आलेख

जो डूबा सो पार !

Posted on Updated on

                  वैसे तो मैं बचपन से ही खुराफाती जिज्ञासु टाइप का रहा हूँ…संगीत, ड्रामा,लकड़ी का काम सहित साहित्य और तकनीकी विषयों के प्रति विशेष रुचि रही… इसी क्रम मे कई बार तैरना सीखने की कोशिश भी की पर बार बार नाकाम ही रहा…कई बार इस चक्कर मे डूबते डूबते भी बचा। गाँव वाले घर के पिछवाड़े वाले तालाब मे भैंस की पूँछ पकड़ कर पार उतरने की कोशिश मे अचानक पूँछ का छूट जाना और पानी के अंदर खुली आँखों से पानी के बाहर का दिखने वाला उजाला आज भी याद आ जाता है। भला हो मुन्ना तिवारी का जो मेरे पीछे से आ कर मुझे पार निकाला। उस घटना के बाद मैं गहरे पानी मे उतरने की हिम्मत लगभग तीस साल बाद ही कर पाया क्योंकि तब तक भी मुझे तैरना नहीं आता था।

                   गाज़ियाबाद  के मुरादनगर कस्बे मे एक बदनाम "गंग नहर" है जो हरिद्वार से निकलती है। मुरादनगर मेरठ हाइवे के पुल पर 12 हों महीने नहाने वालों का मेला लगा रहता है। पड़ोस के मित्रों ने मुझे चढ़ाया, समझाया और नहर मे तैरना सिखाने का लालच देकर ले गए नहर पर। नहर मे साल भर औसतन 5 से 8 फुट पानी रहता है। हर सप्ताह एक दो लोगों का डूब जाना वहाँ आम बात है। पहले दिन की बोहनी खराब हो गयी… एक घण्टे नहाने के बाद जब बाहर आए तो पता चला कोई हम सब की पैंट और कपड़े  घाट से उठाकर चंपत हो गया था…। हम सभी चड्डी मे ही कार मे छुप कर घर लौटे। अगले रविवार फिर योजना बनी नहर जाने की… इस बार थोड़ी तैयारी से गए…आधा घण्टे सीढ़ी के पास चेन पकड़ कर नहाने के बाद कुछ उपाय खोजा गया… गाड़ी मे पड़ी एक पतली रस्सी निकाली और उसका एक सिरा अपनी कमर से बाँध कर दूसरे सिरे पर अपनी दोनों हवाई चप्पल बाँध दी फिर सभी मित्रों से भरोसा लिया कि अगर मैं डूब जाऊँ तो ऊपर तैरती चप्पल खोज कर मुझे बाहर खींच लेंगे। इतना आश्वासन देखर सब नहर के बीचों बीच नहाने लग गए और मैं घाट की चौथी सीढ़ी तक ही तैरने की कोशिश करता रहा। तैरते हुए अचानक मेरा पैर पाँचवीं सीढ़ी पर गया और फिर मैं वापस घाट पर आने के प्रयास मे और गहरे उतरता चला गया…चंद सेकेंड मे मैं पानी के अंदर उछल रहा था पर पानी के बाहर निकाल नहीं पा रहा था… डूबते हुए आदमी की मनःस्थिति क्या होती है यह बताया नहीं जा सकता… कुल मिलाकर घबराहट मे कुछ नहीं सूझता सिवाय हाथ पैर मारने के। सभी दोस्त नहाते हुए दूर चले गए थे… हालाँकि उनमे से एक (अतहर परवेज़) मुझे डूबता देखकर मेरी तरफ चल पड़ा था… लेकिन अगले दस सेकेंड मे ही मैं डूब जाने वाला था…इसी बीच जाने कहाँ से एक हाथ ने मेरा हाथ पकड़ कर बाहर खींच लिया… मैं घबराहट मे उस व्यक्ति को धन्यवाद भी नहीं कह सका… शायद इसी लिए आपद्काल मे सभी औपचारिकताएँ गौण हो जाती हैं। मेरी जान बच गयी थी… पर मैंने अगले पाँच मिनट मे ही निश्चय कर चुका था… "आज तैरना सीख कर ही जाऊंगा"

           अबकी बार पड़ोस के होटल राहगीरों का पसंदीदा गंग नहर का चाय नाश्ता होटल) के आस पास दो तीन बिसलरी की खाली बोतलें खोजी गईं.. बोतलों के मुँह मे रस्सी के फंदे फंसाए गए और फिर मेरी कमर पर बाँधा गया। अब मैं आसानी से डूब नहीं सकता था। फिर अनथक चार घण्टे के गहन प्रशिक्षण और प्रयास के बाद अच्छा खासा तैरना सीख गया और उसी दिन बिना बोतल बाँधे धार मे कूद कर कई बार किनारे आया। उसके बाद बहुत बार गया और हर बार आत्मविश्वास बढ़ता गया…अब स्थिति यह है कि मुझे भरोसा भी नहीं होता कि मुझे तैरना नहीं आता था। जैसे साइकिल सीख लेने के बाद लगता है इसे चलाने मे ऐसी भी क्या मुश्किल है। तो कुल मिलाकर मैं तैरना सीख चुका था।

तैरना इतना मुश्किल भी नहीं– कम से कम इतना तैरना सबको आना चाहिए कि आपातकाल मे अपनी जान बचाई जा सके। कुछ लोग डूब जाने के डर से आजीवन तैरने का प्रयास भी नहीं करते जबकि तैरना इतना कठिन नहीं है जितना लोग समझते हैं। ज़रूरत है थोड़े से प्रयास धैर्य और हिम्मत की। तैरना सबसे अच्छा व्यायाम माना जाता है जिसमे शरीर का हर अंग श्रम करता है और बिना किसी चोट मोच या नुकसान किए पेशियों को सुदृढ़ करता है।

तैरना कहाँ सीखें- तैरना सीखने के लिए आदर्श परिस्थितियाँ तो तरणताल मे योग्य प्रशिक्षक के साथ सुरक्षा पेटी के साथ सीखना ही है परन्तु ये सब हर जगह सुलभ नहीं है। इस लिए अपने आस पास के तालाब या नदी मे तैरना सीखा जा सकता है। रुके हुए पानी की अपेक्षा बहते हुए पानी के प्रवाह मे तैरना आसान होता है। पानी मे जाने से पहले सुरक्षा का इंतज़ाम अवश्य कर लेना चाहिए, अच्छा हो कोई मित्र जिसे अच्छी तरह से तैरना आता हो वो भी साथ रहे तो अच्छा हो।

कैसे करें शुरुआत- तैरना सीखते समह सबसे पहले पानी से दुश्मनी समाप्त कर पानी से मित्रता बहुत आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले पानी के सामने लड़ने के स्थान पर समर्पण करना सीखना चाहिए…पहले साँस रोक कर धीरे से पानी के अंदर बैठ जाएँ…और अपने पैरों को मोड़ कर घुटनों को अपने हाथों के घेरे से बाँध लेना चाहिए… इससे आप अपने आप पानी मे अपने आप पीठ के बल पानी की सतह पर आ जाएँगे लेकिन ऐसा करते समय सिर पानी के अंदर ही रखें और जल्दबाज़ी न करें… ऐसा करने से पानी के साथ एकाकार होने मे सहायता मिलेगी और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। घुटनों को बाहों मे मोड़ कर जब पर्याप्त समय तक के लिए इस तरह सतह पर तैरना आ जाए तो अगला चरण शुरू होता है। अब… जब घुटनों को थामे हुए जब आप पीठ के बल पानी के उत्प्लावन बल से सतह पर आएँ तो बिना सिर को पानी से बाहर निकाले हाथ को आगे और पैर को पीछे फैलाते हुए पानी के अंदर ही मुँह के बल लेट जाने का प्रयास करें। धीरे धीरे इसका भी अभ्यास हो जाएगा और आत्मविश्वास और बढ़ेगा। अब तीसरा चरण है हाथ पैर चलाना… जब पानी पर लेटना सहज लगने लगे तो दोनों हाथों के पंजों  को  चप्पू की तरह बना कर पानी को पीछे धकेलते हुए आगे बढ्ने का प्रयास करें। धीरे धीरे इसी तरह पैरों को भी चलाना आ जाएगा और जल्दी ही आपको लगेगा इसमे तो कुछ भी खास नहीं था। जैसे साइकिल सीखने के बाद हमें भरोसा भी नहीं होता कि कभी साइकिल चलाना नहीं आता था।

भ्रष्टाचार – कारण और निवारण

Posted on Updated on

पिछले कुछ दिनों से अचानक एक मुद्दा तूफान की तरह उठा और पूरे भारत मे चर्चा का विषय बन गया… ऐसा नहीं कि यह पहले कोई मुद्दा नहीं था या कभी उठाया नहीं गया किन्तु जिस वृहद स्तर पर पूरे देश मे इसपर चर्चा हुई… लोग एकजुट हुए वह अपने आप मे संभवतः पहली बार था… यह मुद्दा है भ्रष्टाचार का। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो दो प्रश्न प्रमुखता से खड़े होते हैं। पहला तो यह कि आखिर भ्रष्टाचार का श्रोत कहाँ है… भ्रष्टाचार के कारण क्या हैं… और दूसरा प्रमुख प्रश्न है कि इसका निवारण कैसे हो। हम यहाँ कुछ भौतिक और मनोवैज्ञानिक कारकों पर विचार करते हैं –
भ्रष्टाचार का श्रोत अथवा कारण—
1- नैतिकता पतन- जैसा कि इसके नाम से ही इसका पहला श्रोत स्पष्ट होता है, आचरण का भ्रष्ट हो जाना ही भ्रष्टाचार है। आचरण का प्रतिनिधित्व सदैव नैतिकता करती है। किसी का नैतिक उत्थान अथवा पतन उसके आचरण पर भी प्रभाव डालता है। आधुनिक शिक्षा पद्धति और सामाजिक परिवेश मे बच्चों के नैतिक उत्थान के प्रति लापरवाही बच्चे को पूरे जीवन प्रभावित करती है। एक बच्चा दस रूपये लेकर बाज़ार जाता है। दस रूपये मे से अगर दो रूपये बचते हैं तो चाहे घर वालों की लापरवाही अथवा छोटी बात समझ कर अनदेखा करने के कारण, बच्चा उन दो रूपयों को छुपा लेता है और और जब धीरे धीरे यह आदत मे शुमार हो जाता है तो इसी स्तर पर भरष्टाचार की पहली सीढ़ी शुरू होती है। अर्थात जब जीवन की पहली सीढ़ी पर ही उसे उचित मार्गदर्शन, नैतिकता का पाठ, और औचित्य अनौचित्य मे भेद करने ज्ञान उसके पास नहीं होता तो उसका आचरण धीरे धीरे उसकी आदत मे बदलता जाता है। अतः भ्रष्टाचार का पहला श्रोत परिवार होता है जहां बालक नैतिक ज्ञान के अभाव मे उचित और अनुचित के बीच भेद करने तथा नैतिकता के प्रति मानसिक रूप से सबल होने मे असमर्थ हो जाता है।
 
 
2- सुलभ मार्ग की तलाश – यह मानव स्वभाव होता है कि किसी भी कार्य को व्यक्ति कम से कम कष्ट उठाकर प्राप्त कर लेना चाहता है। वह हर कार्य के लिए एक छोटा और सुगम रास्ता खोजने का प्रयास करता है। इसके लिए दो रास्ते हो सकते हैं… एक रास्ता नैतिकता का हो सकता है जो लम्बा और कष्टप्रद भी हो सकता है और दूसरा रास्ता है छोटा किन्तु अनैतिक रास्ता। लोग अपने लाभ के लिए जो छोटा रास्ता चुनते हैं उससे खुद तो भ्रष्ट होते ही हैं दूसरों को भी भ्रष्ट बनने मे बढ़ावा देते हैं।
 
 
3- आर्थिक असमानता – कई बार परिवेश और परिस्थितियाँ भी भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार होती हैं। हर मनुष्य की कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं। जीवन यापन के लिए के लिए धन और सुविधाओं की कुछ न्यूनतम आवश्यकताएँ होती हैं। विगत कुछ दशकों मे पूरी दुनिया मे आर्थिक असमानता तेज़ी से बढ़ी है। अमीर लगातार और ज़्यादा अमीर हो रहे हैं जबकि गरीब को अपनी जीविका के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। जब व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताएँ सदाचार के रास्ते पूरी नहीं होतीं तो वह नैतिकता पर से अपना विश्वास खोने लगता है और कहीं न कहीं जीवित रहने के लिए अनैतिक होने के लिए बाध्य हो जाता है।
 
 
4- महत्वाकांक्षा- कोई तो कारण ऐसा है कि लोग कई कई सौ करोड़ के घोटाले करने और धन जमा करने के बावजूद भी और धन पाने को लालायित रहते हैं और उनकी क्षुधा पूर्ति नहीं हो पाती। तेज़ी से हो रहे विकास और बादल रहे सामाजिक परिदृश्य ने लोगों मे तमाम ऐसी नयी महत्वाकांक्षाएं पैदा कर दी हैं जिनकी पूर्ति के लिए वो अपने वर्तमान आर्थिक ढांचे मे रह कर कुछ कर सकने मे स्वयं को अक्षम पाते हैं। जितनी तेज़ी से दुनिया मे नयी नयी सुख सुविधा के साधन बढ़े हैं उसी तेज़ी से महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ी हैं न्हें
नैतिक मार्ग से पाना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे मे भ्रष्टाचार के द्वारा लोग अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए प्रेरित होते हैं।
5- प्रभावी कानून की कमी- भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण यह भी है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए या तो प्रभावी कानून नहीं होते हैं अथवा उनके क्रियान्वयन के लिए सरकारी मशीनरी का ठीक प्रबन्धन नहीं होता । सिस्टम मे तमाम ऐसी खामियाँ होती हैं जिनके सहारे अपराधी/भ्रष्टाचारी को दण्ड दिलाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
6- कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जहाँ मनुष्य को दबाव वश भ्रष्टाचार करना और सहन करना पड़ता है। इस तरह का भ्रष्टाचार सरकारी विभागों मे बहुतायत से दिखता है। वह चाह कर भी नैतिकता के रास्ते पर बना नहीं रह पाता है क्योंकि उसके पास भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए अधिकार सीमित और प्रक्रिया जटिल हैं।
निवारण-
1- कठोर और प्रभावी व्यवस्था- दुनिया के किसी भी देश मे भ्रष्टाचार और अपराध से निपटने के लिए कठोर और प्रभावी कानून व्यवस्था का होना तो अति आवश्यक है ही… साथ ही इसके प्रभावी मशीनरी के द्वारा प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जाना भी बेहद आवश्यक है। दुनिया भर मे कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस और अन्य सरकारी मशीनरियाँ काम करती हैं। अब लगभग हर देश मे पुलिस, फायर सर्विस जैसी तमाम सरकारी सहाता के लिए एक यूनिक नंबर होता है जिसके मिलाते ही वह सुविधा आम लोगों को मिलती है। लेकिन यदि कोई रिश्वत मांगता है अथवा भ्रष्टाचार करता है तो ऐसा कोई सीधी व्यवस्था नहीं दिखती है कि एक फोन मिलाते ही भ्रष्टाचार निरोधी दस्ता आए और पीड़ित की सहायता करे और भ्रष्ट के खिलाफ कार्यवाही करे।
 
 
2- आत्म नियंत्रण और नैतिक उत्थान- यह एक हद तक ठीक है कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक कडा कानून होना आवश्यक है किन्तु इस से भ्रष्टाचार पर मात्र तात्कालिक और सीमित नियंत्रण ही प्राप्त किया जा सकता है भ्रष्टाचार समाप्त नहीं किया जा सकता है। सत्य के साथ जीना सहज नहीं होता, इसके लिए कठोर आंत्म नियंत्रण त्याग और आत्मबल की आवश्यकता होती है। जब तक हमें अपने जीवन के पहले सोपानों पर सत्य के लिए लड़ने की शक्ति और आत्म बल नहीं मिलेगा भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलना संभव नहीं है। दुनिया मे उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ावे के साथ नैतिक शिक्षा के प्रति उदासीनता बढ़ी है। पश्चिमी शिक्षा पद्धति ने स्कूलों और पाठ्यक्रमों से आत्मिक उत्थान से अधिक भौतिक उत्थान पर बल मिला है जिससे बच्चों मे ईमानदारी और नैतिकता के लिए पर्याप्त प्रेरकशक्ति का अभाव देखने को मिलता है। बचपन से ही शिक्षा का मूल ध्येय धनार्जन होता है इस लिए बच्चों का पर्याप्त नैतिक उत्थान नहीं हो पाता है। अतः शिक्षा पद्धति कोई भी हो उसमे नैतिकमूल्य, आत्म नियंत्रण, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य जैसे विषयोंका समावेश होना अति आवश्यक है।
 
 
3- आर्थिक असमानता को दूर करना- आर्थिक असमानता का तेज़ी से बढ़ना बड़े स्तर पर कुंठा को जन्म देता है। समाज के आर्थिक रूप से निचले स्तर पर आजीविका के लिए संघर्ष किसी व्यक्ति के लिए नैतिकता और ईमानदारी अपना मूल्य खो देती है। पिछले दिनों योजना आयोग ने गावों के लिए 26 रूपये और शहरों के लिए 32 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन खर्च को जीविका के लिए पर्याप्त माना, और यह राशि खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं माना जाएगा, जबकि यह तथ्य किसी के भी गले नहीं उतारा कि इस धनराशि मे कोई व्यक्ति ईमानदारी के साथ अपना जीवनयापन कैसे कर सकता है। गरीबी और आर्थिक असमानता भी जब हद से बढ़ जाती है तो नैतिकता अपना मूल्य खो देती है यह हर देश काल के लिए एक कटु सत्य है कि एक स्तर से अधिक आर्थिक/सामाजिक असमानता ने क्रांतियों को जन्म दिया है। इस कारण किसी भी देश की सरकार का प्रभावी प्रयास होना चाहिए कि आर्थिक असमानता एक सीमा मे ही रहे।
 
 
इसके अतिरिक्त और भी बहुत से उपाय  किए जा सकते हैं जो भ्रष्टाचार को कम करने अथवा मिटाने मे कारगर हो सकते हैं परंतु श्रेयस्कर यही है कि सख्त और प्रभावी कानून के नियंत्रण के साथ नैतिकता और ईमानदारी अंदर से पल्लवित हो न कि बाहर से थोपी जाय।
…. पद्म सिंह

