मुल्ला नसीरुद्दीन का कुर्ता

पिछले एक महीने से कोई पोस्ट नहीं लिख सका… या यूँ कहिये लिखने की मनःस्थिति नहीं बन रही थी… कार्यालय में (कमाऊ)कुर्सी के लिए ऐसा ताण्डव हुआ कि तीन महीने सारा काम धाम ठप रहा और दो “माया’वी” अधिकारियों ने अपनी औकात का खुल्ला प्रदर्शन किया…(गाली गलौज से जूतमपैजार तक) मामला किसी तरह हाईकोर्ट से सुलझा… मगर विभाग का कमसे कम कार्यालय के  तीन महीने के मुफ्त वेतन के बराबर  लगभग रु.51,00,000.00 का तो नुकसान हुआ ही…

इसी बीच दिल्ली में सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया … परिकल्पना सम्मान समारोह के बाद उठे विवाद ने ढेरों प्रश्न और संभवतः थोड़े उत्तर भी पैदा किये… सम्मान, पारितोषिक, ईनाम और थोड़ा और ठेठ हो जाएँ तो बख्शीश वगैरह किसी हद तक कभी लेनेवाले , कभी देने वाले अथवा दोनों के अहं और महत्वाकांक्षा को ही पोषित करते हैं… अकादमिक साहित्य में सम्मान, पुरस्कार, आदि के लिए किये जाने वाले जोड़ तोड़ हमेशा से जगजाहिर हैं… लेकिन चिंतनीय है कि धीरे धीरे हिन्दी ब्लागिंग में हिन्दी से पहले इस तरह के प्रश्न पुष्ट होने लगे हैं… 

DSC_0165सापेक्ष दर्शन के अनुसार किसी लाइन को छोटा करने के लिए उसके बगल एक बड़ी लाइन खींच देनी होती है… और सम्मान या पुरस्कार कहीं न कहीं ऐसी लाइनें खींचने का प्रयास है…किन्तु यहाँ सम्मान और पुरस्कार में मूलभूत अंतर को समझ लेना भी आवश्यक होगा… इन दोनों में अंतर यही है कि दोनों स्थिति में लाइनें आपस में बदल जाती हैं…सम्मान जहाँ  प्राप्त करने वाले के लिए गरिमामयी है वहीँ पुरस्कार, प्राप्त करने वाले का मूल्यांकन हो जाता है… इस विषय पर आगे फिर लिखेंगे फिलहाल एक प्रसिद्द कहानी लिखना प्रासंगिक लग रहा है–

ये यूँ तो जग प्रसिद्द कथा है और काल्पनिक भी…. परन्तु मुल्ला नसीरुद्दीन की कहानियाँ मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं…. महत्वाकांक्षा जिस तरह से किसी के सर चढ़ कर बोलती है उसे दिखाने में कहानी सक्षम है… महत्वाकांक्षा मनुष्य मात्र के लिए एक बड़ी प्राथमिकता रही है. 

मुल्ला नसीरुद्दीन की गरीबी और फाकामस्ती जग प्रसिद्द है… अपनी खुदी में मस्त रहने वाले मुल्ला नसीरुद्दीन के किसी मित्र ने मुल्ला को अपने साथ किसी धनाड्य मित्र के घर पार्टी में ले जाने की पेशकश की… मुल्ला ने यह कह कर जाने से मना कर दिया कि उसके पास तो सिवाय आधे पैर का घुटन्ना और एक चोगे के अलावा कुछ नहीं है… ऐसे उत्सव में बड़े बड़े लोग होंगे… अपना क्या है… लेकिन तुम्हारी इज्ज़त चली जायेगी.., तू मुझे मत ले चल… मेरे पास उस पार्टी लायक कपड़े नहीं हैं..

