छत्तीसगढ़ भवन…ब्लॉग गोष्ठी … संवेदना के आयाम, जीपीएस मोहतरमा और सवा ढाई किलो के हाथ…

bloggerसूचना पहले से थी, अविनाश जी का जी-टाक भी दरवाज़ा खड्का गया …किन्तु इससे पहले ही नुक्कड़ पर ब्लॉगर मिलन की खबर पढ़ कर शाम की कड़कड़ाती ठण्ड में ब्लॉगर्स के गरमागरम विचारों और सुखद सानिध्य का लोभ संवरण नहीं कर सका… ऊपर से बहु प्रतीक्षित पाबला जी से मिलने की कामना ने छत्तीसगढ़ भवन पहुंचना सुनिश्चित कर दिया था…

मै और अविनाश जी दोनों अपनी अपनी कार से लगभग एक ही समय अपने अपने घर से चले थे किन्तु भला हो गूगल बाबा का जिसने थोड़ी बहुत त्रुटि के साथ छतीसगढ़ भवन की स्थिति स्पष्ट कर दी थी… इस लिए अकबर रोड, तीनमूर्ति और कौटिल्य मार्ग होते हुए पन्द्रह मिनट देर से  छतीसगढ़ भवन पहुँच गया…(इस बार पुनः अविनाश जी से पहले:)

अँधेरे में पाश इलाके में खड़ी छत्तीसगढ़भवन का भवन सन्नाटे में डूबा था… फोन मिलाते ही पाबला जी देवदूत जैसे प्रकट हुए …. पहली बार ही गले लग कर दोनों ऐसे मिले जैसे पता नहीं कब के सम्बन्धी हों…(आभासी दुनिया का कमाल..है न?)

P191210_20.13अंदर आते ही पाया कि कई ब्लॉगर पहले से सोफासीन रह कर देर से आने वाले (VIP’s?Smile)का इंतज़ार कर रहे थे… अशोक बजाज जी भी आ चुके थे… आने वाले हर ब्लॉगर मित्रों का उठ कर सहृदयता से स्वागत करने के उपरांत अशोक जी ने सबको एक केबिन नुमा केबिन में लेकर गए जहाँ उनके कुछ राजनैतिक मित्र भी साथ थे… जो संभवतः ब्लोगिंग से सरोकार न होने के कारण उठ कर चले गए… अब यहाँ एक दर्जन ब्लॉगर(खालिस वाले) ही बच गए थे…

P191210_18.45_[01]चर्चा की शुरुआत संक्षिप्त परिचय के बीच ब्लॉग एग्रीगेटर्स को लेकर हुई… मीडिया और ब्लॉगिंग में एक फर्क यह सामने आया कि जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया आज धीरे धीरे राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण कहीं न कहीं निष्पक्षता से दूर हो रही है वहीँ ब्लोगिंग में अभिव्यक्ति की बेलाग स्वतंत्रता अभी कायम है… जहाँ प्रिंट या अन्य मीडिया को  एक तरफ़ा अभिव्यक्ति कह सकते हैं वहीँ ब्लोगिंग में लेखक और पाठक दोनों समानांतर रूप से अपना पक्ष रख सकते हैं… इससे कहीं न कहीं ब्लोगर आत्मानुशासन, और ज़िम्मेदारी के प्रति भी सजग रहता है…शायद यही ब्लोगिंग की सबसे बड़ी शक्ति है.

इसी बीच चाय पेस्ट्री, पेट्टीज और बिस्किट के दौर ने चर्चा को और दिलचस्प बना दिया🙂

P191210_19.28_[02]चर्चा को नया आयाम देते हुए खुशदीप जी ने  ब्लोगिंग को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम होने की बात करते हुए बताया कि आज हिंदी ब्लोगिंग अंग्रेजी या अन्य भाषाओं की ब्लोगिंग से किस तरह अलग हो सकता है… विशेष रूप से पिछले दो वर्षों से हिंदी ब्लॉग काफी तेज़ी से बढ़े हैं और बहुत सी प्रतिभाएं भी सामने आई हैं… हिंदी ब्लोगिंग ने फिलहाल एक मुकाम प्राप्त कर लिया है और अब समय है इसे एक नया आयाम देने की, जहाँ हम अपने विचारों को आभासी दुनिया के बादलों से वास्तविकता के धरातल पर लाने और अपने विचारों का क्रियान्वयन कर सकते हैं!

खुशदीप जी ने इस बात पर बल दिया कि ब्लोगिंग के साथ साथ अपनी संवेदना के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है. आज आधुनिकता और बाज़ारवाद ने बुजुर्गों को किसी हद तक अलग थलग किया है. उन्होंने बताया कि वो रोज़ अपने पास के वृद्धाश्रम जा कर कुछ समय बिताते हैं.. इस से जहाँ उन्हें अनुभव के अमूल्य खजाने मिलते हैं वहीँ वहाँ के बुजुर्गों को अपने एकाकी जीवन में खुशियों के रंग परवान चढते हैं… इस विषय पर सुरेश यादव जी के रैन बसेरों और बुजुर्गों के प्रति अपने अनुभवों को सुनने से अनायास ही लगने लगा कि कोई इंसान अपने बुजुर्गों के प्रति कितना कठोर और हृदयहीन हो सकता है. इसी से सम्बंधित उनके द्वारा सुनाई गयी एक प्रेरणात्मक  कहानी ने सभी को बुजुर्गों के प्रति संवेदना से भर दिया.