http://www.blogprahari.com/padmsingh

बंदर बनाम टोपीवाले …

Posted on Updated on

 
ll
एक कहानी बचपन से सुनते आये हैं… एक टोपी वाला जंगल से गुज़र रहा था. दोपहरी चटख रही थी. दो घड़ी आराम करने की नीयत से वह एक पेड़ के नीचे अपनी टोपियों की टोकरी रखकर सो गया… थोड़ी देर में जब उसकी तन्द्रा टूटती है तो उसने देखा कि बंदरों के एक झुण्ड ने उसकी टोपियाँ उठा ली हैं और लेकर पेड़ पर चढ गए हैं. टोपी वाला पहले तो बहुत मिन्नतें की लेकिन बंदर तो बंदर… अनुनय विनय का तरीका काम न आने पर टोपीवाले ने सहज बुद्धि का इस्तेमाल किया और बंदरों की नकल करने की आदत का फायदा उठाया. उसने टोकरी में बची हुई एक टोपी को बंदरों को दिखाते हुए अपने सर पर पहन ली… जैसा की बंदरों की आदत होती है… टोपीवाले की नकल करते हुए बंदरों ने भी टोपी सर पर रख ली…जब टोपीवाला टोपी हाथ में ले लेता तो बंदर भी टोपी हाथ में ले लेते… अंत में टोपीवाले ने अपनी टोपी सर से उतार कर जोर से ज़मीन पर दे मारी… लेकिन ये क्या ? एक भी बंदर ने ऐसा नहीं किया ? बल्कि लगे खिलखिला कर हँसने…बल्कि बंदरों ने टोपी फिर से अपने सिर पर धारण कर ली… टोपी वाला अचंभित…उसने लाख दिमाग लगाया लेकिन माजरा कुछ समझ में नहीं आया…
हर टोपीवाला अपने इतिहास से सीखता है कि अपनी टोपी बचाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं…उनसे पहले के टोपीवालों ने अपनी टोपियाँ कैसे बचाई थीं?… और हमेशा उन्हीं तरीकों का प्रयोग भी करते रहे… लेकिन उधर बंदरों ने भी पीढ़ी दर पीढ़ी टोपी वालों का खेल देखा था… बंदरों ने टोपीवालों की चालाकियों को बखूबी समझ लिया था और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी टोपी वालों की चालाकियों से सचेत कर दिया…. समय के साथ साथ साथ सभी ने अपनी गलतियों से सीख ली और समझ लिया था कि टोपी वाले कैसे उनकी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं… जबकि टोपी वाले पीढ़ी दर पीढ़ी बंदरों को एक ही तरीके से जीतने की कोशिश करते रहे …और कभी कल्पना नहीं की थी कि बंदर भी कभी अपनी पुरानी कमियों से सीख लेकर कहीं अधिक चालाक हो जायेंगे… यही कारण कि बंदरों ने अचानक नयी गुलाटी खाई और टोपी वालों को चारों खाने चित कर दिया…
यही नहीं कालान्तर में धीरे धीरे बंदरों ने अपनी नस्ल को और उन्नत करने के लिए एक संकर नस्ल की मादा को  अपने परिवार में लाये.. संकर नस्ल हमेशा चालाक होती है ये वैज्ञानिकों का कहना है.. फिर चालाक बंदरों ने मनुष्यों जैसे वेश धर लिए और मनुष्यों में जा मिले.. कईयों ने सफ़ेद खद्दर के कुर्ते बनवाए सर पर गाँधी टोपी पहनी और चुनाव लड़ते हुए इंसानी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए सत्ता में भी अपनी पैठ बना ली…अपने हिसाब से क़ानून बनाने लग गए.. अपने वंशजों को समाज के हर क्षेत्र में फैला दिए.. किसी को उद्योगपति, किसी को मठाधीश बनाए तो किसी को सरकारी मशीनरी में फिट कर दिया… मनुष्यों के वेश में मनुष्यों को लूटने के लिए सिंडिकेट बना लिए… मनुष्यों द्वारा दुरियाए जाने वाले बंदरों ने मनुष्यों पर ही राज करना शुरू कर दिया… अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुसार तरह तरह की गुलाटियाँ खाना और कलाबाजियाँ करना नहीं भूले…. बंदरों ने इस बार मनुष्यों की मान मर्यादा की प्रतीक टोपी को निशाना नहीं बनाया बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी धन दौलत पर हाथ साफ़ करने लगे और अरबों खरबों रूपये हड़प कर उड़न खटोलों पर जा चढ़े और विदेशों में छुपा आये..अपने पास रखने का जोखिम भी नहीं उठाया क्योंकि बंदर अपनी आदतों को जान चुके थे.. किसी तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते थे . इधर इंसान हलाकान परेशान होने लगे लेकिन हमेशा अपनी लालच का शिकार हो इन्हीं बंदरों को चुन कर सत्तासीन करते रहे… कुछ लोगों को इन बंदरों पर शक भी हुआ और कुछ की तन्द्रा भी टूटी… समस्या विकट थी… चारों तरफ धन दौलत के अम्बार लेकर उड़न खटोलों पर चढ़े हुए बंदर ही बंदर और अपना पेट पालने में हैरान हलाकान औंघाई हुई जनता… खलबली तब मची जब चंद जागे हुए लोगों द्वारा समस्या के हल खोजे जाने लगे…
इंसान सदा से हर समस्या का हल धर्म-गुरुओं, परम्पराओं और पुरातन-पोथियों में खोजता रहा है, “महाजनो येन गतः स पन्थाः” की तर्ज़ पर आँख मूँदे झुण्ड की शक्ल में चलता रहा है. इस बार भी इतिहास खंगाले गए… पोथियाँ पलटी गयीं… पर इन्हें इतिहास में फिर एक टोपीवाला ही मिला जिसका रास्ता ही सबसे प्रभावी लगा… मिल जुल कर कुछ लोग एक टोपी वाला खोज लाये… क्योंकि उनका अनुभव बताता था कि टोपी वाले ही उत्पाती बंदरों से निपटते आये हैं… साथ ही एक भगवा धारी बाबा ने अपनी तरफ से मोर्चा खोल दिया… अब बंदरों में खलबली मच गयी…. घबराए हुए बंदरों की अम्मा ने उन्हें समझाया बेटा ये इंसान हैं.. ये पीढ़ी दर पीढ़ी लकीर के फ़कीर होते हैं… इनकी हर अगली चाल को हम हिंदी सिनेमा के सीन की तरह आसानी से भांप सकते हैं… ये ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे … अनशन करेंगे… भूखे रहेंगे… सड़कों पर चिल्लायेंगे…भाषण बाज़ी करेंगे… सोशल साइट्स पर हमें कोसेंगे..गरियायेंगे … क्योंकि इनकी परंपरा यही कहती है… अहिंसा परमो धर्मः… पंचशील सिद्धांत…बस यही सब … तो इन मनुष्यों से घबराने की ज़रूरत नहीं है…
एक तरफ बाबा और एक तरफ टोपी वाला … दोनों तरफ से बंदरों पर दबाव बढ़ने लगा… यहाँ तक कि उन्हें मनुष्यों के वेश में रहना मुश्किल हो गया… और खीज में एक दिन बंदरों की मूल प्रवृत्ति उजागर हो ही गयी और खिसियाये हुए बंदर एक साथ इनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए भगवाधारी बाबा पर खौंखिया कर दौड़ पड़े… … बाबा इस अप्रत्याशित हमले से जैसे तैसे जान बचा कर निकले … उधर टोपी वालों ने अलग नाक में दम कर रखा था… रोज़ धरने की धमकी… अनशन की चेतावनी… बंदरों ने अपने कुछ चालाक और कुटिल प्रतिनिधियों को छाँट कर टोपी वालों से निपटने के लिए एक गोल बनाई और जैसे कभी इंसान ने बंदरों को लालच दिया था… आज बंदरों ने टोपीवालों को लालच दी… और टोपी वाले उनकी चाल में फंस गए…
जैसे कभी मनुष्यों ने उन्हें अपनी शर्तों और इशारों पर नचाया था… आज ये मण्डली टोपी वालों को नचाने लगी… रोज़ नई तरह की बातें… रोज़ नए तरह के पैंतरे… और लाख कोशिशों के बाद आज भी बन्दर टोपी वालों पर भारी हैं… टोपी वालों के पास पोथियों में और इतिहास के पन्नों में एक ही तरीका लिखा है इन लंगूरों से निपटने का…और कोई रास्ता अपनाते देख बंदर उन्हें बदनाम करने में लग जाते हैं.. इधर बंदर दिन ब दिन अपनी चालाकियों और गुलाटियों में परिवर्धन करते गए.. अपनी गलतियों से सीखते गए.. अपडेट होते गए… बंदरों ने लालकिले की प्राचीरों पर अपना मोर्चा लगा रखा है …चंद मनुष्यों ने पुराने जंग खाए तमंचे में तेल लगा कर तोपों से मोर्चा लेने की ठान रखी है… फिर से पुराने तरीकों पर अमल करने में लगी है .. बाकी जनता आज भी अपनी टोकरी पेड़ के नीचे रख कर सो रही है ….कई तो यह मानने को भी तैयार नहीं कि उनकी टोकरियों को खाली करने के साथ साथ बंदरों ने उनके तन से कपड़े भी उतार लिए हैं और गाँठ में रखी रोटी भी छीन ली है… उधर बंदर अपनी हर कमियों को सुधार कर मनुष्यों से निपटने के नए नए गुर सीखने में लगे हैं.
सो… टोपीवाले फिर से अनशन की तैयारियाँ कर रहे हैं… फिर से भूख हड़ताल की धमकियाँ दे रहे हैं… उधर सारे बंदर पेड़ छोड़ कर उड़न खटोलों की सवारी कर रहे हैं… और धीरे धीरे मनुष्यों के धन के साथ टोपी (धर्म) और रोटी के साथ कपड़ा और मकानों पर भी नज़र जमाये हुए हैं…. कुछ लोग बंदरों को पहचान कर भी कुछ करने में असमर्थ हैं… कुछ लोग कुछ पहचानने को तैयार नहीं हैं… और कुछ लोग तो उनकी नस्ल में शामिल होने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं….
फिलहाल ……..बंदरों और टोपी वालों में जंग जारी है…
———————padmsingh 9716973262  21-07-2011

