चलो नेट पे दिल लगाते हैं (पद्म सिंह)

Posted on

internetlove1
फिर एक बार मोहोब्बत में डूब जाते हैं
चलो फिर एक बार नेट पे दिल लगाते हैं
हम अचानक मिलेंगे आर्कुट की गलियों में
और फिर फेसबुक पे अंजुमन सजाते हैं
तुम एक प्यारी प्रोफाइल बना  लेना  
चाहे फोटो सेलेब्रिटी की ही लगा लेना
अपना स्टेटस, सिंगल मै जब दिखाऊंगा
तुम भी लाइक कर के ख्वाहिशें जगा देना
गूगली टाक पे गुफ्तगू चंद कर लेना
मै फेसबुक पे मिलूँगा पसंद कर लेना
अगर मिजाज़ न बहले तो आर्कुट आना
मेरी तस्वीर पिकासा में बंद कर लेना
न ऐतबार रहा अब तो दिले पागल पर
तुम्हीं छाए हो मेरे वर्चुअली बादल पर
प्यार ग्लोबल हुआ जाता है हमारा अब तो
मै तुझे बिंग पे खोजूँ तू मुझे गूगल पर
कभी जी करता है डोमेन तुम्हारा ले लूँ
तुम्हारी प्रोफाइल आज डॉट इन कर लूँ
मगर तुम्हारी होस्टिंग की सोचता हूँ मै
अभी स्पेस ज़रा कम है बड़ा तो कर लूँ
फिर से कुछ गौर करो मेरे दिले बेबस पर
ना सही फेस बुक तो आओ गूगल प्लस पर
चलो कहो कि मुझे ब्लॉग पर पढोगे तुम
और लाइक करोगे हरदम मुझको बज़ पर

मै एक ट्वीट पे दौड़ा न चला आऊँ तो
हाल कुछ भी हो, न स्माइली लगाऊं तो
मुझे कसम है मुझे ब्लाक कर दिया जाए
तुम्हारे ब्लॉग पे टिप्पणी न लिख पाऊँ तो

किसी अनजान को स्पैम बनाकर रखना
और इन हैकरों से दिल को बचाकर रखना
हरेक शाम सरे आम रहूँगा विजिबिल
और तुम खुद को सरे वर्ल्ड छुपा कर रखना

तुम अपने दिल का पासवर्ड न रीसेट करना
वर्चुअल प्रेम से स्पेस न खाली रखना
मिल के दोनों चलो नया जहाँ सजाते हैं
चलो फिर एक बार नेट पे दिल लगाते हैं
…….पद्म सिंह २६-०७-११

(निर्मल हास्य)

Advertisements

19 thoughts on “चलो नेट पे दिल लगाते हैं (पद्म सिंह)

    पा.ना. सुब्रमणियन said:
    जुलाई 27, 2011 को 1:07 अपराह्न

    सुन्दर हास्य. मजा आ गया.

    Ratan singh Shekhawat said:
    जुलाई 27, 2011 को 7:32 अपराह्न

    वाह ! शानदार रचना |

    प्रवीण पाण्डेय said:
    जुलाई 28, 2011 को 6:44 पूर्वाह्न

    आभासी प्यार का आभासी सुख।

    ललित शर्मा said:
    जुलाई 28, 2011 को 5:00 अपराह्न

    वाह वाह वाह,
    अब समझ में आया मामला, एक लड़का फ़ेसबुक पे लिख रहा था कि “क्या फ़ेसबुक पे प्यार हो सकता है?”
    दुसरे दिन अखबार में समाचार पढा, एक लड़की घर बार छोड़कर दिल्ली से इंदौर आ गई फ़ेसबुक प्रेमी के पास। उसके माँ-बाप ढूंढते फ़िर रहे थे। हा हा हा

    “यही तो प्यार है”

    Kavita Rawat said:
    जुलाई 29, 2011 को 7:22 अपराह्न

    तुम अपने दिल का पासवर्ड न रीसेट करना
    वर्चुअल प्रेम से स्पेस न खाली रखना
    मिल के दोनों चलो नया जहाँ सजाते हैं
    चलो फिर एक बार नेट पे दिल लगाते हैं

    .waah! bahut hi badiya prastuti lagi…
    yahi haal aajkal, jo kahin dil nahi laga paata wah net se laga baithta hai aur phir kya haal hota hai yah to sabhi jaan hi jaate hain….

