ईद … जरूरत … रवायत … और पाइथागोरस

आज ईद भी है और गणेश चतुर्थी भी … कहीं कहीं हरतालिका तीज भी …  इन सब के लिए पूरे देश को शुभकामनाएँ ….

कल सपत्नीक बाजार का रुख किया तो रास्ते में ही पता चल गया कि त्योहारों का मौसम आ गया है …. बाजारों में कपड़ों, चूड़ियों और शृंगार प्रसाधन की दुकानें ग्राहकों से पटी हैं … चूड़ी की दूकान पर जहाँ हिंदू औरतें तीज के लिए चूड़ियाँ खरीद रही थीं वहीँ मुस्लिम महिलायें भी चूड़िया  ले रहीं थीं … ये वाली नहीं थोड़ा मैचिंग में दिखाओ . सब कुछ घुला मिला सा लगा …. ये सब देख कर ऐसा लगता है कि इस देश में अनेक धर्म और जातियां कितना मिल जुल कर रहती हैं …यद्यपि कुछ समय से अपनी धार्मिक पहचान दिखाने की होड़ कुछ बढ़ी है ….फिर भी  सामान्यतः तो रहन सहन और भाषा  से अलग अलग पहचानना भी मुश्किल होता है ….ये सब देख कर धर्म और मजहब के नाम पर लड़ने मरने की बातें अविश्वसनीय लगती हैं …

सुबह मेरी पड़ोसन ज़न्नत बेगम जी जब ईद की सेवियां लेकर घर पर आईं तो मन सुखद अनुभूति से भर गया ….हमेशा हम ईद और दीपावली पर एक दुसरे से अपनी खुशियाँ और खाना पीना शेयर करना नहीं भूलते …

मेरे कुछ बचपन के मुस्लिम मित्र हैं … सगीर, अनीस जैसे दोस्तों के साथ तो बचपन से पढ़ा और खेला हूँ … ईद और होली दीवाली पर साथ मिले बैठे और खाया पिया… कभी भी कहीं से आपस में  ऐसा लगा ही नहीं कि मै हिंदू हूँ या वो मुस्लिम… कई बार तो हम आपस में ऐसे मजाक करते  जिसे  कोई और सुने तो इसे धर्म या मज़हब का अपमान भी समझ सकता है … लेकिन दोस्ती की बातें हैं …. इतने सालों में कभी भी रवायत या किसी अन्य पूर्वाग्रह आपसी संबंधों के बीच कभी नहीं आये … हमारे  बीच भाई जैसी घनिष्ठता और बेबाकी रही(और है भी)…  सोचता हूँ वो ऐसी क्या वजह होती है जो इंसान को इंसानियत से अलग कर देती है … ये ज़िम्मेदारी इस युवा और पढ़े लिखे युवाओं पर जाती है कि भविष्य में रवायतों को मानवता के दायरे में कैसे सुरक्षित रखा जाए.,

दिल्ली में सन 1984 के दंगों में मेरे कुछ रिश्तेदार इस तरह की इंसानियत के जीते जागते सुबूत हैं जिन्होंने पूरे पूरे मोहल्ले सहित मिल कर बहुतों को अपने घर में छुपा कर … रात रात भर पहरा दे कर दंगाइयों से लोहा  लिया और धार्मिक विद्वेष से ऊपर उठ कर मानवता की रक्षा की ,.. अगर हम इक्कीसवीं सदी के आधुनिक युग में मानवता की रक्षा नहीं कर पाए तो हमें बचाने ऊपर से भी कोई  आने वाला नहीं है …

सीरियस बात खतम ….:)

अब मज़ेदार बात शुरू……

इस क्रम में  दो होनहार  दोस्तों(अतहर और अनिल) की सच्ची  और रोचक दास्तान सुनाता हूँ…. जिसे सुना सुना कर दोनों घंटों लोट पोट हुए थे …  ये दोनों ही मेरे पड़ोसी थे (दोनों अपने अपने जॉब में बिजी है आजकल)

image नाम अतहर परवेज़, उम्र कोई छबीस साल, अपने मित्र अनिल भाटिया उम्र लगभग २६-२७ वर्ष,  के साथ कहीं  घूमने जाते हैं … अनिल भाटिया पंजाबी, हिंदू ,,, अतहर परवेज़ मुस्लिम…दोनों अपने आप में नमूने … दोनों मस्त और हाज़िर जवाब ..,. लगभग दो साल पहलेएक दिन किसी काम से  दोनों बरेली(जगह का नाम बदला हुआ) के मुस्लिम बहुल इलाके में किसी काम से जाते हैं… शहर अनजाना है … और बस्ती घनी… काफी देर घुमते अनिल भाटिया को लघुशंका ने आ घेरा … लेकिन बस्ती थी कि जगह देने को तैयार नहीं … इधर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था … यार अतहर अब तो कुछ कर … पाप का घड़ा भर चुका  है ….  अमे यहाँ तो कहीं सुलभशौचालय भी नहीं दिख रहा है …  क्या करूँ … कुछ तो सोच भाई …वरना निकल पड़ेगी …  अनिल का गुब्बारा फूटने को तैयार था …. इसी बीच ऊपर वाले ने दोनों की सुध ली … सामने ही एक मस्जिद नज़र आगई …. अतहर ने अनिल से बोला यार मस्जिद में वुजू के लिए जगह तो होगी … रुक .. पहले मै देख कर आता हूँ …

