एक घर,दो जोड़े,तीन दिन,चार शादियाँ, और पांच ब्लॉगर

मै नहीं जानता था वो कौन हैं… अब तो ये भी याद नहीं कि आर्कुट पर क्यों और किस तरह से जुड़े हम… वैसे तो मेरी फितरत है कि खामखा  दबंग दिखने/दिखाने वालों और बनावटी उसूलों वालों को या तो जल्दी नज़दीक नहीं आने देता या उसकी तरफ को मुंह कर के ….. नहीं करता क्योकि मै मानता हूँ जंगल में एक ही शेर रह सकता है…दो ही बात होगी …. या तो वो नहीं रहेगा … या मै ही रहूँगा Winking smile.

लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ….आर्कुटिंग, सामान्य परिचय और चैटिंग से होते हुए स्नेह और सम्मान के सम्बन्ध किस सीमा तक पगाढ़ हुए इसे गूंगे का गुड़ ही रहने दीजिए… अगर यह प्रश्न उठता है कि माँ यशोदा ने कृष्ण को दूसरे का पुत्र होते हुए भी   इतना स्नेह प्रेम कैसे  दिया तो शायद इसकी मिसाल हमारा सम्बन्ध हो सकता है.

gdgदिन निकलते रहे..रातें गुज़रती रहीं…. शायद तमाम जन्मों के पुण्यों ने अपना असर दिखाया और वो अवसर आया जब आभासी दुनिया से निकल कर हमारे मिलने का मार्ग प्रशस्त होता दिखा. फोन आया कि बेटी की शादी की बात दिल्ली में चल रही है… एक लड़का है किसी ऑटो पार्ट्स की दूकान पर काम करता है… करोल बाग में… अगर हो सके तो देखो जा कर कैसा है… मैंने अपना गरीब रथ(दस वर्षीया द्विचक्रिका) तुरंत जोता और पहुँच गए करोल बाग.. दिए गए पते पर पहुंचा तो पाया कि लड़का तो सच में ऑटो पार्ट्स की दूकान पर काम करता है… लेकिन वो बाइक पार्ट्स बनाने वाली बहुत बड़ी कंपनी का आफिस था और लड़का उसमे मालिक के तौर पर काम करता था … हद है!…. लड़का स्मार्ट,(आशुतोष राणा जैसा लुक), मितभाषी  और दमदार आवाज़ का मालिक (सुरेश ओबेरॉय जैसी) जो देखना था देखा और अपन ने बात फाइनल कर दिया..

ghhgपुत्री की शादी पक्की होती, इससे पहले पुत्र की शादी पक्की हो गयी… डेट निकली 18 नवम्बर 2010 स्थान चित्तौड़ गढ़ …. सब तरफ इन्विटेशन भी भेज दिए गए… 22 नवम्बर को भांजे की शादी में लखनऊ भी जाना था और चित्तौड़ से लखनऊ के लिए सीधे कोई ट्रेन नहीं है(जनरल नॉलेज के लिए नोट करें) इस लिए पाबला जी और ललित जी  के सहयोग से तय हुआ कि वापसी में कोटा से लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़ी जाय. आनन् फानन में तैयारियां ऐसे परिवार से मिलने की pp… जिसे कभी देखा नहीं… कोई सम्बन्ध नहीं.. कभी मिले नहीं… व्यग्रता और बढ़ गयी जब हज़रत निजामुद्दीन से ट्रेन ने सीटी दे कर प्लेटफार्म छोड़ा…  ट्रेन सुबह चार बजे के आसपास पहुंचनी थी … खबर थी कि चित्तौड़ में दो तीन दिन से भारी बरसात हो रही है… इस लिए मैंने ट्रेन का टाइम नहीं बताया था कि खामखा इतनी सुबह स्टेशन पर किसी को बुला कर परेशान क्यों करना … ट्रेन करीब आधे घंटे लेट थी … लेकिन स्टेशन पर पहुचते ही फोन ने जेब में दस्तक दी… पता चला एक घंटे पहले से एक फोर्चुनर हमारा Uncle auntyइंतज़ार कर रही थी…मुझे पहले किसी ने देखा नहीं था …कमल पुरी  गोस्वामी जी(मेरे लिए अंकलजी)  ने मेरी फोटो देखी थी नेट पर … बोले दूर से छह फुट्टे को पहचान लूँगा … और ऐसा ही हुआ … गेट पर खड़े दूर से ही पहचान लिया….. पिछली बोगी से एक फैमिली और उतरीथी…. बाद में पता चला हमारा गंतव्य एक ही था…मुंबई से इंदु जी की बेस्ट फ्रैंड तुहिना जीअपने पति और अपने भाई प्रद्युम्न जी  तथा उनकी पुत्री पिऊ( ईशानी) के साथ गुडगाँव से इसी ट्रेन से आये थे…. दोनों परिवार जब गाड़ी में लादे गए(सामान ही बहुत हो गया था) तब पता चला कि घर तो यहाँ से पन्द्रह किलोमीटर दूर था… हमारे पहुँचने तक अँधेरा छंटा भी नहीं था लेकिन सारे घर वाले जगे हुए थे और द्वार पर खड़े थे… इंदु माँ शायद काफी देर से बाहर ही हमारा इंतज़ार कर रही थीं … आते ही हम बहुत देर तक गले लग कर ममत्व और स्नेह का रसपान करते रहे.

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ये चित्तौद्गढ़ की आदित्य विडला ग्रुप की सीमेंट फैक्ट्री की आफिसर्स कालोनी का ब्लॉक नंबर B-9 और B-10 था… हर्ष, आह्लाद, संकोच, स्नेह, आश्चर्य और जाने किन किन भावों में डूबते उतराते रहे हम.. जब तक कि हमारे लिए चाय नाश्ते का प्रबंध होता … इंदु माँ ने घर में पहले मिलने वाले दो मेहमानों (अंजलि पुरी गोस्वामी और कविता जी  से परिचय क्रमशः अपनी भतीजी और कज़न के रूप में करवाया  ….

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हमारा सामान ब्लॉगर ब्लाक के ऊपर वाले कमरे में रखवा दिया गया था…ये वाला ब्लाक B-10 ब्लॉगर्स के लिए विशेष रूप से सजाया गया था… सीढियां चढ़ते हुए मै आश्चर्य और हर्षातिरेक से स्तब्ध था … ब्लाक की दीवारों सीढ़ियों से ले कर हर कमरे ब्लॉगर्स के चित्रों, राजस्थानी पेंटिंग्स  और मोहक फूलों तथा चाँद आदि के सुन्दर फ्लेक्स से सजाया गया था…. हर कमरा ताज़े फूलों के गुलदस्ते सहित नयी चादरों और पर्दों से सुसज्जित था… बाथरूम में साबुन, तेल,मंजन और गर्म पानी जैसी सभी आवश्यक सुविधाओं  की पहले से व्यवस्था थी…. कपड़े धोने, खाना बनाने,सफाई करने सहित लगभग हर सुविधा हेतु बीसों वोलेंटियर हर समय तत्पर…P161110_13.36_[02]

सुबह हो चुकी थी…इस अति सुन्दर या कहें मनोरम कालोनी को कालोनी न कह कर पर्यटन उद्यान कहना अधिक उचित होगा….  चार पांच दिन से बारिश के कारण मौसम रूमानी हो रहा था… पत्तियाँ धुली हुई और डालियाँ सफ़ेद चमेली के फूलों से लदी और गमकती हुई … नहाते, आराम करते, बतियाते पूरा दिन काफूर हो गया …

P191110_12.26कोटा से भाई ललित शर्मा  का फोन आया कि पूर्वनिश्चित योजना के अनुसार 17 की  सुबह उसी ट्रेन से कोटा से अख्तर खान अकेला से मिलते हुए दिनेशराय द्विवेदी जी को ले कर चित्तौड़ पहुँच रहे हैं…(कोटा वृत्तांत उनके ब्लॉग पर) अतः सुबह समय से जागने के लिए मोबाइल यंत्र का सहारा लिया और समय पर गोस्वामी जी के साथ स्टेशन से ललित जी को भी ले आये… सोचा था मूंछों से पहचान लेंगे … लेकिन उससे पहले उन्होंने हमें पहचान लिया और हम वापस चित्तौड़ से आदित्य कालोनी की तरफ निकल पड़े …

17 November 2010 चित्तौडगढ़ Gift with a bow

आज नवम्बर २०१० की सत्रह तारीख है…  यहाँ मै स्पष्ट कर दूँ कि इस घर में चार शादियाँ एक साथ होनी हैं… आदित्य गोस्वामी(इंदु जी के पुत्र) सौ० डॉली (होने वाली पुत्र वधू) सौ० अपूर्वा( पुत्री) और सम्राट(होने वाले दामाद)…  जहाँ सम्राट मम्मी पापा सहित गेस्ट हाउस में रुके थे.. वहीँ बहू के परिजन जबल पुर से आज आने वाले थे… सारे इंतजाम इधर ही होने हैं… दर्जनों वोलेंटियर तैयारी को अंजाम दे रहे हैं… मेहमानों के पास एकमात्र महत्वपूर्ण काम है… जब जो मन करे खाओBowl और मस्ती करो…Coffee cupMug गाना गाओ… डीजे पर डांस करो…. और जहाँ कोई रस्म हो उधर शामिल हो जाओ…खाना तैयार होता तो सारे मेहमान मिलकर ठहाके लगाते… मस्ती करते हुए खाना खाते..

आने वाले ब्लॉगर्स में अब तक मै, मेरी पत्नी, और ललित शर्मा जी ही पहुँच पाए थे… समीर लाल जी जबलपुर के लिए प्रस्थान कर चुके थे, दिनेश राय द्विवेदी, पाबला जी, अनामिका जी और सतीश सक्सेनाजी अपनी अपनी समस्याओं में फंस कर रह गए.. अंत तक आने का दावा करने वाले महफूज़ भी नहीं आये… इस लिए धमाल का पूरा जिम्मा ललित जी और मेरे ऊपर था…

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कोई काम था नहीं सिवाय मस्ती करने के … तय किया कि आदित्य बिड़ला सीमेंट फैक्ट्री का भ्रमण करना अच्छा रहेगा… तमन्ना जुबां पे लाई गयी… तुरंत छह पास और दो बोलेरो मंगवाई गई … ललित जी, हम और तुहिना जी का परिवार फैक्ट्री देखने निकल पड़े …

 

फैक्ट्री में जिस शख्शियत से हमारी मुलाक़ात हुई उनको बाहर से लोग बिड़ला फैक्ट्री के वोईस चेयरमैन के रूप में जानते हैं…लेकिन चंद लोग उनके अंतरतम को महसूस करते हैं… और जो महसूस कर सकते हैं उन्होंने पाया है कि उनका पद जितना ऊपर से बड़ा है व्यक्तित्व भीतर से उससे कहीं अधिक ऊंचा … इसके लिए शायद अलग से पोस्ट लिखनी पड़ सकती है… फ़िलहाल… ये हैं श्री शिव कुमार तिवारी जी..  वाइस चेयर मैन आदित्य  बिड़ला सीमेंट फैक्ट्री चित्तौड़… जिन्हें हम एन्जिलजी कहते हैं…करीब दो घंटे तक उनके केबिन में बैठे हम सीमेंट और सीमेंट निर्माण के बारे में क्लास अटेंड करते रहे….फिर फैक्ट्री और सीमेंट निर्माण के बारे में बहुत कुछ दिखाया बताया… हमारे साथ फिलिप्स कंपनी के एशिया ज़ोन के डाइरेक्टर और तुहिना जी के अतिरिक्त उनके  भाई प्रद्युम्न जी और उनकी बेटी पीहू भी थे …. तुहिना जी ने इतने प्रश्न पूँछे कि हमें शक हो गया कि हो न हो वो घर जाते ही सीमेंट प्लांट लगाने वाली हैं ‘Winking smile

