तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा….

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कुछ समय पहले गूगल बज़ नया नया लाँच हुआ था. ब्लागरों की एक बड़ी जमात धीरे धीरे बज़ पर पहुँच गयी और देर रात दो दो तीन तीन बजे तक उधर ही अड्डेबाजी करने लगी. उसमे महामहिम समीरलाल जी, सर्वश्री ललित शर्मा जी, हिमांशु मोहन जी, शिव मिश्रा, शिवम जी, आनंद जी शर्मा, स्तुति पाण्डे, सुश्री अनुराधा जी (सॉरी आराधना चतुर्वेदी जी मुक्ति), राजीव नंदन द्विवेदी, प्रशांत प्रियदर्शी(PD), पंकज, डा- महेश सिन्हा,  अजय कुमार  झा, और इंदु पुरी जी जैसे दिग्गज देर रात तक बज़ फोड़ने में लगे रहते… धीरे धीरे जब बज़ का नशा कम हुआ तो सारे ब्लागर अपनी डेरा डंडी लेकर फेसबुक पर आ धमके हैं और यहाँ धमाल मचाने लगे हैं… पिछले दिनों अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने कुछ ऐसे मुद्दे दे दिए हैं कि उसी को लेकर सैकड़ों ग्रुप और धड़े तैयार हो गए हैं और खुले आम काँग्रेस और दिल्ली सरकार की फजीहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं… फेसबुक का नशा ऐसा कि कुछ भी करते रहो एक मिनट को ही सही  कम्प्युटर की तरफ खिंचना पक्का… अपडेट देखा कमेन्ट किया फिर काम में…कई बार तो ज़रूरी काम भी छूट जाते हैं…कई दिन से सोच रहा हूँ अब अति हो रही है … लेकिन क्या करें कंट्रोले नहीं होता है…
तो मेरा ब्लागर भाइयों से निवेदन है कि मेरे प्यारे ब्लागर भाइयो … फेसबुक की बीमारी छोडो और अपना रुख ब्लागिंग की तरफ मोड़ो… इसी क्रम में एक तुरंती भी अर्ज है –
दिन भर चिपक के बैठे वेवजह बिना तुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
 
दिन भर लिखे दीवार पे गन्दा किया करे
अलसाये पड़े काम न धंधा किया करे
अपनी अमोल आँखों को अंधा किया करे
प्रोफ़ाइलें निहारीं किसी की किसी का लुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
 
हर ग्रुप किसी विचार का धड़ा खड़ा करे
रगड़ा खड़ा करे कभी झगड़ा खड़ा करे
मुद्दा कोई हल्का कोई तगड़ा खड़ा करे
कुछ हल न मिला ज्ञान की मुर्गी हुई कुडु़क
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
 
किस बात को बिछाएं क्या बात तह करें
कितना विचार लाएं कितनी जिरह करें
किस बात को किस बात से कैसे जिबह करें
तब तक मगज निचोड़ा जब तक न गया चुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
 
स्क्रीन पे नज़रें गड़ाए जागते रहे
छोड़ी पढाई और ज्ञान बाँटते रहे
पुचकारते रहे किसी को डाँटते रहे
जब इम्तहान आया दिल बोल उठा ‘धुक’
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
 
लाइक करूँ कि टैग करूँ या शेयर करूँ
चैटिंग से किसी की भला कितनी केयर करूं
जब तक दिमाग की चली मै भागता रहा
अब दिल ये कह रहा है बहुत भाग लिया रुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
……पद्म सिंह

21 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Prashant (PD)
    जुलाई 01, 2011 @ 14:29:26

    प्रशान्त प्रियदर्शी(पांडे नहीं).. अगर मेरे ही बारे में लिखा गया है तो..🙂

    प्रतिक्रिया

  2. Diwakar Mani
    जुलाई 01, 2011 @ 15:25:35

    भाई पद्म जी, आपकी तुरंती मस्त, झकास, बिन्दास… बोले तो एकदम ढिंकचाक – ढिंकचाक है…. मजा आ गया पढ़ कर…

    प्रतिक्रिया

  3. kanishka kashyap
    जुलाई 01, 2011 @ 15:30:13

    बहुत सही समय पर, सधी हुए लेखनी .. मैं आपके हर शब्द से सहमती रखता हूँ.. यह फेसबुक से बाहर की .हमारी दुनिया ही सही थी. दिखावटी मित्र बनाते बनाते ..दो चार ,अच्छे मित्रों को भी गँवा दिया .. एक दोस्त के बेटी का जन्मदिन था.. तो उसे फेसबुक पर ही मनवा दिया .. !!!🙂

    प्रतिक्रिया

  4. अजय कुमार झा
    जुलाई 01, 2011 @ 15:35:45

    हा हा हा अर्ज पढ ली गई है , जल्दी ही संतुलन बनाने हेतु एक पंचवर्षीय योजना की शुरूआत की जाएगी ,

    प्रतिक्रिया

  5. archana
    जुलाई 01, 2011 @ 17:04:42

    लगता है बहुत समय बिताया है …
    अब जान गए है गिरेंबां में झुक ..
    बहुत ही अच्छा आंकलन किया है …
    बेवजह ,बेफ़ालतू की बातों में न कोई तुक…

    प्रतिक्रिया

  6. ललित शर्मा
    जुलाई 01, 2011 @ 17:10:38

    “जाग मछन्दर गोरख आया” सांची बात कही आर्य, ब्लॉगिंग की बढती हुई प्रसिद्धि को देखते हुए इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं कि ब्लॉगर उधर ही फ़ंस जाते हैं, जैसे विश्वामित्र मेनका के झांसे में आ गए, जैसे मछन्दरनाथ स्त्री राज्य में फ़ंस गए थे। तुमने जगा दिया। “जाग मछन्दर गोरख आया”।🙂

    प्रतिक्रिया

  7. बी एस पाबला
    जुलाई 01, 2011 @ 18:47:31

    तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा

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  8. Sumit Pratap Singh
    जुलाई 01, 2011 @ 20:00:40

    पद्म भाई आप भी फेस बुक के मारे निकले
    हम जैसे फेस बुकी मासूम, बेचारे निकले..

    प्रतिक्रिया

  9. अनाम
    जुलाई 01, 2011 @ 20:26:29

    Bhag bhag DK BOSE ……

    प्रतिक्रिया

  10. सतीश सक्सेना
    जुलाई 01, 2011 @ 20:33:04

    फेस बुक से खासे दुखी दिख रहे हो …अगर एक और लेख लिखा तो आपके पास उनका आफर आने के चांस हैं🙂
    मेरे तो कभी समझ नहीं आया !
    शुभकामनायें !

    प्रतिक्रिया

  11. प्राइमरी के मास्साब
    जुलाई 01, 2011 @ 21:03:53

    …..अब हम का कहें ??…..जैसी पंचों की राय हो !

    प्रतिक्रिया

  12. प्रवीण पाण्डेय
    जुलाई 01, 2011 @ 21:59:16

    नशे के कारण नहीं बैठे वहाँ।

    प्रतिक्रिया

  13. राहुल सिंह
    जुलाई 02, 2011 @ 06:52:43

    यह तो हमारे लिए अनजान मुहल्‍ला है, आपसे खबरें मिल गई, धन्‍यवाद.

    प्रतिक्रिया

  14. Ravi
    जुलाई 02, 2011 @ 12:47:09

    बहुत दिन हो गए, फ़ेसबुक पर गए हुए. बहुत से जाने अनजाने मित्रों का मित्र निवेदन पड़ा है… क्लीयर करता हूँ, और फ्रेंड सजेस्ट में कुछ को मित्र निवेदन भेजता हूं…🙂

    प्रतिक्रिया

  15. रवि कुमार
    जुलाई 03, 2011 @ 18:33:06

    🙂 …..

    प्रतिक्रिया

  16. raghulaughter@yahoo.com
    जुलाई 11, 2011 @ 06:37:05

    फेसबुक आज सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली साईट बनी हुई है. मुझे तो बहुत रास आती है क्योकि मेरे अपनो से रोज किसी ना किसी रुप मे या पन्नो मे या ग्रुप मे मुलाकात हो ही जाती है.

    प्रतिक्रिया

  17. raghulaughter@yahoo.com
    जुलाई 11, 2011 @ 06:48:30

    फेसबुक तू और तेरा हर रूप लगे हैं हमें महान
    कभी देता हमें खुशी, कभी कर देता हमें हैरान
    चित्रो, नोट्स व वीडियो का करते आदान प्रदान
    अपने ग्रुप व पेज से कराते एक दूजे को पहचान

    फेसबुक ‘टैग’ का तूने किया है इनमें सुंदर प्रयोग
    हमने भी जब चाहा, किया इसका खूब उपयोग
    बेझिझक कर देते हैं, हम सब में शामिल उनको
    जिन्हें समझा मित्र या समझा है अपना जिनको

    कुछ मित्र तो झाँकते भी नहीं चाहे कर लो कितने टैग
    कुछ मन से, कुछ बेमन से लगा जाते हैं पंसद का भोग
    कुछ मित्र ‘टैग’ से झुँझला कर देते हैं लिस्ट से हमें दफा
    सेटिंग वो बदल सकते नहीं लेकिन हम से हो जाये खफा

    सीमा है ‘टैग’ की वरना कितने हो जाते इससे परेशान
    फिर भी ‘’टैग’ करो बिंदास, कर जाते स्नेही मित्र ऐलान
    अपना जान कई मित्र कर जाये हमें खुश देकर प्रोत्साहन

    ”प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ”
    कुछ मन से प्रतिक्रिया देते,करते नहीं इसका वो कोई गुमान

    वैसे सच कहूँ, मेरे लिए ‘टैग’ तो एक बहाना है
    असल में बस कुछ पल आपसे यूँ रूबरू होना है
    कुछ अपनी कहनी है और कुछ आपकी भी सुननी है
    आज फिर टैग होंगे आप, ये कविता भी तो पढ़वानी है ।

    – – प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

    प्रतिक्रिया

  18. प्रवीन बिशनोई
    जुलाई 31, 2011 @ 20:07:37

    कि सी को कुछ मत कहोँ

    प्रतिक्रिया

  19. rafat alam
    सितम्बर 09, 2011 @ 16:34:58

    दुखती नस पर हाथ रखा है श्रीमान .लाइक,कमेन्ट के बैंक खुले हैं एक शब्द आधी पंक्ति लिख कर कमेंटों के शतक बना रहे हैं यार लोग ,बेरसूखों की शानदार रचनाएँ किसी के ध्यान में न आकर बेवा की जवानी सी अनाम हो रही हैं चेट और मेसेज के गोरखधंधो में सिमटा है फेस बुक का सारा कारोबार. कई बार यूँ भी लगता है जेसे किन्ही रचना कारों ने फेक- आईडीयां बना रखी है त्वरित वाहवाही लूटने के लिए.आपने अच्छी बखिया उधेडी है बहरुपि पोशाक की .आभार व शुक्रिया

    प्रतिक्रिया

  20. अनाम
    जुलाई 22, 2012 @ 00:35:11

    प्रतिक्रिया

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