दिन: जुलाई 11, 2010

आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा-२)

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गतांक से आगे —

निर्दोष ब्रह्मपाल लखनऊ की आठ महीने पन्द्रह दिन की जेल काट कर आया तो उसका मन प्रशासन और पुलिस के भ्रष्टाचार के प्रति विरक्ति से भर गया था… जेल मे रह कर उसने जो कुछ भी देखा सुना उसने उसे पुलिस के प्रति मानसिक रूप से विद्रोही बना दिया… लेकिन एक गरीब कर भी क्या सकता था … बूढ़ी माँ की जिद पर उसने ब्रह्मवती से विवाह कर लिया. और आजीविका के लिए मजदूरी करने लगा… मजदूरी कर के कुछ पैसे जुटाए और अपने लिए एक रिक्शा ले लिया और परिवार सहित हापुड कोतवाली मे डेरा डाल दिया … वहाँ भी इसने अपने साथ हुए अत्याचार के लिए न्याय मांगने के लिए जद्दोज़हद करता रहा… लेकिन उसे कभी दुत्कार तो कभी पुलिस हवालात तो कभी लात घूंसे भी खाने पड़े …  न्याय पाने के लिए उसने जिलाधिकारी,पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक के सामने अपनी बात रखी लेकिन न् तो मामले की जाँच हुई और न् ही कोई कार्यवाही हुई… दूसरी क्लास तक पढाई करने के बावजूद ब्रह्मपाल मे लेखन की प्रतिभा और समाज के प्रति समर्पण की भावना कूट कूट कर भरी होने के कारण उसने पुलिस की कार्य प्रणाली के सम्बन्ध मे अधिकारियों को हजारों पत्र लिखे…लेकिन कोई हल नहीं निकला … आज वो अपने साथ हुए अन्याय की उम्मीद छोड़ चुका है… आज उसकी एक ही मांग है कि प्रशासन को लिखे गए उसके सारे पत्र वापस कर दिए जाएँ …

लचर पुलिस व्यवस्था के विरूद्ध  संघर्ष –

अपने साथ हुए अत्याचार का कोई न्याय मिलते न देख ब्रह्मपाल ने पुलिस  प्रशासन के प्रति विरोध का अनूठा तरीका अपना लिया … रिक्शा ही उसकी आजीविका का एक मात्र साधन था… उसने एक दिन खुद ही पुलिस की वर्दी पहन ली … और रिक्शे पर आज़ाद पुलिस के बोर्ड लगा लिए… अपने आपको आज़ाद पुलिस के रूप मे इस लिए बदल लिया कि इस पुलिस के पास नेताओं या अधिकारियों का कोई दबाव नहीं है ..आज़ाद पुलिस भ्रष्टाचार के प्रति बिना किसी लाग लपेट के लड़ाई जारी रखेगी … उसने रिक्शा चलाते हुए भी पुलिस का वेश धारण कर लिया और अपने कमाए पैसों से चालान बुक छपवा ली …

अब उसका मिशन है कि रिक्शा चलाते हुए जहाँ भी पुलिस के लोगों को अपनी ड्यूटी से दूर खड़े होते, नशे मे ड्यूटी करते, रिश्वत लेते,या बिना टोपी डंडे के ड्यूटी देते देखता है तुरंत रुक कर पुलिस वाले का चालान काट देता है … और चालान पर नाम सहित कमियों के उल्लेख करने के साथ साथ उस पुलिस वाले से चालान पर हस्ताक्षर भी ले लेता है … हस्ताक्षर न देने पर बवाल खड़ा कर देता है…

जिससे फजीहत के डर से पुलिस वाला हस्ताक्षर कर अपना पिंड छुड़ाता है … और ये चालान एक दो दिन मे एस एस पी आफिस मे बाकायदा कार्यवाही की प्रार्थना के साथ जमा करवा दिया जाता है … ऐसे मे भले पुलिस वाले पर कोई गंभीर कार्यवाही भले न हो लेकिन उसकी फजीहत होना तय  है …  और इसी लिए पुलिस वाले भी उसको देखते ही “राईट-टाइट” हो जाते हैं … जिस पुलिस वाले ने हेलमेट न पहना हो, जिसकी गाड़ी के प्रपत्र पूरे न होँ, या  तिहरी सवारी कर रहे होँ उनका चालान कटना तय है …

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उसका मिशन है कि जिस भ्रष्टाचार और अत्याचार का वो शिकार हुआ है…उसका शिकार कोई और गरीब न हो  इसके लिए उसका यथा-शक्ति संघर्ष लगातार चलता रहता है …

