मै स्वयं सेवी

मनुष्य मात्र के लिए  परिवार पहली पाठशाला होती है… दूसरे स्तर पर आस पड़ोस का परिवेश और फिर शिक्षा… इस कारण बचपन से परिवार बच्चे के भावनात्मक, नैतिक और परस्पर सहानुभूतिक  विकास,  सामाजिक परिवेश व्यक्तित्व और व्यावहारिक  विकास में और शिक्षा बौद्धिक विकास में सहायक होता है… सामाजिक गतिविधियाँ  सह-अस्तित्व और सह-अनुभूतिक गुणों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. जिन बच्चों को अन्य बच्चों के साथ परस्पर खेलने, विचारों के आदान प्रदान करने और प्रतिस्पर्धा के अवसर नहीं मिल पाते वो बच्चे कहीं न कहीं एकाकी सोच के हो जाते हैं.. बड़े हो कर वाह्य दुनिया से सामंजस्य बिठाना उनके लिए कठिन होता है…. कई विकसित देशों में तो व्यक्तित्व विकास के लिए, विषम परिस्थितियों से पार पाने के लिए अलग से प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं… इस तरह के व्यक्तित्व विकास के लिए विभिन्न तरह के स्वयंसेवी संस्थान और प्रोग्राम कितने प्रभावी होते हैं यह मैंने बखूबी अनुभव किया है…

red_cross-crescentमुझे बचपन से ही टीम के साथ  काम करने का अवसर मिला… बचपन का प्रशिक्षण आज भी मेरे व्यक्तित्व और व्यवहार में घुला मिला हुआ है…. बचपन में मै बेहद उत्साहित जिज्ञासु और जुझारू बच्चा था और किसी भी सामूहिक और सामाजिस कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता था.. स्कूल के दौरान लगभग हर तरह के टीम और मिल जुल कर करने वाले कार्यों में मेरी उपस्थिति अनिवार्य होती थी… चाहे वह गीत संगीत हो अथवा डिबेट या फिर कोई स्वयं सेवी मुहिम…सात साल की उम्र से ही मुझे तमाम स्वयंसेवी आयोजनों और प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होने का अवसर मिला… शुरुआत स्कूल की रेडक्रोस टीम से हुई…

हमारे स्कूल की रेडक्रास की टीम पूरे उत्तर प्रदेश की टॉप टीमों में से एक हुआ imagesकरती थी, अंतर स्कूल, जनपद, और राज्य स्तर पर ढेरों मेडल, सर्टिफिकेट  और चल-वैजयंतियाँ(शील्ड) आदि जीता करते. टीम के हर सदस्य की अपनी डायरी हुआ करती थी जिसमें आम जीवन में किये गए सहायता कार्यों तथा जागरूकता से सम्बंधित कार्यों का लेखा जोखा लिखा करते… और हमारी इन्हीं डायरियों को देख कर निर्णायक मण्डल अचंभित हो जाया करते थे,.. हम जहाँ भी गए अपनी छाप छोड़ कर आये.. बहुत छोटी उम्र में जब मुझसे अपना सूटकेस और बिस्तर भी नहीं उठाया जाता था मैंने तमाम कैम्प किये….

imagesरेडक्रास के अतिरिक्त हमें सेंट जॉन एम्बुलेंस, मैकेंजी और फायर फाइटिंग आदि की प्रतियोगिताओं में अनेकों बार भाग लेने का अवसर मिले. बहुत कुछ बनावटी भी हुआ करता, बहुत कुछ  रटा रटाया भी होता,  लेकिन धीरे धीरे ये सब कुछ जैसे चरित्र  और व्यवहार में घुलता मिलता गया.

Scout_Oath

रेडक्रास के अतिरिक्त स्काउटिंग के ढेरों कैम्प किये… वहीँ सीखा कि रीफ नॉट (चपटी गाँठ) क्यों और कैसे लगाते हैं, किसी घायल को विपरीत परिस्थितियों से कैसे बचाते हैं, अपने मित्रों से बायाँ हाथ  मिलाते हैं क्योंकि बाईं तरफ दिल होता है, और अनुशासन और टीम में कैसे काम करते हैं… टेंट पिचिंग से ले कर कैम्प फायर तक,  फायर फाइटिंग से लेकर सहायता के तरीकों तक सब कुछ धीरे धीरे अनजाने ही आत्मसात होते रहे और  सह अस्तित्व की भावना, मुश्किलों से जूझने की शक्ति और अनुशासन जैसे  गुण आत्मसात होते रहे .

