बगिया के फूलों ने माली से पूछा

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बगिया के फूलों ने

माली से पूछा यूँ

बोले क्यूँ हमको तुम

पहले तो पालो

सहलाते दुलराते हो

पानी देते हो

फिर खाद भी खिलाते हो

आखिर खिल कर हम

गुलनार जब हुए हों तो

तोड़ मुझे डाली से

कहाँ बेच आते हो

बोला माली सबके

दुनिया में आने के

अलग हैं उसूल और

लक्ष्य अलग होते हैं

कुछ अपनी किस्मत पर

रंज सदा करते हैं

जार जार रोते हैं

और कई ऐसे हैं

जो अपने जीवन को

परमारथ अर्पित कर

स्वयं को समर्पित कर

औरों के जीवन को

मह मह महकाते हैं

रंग से सजाते हैं

मै तो हूँ निमित्त मात्र

एक माध्यम हूँ मै

तुम्हारी वजह से

कुछ जिंदगी संवर जाएँ

खुशियों से भर जाएँ

इसी लिए चुन कर के

तुमको तुम्हारी ही

नियति से मिलाता हूँ

तुमको तुम्हारे ही

लक्ष्य से मिलाता हूँ ..

….पद्म सिंह

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7 thoughts on “बगिया के फूलों ने माली से पूछा

    राहुल सिंह said:
    जून 23, 2011 को 7:17 अपराह्न

    माखनलाल चतुर्वेदी जी की कविता पुष्‍प की अभिलाषा की पंक्तियां हैं-
    मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक ।

    प्रवीण पाण्डेय said:
    जून 23, 2011 को 10:20 अपराह्न

    पुष्प का यही सरल और कोमल भाव उसके आदान-प्रदान में भी अभिव्यक्त होता है।

    Shivam Misra said:
    जून 23, 2011 को 10:40 अपराह्न

    जय हो महाराज … बेहद उम्दा रचना !

    ललित शर्मा said:
    जून 24, 2011 को 8:33 पूर्वाह्न

    सांसारिकता पर सुंदर कविता

    आभार

    Sumit Pratap Singh said:
    जून 25, 2011 को 1:53 अपराह्न

    बहुत खूब…

    raghulaughter@yahoo.com said:
    जुलाई 11, 2011 को 6:43 पूर्वाह्न

    ये बगिया सदा महकती रहे …

    Mayank Mishra said:
    अगस्त 22, 2011 को 12:03 अपराह्न

    जीवन के सत्य का सुन्दर चित्रण। सरल-सहज शब्द गूढ़ रहस्यों से पर्दा हटा रहे हैं।

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