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जहाँ भी उसे लगता है कि व्यवस्था मे कुछ गलत हो रहा है उसके बारे मे प्रशासन को सचेत करने के लिए चिट्ठियाँ लिखना … सरकार की नीतियों के खिलाफ विकास के झूठे साइन बोर्डों पर कालिख पोतना, और अपने तरीके से विरोध दर्ज करवाना उसका रोज़ का काम है … इस सब के कारण अक्सर हवालात की हवा खाता रहता है …. कई बार तो बुरी तरह पीटा भी जाता है…इसी क्रम मे कुछ दिन पहले गाज़ियाबाद कलेक्ट्रेट मे मुख्यमंत्री के विकास सम्बन्धी दावों वाले पोस्टरों पर कालिख पोतने के जुर्म मे कविनगर पुलिस द्वारा अपराध संख्या 371/2010 के अंतर्गत जेल मे निरुद्ध किया गया और उसका रिक्शा भी थाने मे बंद कर दिया गया था जहाँ से अभी कुछ दिन पहले छूट कर आया है….

काफी मशक्कत के बाद रिक्शा भी छूट गया है… और पूर्व की भांति उसका संघर्ष अनवरत चल रहा है … यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपाल मे न्याय न् मिलने से निराशा अवश्य है लेकिन उसका जूनून आज भी वही है … फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उसकी लड़ाई अपने लिए थी और आज वो गरीब जनता के लिए संघर्ष कर रहा है ….

तिरंगा का अपमान –

पिछले काफी समय से “तिरंगा” ब्राण्ड के एक गुटखा कंपनी के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है… इसके अनुसार किसी ऐसी चीज़ का नाम तिरंगा होना… या इस पर तिरंगा छापना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान है… इस सम्बन्ध मे नगर मजिस्ट्रेट गाज़ियाबाद द्वारा उसके प्रार्थना पत्र के आधार पर पुलिस अधीक्षक गाज़ियाबाद को उक्त के सन्दर्भ मे गुटखा कंपनी के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं (कैम्प/एस टी -सी एम/०९ दिनांक २९-०९-२००९) लेकिन न् तो अभी इसकी जाँच पूरी हुई है और न् ही गुटखा कंपनी के विरूद्ध कोई कार्यवाही की गयी है.

और कारवाँ बनता गया

शुरुआत मे जब ब्रह्मपाल इस तरह के विरोध के कार्य करता तो पुलिस के लोग और अधिकारी उसे सरफिरा कह कर या “मानसिक संतुलन ठीक नहीं है” कह कर टाल देते थे… लेकिन धीरे धीरे लोगों और पत्रकारों की उत्सुकता का केन्द्र बनता गया और ब्रह्मपाल के बारे मे ख़बरें छपने लगीं … इससे उसे जानने वालों मे इजाफा हुआ और कुछ समाज सेवी लोग ब्रह्मपाल से मिले और इसके अभियान मे साथ देने की इच्छा प्रकट की …इस तरह ब्रह्मपाल ने स्थानीय लोगों की मदद से “आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति” का गठन किया गया जिसका संस्थापक ब्रह्मपाल को  और अध्यक्ष श्री बी.एस.गौतम को बनाया गया …

आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति

आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति बन जाने से ब्रह्मपाल को लोगों का समर्थन और अधिक मिलने लगा …उक्त समिति के तत्वाधान मे बहुत से सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये गए और किये जाते हैं  …इस समिति के माध्यम से दो अनाथ और  गरीब लड़कियों का विवाह करवाया गया … प्रति वर्ष सावन माह मे कांवड के मेले मे इस समिति के माध्यम से कांवडियों के लिए मुफ्त भंडारे का आयोजन किया जाता है …वृक्षारोपण के कार्य करवाए गए जिसका उदघाटन स्वयं सिटी मजिस्ट्रेट ने अपने हाथों से किया …..इसके अतिरिक्त पल्स पोलियो जैसे सरकारी

