आदत पालने की आदत

मेरी बचपन से ही ये आदत है कि मै कोई आदत नहीं पालता… लेकिन आदतें हैं कि पीछा नहीं छोड़तीं…  

यूँ आदतों के भी अजीब किस्से हैं। पढ़ाई के लिए हम  इलाहाबाद मे किराये पर मकान(यहाँ अक्सर मकान को भी रूम कहने का प्रचलन है) ले कर रहते थे। शिक्षा विभाग यूपी बोर्ड वाले शर्मा जी हमारे सह-किरायेदार हुआ करते थे (संभव है अभी भी होंगे)… सुबह सुबह अपने दो सात आठ साल के दो बच्चों को ले कर हमारे आँगन मे आराम से उन्हें नहलाने और खुद भी  नहाने आते थे… ठंड हो या गर्मी के दिन, दोनों को नंगा कर के घंटों इतना रगड़ कर नहलाते, कि देखने वालों की खाल छिल जाती। साथ मे हजारों श्लोकों की स्मृति भी माँजी जाती थी। लगे हाथों अपने अङ्ग्रेज़ी ज्ञान के तड़के भी लगते चलते, सुबह सुबह की पढ़ाई करते हुए उनके वाचनामृत और उनके बच्चों की सिसकारियाँ  कान मे पड़ती रहतीं, फिर पढ़ाई भी क्या होती… उसके बाद शर्मा जी की नित्यक्रिया प्रारम्भ होती… कान पर जनेऊ लपेटे हमारे टॉइलेट का इस्तेमाल,   ब्रश और नहाना भी… ब्रश करते समय मध्यमा और अनामिका को जोड़ कर हलक के अंतिम छोर तक डालकर ऐसा माँजते कि उसकी आवाज़ से दो तीन मकान इधर उधर के लोगों के जिगर मुँह से बाहर आने को तैयार हो जाते। ये सब कुछ उनकी आदत मे शुमार था और जाड़ा, गर्मी, बरसात, अविरल अखंड चलता। 

बहुत सी आदतें ऐसी होती हैं जिन्हें लोग जानबूझ कर पालते हैं, गाँव मे कजरहा महतो  नाम के एक बुजुर्ग, उनकी आदत भी अजब गजब… उनको कोई "मौसिया" कह भर दे, फिर उसकी शामत समझिए… हरामजादो, बेईमानों, से लेकर माँ बहन तक का सफर एक सांस मे कर डालते, और लोग थे, कि उनकी गाली सुनने के आदी। गलियाँ सुनते और खी खी ठें ठें करते अपने रास्ते चलते … इसी बहाने हंसने का बहाना भी मिल जाता।

अजीब लगता है यह जानकार कि इंसान कहीं न कहीं किसी न किसी रूप मे किसी आदत का शिकार होता है। इन्हीं आदतों के कारण हम किसी के व्यवहार की पहचान भी करते हैं। कोई कैसे चलता है, कैसे खाता है, कैसे बात करता है और कैसे भाव भंगिमा अपनाता है हर बात अनजाने एक आदत का रूप ले लेती हैं। इनमे कुछ आदतें जानबूझ कर पाली जाती हैं तो कुछ व्यवहार का हिस्सा होती हैं।

bxp64633आफिस के एक सहकर्मी हैं, सिगरेट के इतने शौकीन कि दिन भर मे एक  दो और कभी तीन डिब्बे भी खतम कर देते हैं। उनका दावा है कि उन्हें सिगरेट की आदत थोड़े ही है… शौकिया पीते हैं। जब चाहेंगे छोड़ देंगे। और ऐसा कहते हुए पिछले नौ सालों से देख रहा हूँ।

इन्हीं आदतों मे आदतें बखान करने की आदतें भी शुमार होती हैं… मौका मिलते ही अपनी आदतें बखान करना शुरू… मै तो सीधा सादा आदमी… मुझे छक्का पंजा नहीं आता भाई …  भई मै तो सुबह चार बजे उठ जाता हूँ…जाड़ा हो या बरसात  भई मै तो बिना नहाये भोजन नहीं करता… भई बिना सुर्ती खाये ठीक से उतरती नहीं मेरी तो… आदि आदि …

आदतों का आलम ये कि बहुत कम लोग अपनी आदतों के प्रति सजग होते हैं। कुछ आदतें विरासत मे मिलती हैं, कुछ अनजाने आस पड़ोस के परिवेश से तो कुछ खुद ही पाली जाती हैं। लेकिन हर तरह की आदतें कभी धनात्मक तो कभी ऋणात्मक रूप से व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं।

ऐसे ही एक बेहद ज़िंदादिल परिचित को नशे के रूप मे एक प्रसिद्ध खांसी की दवा पीने का शौक था । लाख समझाया लेकिन दावा वही,….. कोई नशेड़ी थोड़े ही हूँ… चाहूँ तो आज छोड़ दूँ… और आज लगभग दो साल उन्हें दुनिया छोड़े हो चुके हैं।  

बात बात मे गाली बकने या अपशब्द बोलने की आदत लगभग हर जगह देखने को मिल जाती है… दिल्ली और आसपास NCR क्षेत्र मे बहन की गाली लोग तकिया कलाम की तरह इस्तेमाल करते हैं, कभी कभी तो लगता है दिन भर मे जितनी बार बहन को याद करते हैं… भगवान का नाम लिया होता तो तर जाते। लेकिन आदत तो आदत है। कई बार भूल जाते हैं कि कहाँ बैठे हैं और किससे बात कर रहे हैं।

ispc013051यद्यपि कुछ आदतें अच्छी कही जा सकती हैं, परन्तु आदतें कहीं न कहीं आत्मनियंत्रण को खोना भर है। जब हम किसी आदत के शिकार होते हैं तो स्वयं को ही मूर्ख बना रहे होते हैं। किसी आदत का गुलाम होना दुनिया के साथ सहज तादात्म्य को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि किसी विषय पर विस्तृत  दृष्टिकोण भी प्रभावित होता है। अच्छी और बुरी आदतें विचार का एक अलग मुद्दा हो सकती हैं लेकिन आदतों का गुलाम होना कहीं न कहीं व्यक्तित्व को एकांगी बनाता है। आत्मावलोकन आदतों से बचने/समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

अगर आदतें होश पूर्वक या कहें विवेक पूर्वक पाली जाएँ तो अच्छे परिणाम आने की ज़्यादा संभावनाएं हैं..

शुभकामनायें ….. पद्म सिंह

5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. naresh singh rathore
    फरवरी 18, 2011 @ 19:47:59

    आदत पालने से पहले उसके परिणाम पहले सोच लेना बेहतर है |

    प्रतिक्रिया

  2. sanjay
    फरवरी 18, 2011 @ 23:32:52

    अपनी तो ये आदत है कि कुछ नहीं कहते:)

    प्रतिक्रिया

  3. समीर लाल
    फरवरी 19, 2011 @ 08:29:34

    आत्मावलोकन आदतों से बचने/समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है- सही कहा..

    प्रतिक्रिया

  4. अन्तर सोहिल
    फरवरी 19, 2011 @ 13:22:31

    पता भी तो नहीं चलता कि हमने कौन-कौन सी आदत पाल ली है।

    प्रणाम

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  5. Rakesh Rohit
    फरवरी 20, 2011 @ 15:08:27

    आदत के बहाने मनुष्यों के व्यवहार का अच्छा सर्वेक्षण किया है आपने.

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