ओ मेरे चरण दास (जस्ट खुराफात)

मेरे चरण दास…!

            सुनो मेरी अरदासकम लिखे को ज्यादा समझना, खर्चा जो भेजा था आधा समझनाकई दिन से तुम् दिलो दिमाग में रह गए हो फंस के, मन में याद बन के ऐसे कसके, जैसे ऊँगली में घुसी फांसजैसे दमे की सांस, जैसे टी बी की खांसी पुरानी,…..

मेरे पश्चानुगामी  … अब तो जिंदगी लग रही है बेमानी …. तुमारी आस में महाजन से कितना कर्जा कर चुकी हूँ, काम धंधा छोड़ दिया है, कितना हर्जा कर चुकी हूँ अंटी में दाम…! रात को चैन दिन को आराम.. तुम्ही कहो कैसे पड़े चैनकैसे रहूँ खुश

मेरे कामी पुरुष!.…… काम में इतना मगन….? क्या झूठी थी मुझसे तुम्हारी लगन…. तुम्हें भी अकेलापन कैसे भाता होगा, क्या तुम्हें मेरे चेहरे की झाइयां और जुल्फों का घोसला याद आता होगातुम्हारी याद मुझे अंदर तक हिला देती है, मन कसैला, जैसे कच्ची ताड़ी पिला देती हैये देस ये समाज मेरे दिल को तार तार करता है,… रात बेचैन दिन अनमना रहता है रोम रोम में उठती है सुरसुरी …….

मेरे नयनों की किरकिरी...! तुझे तहेतिल्ली से याद करती है तुम्हारी सिरफिरी…. हर पल मेरे नयनों में ही करकते होएकएल पल सीने में कसकते होक्या तुम अपने सारे खेलखिलंदड भूल गए? या किसी सौतन की गलबहियां झूल गएजरा याद करो वो गिल्ली वो  डंडा, वो चकरी वो गोटकभी मैक्सी के पीछे, कभी पेटीकोट की ओट आओ सम्हालो अपना माल असबाबसगरा गाँव पढ़ने को दौड़ता हैजैसे मै हूँ कोई खुली किताब

मेरे सींकिया कबाब  ...कुछ  तो दे दो जवाब …  साज़ बिखरे पड़े हैं बजाए कौनबर्तन को साफ़ करे, घर को सजाये कौन….? और जानेमन मेरी पीठ का एग्जिमा….??? तुम्ही कहो खुजाए कौन? …. तुम बिन तन्हाई में जीती हूँखून के घूँट पीती हूँ …. क्या करूं……जब भी तुम्हारी याद आती हैतुम्हारे पुराने कच्छे की तुरपनकभी फाड़ती हूँकभी सीती हूँअब तो एक ही है मलाल, हाल तो बिगड़ ही चुका है, कब तक सम्हालूँ अपनी चाल…….

मेरे अकेशोज्योतिर्कापाल.….आजा और अपना कुनबा संभाल…. तुम्हारा बड़कू खनगिन काखसमखास‘ (यानी खासम खास) हो गया हैछुटकी  लटक गयी  … मझला पास हो गया हैऔर क्या बताऊँ जीवन खार हो गया हैगाय और सांड की लड़ाई मेंबछिया का बंटाधार हो गया हैकभी तो लगता है कि जान…..कि अब  तो जान गई ..

मेरे तिर्यकनेत्रद्वयी …. इतनी देर काहे भई ….…. कब तक करूँ तुम्हरे नाम का जापतुम्हारा दारू से आरक्त और मदमस्त चेहरा भूले नहीं भूलता हैऔर मन है कि तुम्हारी गालियों और फटकारों में ही झूलता है …. तुम्हारी  मर्दानगी जब याद आती है तो दिल उठता है काँप….. जो जूता, वो चप्पल, वो गालियाँ वो झापतुम्हारी चाहत में टूटी खटिया पर लेटती हूँ और आँख मूँद लेती हूँ …. तुम्हें याद करती हूँ और तुम्हारी गंजी का पसीना सूंघ लेती हूँ…. देख आज फिर हो गयी मेरी आँखें नम …..

मेरे चवन्नी कममेरा कुछ तो रखो भरमअरे इन पैसों का क्या करूँ……?? बत्ती बनाऊं……? . और तेल में डाल के दिया जलाऊंतुम बिन ज़िंदगी कटती नहींचहुं दिस छाई अंधियारी… जैसे कामन वेल्थ की तैयारी तुम्हीं कहो तुम्हारी अमानत का कैसे हिसाब दूँ?? और सुबह शाम नेपथ्य से उठती  सीटियों का क्या जवाब दूँ ? …. दिलो दिमाग में उठते हैं बलबले ,,,

मेरे जिगरजले मेरे बजरबट्टूइंटरनेट के चट्टू …..जाओ   जहाँ रहो आबाद रहो ,,, गाज़ियाबाद चाहे इलाहाबाद रहो  …..  चिट्ठी करती हूँ बंदजब याद आये तो एक पोस्ट मेरे नाम की सजा देनावरना ट्विटर या बज़ पर बजा देना  …बातें लिखते हो कितनी चीपथोड़ा सोच को करियो डीपवरना सबकी उलटी टीप खाओगे ….जहाँ तहां बजाये जाओगे …. कुछ भी हो  तेरा यश हरदम अपनी जुबां पर सजाऊँगी …. और यही गाऊँगी

मुन्नी बदनाम हुई  ………………………तेरे लिए

                                                                                ‘आपकी प्राण‘, प्यासी

 

अकेशोज्योतिर्कापाल=बिना केश और चमकते कपाल वाला

तिर्यकनेत्रद्वयी= तिरछी नज़र वाला …(भेंगा)

4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    अक्टूबर 21, 2011 @ 09:59:44

    हा हा हा हा, ए मस्ट खुराफात।

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  2. संजीव
    अक्टूबर 21, 2011 @ 18:26:19

    खुराफात बहुत खूब……. बहुत अच्छा व्यंग है, बहुत अच्छा ……………

    प्रतिक्रिया

  3. Rajan singh
    नवम्बर 21, 2011 @ 23:19:50

    हा हा हा …बढ़िया है !!

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  4. राहुल सिंह
    नवम्बर 28, 2011 @ 11:57:34

    एकदम अलग सा, मजेदार.

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