ये पब्लिक है ये सब जानती है

Posted on

पिछले दिनों हुए घटना क्रमों पर एक सरसरी निगाह डालें तो सरकार का रवैया साफ़ नज़र आता है

HAZARE_1_652601fपिछले दिनों अन्ना ने जंतर मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जिस जनयुद्ध का बिगुल अन्ना हजारे ने फूंका था, और जनता द्वारा अप्रत्याशित रूप से जिस तरह से अन्ना की मुहिम को सममर्थन प्राप्त हुआ था उससे सरकार हिल गयी थी और न चाहते हुए भी आश्वासन के तौर पर ही सही लेकिन जन लोकपाल विधेयक के लिए ड्राफ्टिंग कमिटी का गठन किया… इधर ड्राफ्टिंग कमिटी गठित तो हुई परन्तु उसके तुरंत बाद अचानक ड्राफ्ट कमिटी के मेम्बरों पर नए नए तमाम आरोप लगाए जाने लगे और  साक्ष्य उजागर करने का नाटक करते हुए ड्राफ्ट कमिटी के मेम्बरों को बदनाम करने का प्रयास किया जाने लगा.

baba-ramdevयह मुद्दा अभी अधर में ही था कि बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध दूसरी लड़ाई का आगाज़ कर दिया. सरकार पहले से ही सकते में थी, जंतर मंतर पर उमड़े जनसैलाब देख पहले से ही डरी हुई थी. वो किसी भी तरीके से रामलीला मैदान को जंतर मंतर नहीं बनने देना चाह रही थी. रामदेव के अनशन के ऐलान के साथ ही तमाम सरकारी कोशिशें इस प्रयास में लग गयीं कि कैसे बाबा रामदेव के अनशन को रोका जा सके. इसी मंशा के तहत प्रधानमन्त्री और सोनियागांधी ने चिट्ठी लिखी, एयर पोर्ट पर चार कैबिनेट मन्त्री फुसलाने, बरगलाने अथवा धमकाने के लिए पहुँचे. बाबा अपनी शर्तों से किसी तरह डिगने वाले नहीं थे. सरकार द्वारा तथाकथित राष्ट्रभक्तों से निपटने का ज़िम्मा कपिल सिब्बल को दिया गया था. उसके बाद अन्ना हजारे के जंतर मंतर वाले फार्मूले के तहत आश्वासन  देने और फिर मामले को बहकाए रहने की नीति अपनाई गयी और पांच घंटे तक बाबा के साथ बंद कमरे में वार्ता चली. बंद कमरे में राजनीति के जितने खेल खेले गए होंगे वह तो बाबा या सिब्बल जानते होंगे, मगर बाबा की बातों से स्पष्ट था कि साम दाम दण्ड भेद जैसे सभी हथकण्डे अपनाए गए बाबा को अनशन पर बैठने से लेकिन स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया और बाबा को आश्वासनों और वादों की चुसनी देते रहे.

आश्वासन, और दबाव की रणनीति अपनाते हुए बाबा और उनके सहयोगी बालकृष्ण को सरकार ने अपने जाल में फँसाया और एक सहमति पत्र  जल्दबाजी में लिखवा लिया गया. बाबा के एक सहयोगी के अनुसार अगर वह पत्र लिख कर नहीं दिया गया होता तो बाबा और बालकृष्ण को होटल में ही गिरफ्तार कर लिया जाता और जनता को उसी समय खदेड़ दिया जाता लेकिन होनी कुछ और थी… बाबा ने सहमति पत्र दिया और अनशन पर बैठ गए. इस बीच सरकार और बाबा के बीच परदे के पीछे लगातार वार्ता जारी रही. सरकार हर बात मानने का आश्वासन दे रही थी, लेकिन केवल आश्वासन पर बाबा मानने वाले नहीं थे क्योंकि लोकपाल का हश्र सब देख चुके थे.

अनशन पूरा एक दिन चला..यद्यपि वहाँ कल्बे ज़व्वाद रिज़वी, मदनी, आर्क बिशप और जैन गुरु आदि हर धर्म के लोग मौजूद थे, अन्ना ने भी अपना समर्थन बाबा को दे दिया था परन्तु पूर्वाग्रह से ग्रसित  सरकार ने साध्वी ऋतंभरा को देखते ही पूरे अनशन को आर एस एस द्वारा प्रायोजित और भाजपा द्वारा समर्थित होने का दावा कर दिया. शाम होते होते मंच से हो रही किरकिरी और अनशन पर बैठे अपार जन समूह ने सरकार के पेट में खलबली मचा दी… चौतरफ़ा उसके सभी प्रयास विफल होते देख काँग्रेस कोर कमिटी की बैठक में कुछ गुप्त निर्णय लिए गए.

Anna Hazare Fast 08-06-11 (68)सरकार की घबराहट बढती जा रही थी …उसने अपने अंतिम प्लान पर अमल करते हुए  रात साढ़े ग्यारह बजे दिन भर के भूखे प्यासे लगभग एक लाख सो रहे अनशनकारियों पर दिल्ली पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबल आँसू गैस और लाठियाँ लेकर पिल पड़े और जो जहाँ जैसे मिला उसे खदेड़ा गया, बाबा रामदेव को मंच के पीछे से खींचतान कर पकड़ने के प्रयास में बाबा के कपड़े तक उतार लिए गए. आँसू गैस और घबराहट से बेहोश निर्वस्त्र पड़े बाबा को किसी तरह महिलाओं ने अपना कपड़ा पहनाया और बाहर निकाला जहाँ से पुलिस ने बाबा को पकड़ा और हरिद्वार के लिए तडीपार कर दिया. दूर दूर पूरे भारत से आये अनशनकारी  पूरा दिन दिल्ली की सड़कों पर भटकते रहे, जो जहाँ मिला पीटा गया…

सरकार ने बाबा को तो खदेड़ दिया लेकिन चिट्ठी को लेकर जहाँ बाबा बैकफुट पर आते नज़र आ रहे थे तमाम जनता की सहानुभूति बाबा के पक्ष में जाने लगी, लगभग हर राजनैतिक पार्टी ने इस कृत्य का विरोध किया. चारों तरफ थू थू होने लगी. लेकिन इस अफरातफरी में भ्रष्टाचार का मुद्दा फिर से कहीं गुम हो गया…

सिविल सोसाइटी द्वारा जब एक दिन के लिए कमिटी की बैठक का बहिष्कार किया गया तो कपिल सिब्बल की बाँछें खिल गयीं और ऐलान कर दिया कि हम कटिबद्ध हैं और अकेले ही(मनमाने ढंग से) लोकपाल बिल बनायेंगे और पेश कर देंगे.

