बंदर बनाम टोपीवाले …

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एक कहानी बचपन से सुनते आये हैं… एक टोपी वाला जंगल से गुज़र रहा था. दोपहरी चटख रही थी. दो घड़ी आराम करने की नीयत से वह एक पेड़ के नीचे अपनी टोपियों की टोकरी रखकर सो गया… थोड़ी देर में जब उसकी तन्द्रा टूटती है तो उसने देखा कि बंदरों के एक झुण्ड ने उसकी टोपियाँ उठा ली हैं और लेकर पेड़ पर चढ गए हैं. टोपी वाला पहले तो बहुत मिन्नतें की लेकिन बंदर तो बंदर… अनुनय विनय का तरीका काम न आने पर टोपीवाले ने सहज बुद्धि का इस्तेमाल किया और बंदरों की नकल करने की आदत का फायदा उठाया. उसने टोकरी में बची हुई एक टोपी को बंदरों को दिखाते हुए अपने सर पर पहन ली… जैसा की बंदरों की आदत होती है… टोपीवाले की नकल करते हुए बंदरों ने भी टोपी सर पर रख ली…जब टोपीवाला टोपी हाथ में ले लेता तो बंदर भी टोपी हाथ में ले लेते… अंत में टोपीवाले ने अपनी टोपी सर से उतार कर जोर से ज़मीन पर दे मारी… लेकिन ये क्या ? एक भी बंदर ने ऐसा नहीं किया ? बल्कि लगे खिलखिला कर हँसने…बल्कि बंदरों ने टोपी फिर से अपने सिर पर धारण कर ली… टोपी वाला अचंभित…उसने लाख दिमाग लगाया लेकिन माजरा कुछ समझ में नहीं आया…
हर टोपीवाला अपने इतिहास से सीखता है कि अपनी टोपी बचाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं…उनसे पहले के टोपीवालों ने अपनी टोपियाँ कैसे बचाई थीं?… और हमेशा उन्हीं तरीकों का प्रयोग भी करते रहे… लेकिन उधर बंदरों ने भी पीढ़ी दर पीढ़ी टोपी वालों का खेल देखा था… बंदरों ने टोपीवालों की चालाकियों को बखूबी समझ लिया था और अपने आने वाली पीढ़ियों को भी टोपी वालों की चालाकियों से सचेत कर दिया…. समय के साथ साथ साथ सभी ने अपनी गलतियों से सीख ली और समझ लिया था कि टोपी वाले कैसे उनकी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं… जबकि टोपी वाले पीढ़ी दर पीढ़ी बंदरों को एक ही तरीके से जीतने की कोशिश करते रहे …और कभी कल्पना नहीं की थी कि बंदर भी कभी अपनी पुरानी कमियों से सीख लेकर कहीं अधिक चालाक हो जायेंगे… यही कारण कि बंदरों ने अचानक नयी गुलाटी खाई और टोपी वालों को चारों खाने चित कर दिया…
यही नहीं कालान्तर में धीरे धीरे बंदरों ने अपनी नस्ल को और उन्नत करने के लिए एक संकर नस्ल की मादा को  अपने परिवार में लाये.. संकर नस्ल हमेशा चालाक होती है ये वैज्ञानिकों का कहना है.. फिर चालाक बंदरों ने मनुष्यों जैसे वेश धर लिए और मनुष्यों में जा मिले.. कईयों ने सफ़ेद खद्दर के कुर्ते बनवाए सर पर गाँधी टोपी पहनी और चुनाव लड़ते हुए इंसानी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए सत्ता में भी अपनी पैठ बना ली…अपने हिसाब से क़ानून बनाने लग गए.. अपने वंशजों को समाज के हर क्षेत्र में फैला दिए.. किसी को उद्योगपति, किसी को मठाधीश बनाए तो किसी को सरकारी मशीनरी में फिट कर दिया… मनुष्यों के वेश में मनुष्यों को लूटने के लिए सिंडिकेट बना लिए… मनुष्यों द्वारा दुरियाए जाने वाले बंदरों ने मनुष्यों पर ही राज करना शुरू कर दिया… अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुसार तरह तरह की गुलाटियाँ खाना और कलाबाजियाँ करना नहीं भूले…. बंदरों ने इस बार मनुष्यों की मान मर्यादा की प्रतीक टोपी को निशाना नहीं बनाया बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी धन दौलत पर हाथ साफ़ करने लगे और अरबों खरबों रूपये हड़प कर उड़न खटोलों पर जा चढ़े और विदेशों में छुपा आये..अपने पास रखने का जोखिम भी नहीं उठाया क्योंकि बंदर अपनी आदतों को जान चुके थे.. किसी तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते थे . इधर इंसान हलाकान परेशान होने लगे लेकिन हमेशा अपनी लालच का शिकार हो इन्हीं बंदरों को चुन कर सत्तासीन करते रहे… कुछ लोगों को इन बंदरों पर शक भी हुआ और कुछ की तन्द्रा भी टूटी… समस्या विकट थी… चारों तरफ धन दौलत के अम्बार लेकर उड़न खटोलों पर चढ़े हुए बंदर ही बंदर और अपना पेट पालने में हैरान हलाकान औंघाई हुई जनता… खलबली तब मची जब चंद जागे हुए लोगों द्वारा समस्या के हल खोजे जाने लगे…
इंसान सदा से हर समस्या का हल धर्म-गुरुओं, परम्पराओं और पुरातन-पोथियों में खोजता रहा है, “महाजनो येन गतः स पन्थाः” की तर्ज़ पर आँख मूँदे झुण्ड की शक्ल में चलता रहा है. इस बार भी इतिहास खंगाले गए… पोथियाँ पलटी गयीं… पर इन्हें इतिहास में फिर एक टोपीवाला ही मिला जिसका रास्ता ही सबसे प्रभावी लगा… मिल जुल कर कुछ लोग एक टोपी वाला खोज लाये… क्योंकि उनका अनुभव बताता था कि टोपी वाले ही उत्पाती बंदरों से निपटते आये हैं… साथ ही एक भगवा धारी बाबा ने अपनी तरफ से मोर्चा खोल दिया… अब बंदरों में खलबली मच गयी…. घबराए हुए बंदरों की अम्मा ने उन्हें समझाया बेटा ये इंसान हैं.. ये पीढ़ी दर पीढ़ी लकीर के फ़कीर होते हैं… इनकी हर अगली चाल को हम हिंदी सिनेमा के सीन की तरह आसानी से भांप सकते हैं… ये ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे … अनशन करेंगे… भूखे रहेंगे… सड़कों पर चिल्लायेंगे…भाषण बाज़ी करेंगे… सोशल साइट्स पर हमें कोसेंगे..गरियायेंगे … क्योंकि इनकी परंपरा यही कहती है… अहिंसा परमो धर्मः… पंचशील सिद्धांत…बस यही सब … तो इन मनुष्यों से घबराने की ज़रूरत नहीं है…
एक तरफ बाबा और एक तरफ टोपी वाला … दोनों तरफ से बंदरों पर दबाव बढ़ने लगा… यहाँ तक कि उन्हें मनुष्यों के वेश में रहना मुश्किल हो गया… और खीज में एक दिन बंदरों की मूल प्रवृत्ति उजागर हो ही गयी और खिसियाये हुए बंदर एक साथ इनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए भगवाधारी बाबा पर खौंखिया कर दौड़ पड़े… … बाबा इस अप्रत्याशित हमले से जैसे तैसे जान बचा कर निकले … उधर टोपी वालों ने अलग नाक में दम कर रखा था… रोज़ धरने की धमकी… अनशन की चेतावनी… बंदरों ने अपने कुछ चालाक और कुटिल प्रतिनिधियों को छाँट कर टोपी वालों से निपटने के लिए एक गोल बनाई और जैसे कभी इंसान ने बंदरों को लालच दिया था… आज बंदरों ने टोपीवालों को लालच दी… और टोपी वाले उनकी चाल में फंस गए…
जैसे कभी मनुष्यों ने उन्हें अपनी शर्तों और इशारों पर नचाया था… आज ये मण्डली टोपी वालों को नचाने लगी… रोज़ नई तरह की बातें… रोज़ नए तरह के पैंतरे… और लाख कोशिशों के बाद आज भी बन्दर टोपी वालों पर भारी हैं… टोपी वालों के पास पोथियों में और इतिहास के पन्नों में एक ही तरीका लिखा है इन लंगूरों से निपटने का…और कोई रास्ता अपनाते देख बंदर उन्हें बदनाम करने में लग जाते हैं.. इधर बंदर दिन ब दिन अपनी चालाकियों और गुलाटियों में परिवर्धन करते गए.. अपनी गलतियों से सीखते गए.. अपडेट होते गए… बंदरों ने लालकिले की प्राचीरों पर अपना मोर्चा लगा रखा है …चंद मनुष्यों ने पुराने जंग खाए तमंचे में तेल लगा कर तोपों से मोर्चा लेने की ठान रखी है… फिर से पुराने तरीकों पर अमल करने में लगी है .. बाकी जनता आज भी अपनी टोकरी पेड़ के नीचे रख कर सो रही है ….कई तो यह मानने को भी तैयार नहीं कि उनकी टोकरियों को खाली करने के साथ साथ बंदरों ने उनके तन से कपड़े भी उतार लिए हैं और गाँठ में रखी रोटी भी छीन ली है… उधर बंदर अपनी हर कमियों को सुधार कर मनुष्यों से निपटने के नए नए गुर सीखने में लगे हैं.
सो… टोपीवाले फिर से अनशन की तैयारियाँ कर रहे हैं… फिर से भूख हड़ताल की धमकियाँ दे रहे हैं… उधर सारे बंदर पेड़ छोड़ कर उड़न खटोलों की सवारी कर रहे हैं… और धीरे धीरे मनुष्यों के धन के साथ टोपी (धर्म) और रोटी के साथ कपड़ा और मकानों पर भी नज़र जमाये हुए हैं…. कुछ लोग बंदरों को पहचान कर भी कुछ करने में असमर्थ हैं… कुछ लोग कुछ पहचानने को तैयार नहीं हैं… और कुछ लोग तो उनकी नस्ल में शामिल होने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं….
फिलहाल ……..बंदरों और टोपी वालों में जंग जारी है…
———————padmsingh 9716973262  21-07-2011
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17 thoughts on “बंदर बनाम टोपीवाले …

