तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं….

पिछले कुछ वर्षों को अगर पलट कर देखें तो भारतीय जनमानस एक संक्रमण काल मे चल रहा है। जहाँ पुराने राजनैतिक और सामाजिक प्रतिमान दरकने लगे हैं वहीं नई विचारधारा बलवती होती दिखाई देती है। न केवल भारत मे वरन विश्व के कई देशों मे राष्ट्रवाद की अवधारणा के पुष्ट होने के संकेत मिलने लगे हैं। इस बीच अमेरिका मे ट्रम्प और इज़राइल मे नेतिन्याहू का चुना जाना भी इसी बात की ओर इंगित करता है। इसके विपरीत कुछ पूर्व मे स्थापित किलों की दीवारों के दरकने की ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ने लगी हैं…ऐसे स्वर बौखलाहट और अन्ध विरोध की अँधेरी छाया मे न केवल अपनी दिशा भटक चुके हैं वरन प्रायः भाषाई मर्यादा भूल कर अपने कार्यों से देश काल पर होने वाले दुष्परिणामों को भी देख नहीं पा रहे हैं(या देखना ही नहीं चाह रहे हैं)

“भारत तेरे टुकड़े होंगे
इंशाल्ला-इंशाल्ला “, “अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा हैं”, “भारत की बरबादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी” जैसे नारे लगाने वाले उमर खालिद, कन्हैया कुमार सहित कश्मीर के कुछ युवकों की वीडियो न केवल मीडिया मे छाई रही वरन विधिवत एक फोरेंसिक लैब मे उसकी सत्यता की जाँच भी ठीक पाई गई.

पिछले दिनों जवाहरलाल विश्वविद्यालय मे पढ़ने वाले कुछ छात्रों का एक कार्यक्रम और उसमे लगाने वाले नारे चर्चा मे रहे… “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाल्ला-इंशाल्ला”, “अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा हैं”, “भारत की बरबादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी” जैसे नारे लगाने वाले उमर खालिद, कन्हैया कुमार सहित कश्मीर के कुछ युवकों की वीडियो न केवल मीडिया मे छाई रही वरन विधिवत एक फोरेंसिक लैब मे उसकी सत्यता की जाँच भी ठीक पाई गई… कश्मीर को लेकर पहले भी आंदोलन होते रहे हैं, तो कोई अतिशय घटना नहीं थी, परन्तु उस घटना के चर्चा मे आने के बाद उसके समर्थन मे पूरे देश से जो स्वर उठे, जिस प्रकार से मीडिया, साहित्य, कला और बौद्धिक गोले मे मे बैठे कुछ लोगों द्वारा अनेक कुचक्र(अवार्ड वापसी, असहिष्णुता, रोहित वेमुला, गोरक्षक, दलित उत्पीड़न आदि आदि) रचे गए, उसने भारत मे एक नए विमर्श को उठान दे दिया…… भारत का आम जनमानस प्रायः अपनी सांस्कृतिक मूल्यों से मजबूती से जुड़ा हुआ है, अनेक बाहरी आक्रान्ता और आक्रमण चाह कर भी उसे समूल नष्ट नहीं कर पाए, भारत केवल एक भू भाग का नाम नहीं है, भारत मात्र पहाड़ों, नदियों वनस्पतियों का नाम नहीं है, या इसमे रहने वाले मनुष्यों की गिनती भर नहीं है, भारत की एक आत्मा भी है… जिसमे उसकी संस्कृति, उसके पूर्वज, उसके मूल्य और उसका भौगोलिक क्षेत्र सब कुछ है, एक राष्ट्र पुरुष है… एक भारत माता है…

आज के परिप्रेक्ष्य मे जब की “भारत की बरबादी” के नारे लगाने वाला और देश के संविधान और न्याय व्यवस्था को चुनौती देने वाला वही गरीब और बेरोजगार लड़का कन्हैया कुमार जिसके पिता विकट गरीबी मे जीते हुए दिवंगत हो गए, जब बेगूसराय से सांसद का टिकट लेता है तो अचानक उसके साथ दौड़ने वाली लाखों की गाडियाँ कहाँ से आती हैं, उसके हाथ मे लगभग आधे लाख का मोबाइल कौन ला कर देता है, वो कौन लोग हैं जिन्होने उसके गरीब माता पिता की तो कभी मदद नहीं की किन्तु उसका उपयोग सत्ता की चाभी की तरह करना चाहते हैं। और सबसे बड़ा प्रश्न तब खड़ा होता है जब इसी समाज से कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, ब्लॉगर, कलाकार, रचनाकार और पत्रकार अचानक उसके समर्थन मे गीत लिखने लगते हैं, समर्थन मे कसीदे पढ़ने लगते हैं, और समर्थन मे सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों पर उसे प्रचारित करने लगते हैं। वास्तव मे ये वर्ग चाहता क्या है ?… क्या इस वर्ग ने अपने क्षेत्र की मर्यादा, उसके मूल्यों सहित अपने उत्तरदायित्व के प्रति छल नहीं किया… इतना ही होता तो भी कोई बात नहीं… इसका देश और काल पर प्रभाव क्या पड़ेगा इस पर भी विचार किया या नहीं…. ? महत्वपूर्ण ये नहीं कि हमें विरासत मे क्या मिला है, महत्वपूर्ण ये है कि हम अपने आने वाली पीढ़ी को विरासत मे क्या दे कर जाने वाले हैं ?…

मैं उन सभी साहित्यकारों, कलाकारों, लेखकों ब्लागरों और सोशल मीडिया पर लिखने वालों से कहना चाहता हूँ कि नश्तर(छुरा) का गुण तो एक ही होता है काटना… परन्तु उसका प्रयोग महत्वपूर्ण है, वही छुरा जब डॉक्टर प्रयोग करता है तो किसी की जान बच जाती है, सृजनात्मक कार्य कारित होता है… वहीं अगर उसी छुरे को एक हत्यारा प्रयोग करता है तो उसका परिणाम विध्वंसक होता है…. आप जिस भी विधा मे काम करते हैं, जिस भी विचारधारा मे बहते हैं… आप अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकते…ध्यान रखिए आप स्वतन्त्र हैं, स्वच्छन्द नहीं…. देश काल के प्रति आपका उत्तरदायित्व है….आप अपनी किसी भी विचारधारा को समर्थन करें स्वीकार करें तो आपकी स्वतन्त्रता है… परन्तु जब आप के कारण देश का अहित हो, मूल्यों का ह्रास हो, तो आप स्वीकार्य नहीं हैं…..