जीवन और स्मृति 

वो पहला दिन था ! जब मैं त्रिभुवन जी की साइकिल के आगे डण्डे पर बैठ कर स्कूल पहुँचा था। स्कूल के ही दो कमरे ब्लॉक ऑफिस के काम आते थे तो कुछ लोहे की सरकारी रंगीन बैलगाड़ियाँ स्कूल में ही खड़ी थीं। 25 पैसे फीस होती थी उस समय पहली क्लास की…चन्द पन्नों की एक ही किताब “हिन्दी बाल पोथी”.. महुए के पेड़ के नीचे बैटरी की कालिख से लकड़ी की पट्टी काली करना और सुलेख लिखना, महुए के पेड़ पर जहरीली चींटियां और 3 पैसे की एक पुड़िया “लकी” स्याही… सब इतना स्पष्ट याद है कि लगता है कल की बात है… पहली क्लास में एक लड़की (शायद सुशीला नाम था) मेरे से कुछ बड़ी थी, उसके साथ रहना मुझे बहुत सुखद लगता था, अक्सर हम घर से लाए पराँठे आपस मे शेयर भी करते…साथ साथ स्कूल के पिछवाड़े वाले बाग में घूमते और झरबेरी खाते। (अब सोचता हूँ तो लगता है क्या उस उम्र में भी कुछ प्यार व्यार जैसा तो नहीं रहा होगा?) लगभग 40 साल के इस अन्तराल में अगर वो याद रह गयी है तो कुछ विशेष तो थी ही… 

आज एक लम्बा समय निकल चुका है, देखते देखते लगभग 45 साल सर्र से निकल गए… सुबह, शाम, सुबह शाम… बहुत कुछ स्मृति में शेष है, ट्रिलियन ट्रिलियन डेटा मस्तिष्क तन्तुओं में सोया पड़ा है… 

तमाम ऐसी घटनाएँ जिन्हें हम खुद ही याद नही करना चाहते, लेकिन याद रह जाती हैं… बहुत से ऐसे पल जो समय की धूल में अदृश्य हो चुके हैं… कभी सोच कर देखिये आपकी स्मृति बचपन में कितने पीछे तक जा पाती है… क्या आपको माँ की गोद याद है ?.. क्या याद है कि आपके बचपन के सबसे पुराने खिलौने क्या थे ?…  मुझे लगता है मैं अपने बचपन के तीसरे साल तक की स्मृति में जा सकता हूँ…

ओशो कहते हैं अपने पूर्व जन्म की स्मृति में जाना सम्भव है… यहाँ तक कि बचपन के 6 माह तक बालक को अपने पूर्व जन्म की स्मृति होती है… समस्या यह है कि स्मृति में पीछे जाना टेप को उल्टा बजाने जैसा है… अगर हम स्मृति में पीछे जा भी पाए तो समझ पाना सम्भव नही होता…थोड़ी स्मृतियाँ जो टुकड़ों में रह जाती हैं वो टेप को रिवर्स कर के फिर सीधा बजाने जैसा है।

मनोविज्ञान में स्मृति एक पूरा विषय ही अलग है… स्मृति के विषय में आपकी अभिरुचि, सम्वेदना, अभिप्रेरणा ही नही चेतन और अचेतन में पड़ी इच्छाएँ और अनुभव भी प्रभावित करते हैं। 

तो एक बार प्रयास करिये आप अपने बचपन मे कितना पीछे जा सकते हैं, अपना पहला स्कूल का दिन, उससे पहले के दिन, या उससे भी पहले … आप देखेंगे कि आपके अनुभव बदल गए, समझने की क्षमता बढ़ गयी, रुचियाँ, स्वभाव, प्राथमिकताएं  सब बदलीं, लेकिन आप लगभग आज भी वैसे ही हैं… गौर से देखिये जो द्रष्टा है उसमें कोई परिवर्तन नही है।

 धीरे धीरे चलते हुए वर्तमान में आइए… द्रष्टा भाव से… वरना आप उदास हो सकते हैं… और फ़िर अगले पाँच साल आगे जाइये, दस साल, पन्द्रह साल या बीस पचीस साल आगे जाइये और स्वयं को देखिए… आप कहाँ होंगे, आप का शरीर कहाँ होगा… लेकिन ज़रूरी है हर घटना, सम्भावना की आँख में आँख डाल कर स्पष्ट देखने का प्रयास करना… संभव है आप स्थितप्रज्ञ हो जाएं।  

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