P191210_19.29_[03]इधर गोष्ठी चल रही थी उधर पाबला जी पूरी गतिविधि को अपने चतुर कैमरे में समेटने में लगे थे… उनका कैमरा एक इशारे पर लगातार आठ फोटो खींच रहा था … इसी बीच चाय, पेस्ट्री, पेट्टीज़ के साथ मिठाइयों और अल्पाहार का भी दौर चला… थोड़ी देर में सहमति बनी कि हाल में बैठ कर इस विषय पर एक लाइव पोस्ट भी ठोंक दी जाय.. सो लग गए सब के सब अपने अपने हथियार से जूझने … खुशदीप जी जहाँ रिपोर्टिंग में लगे वहीँ मै और अविनाश जी कैमरे से फोटो फोन में और फोन से लैपटॉप में लाने से लेकर उसे कम्प्रेस कर पोस्ट तक पहुँचाने में अपने दिमागी घोड़े खोले हुए थे…

इधर नुक्कड़ पर पोस्ट पब्लिश हो रही थी उधर भाई ललित शर्मा ने फोन पर सब को बधाई देते हुए सब का हाल पूछ रहे थे… अशोक बजाज जी भी ब्लॉगर्स से मिल कर अभिभूत से दिखे… उनकी खुशी देखते बनती थी… संजू तनेजा, राजीव कुमार तनेजा, सुरेश कुमार यादव, मैने , शाहनवाज़ सिद्दीकी, अविनाश वाचस्पति, कनिष्क कश्यप, अशोक बजाज, खुशदीप सहगल, बीएस पाबला, कुमार राधारमण और जयराम विप्लव जी आदि ने इस ब्लॉग गोष्ठी की सुखद अनुभवों को समेटे हुए विदा लिया …

रात ने दस्तक दे दी थी… बाहर ठण्ड सीने से लगने को तैयार खड़ी थी… बाहर आ कर तय हुआ कि पाबला जी, शाहनवाज़, जयराम, राधारमण (सर्व जी)मेरे साथ ही चले .. पाबला जी ने अपनी तकनीकी ज्ञान का ज़बरदस्त अनुभव कराया अपने फोन के जीपीएस तकनीक का प्रयोग कर के….. मै कार ड्राइव कर रहा था पाबला जी के मोबाइल की मशीनी मोहतरमा डैशबोर्ड पर आराम से लेटी हुई रास्ता बता रही थी,.. कमेंट्री के जैसे…शुद्ध और परिष्कृत हिंदी में… पाँच सौ मीटर जा कर दो रास्ते छोड़ कर बाएं मुड़ें, अब दाहिने मुड़ें… और हम सब लोग चमत्कृत थे कि उसे मेरी कार की स्पीड तक ठीक ठीक पता थी… गीता कालोनी की तरफ मुड़ते ही हमने थोड़ा रास्ता बदला… वो फिर बोली “मार्ग  की पुनर्गणना की जा रही है” उसने जब भी हिसाब लगा कर मुड़ने के संकेत दिए हम सीधे चलते रहे… कोई और होता तो शायद झल्ला कर कहता … आखिर ठहरे निरे ब्लॉगर हीSmile लेकिन जीपीएस मोहतरमा पुनर्गणना करती रहीं… अंत में तीक्ष्ण मोड़ मुड़ने के संकेत पर हमें पता चला कि हम अंतिम मोड़ भी छोड़ आये थे … और तीक्ष्ण मोड़ मुडना पड़ा … आखिर मोहतरमा ने अजय झा के घर तक पहुंचा कर ही दम लिया… अजय झा अपने शयन लिबास में घर से बाहर मिले और थोड़ी देर बाते कर हम पाबला जी के “सवा ढाई किलो के हाथ” से हाथ मिला कर अपने अपने  घर की ओर कूच कर गए.

17 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. अजित वडनेरकर
    दिसम्बर 21, 2010 @ 23:41:53

    जबर्दस्त रिपोर्ट।
    पाबला जी के जीपीएस का वर्णन दिलचस्प लगा।
    पाब्लाजी जिंदाबाद।
    आप भी जिंदाबाद

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  2. ललित शर्मा
    दिसम्बर 21, 2010 @ 23:56:47

    सभी से फ़ोन पर मुलाकात कर अच्छा लगा।आपने काफ़ी विस्तार से जानकारी है।
    पाबला जी का फ़ोन तो कमाल का है। सवा ढाई किलो के हाथ से वह भी डरता है। इसलिए सही चलता है।
    आभार

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  3. indu puri goswami
    दिसम्बर 22, 2010 @ 00:09:58

    तो उस दिन तुम ओन लाइन इसी लिए नही थे.सब ब्लोगर्स मिल कर ‘मीट’ कर रहे थे.
    वो सब तो ठीक है बाबु! किन्तु पाबला वीरजी का हाथ ‘सवा ढाई किलो का हाथ’ है ये कैसे मालूम पड़ा? किसी को जड़ दी थी क्या एक दो उन्होंने?
    हा हा हा
    मजा आ गया पढ़ कर. जी पी एस …..विज्ञान का करामात है जी .अब तो चाह कर भी कोई रास्ता ना भटक सके जो ये साथ हो.