Img00000 अतहर ने अंदर जाकर जो देखा और थोड़ा चिंतनीय मुद्रा में वापस आ गया … यार जगह तो है लेकिन एक समस्या है … वहाँ लघुशंका के लिए जो जगह बनी है उसकी दीवार सिर्फ चार फीट है … और तू तो लंबा है… नियम ये होता  है कि कोई खड़े हो कर पेशाब न करे… और अगर तू खड़ा होता है …. तो तेरा सर ऊपर से दिखेगा … किसी ने टोक दिया… या  कुछ कह दियातो बेईज्ज़ती भी हो जायेगी  …  अनिल बोला यार इस टाईट जींस में बैठूं कैसे … और मेरी तो आदत भी नहीं है …. कुछ देर सोचने के बाद दोनों ने पाइथागोरस का प्रमेय याद करते हुए एक हल निकाला … अतहर ने अपनी टोपी निकाली और अनिल के सर पर लगा दी … बोला जा बेटा… कर ले हसरत पूरी ….  मरता क्या न करता … चल दिए अंदर डरते डरते … और फिर हिन्दुस्तानी जुगाड़ का वो तरीका अपनाया कि एक तीर से दो शिकार हुए  …. हुआ यूँ कि चार फीट की दीवार पर अपना हाथ और सर टिकाते हुए .. समकोण त्रिभुज के कर्ण के आकार में तिरछा खड़ा हो गया और…. इति सिद्धम!… जिससे न तो बैठना पड़ा और न ही सर दीवार के ऊपर दिखा … इस तरह से दोनों महारथियों ने मिल कर जरूरत और रवायत दोनों  को बचा लिया  …

P091009_20.08 athar-2

“सभी को ईद और गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ”

आपका पद्म ……..

10 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. arun
    सितम्बर 12, 2010 @ 04:03:42

    मुझे तो पाइथागोरस नही बल्कि त्रिकोणमिति का सवाल लगता है जिसमे कोण को निकालना है tan थीटा दिया है
    लघुशंका का गणितीय हल
    बहुत बढ़िया सच्चे दोस्त ऐसे ही होते हैं

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  2. jai kumar jha
    सितम्बर 12, 2010 @ 04:35:36

    अगर हम इक्कीसवीं सदी के आधुनिक युग में मानवता की रक्षा नहीं कर पाए तो हमें बचाने ऊपर से भी कोई आने वाला नहीं है …

    एकदम सही और सटीक बात मानवता को हमसब को मिलकर ही बचाना होगा ,इस देश की सरकार में बैठे लोग तो भ्रष्टाचार के आवारा पूंजी की वजह से हैवानियत को फैला रहें हैं …

    आपको भी “सभी को ईद और गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ”

    प्रतिक्रिया

  3. sanjay
    सितम्बर 12, 2010 @ 07:28:08

    जहाँ चाह वहाँ राह – मज़ेदार इंसिडेंट।
    धर्म मजहब के मामले में अपना भी अनुभव आप जैसा ही है, लेकिन एक फ़र्क देखा है। जब तक व्यक्तिगत मित्रता की बात है, दोनों तरफ़ से कोई कमी नहीं होती, लेकिन समाज की या सामूहिक बात आने पर खुद को अल्पसंख्यक मानने वाली मानसिकता हावी हो जाती है। उस समय सही या गलत पर धर्म या मजहब हावी हो जाते हैं।

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  4. ali syed
    सितम्बर 12, 2010 @ 07:28:12

    अतहर और अनिल की जुगलबंदियां सलामत रहें !

    वैसे फोटो में पीछे दिख रहे केले के पौधों से तो अतहर की सेहत ही ठीक लगी 🙂

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  5. शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    सितम्बर 12, 2010 @ 21:04:03

    अच्छा संदेश दिया है इस लेख में.

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  6. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 12, 2010 @ 21:39:37

    आप सबको भी त्योहारों की शुभकामनायें। रोचक घटना।

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  7. समीर लाल
    सितम्बर 13, 2010 @ 08:56:52

    ईद और गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ

    बढ़िया तस्वीरें और पोस्ट.

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  8. ललित शर्मा
    सितम्बर 13, 2010 @ 09:39:00

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  9. rachana dixit
    सितम्बर 13, 2010 @ 20:21:27

    अच्छा संदेश दिया है. आपको भी त्योहारों की शुभकामनायें।

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  10. narzuty
    फरवरी 27, 2011 @ 02:01:04

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