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शाम होते होते सीमेंट फैक्ट्री की यादें सँजोते हम वापस आ गए … रात क्लब के हाल में महिला संगीत का प्रोग्राम था… खाना शाना उधर ही होना था… शाम होते होते सारी तैयारियां हो चुकी थीं,.. चार पांच गाड़ियां मेहमानों को क्लब तक छोड़ रही थीं… क्लब का हाल बहुत खूबसूरती के साथ सजाया गया था… डीजे की धुन के साथ … सारे के सारे मेहमान थिरक रहे थे… शाम धीरे धीरे ढल रही थी… आह्लाद और उमंग Lalit sharmaके नशे में सारे मेहमान मस्त थे…. इंदु जी ने पुराने गीतों के ढेर सारे गीतों के लिरिक्स को प्रिंट करवा कर किताब की शक्ल दे रखी थी, जिससे गीत गाते समय किसी को गीत के बोल न भूलें… डीजे बंद करवा दिया गया… ढोल की थाप पर गीतों की सरिता कुछ यूँ बही कि रात कब गहरा गयी पता ही नहीं चला… इंदु जी की भतीजी अंजलि पुरी गोस्वामी जी, इंदु जी और बैठे,(या कहें पसरेगले से) से मैंने गाने की महफ़िल को तीन चार चाँद लगाने की पूरी कोशिश की…

 

P171110_23.00_[01]रात गहराने लगी …  होने वाले दामाद सम्राट जी की फरमाइश पर एक बेहद भावुक कर देने वाला गीत बजाया गया …”ये तो सच है कि भगवान है… है मगर फिर भी अनजान है… धरती पर रूप माँ बाप का… ये विधाता की पहचान है… फ्लोर पर सभी सम्बन्धी, दूल्हा दुल्हन और भाईयों ने मिल कर गीत पर थिरकने लगे… धीरे धीरे माहौल इतना भावुक हो चला कि वहाँ उपस्थित शायद सभी की आँखों में आँसू थे,… विवाह! एक स्त्री के लिए दूसरे जन्म जैसा… एक घर की सारी यादों को पलकों में मोतियों से सजाते हुए दूसरे घर को जीवन भर के लिए अपनाते समय विछोह का पल… कुछ पलों के लिए सभी आँखें नम और गले रुद्ध हो चले….

गीत समाप्त हुआ…और प्रारम्भ हुई अपूर्वा और सम्राट के जीवन सहयात्रा की पहली पौड़ी… दूल्हे सम्राट  अपूर्वा को हाथ पकड़ कर मंच पर ले जाते हैं… परिवार और समाज सहित ईश्वर को साक्षी मानते हुए दूल्हे ने दुल्हन की मांग में सिंदूर सजा दिया …

विवाह संपन्न हुआ..!!!!

18 November 2010 की सुबह…

P181110_13.05_[01]रात का रूमानी उत्सव अभी मन और आँखों से उतरा नहीं था… ललित शर्मा जी  देर तक सोते रहे…शायद उतरी उनकी भी नहीं थी अभी तक… लेकिन नाश्ते के टाइम तक सब लोग नहा धो कर फिर तैयार थे… शाम को एक और विवाह होना था, एक रिश्ता फिर अपना अस्तित्व रचने को तैयार था… दिन भर करते क्या… तात्कालिक योजना के तहत मै अपने परिवार और ललित जी के साथ चित्तौडगढ़ का किला देखने के लिए तैयार था… थोड़ी देर में हम शेवरले-युवा पर चित्तौड़गढ़ की ओर निकल चुके थे…

चित्तौडगढ़ का किला  अपनी विशालता और भव्यता के साथ पहाड़ी के शीर्ष पर पसरा हुआ कई किलोमीटर दूर से ही दिखने लगता है…किले के सातों द्वार पार करते हुए हम राजस्थान की वीरगाथाओं और आन बान शान से अभिभूत होने लगे थे… अंतिम द्वार पार करते ही संग्रहालय सामने था… संग्रहालय में विभिन्न अस्त्र शस्त्र और जिरह बख्तर आदि की भव्यता देखने लायक थी… दस रूपये की अतिरिक्त टिकट पर हम अपनी कार ले कर पूरा किला देख सकते थे… अतः वही किया…