    राजीव तनेजा said:
    जुलाई 21, 2011 को 12:47 अपराह्न

    बहुत…बहुत ही बढ़िया…धारदार एवं पैना व्यंग्य

    Ratan Singh Shekhawat said:
    जुलाई 21, 2011 को 1:52 अपराह्न

    धासूं व्यंग्य

    ललित शर्मा said:
    जुलाई 21, 2011 को 2:17 अपराह्न

    टोपी के माध्यम से अच्छी बखिया उधेड़ी है।
    कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना, उम्दा व्यंग्य।

    आभार

    प्रवीण पाण्डेय said:
    जुलाई 21, 2011 को 3:34 अपराह्न

    इतने सरल उदाहरणों से इतना सन्नाट व्यंग।

    अविनाश वाचस्‍पति said:
    जुलाई 21, 2011 को 4:41 अपराह्न

    जंग का यह रंग
    जंग तरंग करे
    करे कोई भरे कोई
    खाली कोई करे।

    Kavita Rawat said:
    जुलाई 21, 2011 को 5:36 अपराह्न

    Topi ke bahane bahut badiya tareeke se achhe-achhon kee topi utarne mein koi kasar baaki nahi chhodi aapne…saarthak prastuti ke liye aabhar!

    Shivam Misra said:
    जुलाई 21, 2011 को 5:39 अपराह्न

    यह जंग तो अभी लम्बी चलेगी … हम भी तैयार है …
    बेहद उम्दा व्यंग्य !

    अनाम said:
    जुलाई 21, 2011 को 5:46 अपराह्न

    बहुत ही बढ़िया व्यंग्य…..

    SANDHYA SHARMA said:
    जुलाई 21, 2011 को 5:48 अपराह्न

    बहुत ही बढ़िया व्यंग्य…..

    mahendra mishra said:
    जुलाई 21, 2011 को 7:55 अपराह्न

    बन्दर और टोपीवाला हा हा बेहद मजेदार …

    ankit ............the real scholar said:
    जुलाई 21, 2011 को 9:57 अपराह्न

    मुझे हंसी नहीं आयी थोड़ी सी चिंता हो रही है

    sciencedarshan said:
    जुलाई 21, 2011 को 10:26 अपराह्न

    हा बेहद मजेदार

    Praveen Trivedi said:
    जुलाई 29, 2011 को 3:11 अपराह्न

    उम्दा ,उम्दा व बेहद उम्दा व्यंग्य!

    मुकुल said:
    जुलाई 31, 2011 को 12:02 पूर्वाह्न

    आप का आलेख मज़ेदार होना तय होता है,,,आज़ तो कमाल हो गया
    वार्ता पे ले रहा हूं

    rafat alam said:
    सितम्बर 9, 2011 को 4:20 अपराह्न

    वाह वाह क्या नंगे किये है सभी हम्माम वाले, टोपी उतार दी है सभी कर्म के गंजों की .नकटो को कविता के दर्पण ने नाक दिखादी है .पढवाने के लिए आभार.

    raghulaughter@yahoo.com said:
    सितम्बर 11, 2011 को 5:13 पूर्वाह्न

    पद्म जी मजा आ गया आज तो …
    क्या व्यंग्य मारा है काबीलेतारीफ़ !!!

    mukesh sinha said:
    अगस्त 4, 2012 को 10:29 पूर्वाह्न

    :))…. uff …. nanga hi kar diya

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