितना पीछे जा सकते हैं, अपना पहला स्कूल का दिन, उससे पहले के दिन, या उससे भी पहले … आप देखेंगे कि आपके अनुभव बदल गए, समझने की क्षमता बढ़ गयी, रुचियाँ, स्वभाव, प्राथमिकताएं  सब बदलीं, लेकिन आप लगभग आज भी वैसे ही हैं… गौर से देखिये जो द्रष्टा है उसमें कोई परिवर्तन नही है।

 धीरे धीरे चलते हुए वर्तमान में आइए… द्रष्टा भाव से… वरना आप उदास हो सकते हैं… और फ़िर अगले पाँच साल आगे जाइये, दस साल, पन्द्रह साल या बीस पचीस साल आगे जाइये और स्वयं को देखिए… आप कहाँ होंगे, आप का शरीर कहाँ होगा… लेकिन ज़रूरी है हर घटना, सम्भावना की आँख में आँख डाल कर स्पष्ट देखने का प्रयास करना… संभव है आप स्थितप्रज्ञ हो जाएं।  

हिन्दू समाज को बांटने की राजनीतिक साजिश है सहारनपुर दंगे

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Rastra Sandesh

दंगों की आग झेल रहा सहारनपुर सतही तौर पर भले ही दलितों और ठाकुरो के बीच की जातीय हिंसा लगे पर इसकी तह पर बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश की बू आती है। हज़ारों वर्षो के भारतीय इतिहास को अगर पलट कर देखे तो आप पाएंगे कि आज़ादी के 70 वर्षो बाद पहली बार ऐसा लग रहा था कि पूरा देश हिंदुत्व के साये में जातीय बेड़ियों को तोड़कर एकता के गठबंधन में बंधकर एकता के रास्ते पर अग्रसर होना चाहता है।

पर इससे पहले की इस गठबंधन को मजबूती मिलती हैदराबाद विश्वविद्यालय से रोहित वेमुला की आत्महत्या की खबर आती है और राष्ट्रीय पटल पर यह चर्चा का विषय बन जाता है कि देश में दलितों के साथ अन्याय हो रहा है और उन्हें इस प्रकार से शोषित किया जा रहा है कि उन्हें आत्महत्या पर विवश किया जा रहा है। इस पर जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक वामपंथी…

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दिल्ली सोशल मीट 11-4-16

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फेसबुक वारियर्स… !! दिल्ली मीट !
लोग कहते थे आग बुझ गयी है, राख़ है ये 

जरा कुरेद के देखा तो मशालें निकलीं।
ये शे’र लिखते हुए मैं उम्मीद और नए उत्साह से भर जाता हूँ… सोशल मीडिया को निरा लफ़्फ़ाज़ी मञ्च और हवा हवाई कहने समझने वालों के लिए यह समझ लेना चाहिए कि वैचारिक क्रान्ति की जो जाग हुई है वो एक दिन आग भी बनेगी… और 
जो समझते हैं यहाँ खून नहीं पानी है… 

उनसे कह दूँ के ये दरिया बड़ी तूफानी है …. 
दिल्ली मे हुई मीट को मैं एक करवट के रूप मे देखता हूँ, एक मीटिंग से कोई निष्कर्ष निकल सकता था ऐसा मानना भी नहीं था। आभासी दुनिया से निकाल कर विचार जब सड़कों पर निकल पड़ें तो ये उस करवट की निशानी है जो सुबह की उजास के साथ जाग मे बदलेगी, उस चिंगारी की निशानी है जो एक दिन आग मे बदलेगी। पिछले लगभग दो सालों से देश मे एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है.. भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं। बहस के आयाम बदल गए हैं… दशकों से छुपे हुए तमाम मकोड़े अचानक बिलबिला कर बिलों से बाहर आ गए हैं…एकजुट हो रहे हैं…  दाँव पर दाँव खेल रहे हैं… और ऐसे विरोध के अतिरेक मे जिस डाल पर बैठे हैं वही काटने को उतारू हो रहे हैं। 

