गाँधी जी के मजबूर बंदर ….(पद्म सिंह)

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वे जाने कब से  आने जाने वालों को मौन सीख दे रहे हैं,  सीख दे रहे हैं कि… बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, और बुरा मत सुनो…. इसके लिए एक ने अपना मुँह बंद कर रखा है, दूसरे ने अपनी आँखें तो तीसरे ने अपने कान बंद कर रखे हैं… एक दिन सामने से सामने से गुजरते हुए अचानक उत्सुकता जागी तो इनसे पूछ बैठा,… गाँधी जी के बंदरों, गाँधी जी ने तुम्हें ऐसा ही सिखाया है,,,, कि बुरा मत बोलो इस लिए अपने मुँह बंद कर लो, बुरा मत देखो, इस लिए आँखे बंद कर लो, बुरा मत सुनो इस लिए कान बंद कर लो… ये तो हुई गाँधी जी की सीख की बात… अपने दिल की बात भी तो कहो कुछ?

तीनों बंदरों का चेहरा बेचारगी से भर गया…. वे बोले…. ये शिक्षाएँ आज के युग में प्रासंगिक तो हैं लेकिन शायद अपर्याप्त लगने लगी हैं… आज गाँधी जी के सिखाये रास्ते पर चलना असंभव है,,,, आँखें बंद करते हैं तो कान खुले रह जाते हैं…. सरे आम भ्रष्टाचार, बलात्कार, और अनैतिकता की हदें पार करती ख़बरें कानों में पड़ ही जाती हैं…कान बंद करते हैं तो आँखें खुली रहती हैं और इन्हीं आखों से समाज और दुनिया की तेज़ी से अधोमुखी प्रगति की तस्वीर दिखाई देती है… ऐसे में मुँह बंद रखना असहनीय होता जा रहा है…

हम तो गाँधी जी के बंदर हैं…. हमारी मजबूरी है कि हम अपना तरीका नहीं बदल सकते… लेकिन  अब तो बस यही लगता है….कि समय के साथ साथ लोगों को अपना नजरिया बदल लेना चाहिए….

आज की परिस्थितियां ऐसी नहीं रहीं कि अपने आँख कान मुँह बंद कर के रखे जाएँ… बल्कि आज आवश्यकता यही है… कि आँखें पूरी तरह से खुली रखा जाए और हर बुराई पर कड़ी नज़र रखी जाए…. छद्म वेश धारी पाखण्डी और नकली मुखौटे वाले चेहरों को पहचाना और बेनकाब किया जाए….

अपने कान पूरी तरह से खुले रखे जाएँ… जिससे समाज, देश और भविष्य के प्रति रची जा रही हर साजिश की आहट को सुना और महसूस किया जा सके…

और इन साजिशों और हर बुराइयों को पहचानते हुए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने मुँह को भी खुला रखा जाय… किसी बुराई अथवा अत्याचार  को देखते समझते हुए भी मुँह बंद रखना भी बुराई ही है…. इस हम गाँधी जी के बंदरों को जाने दें… हम भले अपने आकाओं से मजबूर हैं लेकिन आम जन को हम यही सीख देना चाहेंगे कि अपनी आँख कान खुले रखें और बुराइयों, अत्याचार और छद्मवेशी आस्तीन के साँपों के खिलाफ़ अपनी आवाज़ को बुलंद किया जाए…

गाँधी जी के  बंदर

मजबूर हैं गाँधी जी की सीखों से

तभी तो आखें,कान मुँह

बंद कर रखे हैं……

अनभिज्ञ हैं

मानवता की चीखों से

वो बंदर हैं

नासमझी का दामन थाम

मजबूरी के नाम पर

न कुछ देखते हैं

न सुनते हैं

या सबकुछ देख सुन कर भी

चुप रहते हैं

गाँधी जी के नाम पर

लोग कब तक

बंदर बने रहेंगे

बुराई न देखेंगे

बुराई न सुनेंगे

बुराई के लिए

मुँह बंद रखेंगे…..

और कुछ भी नहीं कहेंगे…

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16 thoughts on “गाँधी जी के मजबूर बंदर ….(पद्म सिंह)

    yogendra pal said:
    मार्च 30, 2011 को 8:00 पूर्वाह्न

    बहुत सही और सटीक लिखा है आपने

    राजीव तनेजा said:
    मार्च 30, 2011 को 8:24 पूर्वाह्न

    सटीक बात

    प्रवीण पाण्डेय said:
    मार्च 30, 2011 को 8:38 पूर्वाह्न

    गहरा कटाक्ष।

    राहुल सिंह said:
    मार्च 30, 2011 को 8:38 पूर्वाह्न

    मन के बंदर की उछल-कूद तो वही रहेगी.

    रघु said:
    मार्च 30, 2011 को 11:42 अपराह्न

    वाह पद्म जी वाह .
    बहुत सटीक बात कही है आपने …
    आज बहुत दिनों बाद आपका कुछ पढ़ने को मिला …
    बहुत अच्छा लगा आज तो !!!
    रघु

    sanjay kumar said:
    अप्रैल 1, 2011 को 11:07 पूर्वाह्न

    सटीक बात

    dhnyvaad

    jai kumar jha said:
    अप्रैल 1, 2011 को 12:11 अपराह्न

    बुरा नहीं देखने वाले, बुरा नहीं सुनने वाले तथा बुरा नहीं बोलने वाले यानि असंवेदनशील इंसान बन्दर के ही सामान हैं …इसलिए आज बुरा देखो,बुरा सुनो और बुरा बोलो बुरे लोगों के खिलाफ तथा महसूस करो की ऐसा अगर तुम्हारे साथ होगा तो तुमपर क्या बीतेगी….? तब जाकर बन्दर से इंसान बन्ने की दिशा मिलेगी….शानदार प्रेरक पोस्ट कहूँगा इसे मैं…

    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद said:
    अप्रैल 3, 2011 को 1:42 अपराह्न

    बहुत गंभीर बात कह गए आप.

    biswanath nayak said:
    अप्रैल 10, 2011 को 4:56 अपराह्न
    sanjay said:
    अप्रैल 12, 2011 को 3:49 अपराह्न

    इससे तो गांधी जी एक बंदर बता देते कि ’बुरा मत करो।’

    Saba said:
    अप्रैल 16, 2011 को 12:31 अपराह्न

    बहुत सटीक ..

    उदय सिंह टुन्डेले, इंदौर said:
    अप्रैल 22, 2011 को 7:07 अपराह्न

    पद्मसिंह जी,
    आपकी रचना बिल्कुल प्रासंगिक है. आजकल ये सभी बंदर भ्रष्ट समाज की डोर के इशारे पर बेशर्मी से नाच रहे हैं.

    रोशन चौधरी said:
    जुलाई 25, 2011 को 12:33 पूर्वाह्न

    एक ऐसी टिप्पणी जो सोचने पर मजबूर करती है और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आन्दोलन के लिए प्रेरित करती है । R….. Choudhary…

    सुनीता शानू said:
    अक्टूबर 2, 2011 को 9:59 पूर्वाह्न

    आपके उत्कृष्ट लेखन की चर्चा के साथ प्रस्तुत है आज कीनई पुरानी हलचल

    sangeeta swarup said:
    अक्टूबर 2, 2011 को 10:46 पूर्वाह्न

    तीखा कटाक्ष …

    संजय मिश्रा 'हबीब' said:
    अक्टूबर 2, 2011 को 4:52 अपराह्न

    सटीक बातें…
    सादर…

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