यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह

24wey5k

यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी

वक्त जालिम है सुन  बेरहम जिंदगी


इक शरारे में पैबस्त है आफताब

आज़माइश न कर बेशरम जिंदगी


ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी

गम  में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी


उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर

साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी


छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम

दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी


चल कहीं इश्क की चाँदमारी करें

कुछ तो होगा वफ़ा का वहम जिंदगी


सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली

कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी


रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी

बेवफा है मगर है   सनम  जिंदगी


धड़धड़ाती हुई रेल का इक सफर

मौत की मंजिलों पर खतम जिंदगी

अहले करम-एहसान करने वाला

शरारा-चिंगारी

आफताब-सूरज

पद्म सिंह – ०६/०१/२०११


22 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. ramadwivedi
    जनवरी 06, 2011 @ 09:14:16

    हर एक शेर लाजवाब है ….आपकी लेखनी को नमन करती हूँ ….साधुवाद …

    डा. रमा द्विवेदी

    प्रतिक्रिया

  2. राजीव तनेजा
    जनवरी 06, 2011 @ 10:19:25

    कविता…गज़ल और शेर औ शायरी की ज्यादा समझ नहीं है लेकिन फिर भी आपकी ये रचना प्रभावपूर्ण लगी…

    प्रतिक्रिया

  3. amrit'wani'
    जनवरी 06, 2011 @ 12:06:42

    wah padam ji
    बेरहम जिंदगी hai ye

    प्रतिक्रिया

  4. Shivam Misra
    जनवरी 06, 2011 @ 12:07:51

    क्या बात है जनाब … एक एक शेर सीधा दिल पर दस्तक देता है … बेहद उम्दा नज़्म !

    प्रतिक्रिया

  5. Sanjeev Pal
    जनवरी 06, 2011 @ 13:20:55

    Very Nice

    प्रतिक्रिया

  6. indu puri goswami
    जनवरी 06, 2011 @ 13:26:43

    दिल को छू गयी
    नाईस
    उम्दा नज़्म
    जबरदस्त
    बेहतरीन
    ला जवाब
    क्या बात
    वाह वाह
    लेखनी को सलाम
    कलम चूम लूँ
    आपकी फैन हो गयी
    मैं: ऐसा मत लिखना माँ !
    हा हा हा बाबु! ये सब लिखना पडेगा मुझे क्योंकि……ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी
    गम में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी’
    ‘छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम
    दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी’
    इन दो शे’रों पर मेरे सारे शब्द कुर्बान ! खुदी को बहुत पहले छोड़ आये ,पर खुद से दूर ना जा सके बाबु! और ये ख्वाहिश मन में रह गई.मन को भिगो दिया बाबु.काश वो एक पल आये जब खुद से दूर जा सकूं? दिल को छू गई ये एक पंक्ति बाबु! कुर्बान! कुर्बान !

    प्रतिक्रिया

  7. indu puri goswami
    जनवरी 06, 2011 @ 13:55:58

    देखो उपर अपने कमेन्ट में कितनी बार ‘बाबु’ लिख दिया मैंने .मन की स्थिति एक बच्चे-सी हो गई जो जब रोता है तब ‘माँ माँ ‘की पुकार ज्यादा करता है उसके आंसुओं से ज्यादा उसके ….चेहरे के शब्द बोलते हैं.अफ़सोस माँ! इस समय तुम मेरा चेहरा नही देख पा रही हो.माँ????
    तु रे.तु मेरे अगले जन्म का पापा तो है ही इस जन्म का बेटा,दोस्त और……माँ भी है बाबु!

    प्रतिक्रिया

  8. singhanita
    जनवरी 06, 2011 @ 16:15:05

    यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी
    वक्त जालिम है सुन बेरहम जिंदगी

    सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली
    कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी

    वैसे तो हर शेर कमाल का है पर ये दो शेर तो बेमिसाल लगे ……….

    प्रतिक्रिया

  9. प्रवीण पाण्डेय
    जनवरी 06, 2011 @ 19:10:20

    जीना जाया करते है आप यूँ ही,
    जीने की एक कसम है जिन्दगी।

    प्रतिक्रिया

  10. Shivam Misra
    जनवरी 07, 2011 @ 03:07:55


    बेहतरीन पोस्ट लेखन के लिए बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है – पधारें – बूझो तो जाने – ठंड बढ़ी या ग़रीबी – ब्लॉग 4 वार्ता – शिवम् मिश्रा

    प्रतिक्रिया

  11. संजय @ मो सम कौन?
    जनवरी 07, 2011 @ 05:43:05

    सभी शेर एक से एक शानदार। खासतौर पर
    “रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी
    बेवफा है मगर है सनम जिंदगी”
    बहुत पसंद आया।
    आभार।

    प्रतिक्रिया

  12. मुकुल
    जनवरी 07, 2011 @ 09:39:09

    अरे वाह
    क्या बात कह दी
    उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर
    साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी

    प्रतिक्रिया

  13. ललित शर्मा
    जनवरी 07, 2011 @ 13:11:01

    उम्दा गजल कही है,
    लय ताल सुंदर है।

    प्रतिक्रिया

  14. अविनाश वाचस्‍पति
    जनवरी 08, 2011 @ 07:22:49

    जिंदगी जिंदगी जिंदगी जिंदगी

    किए जा जिंदगी से वंदगी दोस्‍त।

    प्रतिक्रिया

  15. Sushil Bakliwal
    जनवरी 08, 2011 @ 11:52:38

    इस विधा की विशेष समझ तो नहीं है, किन्तु जीवन के सच के दर्शाती रचना अच्छी लगी ।
    सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली
    कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी

    प्रतिक्रिया

  16. डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
    जनवरी 08, 2011 @ 19:39:30

    इस मखमली गजल का तो जवाब नही पद्मसिंह जी!
    अब आपके ब्लॉग पर आता रहूँगा!

    प्रतिक्रिया

  17. Anjana (Gudia)
    जनवरी 11, 2011 @ 03:14:28

    ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी
    गम में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी

    उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर
    साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी

    bahot khoob!

    प्रतिक्रिया

  18. digamber
    जनवरी 22, 2011 @ 14:46:57

    सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली
    कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी

    बहुत खूब … जब वो जिंदगी बन जाएँ तो हर शै मखमली लगती है … लाजवाब ग़ज़ल है …

    प्रतिक्रिया

  19. Anil Kumar
    जनवरी 29, 2011 @ 18:28:25

    kyaa likhte hai. sir.. aap … me to padte wakt doobsa gaya tha…

    प्रतिक्रिया

  20. Swati
    अक्टूबर 07, 2012 @ 21:48:15

    बेहद उम्दा …बोहत खूबसूरत लिखा है आपने …!!

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: