जनमानस स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार

 

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जनता सड़कों पर खड़ी मांग रही कानून
मनमानी सरकार की बना नहीं मजमून
भय है भ्रष्टाचार पर लग ना जाय नकेल
भ्रष्टाचारी       खेलते     उल्टे    सीधे   खेल
उल्टे   सीधे    खेल   काम जैसे भी बनता
नहीं बने कानून    भाड़ मे जाये जनता

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संसद की सर्वोच्चता सत्ता का यह खेल
कैसी   अंधाधुंध     है    कैसी    रेलमपेल
राजनीति की नसों  मे पसरा भ्रष्टाचार
जनमानस   स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार
लोकतन्त्र  लाचार ठनी नौटंकी हद की
फिर नंगी तस्वीर उभर आई संसद की

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जनता जब से जगी है ऐसी पड़ी नकेल
हुए उजागर बहुत से राजनीति के खेल
कहने को सब चाहते लोकपाल मजबूत
पर सपनों मे डराए  लोकपाल का भूत
लोकपाल का भूत  नहीं कुछ कहते बनता
अन्ना,बाबा, स्वामी पीछे सारी जनता

*******************

मंहगाई सर पे चढ़ी फिर उछला पेट्रोल 
सरकारी वादे सभी  बने ढ़ोल के पोल
भूखा मारे गरीब और सड़ता रहे अनाज
देश नोच कर खा रहे  सत्ताधारी बाज़
सत्ताधारी बाज़    कयामत    जैसे  आई
जीना दूभर हुआ चढ़ी सर पे मंहगाई

******************



 

 

 

 


10 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. संतोष त्रिवेदी
    जनवरी 01, 2012 @ 09:54:05

    नए साल में बजा दिया ,इक ठाकुर ने ढोल
    लोकपाल बन जायेगा ,पर खुल जायेगी पोल !!

    प्रतिक्रिया

  2. Padm Singh पद्म सिंह
    जनवरी 01, 2012 @ 09:58:32

    ब्लॉग जगत के धुरंधर फेसबुक्क के वीर
    नए साल पर धार दें तीखे तीखे तीर
    भ्रष्टाचारी व्यवस्था अनाचार की नीति
    सत्ता पर काबिज हुई तानाशाही रीति
    तानाशाही नीति लड़ाई ठानो डट के
    फेसबुक्क के वीर धुरंधर ब्लग जगत के

    प्रतिक्रिया

  3. ajaykumarjha
    जनवरी 01, 2012 @ 10:01:30

    धर धर के पटक पटक के धो डाला , पहिले दिन ही हो महाराज ।
    सब के सब कमाल धमाल । बढिया है जी

    प्रतिक्रिया

  4. कनिष्क कश्यप
    जनवरी 01, 2012 @ 12:05:26

    अकाट्य रही यह लेखनी सच्चाई सब बयान
    अजब -निराले राग से सब कह गए ससम्मान
    घूमते फिरते आये थे ..पर न जाए पाए चुप -चाप
    ऐसी बेबाकी देख कर मिट गए सब संताप

    प्रतिक्रिया

  5. प्रवीण पाण्डेय
    जनवरी 01, 2012 @ 12:27:13

    धुंध पड़ी है, हर पक्षों पर….

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  6. mv
    जनवरी 01, 2012 @ 21:42:21

    छंदों में बढि़या लपेटा है सबको।
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  7. sktyagi
    जनवरी 01, 2012 @ 22:05:56

    बहुत बढ़िया कार्टून है!.. कविता भी अच्छी हर और सरोकार भी!!

    प्रतिक्रिया

  8. Sumit Tomar
    जनवरी 02, 2012 @ 12:02:34

    लौट के बुद्धू घर पर आये…:)

    स्वागत है पद्म भाई…

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  9. सुमित प्रताप सिंह
    जनवरी 02, 2012 @ 19:11:16

    पद्म भाई छंद के फंद में फँसाकर भ्रष्टाचार को पटकनी देकर ही रहेंगे…

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  10. Manju Mishra
    अगस्त 07, 2012 @ 12:09:57

    संसद की सर्वोच्चता सत्ता का यह खेल
    कैसी अंधाधुंध है कैसी रेलमपेल
    राजनीति की नसों मे पसरा भ्रष्टाचार
    जनमानस स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार

    एकदम सही कहा आपने… लोकतंत्र लाचार ही तो हो गया है… चारो तरफ बस मनमानी ही मनमानी तो हो रही है… जन-हित तो सिर्फ भाषण और कागजों तक सीमित हो कर रह गया है…

    प्रतिक्रिया

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