रोना हज़ार रोते हैं (व्यंहज़ल)

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लिखते लिखते सोच रहा था ये क्या लिख रहा हूँ मै ? गज़ल का शिल्प, हास्य का रस, और व्यंग्य की तासीर का मिलाजुला स्वरुप देख कर मन मे आया कि इसे क्या कहूँ .. और फिर शायद एक नयी विधा या शब्द का जन्म हुआ  ऐसा लगता है….

व्यंग्य+हास्य+गज़ल=(व्यंहज़ल)

तो व्यंहज़ल अर्ज़ है……..हल्के फुल्के मन से मुस्कुराते हुए स्वीकारिये …

अंतिम शेर संजीदा एहसासों की शिद्दत से अभिव्यक्ति है…

रोना    हज़ार   रोते  रहे देश काल के

फेंके  न आस्तीं के संपोले निकाल के

 

चारों तरफ़ बिछी है सियासत की गंदगी

यारों कदम बढ़ाना  जरा  देख भाल  के

 

भेजा वही है,   सोच वही,   आदतें वही

बदले हैं कलर लल्ला ने सिर्फ बाल के

 

मिलते ही सुकन्या ने हाइ गाइ! यूँ कहा

आसार  नज़र आने लगे चाल ढाल के

 

लहसुन  पेयाज़ मसाले  का  त्याग देखिये

साहब ने मछली खाई तो वो भी उबाल के

 

कुछ भी न दिया हो विकास ने यहाँ मगर

झुरऊ  मज़े लेते  हैं  सरे-शाम   मॉल   के 

 

इस दौर फर्ज-ओ-फन की  खैर बात क्या करें

ईमान  खरीदे गए सिक्के  उछाल   के

 

 

……… आपका पद्म २२-०८-२०१०

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13 thoughts on “रोना हज़ार रोते हैं (व्यंहज़ल)

    प्रवीण पाण्डेय said:
    अगस्त 22, 2010 को 8:35 पूर्वाह्न

    इसमें कोई धोने जैसी ध्वनि को जोड़ लें। धुलाई के लिये बिल्कुस सही छन्द है यह।

    प्रवीण पाण्डेय said:
    अगस्त 22, 2010 को 8:35 पूर्वाह्न

    *बिल्कुल

    राजीव भरोल said:
    अगस्त 22, 2010 को 8:45 पूर्वाह्न

    पद्म जी,
    बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल. सभी शेर पसंद आये.

    “भेजा वही..” और “मछली उबाल के” वाले शेर खास तौर पर अच्छे लगे.

    Shiv said:
    अगस्त 22, 2010 को 12:18 अपराह्न

    बहुत बढ़िया. व्यंहज़ल अद्भुत है.

    महेश सिन्हा said:
    अगस्त 22, 2010 को 2:46 अपराह्न

    इस दौर फर्ज-ओ-फन की खैर बात क्या करें

    ईमान खरीदे गए सिक्के उछाल के

    Pramod Tambat said:
    अगस्त 22, 2010 को 4:02 अपराह्न

    बहुत जोरदार। बधाई।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    http://www.vyangya.blog.co.in
    http://vyangyalok.blogspot.com

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    अगस्त 22, 2010 को 8:28 अपराह्न

    भेजा वही है, सोच वही, आदतें वही
    बदले हैं कलर लल्ला ने सिर्फ बाल के

    इस दौर फर्ज-ओ-फन की खैर बात क्या करें
    ईमान खरीदे गए सिक्के उछाल के

    क्या खूब नज़रिया समेटे हैं….

    mithilesh said:
    अगस्त 22, 2010 को 10:18 अपराह्न

    मै ब्लोगर महाराज बोल रहा हूँ

    मुझे पता चला है कि मिथिलेश भाई को महफूज भाई के खिलाफ भड़काने वाला कोई और नहीं वहीं नारी विरोधी अरविंद मिश्रा है । मुझे पता चला है कि अरविंद मिश्रा ने महफू भाई और अदा दीदी के खिलाफ ,मिथिलेश के कान भरे हैं । मिथिलेश एक अच्छा लेखक है, इस उम्र में जैसा वह लिखता है हर कोई नहीं लिख सकता , वह ऊर्जावान लेखक है जिसका अरविंद मिश्रा गलत उपयोग कर रहा हैं, आईये इस ढोंगी ब्लोगर का वहिष्कार करें , फिर मिलेंगे चलते-चलते । अभी ये मेरी पहली पोस्ट है, आगे और भी खुलासे होंगे । तब तक के लिए नमस्कार ।

    sanjay said:
    अगस्त 22, 2010 को 10:34 अपराह्न

    गज़ब की पोस्ट लगी साहब।
    और ब्लॉग का स्वरूप भी आपकी क्रियटिविटी दर्शा रहा है। लगता है अपना काफ़ी समय इस ब्लॉग पर खर्च होने वाला है। हा हा हा।

    आभार स्वीकार करें।

    neeshoo said:
    अगस्त 22, 2010 को 10:46 अपराह्न
    indu puri said:
    अगस्त 24, 2010 को 1:51 पूर्वाह्न

    व्यहंजल ??
    हा हा हा क्या खूब नया शब्द ढूँढा है व्यहंज़ल .भाषा का विकास इसी तरह नए शब्दों की उत्पत्ति से होता है. पीकोक,पीहेन …फिर पीचिक या पीचिक्स नाम सुना?
    नही पर मैंने कहा क्यों नही हो सकता.अच्छे इंग्लिश के विद्वान सोच में पड गए….
    हा हा हा
    ऐसिच हूं मैं भी.
    कवि-सम्मलेन में जैसे हमे भी शामिल कर लिया,सजीव चित्रण इसे ही कहते हैं.बाबा किसका आखिर?????
    इस दौर फर्ज-ओ-फन की खैर बात क्या करें
    ईमान खरीदे गए सिक्के उछाल के ‘
    एकदम सच सच वो भी खरा खरा.
    यूँ कहूँ तो बुश का जूता ????(ही ही जूता बुश का थोड़े ही था) वो आप भी मारना सीख गए हैं वो भी उल्टा जूता. तडाक…..व्यहंजल …और भी लिखना. त्रिवेणी ले आये आप…..??? तुम तो बाबु!

    रानीविशाल said:
    अगस्त 25, 2010 को 3:41 पूर्वाह्न

    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल ….सारे शेर पसंद आए !
    मेरे भैया …..रानीविशाल
    रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाए !!

    shikha varshney said:
    अगस्त 25, 2010 को 7:26 अपराह्न

    बहुत बढ़िया.

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