गज़ल

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फिर से घनघोर घाटा छाई है अमराई मे
कहाँ हो आन मिलो शाम की तनहाई मे

विरह की आग पे छींटे न दे अरे बादल
कहीं धुआँ न उठे फिर कहीं रुसवाई मे

चाँद बेज़ार भटकता रहा सरे मंज़र
चाँदनी खोई बादलों की तमाशाई मे

रूठने और मनाने को बहुत हैं मौसम
आज तो चूड़ियाँ मचलने दो कलाई मे

पद्म खिलने लगे हैं झील मे कंवल ऐसे
जैसे केसर का रंग घुल गया मलाई मे

-…. पद्म सिंह- 04-07-2012

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8 thoughts on “गज़ल

    arvind mishra said:
    जुलाई 5, 2012 को 8:46 पूर्वाह्न

    वाह मनोरम अभिव्यक्ति

    प्रवीण पाण्डेय said:
    जुलाई 5, 2012 को 10:15 पूर्वाह्न

    आस बादल की थी, सुन्दर गजल बरस गयी..

    बी एस पाबला said:
    जुलाई 5, 2012 को 10:17 पूर्वाह्न
    विष्‍णु बैरागी said:
    जुलाई 5, 2012 को 3:06 अपराह्न

    यकीनन अच्‍छी गजल है फिर भी बेहतर की प्रतीक्षा सदैव बनी रहेगी।

    expression said:
    जुलाई 5, 2012 को 7:37 अपराह्न

    सुन्दर गज़ल….
    कोमल भाव………………
    अनु

    अनाम said:
    जुलाई 7, 2012 को 10:51 अपराह्न

    bahut sundar ahasaas..

    sanjay jha said:
    अगस्त 6, 2012 को 5:24 अपराह्न

    @ पद्म खिलने लगे हैं झील मे कंवल ऐसे
    जैसे केसर का रंग घुल गया मलाई मे

    M A S T

    SADAR

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