P181110_13.08विजय स्तंभ के सामने कार पार्क कर जैसे ही विजय स्तंभ की और बढे, द्वार पर बड़े बड़े पके शरीफे बिकते हुए दिखे..… मुझे अच्छे लगते हैं शरीफे… मेरी बेटी को भी.. अतः शरीफे लिए और जैसे ही हम प्रांगण में घुसे लंबे चौड़े कुछ लंगूरों ने शरीफों पर नीयत खराब कर ली.. लाख कोशिशों के बावजूद एक बहुत बड़ा लंगूर आया और मेरे हाथ पैर  पकड़ कर बैठ गया… बिलकुल ऐसेP181110_13.14 जैसे कुम्भ के मेले में बिछड़ा भाई मिल गया हो… कोई चारा नहीं था… एक शरीफा उन्हें भेंट किया और आगे बढे….लंगूर जी शरीफा खा कर शरीफों जैसे किले की प्राचीर पर बैठे अपने कुटुंब से जा मिले… ललित जी ने दूसरे शरीफे को बचाने की ज़िम्मेदारी स्वयं पर डाली और टीशर्ट में शरीफा सहित हाथ घुसाए(आतंकवादियों जैसे) तब तक घूमते रहे जब तक कि मौका देख कर शरीफा और शरीफा कथा समाप्त नहीं हो गई…

P181110_14.10_[02]प्राचीन शिव मंदिर, विशाल जलाशय, शरीफे के बाग  और किले के अन्य महल देखते हुए हम रानी पद्मिनी के महल के सामने थे, महल देख कर निकले तो महल के सामने दुकानों की कतारें दिखीं… देखा तो उधर राजस्थानी परिधान में घोड़े और ऊंट की सवारी पर फोटो खींचने की कई दुकानेंP181110_14.30_[01] थीं… उत्सुकता और यादगार संजोने के लिए मेरी बेटी, मैडम  और ललित जी सब  ने बड़े जबरदस्त अंदाज़ में फोटो शेसन करवाया.. फोटो मिलते ही समय को ध्यान में रखते हुए वापसी के लिए प्रस्थान किया… रास्ते में कार रोक कर शरीफे के बाग से ढेर सारे शरीफे तोड़ना नहीं भूले … आखिर हम भी ब्लॉगर ठहरे.. यूँ ही कैसे जाने देते (Smile)

P181110_13.47वापस पहुँचने पर आदेश हुआ कि जल्दी तैयार हो जाओ… शाम पांच बजे बरात निकलनी है, जल्दी जल्दी सब तैयार हुए … तब तक बरात लगभग निकलने को तैयार थी…लेकिन भाई ललित जी शर्मा  निकलने को तैयार नहीं थे… अब उनकी तैयारी के लिए किसी तीसरे को मय कार तैयार किया… खोजते बूझते दवा का प्रबंध हुआ और फिर सब तैयार…. Smile with tongue outMartini glass

P181110_20.01बरात अपनी भव्यता के साथ गाजे बाजे के साथ मंदिर होते हुए कालोनी के क्लब हाल तक पहुंची…. आज फिर से एक दौर चला… यथा योग्य… डीजे, डांस, और ड्रिंक…  अचानक कोई जाना पहचाना चेहरा सामने था… चित्तौड़ से युवा और इस शादी का पाँचवाँ  ब्लॉगर शेखर कुमावत … शेखर के साथ काफी देर तक बातें होती रहीं… रात ढलती रही… बाहर दावत चल रही थी अंदर डीजे और डांस… उधर विवाह की तैयारियाँ भी पूरी हो चुकी थीं… अतः इधर से सब लोग वापस आये… रात में मंडप में विवाह संपन्न होना था … लेकिन जब हमारी आँख खुली तो दूल्हा दुल्हन परिणय सूत्र में बंध चुके थे..

19 November 2010

P191110_08.43कहावत है कि शादी के बाद का  दिन सब से बोरिंग होता है… महीनों से चढा खुमार उतरने लगता है… इस दिन घर सब से ज्यादा अव्यवस्थित और बिखरा हुआ लगता है… थकान और आलस्य अपने चरम पर होती है… ऐसे में घर समेटना… मेहमानों को विदा करना… और फिर कहीं याद आती हैं अपनी दवाइयाँ… ललित जी की ट्रेन शाम को थी… उन्होंने दिन भर सोने का प्लान बनाया और कमरा बंद कर P191110_12.28ध्यानावस्थित हो गए… मै अपनी आदत से मजबूर दिन में सो नहीं पाता .., दिन भर गप्पें मारी, आराम किया.. थोड़ा घर समेटने में हाथ बटाया(लोगों ने ऐसा ही समझा) और पूरा दिन निकाल दिया … तीसरे प्रहर ललित जी, मै और इंदु जी तीनों तब तक के लिए गप्पाष्टक में डूब गए… जब तक कि ललित जी की ट्रेन का टाइम नज़दीक नहीं आ गया…