NCCहाई स्कूल से NCC ज्वाइन करने के साथ ही नए तरह के अनुभव और नए तरह की सीखें मिलीं, चैथम लाइन इलाहाबाद, और पंडिलन एयरफोर्स  की हवाई पट्टी पर कलफ़ लगी खाकी ड्रेसों और चमकते नाल लगे जूतों से जब परेड होती तो हवाई पट्टी से चिंगारियाँ और माथे पर पसीना मचल उठता… “परेड….. तीनों तीन में सलामी देगा …. सलामीईईईईई …दे" और एक साथ तड़ाक की आवाज़ के साथ सैकड़ों जूते हवाई पट्टी से टकराते और हमारे उत्साह और उमंग तिरंगे के सामान ही परवाज़ हो जाते … हमारे ट्रेनर हवलदार मानसिंह हुआ करते थे… उनकी प्रतिबद्धता और हमारे प्रति स्नेहवत व्यवहार आज भी याद आते हैं… उस दिन मुझे पूरी बटालियन के सामने फायरिंग में ग्रुपिंग के लिए और बेहतरीन परेड के लिए बाहर निकाल कर  तारीफ की थी तो लगता था जैसे बार्डर फतह किया हो …

NSS 1

विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय सेवा योजना में शामिल होने पर नए अनुभव और नए संकल्प मिले… देश, समाज और आस पड़ोस के प्रति जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का एहसास हुआ… सृजनात्मकता, सहयोग और सह अस्तित्व की भावना सीखा… साथ ही संगीत, थियेटर, के साथ साथ उत्तर मध्य सांस्कृतिक केन्द्र के अन्य सृजनात्मक कार्यों से संवेदन शीलता ग्रहण की…

समय के साथ साथ बड़े भी होना था और दुनिया के मजधार में भी कूदना था… सो कूदा… जहाँ जहाँ जो जो भी किया कुछ बहुत अच्छे लोग भी मिले लेकिन बचपन में जो संस्कार सीखे, आत्मसात किये थे, दुनिया उसके हिसाब से कहीं जटिल निकली… किसी पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेने, तुरंत सबको मित्रवत मान लेने और सहायता के लिए तत्पर रहने की आदत के चलते खूब धोखे भी खाए…  किन्तु इन गतिविधियों से व्यवहार और सोच में जो आमूल परिवर्तन हुए वो मेरे लिए कहीं अधिक संतोषप्रद हैं….

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब समाज की संरचना और चुनौतियाँ तेजी से जटिल होती जा रही हैं,  बहुत ज़रूरी है कि बच्चों को सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण दिए जाएँ…एकल परिवार, सीमित सामाजिक संपर्क, टीवी, इंटरनेट  और वीडियोगेम्स तक सीमित मनोरंजन बच्चों को कहीं न कहीं मानसिक रूप से कमज़ोर और एकाकी बनाते हैं… बड़े हो कर बच्चा जब बाहरी दुनिया की वास्तविक चुनौतियों से सामना होता है तो सामंजस्य बिठाना कठिन होता है… डिप्रेशन, असुरक्षा की भावना, और इनफीरियारिटी कोप्लेक्स जैसी तमाम मानसिक चुनौतियों का सामना करना होता है…

ज़रूरी है कि बच्चों को नियमित रूप से किन्हीं सार्थक कार्यों में मिलजुल कर कार्य करने के लिए प्रेरित करना चाहिए… अवसर देने चाहिए…   सह अस्तित्व की भावना और मिलजुल कर काम करने की आदत का विकास किया जान चाहिए… मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए … घर बाहर के सामाजिक परिवेश के बारे में अवगत कराना और आवश्यकतानुसार परिस्थितियों से स्वयं सामंजस्य बैठाने का अवसर देना चाहिए…   वरना आने वाले समय में पग पग पर दुनिया के झंझावातों से नयी पीढ़ी का उबर पाना मुश्किल होगा…

….पद्म सिंह

 

4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. jai kumar jha
    मई 30, 2011 @ 09:34:00

    सार्थक व सराहनीय प्रेरक पोस्ट…शानदार…

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  2. प्रवीण पाण्डेय
    मई 30, 2011 @ 15:45:54

    सुन्दर पोस्ट, सब सेवायें कुछ न कुछ सिखा जाती हैं।

    प्रतिक्रिया

  3. krjoshi
    मई 30, 2011 @ 17:34:25

    सार्थक व सराहनीय प्रेरक पोस्ट| धन्यवाद |

    प्रतिक्रिया

  4. राहुल सिंह
    मई 31, 2011 @ 06:07:07

    इन इकाईयों में सार्थक भागीदारी, वरना अधिकतर इसे एक कम्‍पलसरी पेपर की तरह भोगते और निपटाते हैं.

    प्रतिक्रिया

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