जो डूबा सो पार !

                  वैसे तो मैं बचपन से ही खुराफाती जिज्ञासु टाइप का रहा हूँ…संगीत, ड्रामा,लकड़ी का काम सहित साहित्य और तकनीकी विषयों के प्रति विशेष रुचि रही… इसी क्रम मे कई बार तैरना सीखने की कोशिश भी की पर बार बार नाकाम ही रहा…कई बार इस चक्कर मे डूबते डूबते भी बचा। गाँव वाले घर के पिछवाड़े वाले तालाब मे भैंस की पूँछ पकड़ कर पार उतरने की कोशिश मे अचानक पूँछ का छूट जाना और पानी के अंदर खुली आँखों से पानी के बाहर का दिखने वाला उजाला आज भी याद आ जाता है। भला हो मुन्ना तिवारी का जो मेरे पीछे से आ कर मुझे पार निकाला। उस घटना के बाद मैं गहरे पानी मे उतरने की हिम्मत लगभग तीस साल बाद ही कर पाया क्योंकि तब तक भी मुझे तैरना नहीं आता था।

                   गाज़ियाबाद  के मुरादनगर कस्बे मे एक बदनाम "गंग नहर" है जो हरिद्वार से निकलती है। मुरादनगर मेरठ हाइवे के पुल पर 12 हों महीने नहाने वालों का मेला लगा रहता है। पड़ोस के मित्रों ने मुझे चढ़ाया, समझाया और नहर मे तैरना सिखाने का लालच देकर ले गए नहर पर। नहर मे साल भर औसतन 5 से 8 फुट पानी रहता है। हर सप्ताह एक दो लोगों का डूब जाना वहाँ आम बात है। पहले दिन की बोहनी खराब हो गयी… एक घण्टे नहाने के बाद जब बाहर आए तो पता चला कोई हम सब की पैंट और कपड़े  घाट से उठाकर चंपत हो गया था…। हम सभी चड्डी मे ही कार मे छुप कर घर लौटे। अगले रविवार फिर योजना बनी नहर जाने की… इस बार थोड़ी तैयारी से गए…आधा घण्टे सीढ़ी के पास चेन पकड़ कर नहाने के बाद कुछ उपाय खोजा गया… गाड़ी मे पड़ी एक पतली रस्सी निकाली और उसका एक सिरा अपनी कमर से बाँध कर दूसरे सिरे पर अपनी दोनों हवाई चप्पल बाँध दी फिर सभी मित्रों से भरोसा लिया कि अगर मैं डूब जाऊँ तो ऊपर तैरती चप्पल खोज कर मुझे बाहर खींच लेंगे। इतना आश्वासन देखर सब नहर के बीचों बीच नहाने लग गए और मैं घाट की चौथी सीढ़ी तक ही तैरने की कोशिश करता रहा। तैरते हुए अचानक मेरा पैर पाँचवीं सीढ़ी पर गया और फिर मैं वापस घाट पर आने के प्रयास मे और गहरे उतरता चला गया…चंद सेकेंड मे मैं पानी के अंदर उछल रहा था पर पानी के बाहर निकाल नहीं पा रहा था… डूबते हुए आदमी की मनःस्थिति क्या होती है यह बताया नहीं जा सकता… कुल मिलाकर घबराहट मे कुछ नहीं सूझता सिवाय हाथ पैर मारने के। सभी दोस्त नहाते हुए दूर चले गए थे… हालाँकि उनमे से एक (अतहर परवेज़) मुझे डूबता देखकर मेरी तरफ चल पड़ा था… लेकिन अगले दस सेकेंड मे ही मैं डूब जाने वाला था…इसी बीच जाने कहाँ से एक हाथ ने मेरा हाथ पकड़ कर बाहर खींच लिया… मैं घबराहट मे उस व्यक्ति को धन्यवाद भी नहीं कह सका… शायद इसी लिए आपद्काल मे सभी औपचारिकताएँ गौण हो जाती हैं। मेरी जान बच गयी थी… पर मैंने अगले पाँच मिनट मे ही निश्चय कर चुका था… "आज तैरना सीख कर ही जाऊंगा"

           अबकी बार पड़ोस के होटल राहगीरों का पसंदीदा गंग नहर का चाय नाश्ता होटल) के आस पास दो तीन बिसलरी की खाली बोतलें खोजी गईं.. बोतलों के मुँह मे रस्सी के फंदे फंसाए गए और फिर मेरी कमर पर बाँधा गया। अब मैं आसानी से डूब नहीं सकता था। फिर अनथक चार घण्टे के गहन प्रशिक्षण और प्रयास के बाद अच्छा खासा तैरना सीख गया और उसी दिन बिना बोतल बाँधे धार मे कूद कर कई बार किनारे आया। उसके बाद बहुत बार गया और हर बार आत्मविश्वास बढ़ता गया…अब स्थिति यह है कि मुझे भरोसा भी नहीं होता कि मुझे तैरना नहीं आता था। जैसे साइकिल सीख लेने के बाद लगता है इसे चलाने मे ऐसी भी क्या मुश्किल है। तो कुल मिलाकर मैं तैरना सीख चुका था।

तैरना इतना मुश्किल भी नहीं– कम से कम इतना तैरना सबको आना चाहिए कि आपातकाल मे अपनी जान बचाई जा सके। कुछ लोग डूब जाने के डर से आजीवन तैरने का प्रयास भी नहीं करते जबकि तैरना इतना कठिन नहीं है जितना लोग समझते हैं। ज़रूरत है थोड़े से प्रयास धैर्य और हिम्मत की। तैरना सबसे अच्छा व्यायाम माना जाता है जिसमे शरीर का हर अंग श्रम करता है और बिना किसी चोट मोच या नुकसान किए पेशियों को सुदृढ़ करता है।

तैरना कहाँ सीखें- तैरना सीखने के लिए आदर्श परिस्थितियाँ तो तरणताल मे योग्य प्रशिक्षक के साथ सुरक्षा पेटी के साथ सीखना ही है परन्तु ये सब हर जगह सुलभ नहीं है। इस लिए अपने आस पास के तालाब या नदी मे तैरना सीखा जा सकता है। रुके हुए पानी की अपेक्षा बहते हुए पानी के प्रवाह मे तैरना आसान होता है। पानी मे जाने से पहले सुरक्षा का इंतज़ाम अवश्य कर लेना चाहिए, अच्छा हो कोई मित्र जिसे अच्छी तरह से तैरना आता हो वो भी साथ रहे तो अच्छा हो।

कैसे करें शुरुआत- तैरना सीखते समह सबसे पहले पानी से दुश्मनी समाप्त कर पानी से मित्रता बहुत आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले पानी के सामने लड़ने के स्थान पर समर्पण करना सीखना चाहिए…पहले साँस रोक कर धीरे से पानी के अंदर बैठ जाएँ…और अपने पैरों को मोड़ कर घुटनों को अपने हाथों के घेरे से बाँध लेना चाहिए… इससे आप अपने आप पानी मे अपने आप पीठ के बल पानी की सतह पर आ जाएँगे लेकिन ऐसा करते समय सिर पानी के अंदर ही रखें और जल्दबाज़ी न करें… ऐसा करने से पानी के साथ एकाकार होने मे सहायता मिलेगी और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। घुटनों को बाहों मे मोड़ कर जब पर्याप्त समय तक के लिए इस तरह सतह पर तैरना आ जाए तो अगला चरण शुरू होता है। अब… जब घुटनों को थामे हुए जब आप पीठ के बल पानी के उत्प्लावन बल से सतह पर आएँ तो बिना सिर को पानी से बाहर निकाले हाथ को आगे और पैर को पीछे फैलाते हुए पानी के अंदर ही मुँह के बल लेट जाने का प्रयास करें। धीरे धीरे इसका भी अभ्यास हो जाएगा और आत्मविश्वास और बढ़ेगा। अब तीसरा चरण है हाथ पैर चलाना… जब पानी पर लेटना सहज लगने लगे तो दोनों हाथों के पंजों  को  चप्पू की तरह बना कर पानी को पीछे धकेलते हुए आगे बढ्ने का प्रयास करें। धीरे धीरे इसी तरह पैरों को भी चलाना आ जाएगा और जल्दी ही आपको लगेगा इसमे तो कुछ भी खास नहीं था। जैसे साइकिल सीखने के बाद हमें भरोसा भी नहीं होता कि कभी साइकिल चलाना नहीं आता था।

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