स्टेशन पर छोड़ते हुए शेखर कुमावत भी आ गए थे… तीन दिन के अविस्मरणीय साथ के बाद ललित जी को पुनः शीघ्र  मिलने के वादे के साथ विदा किया… और वापस कालोनी… हमारी ट्रेन कल सुबह जो थी…

हमारी ट्रेन कोटा(जो चित्तौड़ से २०० किलोमीटर दूर है) से लखनऊ के लिए थी… कोटा सुबह १० बजे तक पहुँचने का कोई साधन नहीं था… इंदु जी ने कब और कैसे मेरे लिए कोटा तक के लिए टैक्सी का प्रबंध किया मुझे नहीं पता … सुबह पांच बजे टैक्सी दरवाज़े पर थी…इंदु माँ ने ममत्व का आँचल डाल भावभीनी विदाई की… इस से पहले कि पौ फटती… सब को सोता हुआ छोड़…अप्रतिम, अनुपम, स्नेह, सौहार्द्र, ममत्व और अपनापे की नगरी छोड़ कर तीन चार दिनों तक बिताए हुए अतुलनीय आह्लाद के क्षणों को दिल के कोने में संजोये हुए… आँखों में एक कतरा कृतज्ञता के मोती लिए हम चित्तौड़ से दूर हो रहे थे…. सूरज का गोला धीरे धीरे लाल हो रहा था…….!!!

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आइये परिचय करवाते हैं मुख्य मुख्य स्मरणीय व्यक्तित्वों से –

Garima

१-गरिमा जी- इंदु जी की सहकर्मी(टीचर मैम) महीनों से शादी की अथक तैयारियों के लिए ज़िम्मेदार.

suvidhi, Garima

२-सुविधि जी- एक और टीचर मैम, इंदु जी का दाहिना२ (शायद बायाँ भी) हाथ…

Causon Sister

३-कविता जी- इंदु जी की कज़न- गंभीर, शान्त, सौम्य, जिम्मेदार और ग्रेसफुल व्यक्तित्व…

 

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४-अंजली पुरी गोस्वामी(मीका जी)- इंदु जी की भतीजी, बहुत सुन्दर, सर्वगुण संपन्न, ड्रेसिंग सेन्स-ऑसम, डांस, संगीत और व्यावहार कुशल… मितभाषी और … और भी बहुत कुछ …

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५-अनीता सिंह(ब्लॉगर) मेरी धर्मपत्नी…

आगे क्या कहूँ… मै नहीं मेरी आत्मा जानती है.. आप खुद समझदार हैंWinking smile

 

Lunch

६-बाएं से मीका जी,अंजू (इंदु जी के कजन की पत्नी  छोटी भाभी कम सहेली ज्यादा भाभी), और इंदु जी की छोटी भाभी कानू जी (बहुत सहनशील,धैर्यवान और सुन्दर और महान  व्यक्तित्व)

 

Tuhina७-तुहिना जी(इंदु जी की बेस्ट गर्ल फ्रैंड)- क्या लिखूं, अपने जैसी अकेली शख्शियत, हिंदी भी अंग्रेजी में बोलती हैं, फीका खाना खाती हैं.. डाईट से ले कर घुलना मिलना सब कुछ वेल कंट्रोल्ड….कुल मिला कर सुपर स्पेसियालिटी टाइप…

Pradyumn

८-प्रद्यूत सिन्हा  जी- (तुहिना जी के भाई) फिलिप्स ग्रुप में जोनल डाइरेक्टर… सीधे  सादे.. हँसमुख, मिलनसार, और सरल व्यक्तित्व.