उधर बाबा अनशन से उठने को तैयार नहीं हैं और हरिद्वार में अपने अनशन पर हैं इधर सरकार और उसकी सारी मशीनरी बाबा और बालकृष्ण के इतिहास वर्तमान को खोदने और खंगालने में लगी हुई है. एक तरफ दिग्विजय सिंह घूम घूम कर बाबा को गरियाने और कोसने में लगे हुए हैं तो दूसरी तरफ तमाम एजेंसियाँ बाबा और बालकृष्ण को बदनाम करने के लिए कोशिश में लगी हुई हैं. इस तरह कालेधन और भ्रष्टाचार का मुद्दा कहीं खोता हुआ दिख रहा है

Anna Hazare Fast 08-06-11 (11)अन्ना ने रामलीला मैदान में हुए सरकारी और पुलिसिया कहर के खिलाफ़ जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण अनशन करना चाह रहे थे, लेकिन सरकार अब किसी की सुनने के मूड में नहीं थी, धरा 144 लगा कर जंतरमंतर को भी सील कर दिया. मजबूरन अन्ना को अपने अनशन को राजघाट ले जाना पड़ा. चार दिन पहले हुए पुलिसिया ताण्डव के बावज़ूद राजघाट पर अन्ना के समर्थन में दुबार एक बड़ा जनमानस इकठ्ठा हुआ और बता दिया कि अब यह मुद्दा और जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता है. राजघाट पर भी जनता न पहुँचे इसके लिए पुलिस द्वारा पूरे प्रयास किये गए थे. लेकिन सरकार की सारी योजनाएं असफल होते हुए दिख रही हैं और जनता का विरोध और मुखर हो रहा है

अन्ना को राजघाट पर मिले व्यापक जन समर्थन के बाद सरकार की मुश्किलें और बढ़ी हैं… सरकार अपनी पोल खुलते देख अब इन लोगों की आवाज़ को दबाने और इनसे निपटने के लिए गैर लोकतांत्रिक तरीके अख्तियार करने लगी है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक एडवाइजरी भेज कर सभी चैनलों को अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों की कवरेज करने से मना कर दिया है. सरकारी धमकी के बाद चैनल भी पूँछ दबा लिए हैं.

तू डाल डाल मै पात पात की तर्ज़ पर आज भ्रष्टाचार और जनता के बीच जो जंग छिड़ गयी है उसमे सरकार तमाम मायावी चालों से जनता की आवाज़ को दबा देने और जज़्बे को कुचल देने के लिए कटिबद्ध दिखती है जबकि जनता है कि सार्थक अंजाम तक पहुंचाए बिना इस मुहिम से पीछे हटने को तैयार नहीं है..

मै स्वयं सेवी

Posted on Updated on

मनुष्य मात्र के लिए  परिवार पहली पाठशाला होती है… दूसरे स्तर पर आस पड़ोस का परिवेश और फिर शिक्षा… इस कारण बचपन से परिवार बच्चे के भावनात्मक, नैतिक और परस्पर सहानुभूतिक  विकास,  सामाजिक परिवेश व्यक्तित्व और व्यावहारिक  विकास में और शिक्षा बौद्धिक विकास में सहायक होता है… सामाजिक गतिविधियाँ  सह-अस्तित्व और सह-अनुभूतिक गुणों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. जिन बच्चों को अन्य बच्चों के साथ परस्पर खेलने, विचारों के आदान प्रदान करने और प्रतिस्पर्धा के अवसर नहीं मिल पाते वो बच्चे कहीं न कहीं एकाकी सोच के हो जाते हैं.. बड़े हो कर वाह्य दुनिया से सामंजस्य बिठाना उनके लिए कठिन होता है…. कई विकसित देशों में तो व्यक्तित्व विकास के लिए, विषम परिस्थितियों से पार पाने के लिए अलग से प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं… इस तरह के व्यक्तित्व विकास के लिए विभिन्न तरह के स्वयंसेवी संस्थान और प्रोग्राम कितने प्रभावी होते हैं यह मैंने बखूबी अनुभव किया है…

red_cross-crescentमुझे बचपन से ही टीम के साथ  काम करने का अवसर मिला… बचपन का प्रशिक्षण आज भी मेरे व्यक्तित्व और व्यवहार में घुला मिला हुआ है…. बचपन में मै बेहद उत्साहित जिज्ञासु और जुझारू बच्चा था और किसी भी सामूहिक और सामाजिस कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता था.. स्कूल के दौरान लगभग हर तरह के टीम और मिल जुल कर करने वाले कार्यों में मेरी उपस्थिति अनिवार्य होती थी… चाहे वह गीत संगीत हो अथवा डिबेट या फिर कोई स्वयं सेवी मुहिम…सात साल की उम्र से ही मुझे तमाम स्वयंसेवी आयोजनों और प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होने का अवसर मिला… शुरुआत स्कूल की रेडक्रोस टीम से हुई…

हमारे स्कूल की रेडक्रास की टीम पूरे उत्तर प्रदेश की टॉप टीमों में से एक हुआ imagesकरती थी, अंतर स्कूल, जनपद, और राज्य स्तर पर ढेरों मेडल, सर्टिफिकेट  और चल-वैजयंतियाँ(शील्ड) आदि जीता करते. टीम के हर सदस्य की अपनी डायरी हुआ करती थी जिसमें आम जीवन में किये गए सहायता कार्यों तथा जागरूकता से सम्बंधित कार्यों का लेखा जोखा लिखा करते… और हमारी इन्हीं डायरियों को देख कर निर्णायक मण्डल अचंभित हो जाया करते थे,.. हम जहाँ भी गए अपनी छाप छोड़ कर आये.. बहुत छोटी उम्र में जब मुझसे अपना सूटकेस और बिस्तर भी नहीं उठाया जाता था मैंने तमाम कैम्प किये….

imagesरेडक्रास के अतिरिक्त हमें सेंट जॉन एम्बुलेंस, मैकेंजी और फायर फाइटिंग आदि की प्रतियोगिताओं में अनेकों बार भाग लेने का अवसर मिले. बहुत कुछ बनावटी भी हुआ करता, बहुत कुछ  रटा रटाया भी होता,  लेकिन धीरे धीरे ये सब कुछ जैसे चरित्र  और व्यवहार में घुलता मिलता गया.

Scout_Oath

रेडक्रास के अतिरिक्त स्काउटिंग के ढेरों कैम्प किये… वहीँ सीखा कि रीफ नॉट (चपटी गाँठ) क्यों और कैसे लगाते हैं, किसी घायल को विपरीत परिस्थितियों से कैसे बचाते हैं, अपने मित्रों से बायाँ हाथ  मिलाते हैं क्योंकि बाईं तरफ दिल होता है, और अनुशासन और टीम में कैसे काम करते हैं… टेंट पिचिंग से ले कर कैम्प फायर तक,  फायर फाइटिंग से लेकर सहायता के तरीकों तक सब कुछ धीरे धीरे अनजाने ही आत्मसात होते रहे और  सह अस्तित्व की भावना, मुश्किलों से जूझने की शक्ति और अनुशासन जैसे  गुण आत्मसात होते रहे .

