मुद्दे मुद्दे बहस छिड़ी है…

revolution

मुद्दे मुद्दे बहस छिड़ी हर चौराहे पर अनशन है

जनता के अधिकारों की सत्ता से गहरी अनबन है

राजनीति व्यापार हो गई कुर्सी मिले विरासत में

तानाशाह हुई सरकारें लोकतंत्र है सांसत में

लाज लुट रही है थानों में अस्पताल में मौत बंटी

थका बुढापा पिसता बचपन दिशाहीन सा यौवन है

 

फिर विकास के नाम छिने खलिहान खेत गोपालों के

कीर्तिमान फिर नए बने भ्रष्टाचारों घोटालों के

बाज़ारों की साख लुटी अड्डे बन गए उगाही के

लगे चरमराने सरकारी दफ्तर नौकरशाही के

लोकतंत्र की नींव हिली सरकारों की मनमानी से

डंडों से मुंह बंद कर दिए दुखड़ा कहने वालों के

 

चोर दलालों के जमघट हैं संसद के गलियारों में

सेंध लगा बैठे हैं गुण्डे जनता के अधिकारों में

मंहगाई ने सूनी कर दी है रौनक त्यौहारों में

डर लगता है बच्चों को लेकर जाना बाज़ारों में

मिलीभगत है भीतरखाने सत्ता और दलालों में

जिससे अँधियारा डर जाए वो हो रहा उंजालों में

 

एक तरफ आतंकवाद की फ़ैल रही बीमारी है

एक तरफ मंहगाई है तो एक तरफ बेकारी है

जनता भय से काँपे नेताओं पर पहरेदारी है

ए सी में खर्राटे लेती ये सरकार हमारी है

घुटन घुल गयी है मौसम में और हवा कुछ भारी है

कुंठित है जनमानस सूनी आँखों में बेजारी है

जाने कैसी बेचैनी है एक नशा सा तारी है

जैसे किसी क्रान्ति से पहले सुलग रही चिंगारी है

 

जिनको बड़े भरोसे से सत्ता में भागीदारी दी

आज उन्हीं सत्तासीनों ने जनता से गद्दारी की

भरी विदेशों में पूँजी जनता के खून पसीने की

बने आत्म हंता किसान मर कर दी कीमत जीने की

लुटी लाज बहनों की माताओं के सर सिन्दूर छिना

अभयारण्य बन गयी दिल्ली खल कामी गद्दारों की

 

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बुद्ध तुम सारों का

आवाहन करती है भारत माता आपने प्यारों का

भगत सिंह अब्दुल हमीद नेता सुभाष के नारों का

तुम्हें वास्ता देती हैं आज़ादी के मतवालों का

भ्रष्टाचार मिटाने की कर ली हमने तैयारी है

ज़रा लगाओ जोर दोस्तों यही रात बस भारी है

 

जिस गुमान में भूली होगी सत्ता सुन ले ध्यान से

पार नहीं पाया रावण जैसा ग्यानी अभिमान से

कबतक हनन किया जाएगा जनता के अधिकारों का

समय आ गया है अब शायद सत्ता के बीमारों का

निकल गया है मौसम अनुनय विनय और मनुहारों का

घड़ा भर गया लगता है सत्ता के पापचारों का

जनता का सेवक कब तक जनता को आँख दिखायेगा

रात भले काली हो एक दिन नया सवेरा आएगा

जिस दिन जनता की आँधी हर हर हर करती आएगी

कोई भी सिंघासन होगा पत्तों सा उड़ जायेगा

कोई भी सिंघासन होगा पत्तों सा उड़ जायेगा

..…पद्म सिंह २१-०६-२०११

8 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. सुशील बाकलीवाल
    जून 27, 2011 @ 20:33:56

    बहुत ही बढिया वर्णन वर्तमान दशा का आपकी इस प्रभावशाली कविता में मौजूद दिख रहा है । आभार सहित…

    प्रतिक्रिया

  2. प्रवीण पाण्डेय
    जून 28, 2011 @ 08:08:22

    आशा और उत्साह का संचार करती अनुपम कृति, संग्रहणीय।

    प्रतिक्रिया

  3. Sumit Pratap Singh
    जून 28, 2011 @ 08:10:16

    कविता के माध्यम से सुन्दर व सशक्त अभिव्यक्ति…

    प्रतिक्रिया

  4. संजीव
    जून 28, 2011 @ 16:53:38

    वर्तमान स्थिति को देखते हुए बहुत अच्छी कविता लिखी है……….

    प्रतिक्रिया

  5. raghulaughter@yahoo.com
    जुलाई 11, 2011 @ 06:39:30

    हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बुद्ध तुम सारों का
    आवाहन करती है भारत माता आपने प्यारों का
    भगत सिंह अब्दुल हमीद नेता सुभाष के नारों का
    तुम्हें वास्ता देती हैं आज़ादी के मतवालों का
    भ्रष्टाचार मिटाने की कर ली हमने तैयारी है
    ज़रा लगाओ जोर दोस्तों यही रात बस भारी है

    बहुत खूब कहा है आपने पद्म जी वाह

    प्रतिक्रिया

  6. Grijesh kumar
    जुलाई 21, 2011 @ 23:00:02

    देश मे ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने- अपने स्तर से इस समाज को बदलना चाहते हैं| वास्तविक परिवर्तन चाहते हैं| जिनमे स्वार्थ नही दिखता| मकसद सवाल उठाना नही,मकसद कारणों की तलाश कर उसका हल निकालना होता है| गाहे-बगाहे ही सही लेकिन ऐसा चेहरा दिख ही जाता है| आज उसमे एक नाम और जुड़ गया-आपका| आपकी कविता तारीफ़ के काबिल नहीं आत्मसात करने की चीज है| एक-एक शब्द दिल मे गहरे उतरते चले गए| आभार

    प्रतिक्रिया

  7. अनाम
    अगस्त 08, 2011 @ 16:17:13

    anna ke mudde ko sarthak karti kavita he.

    प्रतिक्रिया

  8. rafat alam
    सितम्बर 09, 2011 @ 16:37:56

    रात भले काली हो एक दिन नया सवेरा आएगा ..वो सुबह कभी तो आयगी ..देखिये जाने कब .शुक्रिया

    प्रतिक्रिया

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