हम आम आदमी … (कविता)


P200811_17.52
हम आम आदमी हैं
किसी ‘खास’ का अनुगमन हमारी नियति है
हमारे बीच से ही बनता है कोई खास
हमारी मुट्ठियाँ देती हैं शक्ति
हमारे नारे देते हैं आवाज़
हमारे जुलूस देते हैं गति
हमारी तालियाँ देती हैं समर्थन ….
तकरीरों की भट्टियों मे
पकाए जाते हैं जज़्बात
हमारे सीने सहते हैं आघात
धीरे धीरे
बढ़ने लगती हैं मंचों की ऊँचाइयाँ
पसरने लगते हैं बैरिकेट्स
पनपने लगती हैं मरीचिकाएं
चरमराने लगती है आकांक्षाओं की मीनार
तभी अचानक होता है आभास
कि वो आम आदमी अब आम नहीं रहा
हो गया है खास
और फिर धीरे धीरे …..
उसे बुलंदियों का गुरूर होता गया
आम आदमी का वही चेहरा
आम आदमी से दूर होता गया
लोगों ने समझा नियति का खेल
हो लिए उदास …
कोई चारा भी नहीं था पास
लेकिन एक दिन
जब हद से बढ़ा संत्रास
(यही कोई ज़मीरी मौत के आस-पास )
फिर एक दिन अकुला कर
सिर झटक, अतीत को झुठला कर
फिर उठ खड़ा होता है कोई आम आदमी
भिंचती हैं मुट्ठियाँ
उछलते हैं नारे
निकलते हैं जुलूस ….
गढ़ी जाती हैं आकांक्षाओं की मीनारें
पकाए जाते हैं जज़्बात
तकरीर की भट्टियों पर
फिर एक भीड़ अनुगमन करती है
छिन्नमस्ता,……!
और एक बार फिर से
बैरीकेट्स फिर पसरते हैं
मंचों का कद बढ़ता है
वो आम आदमी का नुमाइंदा
इतना ऊपर चढ़ता है …
कि आम आदमी तिनका लगता है
अब आप ही कहिएये दोष किनका लगता है?
वो खास होते ही आम आदमी से दूर चला जाता है
और हर बार
आम आदमी ही छ्ला जाता है
चलिये कविता को यहाँ से नया मोड़ देता हूँ
एक इशारा आपके लिए छोड़ देता हूँ
गौर से देखें तो हमारे इर्द गिर्द भीड़ है
हर सीने मे कोई दर्द धड़कता है
हर आँख मे कोई सपना रोता है
हर कोई बच्चों के लिए भविष्य बोता है
मगर यह भीड़ है
बदहवास छितराई मानसिकता वाली
आम आदमी की भीड़
पर ये रात भी तो अमर नहीं है !!
एक दिन ….
आम आदमी किसी “खास” की याचना करना छोड़ देगा
समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई,
वक्त की मजबूत कलाई मरोड़ देगा
जिस दिन उसे भरोसा होगा
कि कोई चिंगारी आग भी हो सकती है
बहुत संभव है बुरे सपने से जाग भी हो सकती है
और मुझे तो लगता है
यही भीड़ एक दिन क्रान्ति बनेगी
और किस्मत के दाग धो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी

P210811_07.26

 

…… पद्म सिंह  09-09-2011(गाजियाबाद)

12 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. arvind mishra
    सितम्बर 09, 2011 @ 17:04:04

    समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई-अब यही दरकार है -आज से सब्स्क्राईव कर लिया है आप को!पढ़ते रहेगें डूब कर !

    प्रतिक्रिया

  2. arun chandra roy
    सितम्बर 09, 2011 @ 17:11:56

    बहुत बढ़िया कविता..

    प्रतिक्रिया

  3. upendradubey
    सितम्बर 09, 2011 @ 21:23:42

    बहुत सुन्दर ……

    प्रतिक्रिया

  4. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 09, 2011 @ 22:06:00

    आम आदमी का खास खेल था यह जो खास आदमी के आम खेलों पर भारी पड़ा।

    प्रतिक्रिया

  5. संतोष त्रिवेदी
    सितम्बर 10, 2011 @ 08:41:35

    “पर ये रात भी तो अमर नहीं है !!
    एक दिन ….
    आम आदमी किसी “खास” की याचना करना छोड़ देगा
    समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई,
    वक्त की मजबूत कलाई मरोड़ देगा
    जिस दिन उसे भरोसा होगा
    कि कोई चिंगारी आग भी हो सकती है”

    बहुत सही पहचान कियो है,पर हाकिम जब तक पहचानेंगे तब तक बहुत देर हो चुकी होगी !जनता चुप है तो प्रशांत महासागर की तरह उबल भी पड़ेगी !

    प्रतिक्रिया

  6. raghulaughter@yahoo.com
    सितम्बर 11, 2011 @ 05:10:44

    तभी… अचानक होता है आभास
    कि वो आम आदमी अब आम नहीं रहा
    पद्म जी बहुत उम्दा अभिव्यक्ति है … वाह जनाब वाह !!!

    प्रतिक्रिया

  7. Ratan Singh Shekhawat
    सितम्बर 12, 2011 @ 07:04:58

    शानदार रचना

    प्रतिक्रिया

  8. Pradeep Soni
    सितम्बर 23, 2011 @ 02:51:45

    “वो आम आदमी अब आम नहीं रहा

    हो गया है खास”
    पद्म सिंह जी नमस्ते !
    विडम्बना ये है की हर आम आदमी “ख़ास” होना चाहता है ….या फिर यु कहे की आम आदमी को अपने बीच एक ख़ास चाहिए…जिसे वो ही बनाता है….
    वर्ना आम को पूछता कौन है….खुद आम आदमी भी नहीं…
    प्रभावी रचना …

    प्रतिक्रिया

  9. राजेन्द्र स्वर्णकार : rajendraswarnkar
    सितम्बर 28, 2011 @ 12:30:26

    आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और
    शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    प्रतिक्रिया

  10. singh
    नवम्बर 24, 2011 @ 11:22:07

    bhut acha

    प्रतिक्रिया

  11. संजय भास्कर
    दिसम्बर 26, 2011 @ 12:19:57

    खूबसूरत। काव्य कौशल की झलक प्रभावशाली है

    प्रतिक्रिया

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