जब अलबेला खत्री स्टेशन से उठाए गए … सांपला ब्लागर मीट 24-12-11 (भाग-1)

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पवन चन्दनजी,अविनाश वाचस्पति जी,सुमित प्रताप सिंह, संतोष त्रिवेदी और ललित शर्मा जी  सांपला जाने से पहले ही घबरा गए कि आखिर साँप कहाँ से लाएँगे । कनिष्क कश्यप के साथ केवल राम जी से आग्रह किया कि वो भी हमारे साथ ही चलें लेकिन ऐन मौके पर केवल राम जी  अलबेला जी को उठाने के मिशन से घबरा कर अकेले ही सांपला की ओर प्रस्थान कर गए… अब अलबेला जी को उठाने के लिए  चार के स्थान पर मै और इन्दु जी ही रह गए…जैसे तैसे गाजियाबाद से दिल्ली स्टेशन की ओर अपना रथ जाम से जूझते हुए बढ़ा.. तभी सूचना मिली कि अलबेला जी नदिरेस्टे . की जगह पुदिरेस्टे पर अवतरित हो रहे हैं तो हमने उधर को रुख किया और कनिष्क को पुदिरेस्टे पर ही फटाफट पहुँचने को बोला…

P241211_14.10लाल किले के पास गलत साइड की रोड पर घुसने के बावजूद पुलिस जी ने हमें अभयदान दे दिया और हम जैसे तैसे जाम की बाधा दौड़ पार करते पुदिरेस्टे पहुँच गए। अलबेला जी को फोन पर बोला कि वो जहां हों अपना हाथ ऊपर हिलाएँ ताकि हम उन्हें देख सकें… लेकिन कहीं नहीं दिखे तो खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो पता चला अलबेला जी कार के एकदम पास मे पीछे की तरफ खड़े हाथ हिला रहे थे… लो जी… अलबेला जी को तो हम दोनों ने ही उठा लिया था… अब कनिष्क कश्यप का इंतज़ार करना था… कनिष्क के  आते आते आधा घंटा और बीत गया… अब हमारे 12 यही बज चुके थे… लेकिन जैसे तैसे सांपला के लिए फिर दिल्ली की ट्रैफिक मे बाधा दौड़ करते हुए आगे बढ़े… रास्ता पूछने  का भार अलबेला जी ने अपने ऊपर ले लिए  था।

DSC01246गाड़ी धीरे धीरे जाम को नाकाम करते हुए नांगलोई के मेट्रो पिलर नंबर 420 के पास पहुँचने ही वाली थी कि एक साइकिल सवार अचानक कार के ऊपर साइकिल सहित सवार होने को तैयार हो गए… लेकिन अंततः साइकिल ही उनपर सवार हो गयी। बाद मे पता चला ये पिलर नंबर 420 राजीव तनेजा जी का ‘इलाका’ था और उसी का असर था। दिल्ली से बाहर निकलते निकलते राज भाटिया जी के कई फोन आ गए… लगभग सभी ब्लागर आ चुके थे… अलबेला जी सीधे सौ-चक्रिका से उतर कर चौ-चक्रिका पर सवार हुए थे, जाहिर है पेट के चूहे आंदोलन पर उतर आए  होंगे। तय हुआ कि कहीं एक एक कप कड़क चाय मारी जाय। अच्छी जगह खोजते खोजते कई किलोमीटर निकाDSC01244ल दिये तो एक जगह को जबरन अच्छी मानने को मजबूर होना पड़ा। फिर तो चाय के साथ साथ पड़ोस मे खड़े मशहूर अमृतसरी पराँठे(यद्यपि इस मशहूर पराठों को जानता कोई नहीं:) उड़ाने का दौर भी चला। अलबेला जी खाने से ज़्यादा नहाने की ज़िद पर अड़े हुए थे। कनिष्क कश्यप शक्ल से  ही नहाये हुए लग रहे थे। इन्दु बुआ बाथरूम से काँपते हुए निकली ज़रूर थीं इसका साक्षात गवाह मै। और मेरे बारे मे किसी को कोई शंका हो ही नहीं सकती थी। इस लिए सबसे ज़्यादा आहाने की चिंता अलबेला जी को हो रही थी। अंततः सर्वसम्मति से तय हुआ कि ब्लागर मीट मे कोई नहाने की चर्चा नहीं करेगा। अंततः सन्नाटी रोड पर सन्नाते हुए सांपला पहुँच चुके थे।

