घुमक्कड़ी -१ तुगलकाबाद किला (दिल्ली)

 

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आते जाते घुमते फिरते जहाँ कुछ रोचक मिलेगा आगे घुमक्कड़ी के अंतर्गत प्रस्तुत करता रहूँगा … फिलहाल कुछ दिन पहले जमा की गयी तुगलकाबाद (दिल्ली) किले की एक संक्षिप्त रपट –

दिल्ली के दक्षिणी छोर पर बदरपुर बार्डर से लगभग  तीन किलोमीटर  पश्चिम की ओर जाते समय विशाल पर्वत श्रृंखला जैसी किले की प्राचीरें दिखती हैं … मुग़ल शासक गयासुद्दीन तुगलक (1321-1325 AD) ने दिल्ली पर चढ़ाई करने पर इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया. 1321 से 1323 तक उसने  कूटनीतिक कारणों से उसने अपनी राजधानी शहर के चारों तरफ़ एक विस्तृत और विशाल किले का निर्माण करवाया. यह किला अपने आपमें पत्थरों को ढो और एकत्र कर बनाए गए किसी भी P050110_01.57_[01]स्थापत्य की विशालता मे अपना एक स्थान रखता है. किला लगभग छह किलोमीटर के परिक्षेत्र मे लगभग अष्टभुजी आकृति जैसा पसरा हुआ है. दस से पन्द्रह मीटर ऊंची और मलवे तथा पत्थरों से निर्मित इसकी दीवारों पर जगह जगह विशाल बुर्ज और झरोखे बने हुए हैं. परकोटों मे भी झरोखे इस तरह से बनाए गए हैं कि वाह्य आक्रमण से निपटने मे अंदर बैठी सेना को कम से कम नुक्सान हो. किले मे तेरह भीमकाय द्वार तथा तीन अंदरूनी द्वार हैं जिन तक जाने के लिए भी रास्ते इस तरह से बने हैं कि किसी बाहरी अतिक्रमण को परकोटों से सीधे देखा जा सके.S

तुगलकाबाद किले के अंदरूनी भाग मे नगर की गलियाँ घर और बरामदे जैसे निर्माण आज बर्बाद और ध्वंस स्थिति मे बिखरे पड़े हैं… पूरे किले मे शायद एक दो ही निर्माण ऐसे हैं जिनकी छतें सलामत हैं. किले के अंदर एक स्थल को विजय महल के नाम से जाना जाता है जहाँ पर कुछ हाल, कमरे आदि जैसी आकृतियाँ है… किले से बाहर जाने के लिए सुरंग आदि का भी निर्माण किया गया था जो अब दिखाई नहीं देती हैं.  किले मे सात पानी के टैंक और पानी एकत्र करने के लिए विशाल हौज़ का निर्माण भी किया गया था.  P050110_01.55

इस समय किला ध्वंस स्थिति मे है… इसकी विशालता प्रभावित करती है किन्तु अब दीवारों के अतिरिक्त कुछ भी ठीक हालत मे नहीं है… दिल्ली मे होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के कारण इस किले के दिन भी बहुर आये हैं… दीवारों से उखड़  चुके पत्थरों को पुरानी तकनीक के सहारे ही जोड़ा जा रहा है …

P050110_00.41_[02] कार्य स्थल पर पुरातत्व विभाग के एक रिटायर्ड जूनियर इंजीनियर की देख रेख मे काम चल रहा था.. पूछने पर बताया कि पुराने समय मे सीमेंट नहीं होता था इस लिए देसी तरीकों से किले और अन्य भवनों का निर्माण किया जाता था… उन्होंने बताया कि जुड़ाई के लिए चूना, सुर्की(लाल रंग का गेरू जैसा पदार्थ) और बदरपुर को मिला कर अच्छी तरह से पेराई की जाती थी…P050110_00.41 जबकि  प्लास्टर के लिए चूना, सुर्की,मेथी, बेल की गिरी,उड़द की दाल, गुड़ का चोटा(पुराना गुड़) और सन(पटसन) को मिला कर पेराई की जाती थी… जो सदियों तक के लिए मौसम धूप पानी से बिना प्रभावित हुए मज़बूत बना रहता था…

 

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लाल किले से काफी बड़े लगभग खंडहर मे बदल चुके इस किले के आसपास शहर ने अपने पंजे गाड़ दिए हैं … कुछ घुमंतू जातियों ने अपने टेंट लगा कर कबाड़ या अन्य इस तरह के कारोबार करने लगी हैं.मुख्य शहर से किनारे की ओर होने के कारण कम लोग ही उधर जाते हैं इस लिए किला उपेक्षित सा ही है…. लेकिन किले की विशालता और फैलाव अच्छा लगता है … जिन्हें खंडहरों और इतिहास देखने का शौक है उनके लिए रोचक जगह है दिल्ली में देखने के लिए ….

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P050110_02.26 किले के दक्षिण की तरफ गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा भी है जो तुगलक द्वारा ही  किले के बाद में बनवाया गया था … देखरेख और सफाई आदि होने के कारण मकबरा अभी अच्छी हालत में है … 

इसके निर्माण के सम्बन्ध में संलग्न शिलालेख से जानकारी ली जा सकती है… मकबरे के कुछ अन्य चित्र संलग्न कर रहा हूँ –

 

 

 

P050110_02.27_[01] P050110_02.27 P050110_02.28 P050110_02.28_[01]

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तुगलकाबाद किले के सामने ही ‘कायामाया’ नाम का आयुर्वेदिक अस्पताल है जिसके संस्थापक स्वर्गीय कवि नानक चंद शर्मा दिल्ली के आयुर्वेदाचार्यों में अग्रणी स्थान रखते थे … ये अस्पताल तत्कालीन प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर जी के द्वारा स्थापित और उद्घाटित किया गया था … आज कल शर्मा जी की पुत्र वधू अस्पताल चला रही हैं … विशेषतः महिला रोगों के लिए बहुत कारगर चिकित्सा यहाँ उपलब्ध है … ये स्वानुभूत है P050110_01.32_[01] P050110_01.32

5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण पाण्डेय
    सितम्बर 05, 2010 @ 22:05:49

    आपके चित्रों के साथ पर्यटन सजीव हो गया।

    प्रतिक्रिया

  2. ललित शर्मा
    सितम्बर 06, 2010 @ 03:15:17

    वाह, अबकी बार हम भी यहाँ जाना चाहेंगे।
    कभी ख्याल ही नहीं आया कि इसे देखा जाए।

    प्रतिक्रिया

  3. shankar dutt
    सितम्बर 07, 2010 @ 19:21:49

    पद्य जी पुरानी यादें ताजा हो गयी लगभग पंद्रह साल हो गए उस इलाके में घूमे | अब तो आपके चित्र देख कर लग रहा है कि उसका जीर्णोद्धार हो गया है | अच्छी जानकारी दी | धन्यवाद |

    प्रतिक्रिया

  4. mariouana
    सितम्बर 08, 2010 @ 17:02:52

    namaste… meri hindi itni achchi nahin hain lekin koshish kartha hoon🙂

    aapki ek help chahiye thi… mein indiblogger me ek contest me

    bhaag le raha hoon aur aapki vote ki bohut zaroorat hain..
    krupya post padkar zaroor vote karein…

    http://www.indiblogger.in/indipost.php?post=30610

    bahut bahut dhanyavaad… bahut mehebaani hogi…

    प्रतिक्रिया

  5. ali syed
    सितम्बर 09, 2010 @ 00:42:03

    सुन्दर वृत्तान्त !

    प्रतिक्रिया

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