क्या कहें ?

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स्थान – हास्पिटल का जनरल वार्ड

चार महीने हो गए हैं अस्पताल मे …जिनमे दो महीने  से ICU मे कटे है…

आज मरीज जो जनरल वार्ड मे शिफ्ट कर दिया गया है। अनुमान के हिसाब से तीन चार लाख का खर्चा हो चुका है अभी तक। डाक्टर कुछ साफ साफ नहीं बताते…कहते हैं हम पूरी कोशिश कर रहे हैं…

उम्र करीब पचपन साल… तीन बेटियाँ और दो बेटे जिनको पढ़ाने लिखने और शादी ब्याह मे  बाल झक सफ़ेद हो चुके हैं…एक बेटे की शादी अभी पिछले साल बड़े धूम से की थी… आज बूढ़ी हो चुकी माँ, बहन, और कुछ और रिशतेदारों के साथ  बहू भी आई है… जींस टीशर्ट और माँग मे छोटा सा टीका लगाए… सब के चेहरे पर आश्वासन और सपाट भाव मिले जुले हैं…थोड़ी देर मरीज को सभी मेहमान बेचारगी भरी नज़रों से देखते और आश्वासन देते हैं… यह जानते हुए कि इसका कोई अर्थ नहीं … चार महीने अस्पताल मे सेवा करते परिवारजन बहुत गहरे हार चुके हैं… शायद मान चुके हैं जो होना हो जल्दी हो।

बड़ा बेटा  फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलता है… पढ़ाई खतम कर के बच्चों को अंग्रेज़ी स्पीकिंग का ट्यूशन पढ़ता है…   बेटा सुबह आया था ..दिन मे किसी कंपनी मे काम, ट्यूशन और शाम की इंगलिश स्पीकिंग क्लास लेता है इस लिए उसे समय कम मिलता है…  छोटा बेटा पंद्रह के आसपास है… हास्पिटल की गैलरी मे टहलता हुआ मोबाइल के इयरफोन से गाने सुन रहा है…गुजरते हुए हाल पूछा तो कंधे उचका कर मुंह बिचका दिया जैसे पता नहीं देख लो जाकर…  उसके लिए (या शायद परिवार के लिए)इतने दिनो अस्पताल के चक्कर काटते काटते सामान्य सी बात हो गयी है।

कल रिशतेदार औरतों  मे अलग हट कर बातें हो रही थीं….

… इनके बाद तो अभी बहुत जिम्मेदारियाँ बची रह जाएंगी। एक बेटी और एक बेटा शादी करने को बचे है। बड़ा बेटा भी अभी किसी अच्छी सर्विस मे नहीं है,,, कच्ची गृहस्थी है… इस बात पर कोई ज़्यादा व्यवहारिक महिला कहती हैं… खैर सरकारी सर्विस है… एक लड़का तो लग ही जाएगा इनकी जगह… कम से कम उसकी ज़िंदगी तो बन जाएगी। रही बात इलाज के खर्चे की… तो विभाग खर्चा दे ही देगा…

कहते हैं छोटा बेटा किसी लड़की के साथ दुष्कर्म करने के प्रयास मे जेल मे रह चुका है… इसी सदमे ने मरीज को तोड़ दिया है…. तभी से किसी ने मरीज को हँसते हुए नहीं देखा है…

आज बड़ा लड़का बड़े से अच्छे मोटे फ्रेम मे  बड़ी सी फोटो फ्रेम करवा कर ले आया है… वो वाली फोटो जिसमे कोट और टाई पहने कुर्सी पर बैठे हैं…बाल काले और मूँछें चमकदार हैं…  हारा  थका और बीमार चेहरा देखना कौन चाहता है …

उधर मरीज भी अपनी स्थिति से निराश हो चुका सा लगता है… किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता… सूनी आँखों से खिड़की के बाहर का आकाश देखते हुए अचानक किसी खयाल पर कराह उठता है… बेचैनी और हताशा और फोड़े जैसे दुखते शरीर  ने पूरी दुनिया से जैसे रुचि समाप्त कर दी है… शायद मरीज ने भी मान लिया है जो होना है जल्दी हो….

कैंसर अपने अंतिम दौर मे है… फोटो फ्रेम सूखी चन्दन की  माला का इंतज़ार कर रहा है !!

…… पद्म सिंह

(यह प्रसंग सत्य घटना पर आधारित है)

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