हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

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हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

जैसे कोई सपना थक कर टूटा लगता है

महल चुने, दीवारें तानी चुन चुन जोड़ा दाना पानी

लाखों रिश्तों में अपनी सूरत ही लगती है अनजानी

कर्तव्यों की कारा में मन का पंछी बिन पंख हो गया

अनजाने अनचाहे पथ पर चलते जाना भी बेमानी

मन उपवन का नकली हर गुल बूटा लगता है

हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

सोने की दीवारें भी बंदी की पीर न हर पाती हैं

यादों की दस्तक पर, अनजाने आँखें भर आती है

पीछे मुड़ कर देखो तो कल अभी अभी सा लगता है

आगे जीवन के दीपक की बाती चुकती जाती है

आईने का मंजर लूटा लूटा लगता है

हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

जीने का पाथेय चुकाना होता है हर धड़कन को

साँसे देकर पल पल पाना होता है जीवन धन को

जीना भी व्यापार हुआ पाना है तो देना भी है

जैसे तैसे समझाना पड़ जाता है पागल मन को

ऊपर वाले का भी खेल अनूठा लगता है

हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

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9 thoughts on “हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

    ismat zaidi said:
    अगस्त 1, 2010 को 6:59 अपराह्न

    जैसे कोई सपना थक कर टूटा लगता है

    पद्म जी ,
    ये एक अकेली पंक्ति ही पूरे जीवन की व्यथा बता रही है
    पूरी कविता ही बहुत अच्छी है
    उचित स्थान पर उचित शब्दों का प्रयोग आप की विशेषता है
    बधाई

    aradhana said:
    अगस्त 1, 2010 को 10:05 अपराह्न

    बहुत अच्छी कविता है पद्म जी. चुने हुए शब्द और सुंदर भाव. पर आज मित्रता दिवस के अवसर पर ऐसी कविता क्यों?

      padmsingh responded:
      अगस्त 1, 2010 को 10:22 अपराह्न

      बहुत बहुत शुक्रिया आपका हिम्मत बढाने का …
      दोस्ती मेरे लिए किसी दिवस की मोहताज नहीं है आराधना जी … ऐसे में तो एक शे’र याद आता है
      दिल में छुपा के रक्खी है तस्वीर यार की … जब जी किया गर्दन झुकाई और देख ली ….
      और फिर आप सब का साथ और स्नेह तो है ही

    jai kumar jha said:
    अगस्त 1, 2010 को 10:08 अपराह्न

    क्या बात है आज तो एकदम उदासी छाई है जो लेखनी में झलक रही है ,ऐसे उदास होने से काम नहीं चलेगा अभी तो धौलपुर भी जाना है ,पूरे देश के इमानदार लोगों को इकठ्ठा कर लड़ाई भी लड़नी है और लूटेरों से इस देश और समाज को भी बचाना है | आप जैसे लोगों से देश और समाज को बरी आशा है |

      padmsingh responded:
      अगस्त 1, 2010 को 10:19 अपराह्न

      मुझे अंदेसा था ऐसे प्रश्नों का … आज ही दो ओज की रचनाएँ मेरी गलती से डिलीट हो गयीं जो मुझे याद भी नहीं हैं … कई दिनों से कोई पोस्ट नहीं लिख पाया था सो … जैसा बन पड़ा लिखा और आप सब की नज़र कर दिया … कवि की कल्पना को व्यक्तिगत रूप में देखना उचित है क्या ?

    प्रवीण पाण्डेय said:
    अगस्त 2, 2010 को 8:17 पूर्वाह्न

    आज ही कहीं पढ़ रहा था कि सच्चे के साथ दुख बाटना किसी झूठे के साथ खुशी बाटने से अधिक श्रेयस्कर है।

    इंदु पुरी गोस्वामी said:
    अगस्त 2, 2010 को 9:43 पूर्वाह्न

    कवि की कल्पना को व्यक्तिगत देखना सचमुच सही नही. किन्तु क्या वो सब दूसरों के मन और पीड़ा को बाहर रखता है?
    मैं तो ये मानती हूँ रचनाओं में पात्र की हँसी,पात्र के आँसू ‘उसके’ नही होते.पात्र तो रचनाकार से जन्म लेता है तो वो रचना या रचनाकार से अलग कैसे हो सकता है. इसी तरह बिना स्वय दर्द को जिए कोई दर्द के गीत यूँ नही गा सकता.
    हा हा हा
    कहोगे इसमें हँसने की क्या बात है?
    शेर और आँसू?
    और इतना गन्दा चित्र लगाया .इसी वक्त हटाओ इसे .
    कल मित्रता दिवस था आज उसका ‘एंड डे’ हो जाएगा.

    रघु said:
    अगस्त 9, 2010 को 8:56 पूर्वाह्न

    लाखों रिश्तों में अपनी सूरत ही लगती है अनजानी

    पीछे मुड़ कर देखो तो कल अभी अभी सा लगता है
    आगे जीवन के दीपक की बाती चुकती जाती है

    वाह पद्म जी वाह आपकी ये
    पंक्तिया बहुत कुछ कह रही है !!

    noclegi rowy said:
    फ़रवरी 27, 2011 को 2:00 पूर्वाह्न

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