 

mika ki mammy

९-रजनी एस आर पुरी.. (मीका कि मम्मी और इंदु जी की सबसे बड़ी भाभी)

अ ग्रेसफुल लेडी…

 

इसके अतिरिक्त और बहुत से स्मरणीय मेहमानों के साथ  अजयपुरी, वीरेन, अथर्व, अनंजय,सजल, साक्षी, प्रद्युम्न जी की बेटी पीहू, मेरी बेटी निहारिका और खुशी और सभी बच्चा गैंग

26 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    दिसम्बर 07, 2010 @ 08:58:40

    पढ़कर लगा कि पूरी शादी में हम भी आपके पीछे खड़े सारे दृश्य निहार रहे थे। प्रेम की इस गंगा में, काश हमारा भाग्य भी होता डुबुकी मारने का।

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  2. ललित शर्मा
    दिसम्बर 07, 2010 @ 09:10:00

    वाह भाई सब कुछ विस्तार से एक ही पोस्ट में समेट दिया।
    वैसे यह यात्रा भी गजब की रही है और स्मृतियों स्थाई रहेगी।
    अच्छा किया जो इंदु जी की सहेली का नाम बता दिया, इतना कठिन नाम मैं भूल ही चुका था।
    प्रत्युष भी बढिया इंसान है और एंजिल जी के तो कहने ही क्या हैं।

    एक पो्स्ट में सब कुछ नहीं आ पाया एक और हो जाए।

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  3. Sanjeeva Tiwari
    दिसम्बर 07, 2010 @ 09:20:05

    बढि़या प्रवाह है भाई साहब आपकी लेखनी में, धन्‍यवाद.

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  4. satish saxena
    दिसम्बर 07, 2010 @ 09:46:50

    आपकी नज़र से पूरी शादी में शामिल हो लिया पद्मसिंह ! आशीर्वाद इन बच्चों को और शुभकामनायें इंदुमाँ को !

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  5. बी एस पाबला
    दिसम्बर 07, 2010 @ 10:21:02

    कई अनहोनियाँ एक साथ आ गईं, वरना हम भी होते आप सभी के साथ

    बेहद रोचक शैली में है संस्मरण,
    बिना रूके ही पढ़ते चला गया

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  6. संगीता पुरी
    दिसम्बर 07, 2010 @ 10:23:45

    इतना जीवंत चित्रण ..
    इस पोस्‍ट की जितनी तारीफ की जाए कम होगी !!

    प्रतिक्रिया

  7. puja jha
    दिसम्बर 07, 2010 @ 11:41:18

    pujajha
    बढि़या प्रवाह है भाई साहब आपकी लेखनी में, धन्‍यवाद.

    प्रतिक्रिया

  8. Sanjeet Tripathi
    दिसम्बर 07, 2010 @ 12:52:04

    kya bat hai, bahut hi rochak aur prawahmayi shaily me likha hua vivaran.

    aisa lagaa jaise ham khud vahan maujud rah kar lutf le rahein ho…

    shukriya bahi sahab

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  9. अजित वडनेरकर
    दिसम्बर 07, 2010 @ 13:02:53

    बढ़िया वृत्तांत।
    शुक्रिया आपका और इंदुजी को मांगलिक अवसर की बधाई

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  10. naresh singh rathore
    दिसम्बर 07, 2010 @ 15:04:44

    बहुत बढ़िया और रोचक वर्णन किया है | पोस्ट थोड़ी लंबी जरूर है लेकिन विषय वस्तु भी इस प्रकार की थी की कंही भी बोरियत नहीं हुई | समस्त यात्रा का आँखों देखा हाल …. मजा आ गया |इंदु जी ने ब्लोगरो को जो सम्मान दिया उसके लिए मै उनके प्रती दिल से आभार व्यक्त करता हूँ | आज के इस भौतिक युग में इस प्रकार के बिरले गिने चुने ही है | आभार |

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  11. Shivam Misra
    दिसम्बर 07, 2010 @ 17:18:45

    महाराज …. आज पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर वह भी ललित भाई की पोस्ट पर लिंक मिला गया इस लिए …. पर अब लग रहा है काफी कुछ खोया है मैंने इतने दिनों आप का ब्लॉग पढ़े बिना !

    खैर, अब तो आना जाना बना रहेगा !

    आपका बहुत बहुत आभार … पढ़ते समय यही लगता रहा कि मैं वही हूँ जहाँ घटना हो रही है ! आपकी यह लेखन शक्ति बनी रहे यही दुआ है ! शुभकामनाएं सहित …

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    • padmsingh
      दिसम्बर 07, 2010 @ 17:28:00

      शिवम मिश्रा जी मेरे ब्लॉग पर आने और इस तरह से हौसला बढ़ाने के लिए कृतज्ञता ज्ञापित हो… आप लोगों की टिप्पणियाँ मुझे लिखने की शक्ति प्रदान करती हैं

      प्रतिक्रिया

  12. shikha varshney
    दिसम्बर 07, 2010 @ 17:45:52

    ललित जी के ब्लॉग से सीधे यहीं चले आये ..और आकर शादी में शामिल भी हो लिए और सभी परिवार वालों से भी मिल लिए .बेहद विस्तृत ,रोचक और खूबसूरत वर्णन आभार.

