शह मिले या मात… देखी जायेगी

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साल… दिन…शामें…लम्हे… जाने कितने ठहरावों की  फेहरिस्त  है हमारे माज़ी की डायरी मे…..कभी फुर्सत के पलों मे अचानक कोई सफहा दफअतन उलट गया तो अपनी जमा पूँजी मे से कुछ गिन्नियां तो कुछ कौडियाँ झाँकती दिखीं …  जीवन के हर पल पर हम रुक कर अपनी मौजूदगी का खुद ही इतिहास बनाते रहने की कोशिश करते रहे … जाने कितने पड़ावों की खट्टी मीठी यादों को अपने एहसासों के गिर्द लपेटे दिन ब दिन भारी होते रहे ….  हम अपने  बीते पलों को अपनी पोटली मे लटकाए घुमते रहे … न चाहते हुए भी … खुशफहम यादों ने भले साथ छोड़ दिया हो … हर अनचाहे पलों की किर्ची गाहे बगाहे अपनी मौजूदगी जरूर दर्ज करवा जाती है …. और ठीक उसी समय जब कभी नहीं चाहा कि वो यहाँ हो… जन्मदिन, वार्षिकी और जाने क्या क्या मनाते रहे और खुश होते रह…  किस बात की खुशी मनाते हैं हर पल… इसी बात की न ? … कि जो आने वाला कल है उसका क्या भरोसा … कम से कम हमारा माज़ी तो हमारी थाती है … इसीलिए तो हर पल को ठहर कर गौर से देख लेना चाहते हैं… जी लेना चाहते हैं … सामने का रास्ता धुंध से पटा है … अभी हैं अभी नहीं रहेंगे …. इसी लिए तो साल दर साल… लम्हे दर लम्हे …इतिहास बनने के लिए पल पल समेटते रहे ….रुकते रहे… ठहरते रहे  ….  लेकिन जो ठहरा नहीं कभी….. वो समय ही तो था ….

चंद अशआर आपकी नज़र कर रहा हूँ …. जहाँ सुधार की गुंजाइश हो ज़रूर कहें … बेहिचक कहें ….

Masks

जीस्त की सौगात देखी जायेगी             (जीस्त =जिंदगी)

शह  मिले  या मात देखी जायेगी

धूप है तो धूप से लड़ बावरे

रह गई बरसात,   देखी जायेगी

एक जुगनू को जला कर, बुझा कर

तीरगी की ज़ात देखी जायेगी              (तीरगी=अँधेरा)

मोहोब्बत की थाह पाने के लिए

जेब की औकात देखी जायेगी

बात कहने भर से बनती नहीं बात

बात मे कुछ बात देखी जायेगी

………आपका पद्म ०९/०१/२०१०

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14 thoughts on “शह मिले या मात… देखी जायेगी

    दर्शन लाल said:
    सितम्बर 1, 2010 को 4:02 अपराह्न

    एक जुगनू को जला कर, बुझा कर
    wah wah …

    jai kumar jha said:
    सितम्बर 1, 2010 को 4:08 अपराह्न

    बहुत ही उम्दा और सार्थक पोस्ट ..शानदार …

    rashmi prabha said:
    सितम्बर 1, 2010 को 6:06 अपराह्न

    बात कहने भर से नहीं बात
    बात को अंजाम दो
    शह और मात देखी जाएगी ….

    ali syed said:
    सितम्बर 1, 2010 को 6:17 अपराह्न

    “धूप है तो धूप से लड़ बावरे

    रह गई बरसात, देखी जायेगी

    एक जुगनू को जला कर, बुझा कर

    तीरगी की ज़ात देखी जायेगी ”

    सुन्दर अभिव्यक्ति !

    प्रवीण पाण्डेय said:
    सितम्बर 1, 2010 को 8:30 अपराह्न

    गज़ब की आवारगी है।

    arsh said:
    सितम्बर 1, 2010 को 8:35 अपराह्न

    आदाब ,
    कहीं आपकी टिपण्णी देखी फिर उधर से होते हुए आपके पास आ पहुंचा … सटीक बातें ज्यादा पसंद है इसलिए … आपके ब्लॉग पर पहली दफा ही आना हो रहा है …. इसलिए थोडा संकोच कर रहा हूँ कुछ बिलेलान कहने में … पहले तो आपकी मेल आईडी धुन्डी असफल होने पर यहाँ टिपण्णी कर रहा हूँ …. आपकी ग़ज़ल में कहन अछे हैं बहुत पसंद आये मगर ग़ज़ल बह’र पे थोड़ी और कसी जाती तो मज़ा दुगना हो जाता … मेरी बात को अन्यथा ना लें …

    आपका
    अर्श

      padmsingh responded:
      सितम्बर 1, 2010 को 9:04 अपराह्न

      अर्श जी ….. बहुत शुक्रिया आपका ब्लॉग पर आने के लिए … और उससे भी ज्यादा सलाह देने के लिए ..

      बेहतर कह सकने की कोशिश जारी है ,… और रहेगी …
      मेरा ईमेल है – ppsingh8@gmail.com

    Rohit Jain said:
    सितम्बर 1, 2010 को 8:58 अपराह्न

    उम्दा रचना…

    Manju Mishra said:
    सितम्बर 1, 2010 को 10:23 अपराह्न

    जीस्त की सौगात देखी जायेगी
    शह मिले या मात देखी जायेगी
    धूप है तो धूप से लड़ बावरे
    रह गई बरसात, देखी जायेगी

    एक एक लाइन इतनी ख़ूबसूरत बन पड़ी है कि पढ़ कर बस, मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा “वाह क्या ग़ज़ल है क्या रवानी है” लेकिन “एक जुगनू को जला कर, बुझा कर ” में लय थोड़ी टूटती सी लगी

    sanjay said:
    सितम्बर 2, 2010 को 12:40 पूर्वाह्न

    just stunning,
    “एक जुगनू को जला कर, बुझा कर

    तीरगी की ज़ात देखी जायेगी”

    लय बेशक मामूली सी टूट रही है, लेकिन रवानी पर कोई फ़र्क नहीं।

    बहुत अच्छी गज़ल लगी।

    समीर लाल said:
    सितम्बर 2, 2010 को 1:24 पूर्वाह्न

    वाह!! क्या बात है!

    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

    kaushal said:
    सितम्बर 2, 2010 को 2:39 अपराह्न
    रघु said:
    सितम्बर 3, 2010 को 12:34 अपराह्न

    जन्मदिन, वार्षिकी और जाने क्या क्या मनाते रहे और खुश होते रह… किस बात की खुशी मनाते हैं हर पल… इसी बात की न ? … कि जो आने वाला कल है उसका क्या भरोसा … कम से कम हमारा माज़ी तो हमारी थाती है … इसीलिए तो हर पल को ठहर कर गौर से देख लेना चाहते हैं… जी लेना चाहते हैं …

    बहुत सार्थक बात कही है आपने .
    वाह ठाकुर साहब वाह …

    alko said:
    फ़रवरी 27, 2011 को 2:00 पूर्वाह्न

    Woh I enjoy your content , saved to my bookmarks ! .

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