फिर न कहना के हम ने पुकारा नहीं

तुम मेरे ना हुए ना मिले ना सही 
तेरे दिल पर भी अब हक़ हमारा नहीं
गाँव माज़ी  में कोई घरौंदा तो है
जिस को सपनों ने बेशक सँवारा नहीं 

गिर गयी रात की आख़िरी पाँखुरी
और उफ़क पर भी कोई सितारा नहीं 
आखरी साँस है मेरी आवाज़ की 
फिर न कहना के हमने पुकारा नहीं 

एक दिया टिमटिमाता रहा रात भर 
एक दस्तक की उम्मीद जागी रही  
एक कतरा  न टूटा मेरी आँख से 
एक लम्हा तेरे बिन गुज़ारा नहीं 

यूँ तो हर फ़ूल का एक अंजाम है
खिल के महका महक कर के खुद गिर गया 
तुम कली तोड़ कर घाव क्यों दे गए 
वक्त का तुमने समझा इशारा नहीं 

शर्त बस एक थी मैं तुम्हारा रहूँ
मेरा कुछ ना रहे सब तुम्हारा रहूँ 
ना मिरा मैं रहा ना तुम्हारा हुआ 
हाय डूबा के मिलता किनारा नहीं। 

ज़िन्दगी का फ़साना भला या बुरा 
सुर में सुर बिन मिलाए गुज़ारा नहीं 
दिल लुभाती हैं  लहरों की अठखेलियाँ
कूद जाओ तो मिलता किनारा नहीं 

ज़िन्दगी जंग है रंग ए महफ़िल भी है
वही मजधार है और साहिल भी है 
हौसलों के मुसलसल हुए इम्तहाँ
जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं

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