    Vivek Rastogi said:
    जुलाई 31, 2011 को 11:40 पूर्वाह्न

    आज के युग की बेहतरीन कृति

    rajendraswarnkar said:
    अगस्त 24, 2011 को 8:29 अपराह्न

    आदरणीय पद्मसिंह जी
    सस्नेहाभिवादन !

    ग़ज़्ज़ब लिखा है –

    हरेक शाम सरे आम रहूँगा विजिबिल
    और तुम खुद को सरे वर्ल्ड छुपा कर रखना

    🙂
    आपकी पिछली कुछ पोस्ट्स में भी मज़ेदार कविताएं हैं …
    बहुत बहुत बधाई !

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई-शुभकामनाएं !

    – राजेन्द्र स्वर्णकार

    Sumit Pratap Singh said:
    अगस्त 27, 2011 को 10:41 पूर्वाह्न

    वाह वाह वाह वाह ! शानदार रचना |

    yashwant009 said:
    अगस्त 29, 2011 को 5:50 अपराह्न

    कल 30/08/2011 को आपके दिल की बात नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    anamika said:
    अगस्त 30, 2011 को 8:02 पूर्वाह्न

    वह…बहुत अच्छा लगा

    geeta said:
    अगस्त 30, 2011 को 9:22 पूर्वाह्न
    sangeeta swarup said:
    अगस्त 30, 2011 को 10:53 पूर्वाह्न

    बहुत बढ़िया …. क्या बात है

    राजीव तनेजा said:
    अगस्त 31, 2011 को 9:24 पूर्वाह्न

    आभासी दुनिया का असली दुनिया से ये अजीब सा घालमेल सच में…बड़ा मज़ा देता है…सुन्दर रचना

    अमिताभ त्रिपाठी said:
    अगस्त 31, 2011 को 10:54 पूर्वाह्न

    भाई पद्म सिंह जी मजा आ गया! बधाई! इस निर्मल हास्य के लिये 🙂

    Amrendra Nath Tripathi said:
    अगस्त 31, 2011 को 8:55 अपराह्न

    फिर एक बार मोहोब्बत में डूब जाते हैं
    चलो फिर एक बार नेट पे दिल लगाते हैं!

    — अरे भइया हियाँ जे भुगतिस होये वहिसे पूछौ..! 😦

    संजय @ मो सम कौन? said:
    सितम्बर 1, 2011 को 12:09 पूर्वाह्न

    आप बढ़िया इंसान निकले, लिख डाला ’चलो नेट पे दिल लगाते हैं’ और अमल कर रहे हैं ’चलो एक बार फ़िर से अजनबी बन जायें’ पर:)

    खूब सच्चाई लिखी है जी।

    arvind mishra said:
    सितम्बर 9, 2011 को 9:08 पूर्वाह्न

    बहुत खूब मौलिकता की महक की ऐसी ब्लागरी कविता तो पढी नहीं अब तक ..साधुवाद !

    rafat alam said:
    सितम्बर 9, 2011 को 4:15 अपराह्न

    बहुत खूब साहिब नेट को जरिया बना बिलकुल नये रूप में सच्चा व्यंग रचा है .आभार

    देवेन्द्र पाण्डेय said:
    सितम्बर 10, 2011 को 3:14 अपराह्न

    देर आया दुरूस्त आया… ब्लॉग जोरदार पाया।
    यह कविता तो दिल लूट के ले गई।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s