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं….ऐसे मे वो कहीं न कहीं बहुत दिनों से सोए पड़े दूसरे धडे को भी झकझोर रहे हैं… जागने को मजबूर कर रहे हैं… दिल्ली मीट इसका एक उदाहरण है।

दिल्ली मीट बहुत Organized नहीं थी… बहुत व्यवस्थित भी नहीं थी… एजेंडा भी बहुत स्पष्ट नहीं था… कुछ लोग बोले  कुछ लोग चाह कर भी नहीं बोल पाए। मुद्दा JNU और मीडिया जैसे मुद्दों और समस्याओं की खोज के गोल दायरे मे घूमता रहा… वास्तव मे ऐसी मीटिंग्स से बहुत बड़ा परिवर्तन होने वाला है ऐसा भी मैं नहीं मानता.. ऐसे तमाम मिलन, बैठक, मीटिंग्स हम रोज़ करते हैं… मन मे जज़्बा भी है, जुनून भी है और ज़रूरत भी है… लेकिन हर बार एक कसमसाता हुआ सवाल सामने आ खड़ा होता है- आखिर हम करें तो क्या करें ? … लड़ाई के हजारों छोटे बड़े मोर्चे हैं कि शुरुआत कहाँ से करें, कैसे करें और किसके खिलाफ़ करें? लेकिन जब हम आभासी दुनिया से निकल कर आमने सामने मिलते हैं तो उसके मायने बदल जाते हैं… जब हम एक साथ बैठते हैं तो हमारी तमाम सोच तमाम ऊर्जा और शक्ति जो अलग अलग दिशाओं मे बहती है उसको संगठित होने और एक दिशा पाने का अवसर मिलता है… और एक प्रश्न भी मिलता है ” Who am I ” टाइप का… हम अपनी स्थिति कुछ और स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं। 
ऐसे मिलन और होने चाहिए… हजारों की संख्या मे होने चाहिए…अपने अपने क्षेत्र मे कम से कम सभी वैचारिक समझ रखने वाले लोग आपस मे एक दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जाने। …. समाधान, परिवर्तन, और परिणाम इसके बारे मे तुरन्त आशा करना व्यर्थ है। अन्ना आंदोलन जैसे दूध के उफ़ान बनने से कुछ नहीं होगा… बाबा रामदेव(जिसे मिर्ची लगे वो इससे बड़ा योग, आयुर्वेद और स्वदेशी का काम कर के दिखा दे) जैसे दूरदर्शी और सुव्यवस्थित सोच के साथ बढ़ना होगा… सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य है… अपनी अपनी विशेषज्ञता … लेकिन लक्ष्य एक है… बाकी सब गौण हैं… साधन अनेक हैं… साध्य एक है… यही सोच रखेंगे तो सब अच्छा होगा…. अंत मे शुभेक्षा के साथ कुछ बिन्दु आगे  होने वाली मीटिंग्स के लिए छोडना चाहूँगा-
1- आगे के मिलन किसी बन्द स्थान मे रखे जाएँ(मंदिर, सभागृह, स्कूल) 

2- पहले से चर्चा का एक विषय तय हो तो अच्छा होगा

3- चर्चा के मुख्य विषय पर कुछ विशेषज्ञ भी हों। 

3- सभी स्वयं का परिचय कराएँ, सभी एक दूसरे को कम से कम पहचानें 

4- विचार के लिए फेसबुक पहले से है, मीटिग् मे अपने क्षेत्र मे मित्रवत संगठन या ग्रुप्स पर विशेष ज़ोर हो। 

5- यह तय हो कि यदि आवश्यक हुआ तो उस क्षेत्र के फेसबुक वारियर्स अल्प समय मे कब कहाँ और कैसे मिलेंगे। 
…………….. बहुत कुछ है …. दो लाइन लिखने वाले से इतना लिखवा लिया… ज़्यादा ज्ञान(तथाकथित) देने से कोई फायदा नहीं है… लगे रहिए… जूझते रहिए… हार नहीं माननी और … भाई अजीत सिंह की तरह कहूँ तो …(छोड़ो पोस्ट की ऐसी तैसी नहीं करानी) 😛 … 
ज़िन्दाबाद …. फेसबुक वारियर्स ज़िन्दाबाद  !!

