यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह

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यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी

वक्त जालिम है सुन  बेरहम जिंदगी


इक शरारे में पैबस्त है आफताब

आज़माइश न कर बेशरम जिंदगी


ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी

गम  में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी


उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर

साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी


छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम

दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी


चल कहीं इश्क की चाँदमारी करें

कुछ तो होगा वफ़ा का वहम जिंदगी


सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली

कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी


रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी

बेवफा है मगर है   सनम  जिंदगी


धड़धड़ाती हुई रेल का इक सफर

मौत की मंजिलों पर खतम जिंदगी

अहले करम-एहसान करने वाला

शरारा-चिंगारी

आफताब-सूरज

पद्म सिंह – ०६/०१/२०११


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22 thoughts on “यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह

    ramadwivedi said:
    जनवरी 6, 2011 को 9:14 पूर्वाह्न

    हर एक शेर लाजवाब है ….आपकी लेखनी को नमन करती हूँ ….साधुवाद …

    डा. रमा द्विवेदी

    राजीव तनेजा said:
    जनवरी 6, 2011 को 10:19 पूर्वाह्न

    कविता…गज़ल और शेर औ शायरी की ज्यादा समझ नहीं है लेकिन फिर भी आपकी ये रचना प्रभावपूर्ण लगी…

    amrit'wani' said:
    जनवरी 6, 2011 को 12:06 अपराह्न

    wah padam ji
    बेरहम जिंदगी hai ye

    Shivam Misra said:
    जनवरी 6, 2011 को 12:07 अपराह्न

    क्या बात है जनाब … एक एक शेर सीधा दिल पर दस्तक देता है … बेहद उम्दा नज़्म !

    Sanjeev Pal said:
    जनवरी 6, 2011 को 1:20 अपराह्न
    indu puri goswami said:
    जनवरी 6, 2011 को 1:26 अपराह्न

    दिल को छू गयी
    नाईस
    उम्दा नज़्म
    जबरदस्त
    बेहतरीन
    ला जवाब
    क्या बात
    वाह वाह
    लेखनी को सलाम
    कलम चूम लूँ
    आपकी फैन हो गयी
    मैं: ऐसा मत लिखना माँ !
    हा हा हा बाबु! ये सब लिखना पडेगा मुझे क्योंकि……ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी
    गम में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी’
    ‘छोड़ आये खुदी को बहुत दूर हम
    दो घड़ी तो ठहर मोहतरम जिंदगी’
    इन दो शे’रों पर मेरे सारे शब्द कुर्बान ! खुदी को बहुत पहले छोड़ आये ,पर खुद से दूर ना जा सके बाबु! और ये ख्वाहिश मन में रह गई.मन को भिगो दिया बाबु.काश वो एक पल आये जब खुद से दूर जा सकूं? दिल को छू गई ये एक पंक्ति बाबु! कुर्बान! कुर्बान !

    indu puri goswami said:
    जनवरी 6, 2011 को 1:55 अपराह्न

    देखो उपर अपने कमेन्ट में कितनी बार ‘बाबु’ लिख दिया मैंने .मन की स्थिति एक बच्चे-सी हो गई जो जब रोता है तब ‘माँ माँ ‘की पुकार ज्यादा करता है उसके आंसुओं से ज्यादा उसके ….चेहरे के शब्द बोलते हैं.अफ़सोस माँ! इस समय तुम मेरा चेहरा नही देख पा रही हो.माँ????
    तु रे.तु मेरे अगले जन्म का पापा तो है ही इस जन्म का बेटा,दोस्त और……माँ भी है बाबु!

    singhanita said:
    जनवरी 6, 2011 को 4:15 अपराह्न

    यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी
    वक्त जालिम है सुन बेरहम जिंदगी

    सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली
    कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी

    वैसे तो हर शेर कमाल का है पर ये दो शेर तो बेमिसाल लगे ……….

    प्रवीण पाण्डेय said:
    जनवरी 6, 2011 को 7:10 अपराह्न

    जीना जाया करते है आप यूँ ही,
    जीने की एक कसम है जिन्दगी।

    Shivam Misra said:
    जनवरी 7, 2011 को 3:07 पूर्वाह्न


    बेहतरीन पोस्ट लेखन के लिए बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है – पधारें – बूझो तो जाने – ठंड बढ़ी या ग़रीबी – ब्लॉग 4 वार्ता – शिवम् मिश्रा

    संजय @ मो सम कौन? said:
    जनवरी 7, 2011 को 5:43 पूर्वाह्न

    सभी शेर एक से एक शानदार। खासतौर पर
    “रूठ कर और ज्यादा सलोनी लगी
    बेवफा है मगर है सनम जिंदगी”
    बहुत पसंद आया।
    आभार।

    मुकुल said:
    जनवरी 7, 2011 को 9:39 पूर्वाह्न

    अरे वाह
    क्या बात कह दी
    उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर
    साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी

    ललित शर्मा said:
    जनवरी 7, 2011 को 1:11 अपराह्न

    उम्दा गजल कही है,
    लय ताल सुंदर है।

    अविनाश वाचस्‍पति said:
    जनवरी 8, 2011 को 7:22 पूर्वाह्न

    जिंदगी जिंदगी जिंदगी जिंदगी

    किए जा जिंदगी से वंदगी दोस्‍त।

    Sushil Bakliwal said:
    जनवरी 8, 2011 को 11:52 पूर्वाह्न

    इस विधा की विशेष समझ तो नहीं है, किन्तु जीवन के सच के दर्शाती रचना अच्छी लगी ।
    सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली
    कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी

    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said:
    जनवरी 8, 2011 को 7:39 अपराह्न

    इस मखमली गजल का तो जवाब नही पद्मसिंह जी!
    अब आपके ब्लॉग पर आता रहूँगा!

    Anjana (Gudia) said:
    जनवरी 11, 2011 को 3:14 पूर्वाह्न

    ख्वाब, उम्मीद, रिश्तों की कारीगरी
    गम में लिपटी हुई खुशफहम जिंदगी

    उम्र भर का सफर मिल न पाई मगर
    साहिलों की तरह हमकदम जिंदगी

    bahot khoob!

    digamber said:
    जनवरी 22, 2011 को 2:46 अपराह्न

    सख्त सच सी कभी ख्वाब सी मखमली
    कुछ हकीकत लगी कुछ भरम जिंदगी

    बहुत खूब … जब वो जिंदगी बन जाएँ तो हर शै मखमली लगती है … लाजवाब ग़ज़ल है …

    Anil Kumar said:
    जनवरी 29, 2011 को 6:28 अपराह्न

    kyaa likhte hai. sir.. aap … me to padte wakt doobsa gaya tha…

    Swati said:
    अक्टूबर 7, 2012 को 9:48 अपराह्न

    बेहद उम्दा …बोहत खूबसूरत लिखा है आपने …!!

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