DSC01255सांपला आ चुका था । रेलवे रोड पर पंजाबी धर्मशाला तमाम दिग्गज और सहृदयी ब्लागरों से चहक रहा था। राज भाटिया जी, महफूज, मनीष जी और अन्तर सोहिल के स्नेहिल मिलन को देख कर ऐसा लगा जैसे कुम्भ के मेले मे बिछड़ा हुआ परिवार मिल गया हो। खुशदीप सहगल, वंदना गुप्ता, अजय झा और शाहनवाज़  सहित कई और ब्लागर बंधुओं से पहले भी मिल चुका था किन्तु अन्तर सोहिल और उनकी जोशीली सांपला सांस्कृतिक मंच के स्वयं सेवकों की टीम से मिलना और उनका स्नेह और समर्पण अद्भुद लगा।

फिर चला परिचय और संक्षिप्त विचारों का दौर… अन्तर सोहिल जी के अतिरिक्त मिलन मे आने वाले चिट्ठाकारों की सूची कुछ यूँ है,,, यद्यपि कुछ नाम यहाँ छूट रहे हैं – DSC01257

  सुश्री इंदुपुरी जी (उद्धवजी)

सुश्री अंजु चौधरी जी (अपनों का साथ)

सुश्री वन्दना जी (जख्म…जो फूलों ने दिये, एक प्रयास)

श्री राज भाटिया जी (पराया देश, छोटी छोटी बातें)

श्री खुशदीप सहगल जी (देशनामा, स्लॉग ओवर)

श्री महफूज अली जी (लेखनी…, Glimpse of Soul)

श्री यौगेन्द्र मौदगिल जी (हरियाणा एक्सप्रैस)

श्री अलबेला खत्री जी (हास्य व्यंग्य, भजन वन्दन, मुक्तक दोहे)

श्री संजय अनेजा जी (मो सम कौन कुटिल खल…?)

श्री वीरू भाई जी (कबीरा खडा बाजार में)

श्री राजीव तनेजा जी (हँसते रहो, जरा हट के-लाफ्टर के फटके)
श्री जाट देवता (संदीप पवाँर) जी (जाट देवता का सफर)

श्री संजय भास्कर जी (आदत…मुस्कुराने की)

श्री कौशल मिश्रा जी (जय बाबा बनारस)
श्री दीपक डुडेजा जी (दीपक बाबा की बक बक, मेरी नजर से…)
श्री आशुतोष तिवारी जी (आशुतोष की कलम से)

श्री मुकेश कुमार सिन्हा जी (मेरी कविताओं का संग्रह, जिन्दगी की राहें)

श्री केवलराम जी (चलते-चलते, धर्म और दर्शन)
श्री शाहनवाज जी (प्रेमरस, तिरछी नजर)

और मै पद्मसिंह  (पद्मावली)

मिलने मिलाने के दौर के बाद पता चला हमारे आने से पहले गन्ना चूसने और चर्चाओं और शाम तक के अवशेष (ब्लागर)चाय पानी के कई दौर पहले ही चल चुके थे… परिचय के बाद भोजन तैयार था… सुस्वादु भोजन करते करते स्नेहिल मिलन का दौर भी लगातार चलता रहा। भोजन के बाद काफी देर सब बातें करते रहे और फिर आया विदाई का समय। कई ब्लागर वापस जाने को तैयार थे जबकि रात मे कवि सम्मेलन और ठंडे मौसम मे गरमा गरम वार्ताओं का पूरा इंतज़ाम था, महफूज, कनिष्क, खुशदीप जी सहित तमाम ब्लागर वापस चले गए। जबकि कुछ हिम्मती ब्लागर ने सांपला मे रात बिताने को तैयार हो गए जबकि केवल राम और  राजीव तनेजा जी  को जबरन रोक लिया गया। और फिर रज़ाई मे बैठ कर असल ब्लागर मिलन शुरू हुआ जिसे मे अनौपचारिक और धुंवाधार वार्ताओं का दौर चला। और ये महफिल तब उठी जब अन्तर सोहिल ने कविसम्मेलन का समय होने की घोषणा की।

शेष अगले अंक मे ……..जनहित मे जारी 🙂

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