अमीर मित्र ने अपनी एक अच्छा सा कुर्ता मुल्ला को देते हुए बोला, तू इसे पहन ले…किसी को क्या पता चलेगा कि ये कुर्ता किसका है…और फिर मै भी किसी से नहीं कहूँगा  कि यह कुर्ता मेरा है… मुल्ला ने ना नुकुर करते पोशाक पहनी और चल दिया दावत खाने

मुल्ला का मित्र दावत में मुल्ला के साथ घुसा… मुख्य द्वार पर ही मेजबान मिल गया… उसने मुल्ला का परिचय करवाया…

“इनसे मिलिए….ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन…बस इन्होंने जो कुर्ता पहना है वो मेरा है…

मुल्ला नसीर को बहुत बुरा लगा… कोने में ले जाकर मित्र की क्लास ले ली… अबे,… ये बताने की क्या ज़रूरत थी कि कुर्ता तुम्हारा है… किसी को क्या पता चलता … मित्र को गलती का एहसास हुआ तो वादा किया कि अब ऐसा नहीं होगा…

दोनों आगे बढते हैं… कोई अन्य मित्र मिला होगा… मुल्ला नसीरुद्दीन का दुबारा परिचय करवाया गया …

“इनसे मिलिए …. ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन… बाकी रही इनके कुर्ते की बात… तो ये कुर्ता इन्हीं का है”

मुल्ला नसीरुद्दीन परेशान… बहुत समझाया…अमाँ…क्या गज़ब करते हो… लोग अपना कुर्ता ही पहनते हैं… ये बताने की ज़रू़रत क्या थी.. कि कुर्ता मेरा है…जब मैंने पहना है तो मेरा ही होगा…मेरे भाई… कुर्ते की बात ही क्यों करनी.. तुम तो ये समझो कुर्ते के बारे में बात ही नहीं करनी है…समझो तुम जानते ही नहीं इसके बारे में…

मित्र की समझ में आ गयी बात… आगे बढ़ा…फिर किसी मित्र से मिलते ही परिचय करवाने का दौर चला… लेकिन मित्र के दिमाग में कहीं न कहीं कुर्ता घूम रहा था… सो उसने मुल्ला का परिचय कुछ यूँ करवाया…

“इनसे मिलिए …. ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन…रही बात इनके कुर्ते के बारे में… तो मै इसके बारे में कुछ नहीं जानता कि ये किसका है…

मुल्ला झल्लाता हुआ फिर से मित्र को कोने में ले गया… अमाँ…तू भी गजब है यार!… तू कुर्ते की बात बीच में लाता ही क्यों है बीच में…तू समझ ले अच्छी तरह से… कुर्ते की बात ही नहीं करनी है… 

मित्र को फिर अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने खूब कसमें खाईं कि अब ध्यान रखेगा… ऐसा नहीं होगा…

दोनों आगे बढे…. दावत अपने शबाब पर थी… फिर से दोनों का सामना किसी से होता है… मुल्ला नसीरुद्दीन के मित्र ने मुल्ला का परिचय फिर से करवाया….

“इनसे मिलिए …. ये हैं मशहूर शख्शियत मुल्ला नसीरुद्दीन…बड़े प्रसिद्द व्यक्ति हैं नसीर… बाकी इनका कुर्ता !!!…. तो इसके बारे में मुझे कोई बात ही नहीं करनी है…

मुल्ला ने सर पीट लिया और जैसे तैसे दावत से बाहर निकला…

5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राहुल सिंह
    मई 28, 2011 @ 08:44:42

    कहानी को पृष्‍ठभूमि पर घटाने का प्रयास करता हूं.

    प्रतिक्रिया

  2. Lalit sharma
    मई 28, 2011 @ 09:37:31

    “Maya”Vi logon se Mayavi log hi nipat sakate hai.

    Mulla nasiruddin abhi tak pachhata rahe hain ki kurta mang kar kyon pahna.

    Apni aukat me rahte to hi thik tha.

    प्रतिक्रिया

  3. राजीव तनेजा
    मई 28, 2011 @ 10:43:47

    सही बात…

    प्रतिक्रिया

  4. शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    मई 28, 2011 @ 12:36:41

    आदरणीय सिंह साहब, शायद इसे ही इंसानी फ़ितरत कहते हैं… किसी के लिए कुछ किया भी जाए, तो उसका सबको पता चलना ही चाहिए…
    अपना एक शेर याद आ रहा है मुलाहिज़ा फ़रमाएं-
    तूफ़ां से तो बचा लिया लेकिन ये खौफ़ है
    अहसां जता के मार न दे नाखुदा मुझे

    प्रतिक्रिया

  5. प्रवीण पाण्डेय
    मई 28, 2011 @ 17:40:21

    हा हा हा हा, ऐसे कुर्ते से भूख भली।

    प्रतिक्रिया

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