धूप …

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सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप
एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप

लाँघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर
धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप

मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये
पाँव छू, उंगली पकड़ फिर सर पे चढ जाती है धूप

किस कदर चालाक है ख़ुर्शीद की बेटी भला
खिज़ां का इल्ज़ाम रुत के सर पे मढ़ जाती है धूप

देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले
शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप

पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर
जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप
-पद्म

झमकोइया मोरे लाल !!

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हमारे जिले में शुभ कार्यों में अपने मज़ाक वाले रिश्तों के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए सस्वर गाली गाते हैं होली पर ताज़ी ताज़ी नाज़िल हुई गाली कोे इसी संदर्भ में पढ़ा /गाया जाए। 

यूपी की जनता ने कीन्हा कमाल झमकोइया मोरे लाल 
56 इंच का लगा ऐसा धक्का 
पंचर भई साइकिल निकल गवा चक्का
अंदर से ठट्ठा लगावें सिपाल ….झमकोईयामोरे लाल 

बुआ कहें बबुआ से बड़ा बुरा पटका 
कद्दू जो कटता तो आपस में बंटता 
फाट पड़ा जाने कहाँ से बवाल … झमकोइया मोरे लाल 

घूरे भी ताड़े भी पर नहीं पाए 
अपने ही घर की खबर नहीं पाए 
बुर्के के अंदर से होइगा धमाल ….झमकोईया मोरे लाल

यूपी के लड़िकन की लुटि गयी खटिया 
इतना काम बोला कि डूबि गयी लुटिया
 घरहिन मा मुरगी होइगै हलाल … झमकोइया मोरे लाल 

वारे परधान वारे वा रे अमितवा 
वा रे मनोज वा रे वा रे सम्बितवा
धोती को फाड़ कर दीन्हा रुमाल… झमकोइया मोरे लाल 
©पद्म सिंह #निर्मल हास्य 

फिर न कहना के हम ने पुकारा नहीं

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तुम मेरे ना हुए ना मिले ना सही 
तेरे दिल पर भी अब हक़ हमारा नहीं
गाँव माज़ी  में कोई घरौंदा तो है
जिस को सपनों ने बेशक सँवारा नहीं 

गिर गयी रात की आख़िरी पाँखुरी
और उफ़क पर भी कोई सितारा नहीं 
आखरी साँस है मेरी आवाज़ की 
फिर न कहना के हमने पुकारा नहीं 

एक दिया टिमटिमाता रहा रात भर 
एक दस्तक की उम्मीद जागी रही  
एक कतरा  न टूटा मेरी आँख से 
एक लम्हा तेरे बिन गुज़ारा नहीं 

यूँ तो हर फ़ूल का एक अंजाम है
खिल के महका महक कर के खुद गिर गया 
तुम कली तोड़ कर घाव क्यों दे गए 
वक्त का तुमने समझा इशारा नहीं 

शर्त बस एक थी मैं तुम्हारा रहूँ
मेरा कुछ ना रहे सब तुम्हारा रहूँ 
ना मिरा मैं रहा ना तुम्हारा हुआ 
हाय डूबा के मिलता किनारा नहीं। 

ज़िन्दगी का फ़साना भला या बुरा 
सुर में सुर बिन मिलाए गुज़ारा नहीं 
दिल लुभाती हैं  लहरों की अठखेलियाँ
कूद जाओ तो मिलता किनारा नहीं 

ज़िन्दगी जंग है रंग ए महफ़िल भी है
वही मजधार है और साहिल भी है 
हौसलों के मुसलसल हुए इम्तहाँ
जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं