न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा …

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न जाने क्या हुआ है हादसा गमगीन मंज़र है
शहर मे खौफ़ का पसरा हुआ एक मौन बंजर है
फिजाँ मे घुट रहा ये मोमबत्ती का धुआँ कैसा
बड़ा बेबस बहुत कातर सिसकता कौन अन्दर है

 

सहम कर छुप गयी है शाम की रौनक घरोंदों मे
चहकती क्यूँ नहीं बुलबुल ये कैसा डर परिंदों मे
कुहासा शाम ढलते ही शहर को घेर लेता है
समय से कुछ अगर पूछो तो नज़रें फेर लेता है
चिराग अपनी ही परछाई से डर कर चौंक जाता है
न जाने जहर से भीगी हवाएँ कौन लाता है

 

ये सन्नाटा अचानक भभक कर क्यूँ जल उठा ऐसे
ये किसकी सिसकियों ने आग भर दी है मशालों मे
सड़क पर चल रही ये तख्तियाँ किसकी कहानी हैं
पिघलती मोमबत्ती की शिखा किसकी निशानी है\

 

न जाने ज़ख्म कब तक किसी के चीखेंगे सीने मे
न जाने वक़्त कितना लगेगा बेखौफ जीने मे
न जाने इस भयानक ख्वाब से अब जाग कब होगी
न जाने रात कब बीते न जाने कब सुबह होगी

 

न जाने दर्द के तूफान को कैसे सहा होगा
न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा
बहुत शर्मिंदगी है आज ख़ुद को आदमी कह कर
ज़माना सर झुकाए खड़ा  ख़ुद की बेजुबानी पर

 

मगर जाते हुए भी इक कड़ी तुम जोड़ जाते हो
हजारों दिलों पर अपनी निशानी छोड़ जाते हो
अगर आँखों मे आँसू हैं तो दिल मे आग भी होगी
बहुत उम्मीद है करवट हुई तो जाग भी होगी

 

…..पद्म सिंह

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10 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. हिमांशु
    जनवरी 02, 2013 @ 09:28:48

    रचना की भावना से दो चार हो रहा हूँ-एक एक पंक्ति मेरा बयान लग रही है।

    “न जाने ज़ख्म कब तक किसी के चीखेंगे सीने मे
    न जाने वक़्त कितना लगेगा बेखौफ जीने मे
    न जाने इस भयानक ख्वाब से अब जाग कब होगी
    न जाने रात कब बीते न जाने कब सुबह होगी “

    इन वर्तमान शाश्वत प्रश्नों, आन्तर आकुलताओं से जूझते हुए बस यही आशा ही तो बचाये है भईया-

    “अगर आँखों मे आँसू हैं तो दिल मे आग भी होगी
    बहुत उम्मीद है करवट हुई तो जाग भी होगी ”

    प्रतिक्रिया

  2. Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार
    जनवरी 02, 2013 @ 09:41:41



    ♥(¯`’•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•’´¯)♥
    ♥नव वर्ष मंगलमय हो !♥
    ♥(_¸.•’´(_•*♥♥*•_)`’• .¸_)♥




    न जाने दर्द के तूफान को कैसे सहा होगा
    न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा
    बहुत शर्मिंदगी है आज ख़ुद को आदमी कह कर
    ज़माना सर झुकाए खड़ा ख़ुद की बेजुबानी पर

    आऽह ! बहुत मार्मिक !

    आदरणीय भाई पद्म सिंह जी
    पूरा हिंदुस्तान आहत है…

    … लेकिन सत्ता का हिस्सा बनकर हमारी छाती पर बैठे बलात्कारियों/अपराधियों का जब तक उन्मूलन नहीं हो जाता हमारी बहन-बेटियां असुरक्षित ही रहेंगी …
    आपकी लेखनी ऐसे ही सुंदर , सार्थक , श्रेष्ठ सृजन करती रहे …

    नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार
    ◄▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼►

    प्रतिक्रिया

  3. Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार
    जनवरी 02, 2013 @ 09:52:45



    अपने बहुमूल्य समय में से कुछ पल निकाल पाएं तो हमारी रचना पढ़-सुन कर प्रतिक्रिया देने पधारिएगा …

    हमें ही हल निकालना है अपनी मुश्किलात का
    जवाब के लिए किसी सवाल को तलाश लो

    लहू रहे न सर्द अब उबाल को तलाश लो
    दबी जो राख में हृदय की ज्वाल को तलाश लो


    प्रतिक्रिया

  4. इस्मत ज़ैदी ’शेफ़ा’
    जनवरी 02, 2013 @ 09:55:11

    भावुक कर गई ये कविता बस
    अगर आँखों मे आँसू हैं तो दिल मे आग भी होगी
    बहुत उम्मीद है करवट हुई तो जाग भी होगी
    अब यही उम्मीद है कि हम जाग जाएं शायद ,,हालाँकि ऐसा होने में बहुत समय लगेगा ,,१६ दिसंबर से आज तक कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रा जिस दिन अख़बार में ऐसी ख़बरें न हों ,,,जाने कितनी लड़कियाँ उसी पीड़ा से गुज़र रही हैं ,,,,ज़रूरत है मानसिकता में बदलाव की

    प्रतिक्रिया

  5. सलिल वर्मा
    जनवरी 02, 2013 @ 20:26:54

    ठाकुर साहब! एकदम खामोश कर देती है यह रचना और नं कर देती है आँखों को!! ऐसा लग रहा है जैसे उसका दर्द आपकी कविता से होता हुआ हमारे दिल को चीर रहा है!! आभार ठाकुर साहब!!

    प्रतिक्रिया

  6. DrArvind Mishra
    जनवरी 02, 2013 @ 20:53:59

    एक सशक्त रचना !

    प्रतिक्रिया

  7. Padm Singh पद्म सिंह
    जनवरी 03, 2013 @ 08:19:39

    सलिल भैया…. ऐसे हजारों दर्द ऐसे भी हैं जो कभी ज़ुबान तक नहीं आते… ऐसी हजारों बच्चियाँ हैं जिन्हें अपने घर परिवार से दूर नर्क भोगने के लिए उठा लिया जाता है और फिर जीवन मे कभी वापस नहीं आतीं…. ये लाइन इसी लिए उतरी ,,,,

    न जाने दर्द के तूफान को कैसे सहा होगा
    न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा
    बहुत शर्मिंदगी है आज ख़ुद को आदमी कह कर
    ज़माना सर झुकाए खड़ा ख़ुद की बेजुबानी पर

    कई बार लगता है क्या हम इसी लिए पूरी कायनात मे ऊपरवाले की सबसे अच्छी कृति माने जाते हैं… ??

    प्रतिक्रिया

  8. प्रवीण पाण्डेय
    जनवरी 03, 2013 @ 22:21:19

    गहरी पंक्तियाँ, न जाने ऊपर वाला क्या क्या सोचेगा?

    प्रतिक्रिया

  9. sakhi
    जनवरी 04, 2013 @ 00:30:09

    क्या होता है जब एक ;लड़की के जीवन में ऐसा कुछ घटता है ये पूरी तरह शायद ही कोई समझे..मगर फिर भी अहसास को जो समझे ..ऐसी लगी आपकी रचना ..सच में दर्द कि सच बयानी करती है ये रचना.

    प्रतिक्रिया

  10. आराध्या सिंह
    मई 25, 2013 @ 12:02:44

    न जाने दर्द के तूफान को कैसे सहा होगा
    न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा
    बहुत शर्मिंदगी है आज ख़ुद को आदमी कह कर
    ज़माना सर झुकाए खड़ा ख़ुद की बेजुबानी पर

    एक लडकी के दर्द को आपने बखूबी समझा है ….दामिनी जैसी हजारो लडकियाँ है जो हर दिन ये सब सह रही है …..लेकिन इंसाफ कहा है ?

    प्रतिक्रिया

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