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  4. अविनाश वाचस्‍पति
    दिसम्बर 22, 2010 @ 00:40:33

    पद्म जी यह दमदार तकनीक का फोन अब मुझे भी लेना है, चाहे कार के ही काम आये, मैं खूब टहलाता रहता हूं उसे। या मुझे सड़कों पर बहलाती रहती है। हिंदी जानती हैं फिर तो मेरी कार की हिन्‍दी भाषा खूब अच्‍छी तरह समझेगी।
    जल्‍दी मिलते हैं जीपीआरएस के साथ। एक मोबाइल तुरंत पाबला जी से पूछ कर। सजेस्‍ट कीजिए।
    रिपोर्टिंग घणी जानदार है, मतलब दमदार ….

    <a href="अविनाश वाचस्‍पति के स्‍वर में गोरी तेरा गांव बड़ा प्‍यारा सुनिए और सिर मत धुनिए

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  5. Dipak 'Mashal'
    दिसम्बर 22, 2010 @ 01:57:54

    perfect reporting ji…

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  6. अजय कुमार झा
    दिसम्बर 22, 2010 @ 09:28:22

    हा हा हा अजय झा अपने शयन लिबास में मिले ..पद्म भाई मैं कार्यालय से वापस आने के बाद ऐसे ही लिबास में आवास के आसपास पाया जाता हूं …आप लोगों से भी वो क्षणिक मुलाकात सुखद लगी …और रिपोर्ट तो झक्कास लगी । बस अब तैयार रहिए नए वर्ष में बहुत सी जिम्मेदारियां आप लोगों मिलने वाली हैं ..हां भाई हमारे साथ ही उठाना पडेगा ..। शुभकामनाएं

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    • padmsingh
      दिसम्बर 22, 2010 @ 10:30:50

      अजय भाई .. आपके घर के सामने वाली सरदार जी की चिकन शॉप का ज़िक्र करना भूल गया… करता भी कैसे… अभी तो उसकी सूरत ही देखी थी … सीरत तो उधर जा कर ही पता चलेगी🙂

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  7. प्रवीण पाण्डेय
    दिसम्बर 22, 2010 @ 09:41:12

    कोई इतनी प्यारी हिन्दी में रास्ता बताये तो कैसे कोई भूल सकता है। आजकल तो हिन्दी में रास्ता बताने वालों की कमी हो गयी है।

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  8. Shah Nawaz
    दिसम्बर 22, 2010 @ 10:23:53

    ज़बरदस्त रिपोर्टिंग पदम् भाई… आपने तो आँखों देखा हाल बता डाला… सभी लोगो से मिलकर और गंभीर मुद्दों पर विचार करके बहुत आनंद आया… जय जय ब्लोगिंग!!!

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  9. aradhana
    दिसम्बर 22, 2010 @ 10:45:35

    बढ़िया रिपोर्टिंग. खासकर जी.पी.एस. मोहतरमा का वर्णन और अजय जी का शयन लिबास 🙂

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  10. naresh singh rathore
    दिसम्बर 22, 2010 @ 11:24:19

    बलोगर मीट का बहुत उम्दा वर्णन किया है |जीपीएस तकनीक का उपयोग शहरो तक ही किया जा सकता है | गांवों में उस मोहतरमा को हिन्दी तो क्या अंग्रेजी भी नहीं आयेगी |

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  11. Sanjeeva Tiwari
    दिसम्बर 22, 2010 @ 17:21:40

    सुन्‍दर शब्‍दों में ब्‍लॉगर मिलन का विवरण दिया भाई आपने धन्‍यवाद.

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  12. बी एस पाबला
    दिसम्बर 23, 2010 @ 08:26:50

    रोचक विवरण।
    इस गैर-नियोजित ब्लॉगर बैठक के बहाने आपसे भी संक्षिप्त, सुखद मुलाकात हो गई।
    अगली बार कोशिश रहेगी कुछ अधिक वक्त बिताने की

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  13. शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    दिसम्बर 23, 2010 @ 21:14:27

    बहुत अच्छी पोस्ट है…जिन मुद्दों पर चर्चा हुई, वो किसी निष्कर्ष तक पहुंचकर सफ़लता हासिल करे, इसी कामना के साथ.

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  14. Trackback: अजय कुमार झा - जस्ट सम post bytes….झा जी इश्टाईल …..
  15. pompy do brudnej wody
    फरवरी 27, 2011 @ 02:00:53

    Hello, you used to write excellent, but the last few posts have been kinda boring… I miss your tremendous writings. Past few posts are just a little out of track! come on!

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