NCCहाई स्कूल से NCC ज्वाइन करने के साथ ही नए तरह के अनुभव और नए तरह की सीखें मिलीं, चैथम लाइन इलाहाबाद, और पंडिलन एयरफोर्स  की हवाई पट्टी पर कलफ़ लगी खाकी ड्रेसों और चमकते नाल लगे जूतों से जब परेड होती तो हवाई पट्टी से चिंगारियाँ और माथे पर पसीना मचल उठता… “परेड….. तीनों तीन में सलामी देगा …. सलामीईईईईई …दे" और एक साथ तड़ाक की आवाज़ के साथ सैकड़ों जूते हवाई पट्टी से टकराते और हमारे उत्साह और उमंग तिरंगे के सामान ही परवाज़ हो जाते … हमारे ट्रेनर हवलदार मानसिंह हुआ करते थे… उनकी प्रतिबद्धता और हमारे प्रति स्नेहवत व्यवहार आज भी याद आते हैं… उस दिन मुझे पूरी बटालियन के सामने फायरिंग में ग्रुपिंग के लिए और बेहतरीन परेड के लिए बाहर निकाल कर  तारीफ की थी तो लगता था जैसे बार्डर फतह किया हो …

NSS 1

विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय सेवा योजना में शामिल होने पर नए अनुभव और नए संकल्प मिले… देश, समाज और आस पड़ोस के प्रति जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का एहसास हुआ… सृजनात्मकता, सहयोग और सह अस्तित्व की भावना सीखा… साथ ही संगीत, थियेटर, के साथ साथ उत्तर मध्य सांस्कृतिक केन्द्र के अन्य सृजनात्मक कार्यों से संवेदन शीलता ग्रहण की…

समय के साथ साथ बड़े भी होना था और दुनिया के मजधार में भी कूदना था… सो कूदा… जहाँ जहाँ जो जो भी किया कुछ बहुत अच्छे लोग भी मिले लेकिन बचपन में जो संस्कार सीखे, आत्मसात किये थे, दुनिया उसके हिसाब से कहीं जटिल निकली… किसी पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेने, तुरंत सबको मित्रवत मान लेने और सहायता के लिए तत्पर रहने की आदत के चलते खूब धोखे भी खाए…  किन्तु इन गतिविधियों से व्यवहार और सोच में जो आमूल परिवर्तन हुए वो मेरे लिए कहीं अधिक संतोषप्रद हैं….

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब समाज की संरचना और चुनौतियाँ तेजी से जटिल होती जा रही हैं,  बहुत ज़रूरी है कि बच्चों को सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण दिए जाएँ…एकल परिवार, सीमित सामाजिक संपर्क, टीवी, इंटरनेट  और वीडियोगेम्स तक सीमित मनोरंजन बच्चों को कहीं न कहीं मानसिक रूप से कमज़ोर और एकाकी बनाते हैं… बड़े हो कर बच्चा जब बाहरी दुनिया की वास्तविक चुनौतियों से सामना होता है तो सामंजस्य बिठाना कठिन होता है… डिप्रेशन, असुरक्षा की भावना, और इनफीरियारिटी कोप्लेक्स जैसी तमाम मानसिक चुनौतियों का सामना करना होता है…

ज़रूरी है कि बच्चों को नियमित रूप से किन्हीं सार्थक कार्यों में मिलजुल कर कार्य करने के लिए प्रेरित करना चाहिए… अवसर देने चाहिए…   सह अस्तित्व की भावना और मिलजुल कर काम करने की आदत का विकास किया जान चाहिए… मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए … घर बाहर के सामाजिक परिवेश के बारे में अवगत कराना और आवश्यकतानुसार परिस्थितियों से स्वयं सामंजस्य बैठाने का अवसर देना चाहिए…   वरना आने वाले समय में पग पग पर दुनिया के झंझावातों से नयी पीढ़ी का उबर पाना मुश्किल होगा…

….पद्म सिंह

 

मुल्ला नसीरुद्दीन का कुर्ता

Posted on Updated on

पिछले एक महीने से कोई पोस्ट नहीं लिख सका… या यूँ कहिये लिखने की मनःस्थिति नहीं बन रही थी… कार्यालय में (कमाऊ)कुर्सी के लिए ऐसा ताण्डव हुआ कि तीन महीने सारा काम धाम ठप रहा और दो “माया’वी” अधिकारियों ने अपनी औकात का खुल्ला प्रदर्शन किया…(गाली गलौज से जूतमपैजार तक) मामला किसी तरह हाईकोर्ट से सुलझा… मगर विभाग का कमसे कम कार्यालय के  तीन महीने के मुफ्त वेतन के बराबर  लगभग रु.51,00,000.00 का तो नुकसान हुआ ही…

इसी बीच दिल्ली में सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया … परिकल्पना सम्मान समारोह के बाद उठे विवाद ने ढेरों प्रश्न और संभवतः थोड़े उत्तर भी पैदा किये… सम्मान, पारितोषिक, ईनाम और थोड़ा और ठेठ हो जाएँ तो बख्शीश वगैरह किसी हद तक कभी लेनेवाले , कभी देने वाले अथवा दोनों के अहं और महत्वाकांक्षा को ही पोषित करते हैं… अकादमिक साहित्य में सम्मान, पुरस्कार, आदि के लिए किये जाने वाले जोड़ तोड़ हमेशा से जगजाहिर हैं… लेकिन चिंतनीय है कि धीरे धीरे हिन्दी ब्लागिंग में हिन्दी से पहले इस तरह के प्रश्न पुष्ट होने लगे हैं… 

DSC_0165सापेक्ष दर्शन के अनुसार किसी लाइन को छोटा करने के लिए उसके बगल एक बड़ी लाइन खींच देनी होती है… और सम्मान या पुरस्कार कहीं न कहीं ऐसी लाइनें खींचने का प्रयास है…किन्तु यहाँ सम्मान और पुरस्कार में मूलभूत अंतर को समझ लेना भी आवश्यक होगा… इन दोनों में अंतर यही है कि दोनों स्थिति में लाइनें आपस में बदल जाती हैं…सम्मान जहाँ  प्राप्त करने वाले के लिए गरिमामयी है वहीँ पुरस्कार, प्राप्त करने वाले का मूल्यांकन हो जाता है… इस विषय पर आगे फिर लिखेंगे फिलहाल एक प्रसिद्द कहानी लिखना प्रासंगिक लग रहा है–

ये यूँ तो जग प्रसिद्द कथा है और काल्पनिक भी…. परन्तु मुल्ला नसीरुद्दीन की कहानियाँ मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं…. महत्वाकांक्षा जिस तरह से किसी के सर चढ़ कर बोलती है उसे दिखाने में कहानी सक्षम है… महत्वाकांक्षा मनुष्य मात्र के लिए एक बड़ी प्राथमिकता रही है. 

मुल्ला नसीरुद्दीन की गरीबी और फाकामस्ती जग प्रसिद्द है… अपनी खुदी में मस्त रहने वाले मुल्ला नसीरुद्दीन के किसी मित्र ने मुल्ला को अपने साथ किसी धनाड्य मित्र के घर पार्टी में ले जाने की पेशकश की… मुल्ला ने यह कह कर जाने से मना कर दिया कि उसके पास तो सिवाय आधे पैर का घुटन्ना और एक चोगे के अलावा कुछ नहीं है… ऐसे उत्सव में बड़े बड़े लोग होंगे… अपना क्या है… लेकिन तुम्हारी इज्ज़त चली जायेगी.., तू मुझे मत ले चल… मेरे पास उस पार्टी लायक कपड़े नहीं हैं..

अमीर मित्र ने अपनी एक अच्छा सा कुर्ता मुल्ला को देते हुए बोला, तू इसे पहन ले…किसी को क्या पता चलेगा कि ये कुर्ता किसका है…और फिर मै भी किसी से नहीं कहूँगा  कि यह कुर्ता मेरा है… मुल्ला ने ना नुकुर करते पोशाक पहनी और चल दिया दावत खाने

मुल्ला का मित्र दावत में मुल्ला के साथ घुसा… मुख्य द्वार पर ही मेजबान मिल गया… उसने मुल्ला का परिचय करवाया…

“इनसे मिलिए….ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन…बस इन्होंने जो कुर्ता पहना है वो मेरा है…

मुल्ला नसीर को बहुत बुरा लगा… कोने में ले जाकर मित्र की क्लास ले ली… अबे,… ये बताने की क्या ज़रूरत थी कि कुर्ता तुम्हारा है… किसी को क्या पता चलता … मित्र को गलती का एहसास हुआ तो वादा किया कि अब ऐसा नहीं होगा…

दोनों आगे बढते हैं… कोई अन्य मित्र मिला होगा… मुल्ला नसीरुद्दीन का दुबारा परिचय करवाया गया …

“इनसे मिलिए …. ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन… बाकी रही इनके कुर्ते की बात… तो ये कुर्ता इन्हीं का है”

मुल्ला नसीरुद्दीन परेशान… बहुत समझाया…अमाँ…क्या गज़ब करते हो… लोग अपना कुर्ता ही पहनते हैं… ये बताने की ज़रू़रत क्या थी.. कि कुर्ता मेरा है…जब मैंने पहना है तो मेरा ही होगा…मेरे भाई… कुर्ते की बात ही क्यों करनी.. तुम तो ये समझो कुर्ते के बारे में बात ही नहीं करनी है…समझो तुम जानते ही नहीं इसके बारे में…

मित्र की समझ में आ गयी बात… आगे बढ़ा…फिर किसी मित्र से मिलते ही परिचय करवाने का दौर चला… लेकिन मित्र के दिमाग में कहीं न कहीं कुर्ता घूम रहा था… सो उसने मुल्ला का परिचय कुछ यूँ करवाया…

“इनसे मिलिए …. ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन…रही बात इनके कुर्ते के बारे में… तो मै इसके बारे में कुछ नहीं जानता कि ये किसका है…

मुल्ला झल्लाता हुआ फिर से मित्र को कोने में ले गया… अमाँ…तू भी गजब है यार!… तू कुर्ते की बात बीच में लाता ही क्यों है बीच में…तू समझ ले अच्छी तरह से… कुर्ते की बात ही नहीं करनी है… 

मित्र को फिर अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने खूब कसमें खाईं कि अब ध्यान रखेगा… ऐसा नहीं होगा…

दोनों आगे बढे…. दावत अपने शबाब पर थी… फिर से दोनों का सामना किसी से होता है… मुल्ला नसीरुद्दीन के मित्र ने मुल्ला का परिचय फिर से करवाया….

“इनसे मिलिए …. ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन…बड़े प्रसिद्द व्यक्ति हैं नसीर… बाकी इनका कुर्ता !!!…. तो इसके बारे में मुझे कोई बात ही नहीं करनी है…

मुल्ला ने सर पीट लिया और जैसे तैसे दावत से बाहर निकला…

गाँधी जी के मजबूर बंदर ….(पद्म सिंह)

Posted on Updated on

clip_image001

वे जाने कब से  आने जाने वालों को मौन सीख दे रहे हैं,  सीख दे रहे हैं कि… बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, और बुरा मत सुनो…. इसके लिए एक ने अपना मुँह बंद कर रखा है, दूसरे ने अपनी आँखें तो तीसरे ने अपने कान बंद कर रखे हैं… एक दिन सामने से सामने से गुजरते हुए अचानक उत्सुकता जागी तो इनसे पूछ बैठा,… गाँधी जी के बंदरों, गाँधी जी ने तुम्हें ऐसा ही सिखाया है,,,, कि बुरा मत बोलो इस लिए अपने मुँह बंद कर लो, बुरा मत देखो, इस लिए आँखे बंद कर लो, बुरा मत सुनो इस लिए कान बंद कर लो… ये तो हुई गाँधी जी की सीख की बात… अपने दिल की बात भी तो कहो कुछ?

तीनों बंदरों का चेहरा बेचारगी से भर गया…. वे बोले…. ये शिक्षाएँ आज के युग में प्रासंगिक तो हैं लेकिन शायद अपर्याप्त लगने लगी हैं… आज गाँधी जी के सिखाये रास्ते पर चलना असंभव है,,,, आँखें बंद करते हैं तो कान खुले रह जाते हैं…. सरे आम भ्रष्टाचार, बलात्कार, और अनैतिकता की हदें पार करती ख़बरें कानों में पड़ ही जाती हैं…कान बंद करते हैं तो आँखें खुली रहती हैं और इन्हीं आखों से समाज और दुनिया की तेज़ी से अधोमुखी प्रगति की तस्वीर दिखाई देती है… ऐसे में मुँह बंद रखना असहनीय होता जा रहा है…

हम तो गाँधी जी के बंदर हैं…. हमारी मजबूरी है कि हम अपना तरीका नहीं बदल सकते… लेकिन  अब तो बस यही लगता है….कि समय के साथ साथ लोगों को अपना नजरिया बदल लेना चाहिए….

आज की परिस्थितियां ऐसी नहीं रहीं कि अपने आँख कान मुँह बंद कर के रखे जाएँ… बल्कि आज आवश्यकता यही है… कि आँखें पूरी तरह से खुली रखा जाए और हर बुराई पर कड़ी नज़र रखी जाए…. छद्म वेश धारी पाखण्डी और नकली मुखौटे वाले चेहरों को पहचाना और बेनकाब किया जाए….

अपने कान पूरी तरह से खुले रखे जाएँ… जिससे समाज, देश और भविष्य के प्रति रची जा रही हर साजिश की आहट को सुना और महसूस किया जा सके…

और इन साजिशों और हर बुराइयों को पहचानते हुए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने मुँह को भी खुला रखा जाय… किसी बुराई अथवा अत्याचार  को देखते समझते हुए भी मुँह बंद रखना भी बुराई ही है…. इस हम गाँधी जी के बंदरों को जाने दें… हम भले अपने आकाओं से मजबूर हैं लेकिन आम जन को हम यही सीख देना चाहेंगे कि अपनी आँख कान खुले रखें और बुराइयों, अत्याचार और छद्मवेशी आस्तीन के साँपों के खिलाफ़ अपनी आवाज़ को बुलंद किया जाए…

गाँधी जी के  बंदर

मजबूर हैं गाँधी जी की सीखों से

तभी तो आखें,कान मुँह

बंद कर रखे हैं……

अनभिज्ञ हैं

मानवता की चीखों से

वो बंदर हैं

नासमझी का दामन थाम

मजबूरी के नाम पर

न कुछ देखते हैं

न सुनते हैं

या सबकुछ देख सुन कर भी

चुप रहते हैं

गाँधी जी के नाम पर

लोग कब तक

बंदर बने रहेंगे

बुराई न देखेंगे

बुराई न सुनेंगे

बुराई के लिए

मुँह बंद रखेंगे…..

और कुछ भी नहीं कहेंगे…