जो हल निकाला तो सिफर निकले

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रात कब बीते कब सहर निकले

इसी सवाल में उमर निकले


तमाम उम्र धडकनों का हिसाब

जो हल निकाला तो सिफर निकले


बद्दुआ दुश्मनों को दूँ जब भी

रब करे सारी बेअसर निकले


हर किसी को रही अपनी ही तलाश

जहाँ गए जिधर जिधर निकले


खुद  ही  काज़ी रहे  गवाह भी थे

फिर भी इल्ज़ाम मेरे सर निकले


किसी कमज़र्फ की दौलत शोहरत

यूँ लगे चींटियों को पर निकले


उजले कपड़ों की जिल्द में अक्सर

अदब-ओ-तहजीब मुख्तसर निकले

….आपका पद्म ..06/09/2010

23 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दर्शन लाल
    सितम्बर 06, 2010 @ 21:01:00

    वाह …

    प्रतिक्रिया

  2. Nishant
    सितम्बर 06, 2010 @ 21:12:24

    बहुत खूब. आपका अंदाज़-ए-बयां भी है सबसे जुदा.

    प्रतिक्रिया

  3. अविनाश वाचस्‍पति
    सितम्बर 06, 2010 @ 21:24:48

    कम निकले या ज्‍यादा निकले
    बाहर तो निकले अंदर न छिपले

    जो छिपले अंदर तो ढूंढने पर
    हमारे
    हजूर मेरे दीवार वाली छिपकली निकले

    प्रतिक्रिया

  4. jai kumar jha
    सितम्बर 06, 2010 @ 21:34:56

    शानदार…क्या पोस्ट निकले…

    प्रतिक्रिया

  5. महफूज़ अली
    सितम्बर 06, 2010 @ 22:58:13

    बहुत ही सुंदर रचना…

    प्रतिक्रिया

  6. sanjay
    सितम्बर 06, 2010 @ 23:08:13

    बहुत खूब् पद्म सिंह जी, तस्वीर सहित गज़ल भी बहुत खूबसूरत। बस एक शंका –
    “हमीं काज़ी थे और गवाही भी” में ’गवाही’ ठीक है क्या? शायद…!
    फ़िर कहता हूँ, गज़ल बहुत खूबसूरत है ।

    प्रतिक्रिया

    • padmsingh
      सितम्बर 07, 2010 @ 05:58:32

      हाँ मै सोच रहा था इस पर किसी ने कुछ कहा क्यों नहीं …🙂 आपकी आपत्ति जायज़ है … “मै ही अपने पक्ष में गवाही था” इस भाव से लिखा था … फिर भी मै इसे थोड़ा और स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ

      प्रतिक्रिया

  7. समीर लाल
    सितम्बर 07, 2010 @ 04:22:45

    वाह! बहुत खूब!

    प्रतिक्रिया

  8. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 07, 2010 @ 11:14:53

    उम्दा पोस्ट और भाव।

    प्रतिक्रिया

  9. ललित शर्मा
    सितम्बर 08, 2010 @ 08:30:31

    प्रतिक्रिया

  10. sarwat m. jamal
    सितम्बर 08, 2010 @ 10:02:31

    इंतेज़ार का कडवा फल चखने का वक़्त आ गया. आप ने याद किय और हम हाज़िर हो गए. गज़ल के लेबेल तले यह पोस्ट बताती है कि आप मेहनत में थोडी कमी बरत रहे हैं. अपने अन्दर छुपे हुए रचनाकार/गज़लकार को कुरेदिए, आप में मुझे असीम सम्भावनाएं नज़र आती हैं. किसी समर्थ रचनाकार से कुछ दिन सलाह-मशविरा कर लें, फिर मुझे लगता है कि आप प्रार्थी को चैलेन्ज करने की स्थिति में होंगे.

    मेरी बात का बुरा नहीं मानना भाई, कहोगे तो कमेंट वापस ले लूंगा.

    प्रतिक्रिया

    • padmsingh
      सितम्बर 08, 2010 @ 10:19:19

      ये बात तो मै स्वयं स्वीकार करता हूँ कि अभी मैंने गजल कहना शुरू ही किया है … मैंने इसी लिए आप जैसे महारथियों का आवाहन किया है …. लेकिन एकलव्य को सही दिशा नहीं मिली है अभी तक …वैसे तो मेरी कमियों को उजागर करते हुए कुछ सुधार-सलाह की दरकार थी … फिर भी कोशिश जारी रहेगी …

      प्रतिक्रिया

  11. digamber
    सितम्बर 08, 2010 @ 17:49:15

    हमीं काज़ी थे और गवाही भी
    फिर भी इल्ज़ाम मेरे सर निकले

    ग़ज़ब का शेर है … सुनहां अल्ला … मंझे हुवे शेर हैं सब …

    प्रतिक्रिया

  12. ravi thakur
    सितम्बर 08, 2010 @ 23:10:47

    Hamesha ki Tarh khub likha……Thakur shahab

    प्रतिक्रिया

  13. Mohammed
    सितम्बर 09, 2010 @ 00:11:48

    hi………i’m a 15 year old blogger…..currently taking part in the “My Demand” contest……
    please read my post n support me by voting if u find it interesting….

    My post link: http://www.indiblogger.in/indipost.php?post=30629

    Greetings,
    Mohammed!

    प्रतिक्रिया

  14. ali syed
    सितम्बर 09, 2010 @ 08:25:09

    गज़ल के शिल्प की बात महारथी जाने पर मुंसिफ ,मुजरिम ,गवाह का एक जिस्म होना हमें पसंद आया !

    प्रतिक्रिया

  15. रवि कुमार, रावतभाटा
    सितम्बर 09, 2010 @ 22:40:02

    तमाम उम्र धडकनों का हिसाब
    जो हल निकाला तो सिफर निकले…

    बेहतर…

    प्रतिक्रिया

  16. rajshekharsharma
    दिसम्बर 23, 2010 @ 11:33:06

    खुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम
    कहीं ऐसा न हो, याँ भी , वही काफ़िर सनम निकले – मिर्ज़ा ग़ालिब

    कुछ भी हो , आपके लेखन में उर्दू का प्रयोग बहुत अच्छा लगा
    http://rajshekharsharma.wordpress.com/

    प्रतिक्रिया

  17. kwatery grzybowo
    फरवरी 27, 2011 @ 02:00:42

    Some times its a pain in the ass to read what people wrote but this internet site is very user pleasant! .

    प्रतिक्रिया

  18. sangeeta swarup
    जनवरी 13, 2013 @ 12:03:05

    बहुत खूबसूरत गज़ल

    प्रतिक्रिया

  19. Onkar Kedia
    जनवरी 13, 2013 @ 17:53:49

    बहुत सुन्दर शेर

    प्रतिक्रिया

  20. anita
    जनवरी 13, 2013 @ 18:24:42

    गहन भाव लिये खूबसूरत ग़ज़ल…!
    ~सिफ़र से उठकर किया शुरू जब सफ़र हमने…
    मंज़िल हाथ आई ना … रस्ते आबलापा निकले…~
    ~सादर!!!

    प्रतिक्रिया

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