    प्रतिक्रिया

  13. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    दिसम्बर 07, 2010 @ 19:49:24

    वाह ऐसा लगा कि हम भी वहीँ थे !
    सभी नए पुराने जोड़ों को बधाइयां !

    प्रतिक्रिया

  14. Shivam Misra
    दिसम्बर 08, 2010 @ 04:10:45


    बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

    प्रतिक्रिया

  15. अविनाश वाचस्‍पति
    दिसम्बर 08, 2010 @ 06:32:07

    वाह पद्म सिंह वाह वाह
    पोस्‍ट में वाकई दम है
    दमदार पोस्‍ट है
    सब कुछ बतलाती है
    कितनी मेहनत से
    बेघूमे को भी
    भली प्रकार घुमाती है
    इसे बार बार पढ़ने की
    ललक नहीं जाती है।

    प्रतिक्रिया

  16. विवेक रस्तोगी
    दिसम्बर 08, 2010 @ 06:54:34

    हम तो पूरी शादी जी लिये आपके ब्लॉग पोस्ट से और सभी ब्लॉगर्स से मिल भी लिये ठुमके भी लगा लिये, स्नेह भी पा लिया, अब और क्या कहें, कहना भी कम पड़ रहा है।

    प्रतिक्रिया

  17. संजय भास्कर
    दिसम्बर 08, 2010 @ 07:51:36

    बहुत बढ़िया और रोचक वर्णन किया है शुक्रिया आपका और इंदुजी को मांगलिक अवसर की बधाई

    प्रतिक्रिया

  18. संजय भास्कर
    दिसम्बर 08, 2010 @ 07:52:22

    आपका बहुत बहुत आभार … शुभकामनाएं सहित …

    प्रतिक्रिया

  19. संजय भास्कर
    दिसम्बर 08, 2010 @ 07:53:46

    बेहद विस्तृत ,रोचक और खूबसूरत वर्णन पोस्‍ट की जितनी तारीफ की जाए कम होगी !!

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  20. vichaar shoonya
    दिसम्बर 08, 2010 @ 09:23:48

    very intresting report

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  21. nirmla.kapila
    दिसम्बर 08, 2010 @ 10:16:35

    पहली बार इतने विस्तार से कोई रिपोर्ट पढी कमाल कर दिया आपने। तस्वीरें भी अच्छी लगी। ये स्नेह ऐसे ही बना रहे। इस दुआ के साथ। शुभकामनायें।

    प्रतिक्रिया

  22. indu puri goswami
    दिसम्बर 09, 2010 @ 11:04:20

    अरे तुहिनाजी के भाई का नाम ‘प्रद्युत सिन्हा’है.

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  23. padm singh
    दिसम्बर 09, 2010 @ 17:17:38

    तो क्या हुआ … प्रद्युम्न भी कोई बुरा नाम नहीं है… लेकिन आप कहते हैं तो ठीक कर दूँगा🙂

    प्रतिक्रिया

  24. दिवाकर मणि
    दिसम्बर 10, 2010 @ 11:07:32

    पद्‌म भैया !! बुआ ने मुझे भी बुलाया था लेकिन तब तक मेरा हैदराबाद में एक अंताराष्ट्रिय कार्यशाला में सात दिनों के लिए जाने की योजना बन चुकी थी । खैर….आपके शब्दों व चित्रों के माध्यम से अपने राम ने भी इस शादी के पूरे मजे ले लिए….

    आपको भूरिशः धन्यवाद इस पोस्ट के लिए….

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  25. चलत मुसाफ़िर
    मई 08, 2014 @ 09:50:26

    लो भाई, फ़िर चले आए घूमते फ़िरते पुरानी यादें ताजा हो गई। यह भी जिन्दगी का एक पड़ाव था। वरना कौन कहां मिलता है। बस दुनिया का सफ़र ऐसे ही चलता है।

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