कार्यक्रमों को भी  सफल बनाने के लिए रैलियाँ निकाली गयीं जिसके पीछे ब्रह्मपाल का जूनून और अथक संघर्ष रहा है … इसके अतिरिक्त गुजरात मे आये भूकम्प पीड़ितों के लिए अथक परिश्रम कर के चंदा इकठ्ठा किया गया और गुजरात भेजा गया…. इसके अतिरिक्त और भी बहुत से कार्य समय समय पर किये जाते रहते हैं… इस सम्बन्ध मे ब्रह्मपाल का कहना है कि जब लोग बुराई का दामन नहीं छोड़ते तो मै अच्छाई का दामन कैसे छोड़ दूँ … लोग कहते हैं क्रम ही पूजा है… लेकिन ब्रह्मपाल का कहना है कर्म तो बुरे भी हो सकते हैं इस लिए “सत्कर्म ही पूजा है” सब से पहले सत्कर्मों की शुरुआत अपने आप से करो … फिर किसी से इसकी अपेक्षा करो… समिति ने पुलिस की छवि सुधारने के लिए राज्य के 70 जिलों के जिलाधिकार्यों को पत्र लिखा है और आवश्यक सलाह दी है … देखना है कि प्रशासन इसे कितनी गंभीरता से लेती है ब्रह्मपाल को सामाजिक कार्यों के लिए कई बार आंबेडकर जन्मोत्सव समिति द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है … आज जब कि वह प्रशासन से नाराज़ है , उसने पिछले पन्द्रह सालों मे प्रशासन को लिखे गए अपने पत्रों को वापस माँगा है …

उल्लेखनीय है कि समाज के बारे मे ऐसी बातें करने वाले ब्रह्मपाल के पास सर छुपाने की भी जगह नहीं है और खुले आसमान के नीचे ही अपना आशियाना बना रखा है… परिवार के नाम पर ब्रह्मपाल की पत्नी और दो बेटे हैं … जिन्हें कभी किसी बरामदे मे तो कभी खुले आसमान के नीचे ले कर रहता है … दिन भर रिक्शा चलाना और इसी कमाई से समाज सेवा करना कितना कष्टसाध्य कार्य है इसे एसी मे बैठे अफसरशाह कैसे और क्यों समझेंगे … लोक सेवक हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं … लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल मे इस कदर डूबे हैं कि उन्हें स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता है … अगर कोई अपवाद आता भी है तो धीरे धीरे इसी भ्रष्टाचार रुपी सागर मे समा जाता है … अगर कोई बच भी गया तो स्थानांतरण आदेश की प्रति हमेशा उसका पीछा करती रहती है … ऐसे मे ब्रह्मपाल जैसा जज़्बा एक आम आदमी के लिए सीख से कम नहीं है… उसका कहना है कि कामयाबी अपनी जगह है और प्रयास करना अपनी जगह … जीते जी मेरा प्रयास चलता रहेगा … १९८८ से अकेला प्रशासन से लड़ जाने वाला यह शख्स प्रधानमन्त्री,लखनऊ सचिवालय,जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी से लेकर राष्ट्रपति तक अकेला संघर्ष कर चुका है .. और आज भी अपने जज्बे पर कायम है …

ब्रह्मपाल का वर्मान पता :

ब्रह्मपाल सिंह

लेखक : आज़ाद पुलिस

बरात घर, खुले आसमान के नीचे

नन्द ग्राम गाज़ियाबाद … फोन :9811394513 (PP)

और अन्त मे …… ब्रह्मपाल के दस्तावेज़ और संघर्ष की कहानी की ये बानगी भर है … बहुत संक्षिप्त और मूल मूल बातें लिखते हुए दो पोस्टें भर गयी हैं …पाठकों के समर्थन पर थोड़ा और प्रकाश डालना चाहूँगा ब्रह्मप्रकाश की व्यथा पर … पद्म सिंह

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आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा -१)

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P100710_10.16_[03]पिछले दस वर्षों से आते जाते देखा है उसे …पुलिस वाले उसे देखते ही अपनी ड्यूटी पर सचेत हो जाते हैं …. खाली सर वाले पुलिस वाले तुरंत सिर पर टोपी पहन लेते हैं … और रिश्वत लेते हाथ  इसे देखते ही यकायक रुक जाते हैं … कृषकाय… साधारण सा दिखने वाला   इंसान…. खाकी वर्दी, सर पर पुलिस की टोपी… और हाथ मे पुलिस जैसा ही डंडा लिए हुए वो अपना पुराना सा रिक्शा खींचते हुए… शहर मे कहीं भी कभी भी दिखाई दे जाता है…. यूँ तो कोई विशेष बात नहीं लगती  है इसमें  .. लेकिन एक बात और होती है जो बरबस लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करती है…. उसके  रिक्शे के आगे पीछे हर जगह “आज़ाद पुलिस” लिखा हुआ है … रिक्शे के पीछे  भी “आजाद पुलिस” और “हम बदलेंगे जग बदलेगा” और “भ्रष्टाचार के  खिलाफ” “अंधा क़ानून”  जैसे स्लोगन लिखे हुए होते हैं …वो चलाता तो रिक्शा है लेकिन अपने आपको आज़ाद पुलिस कहता है.. पल्स पोलियो, दहेज विरोध तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ बैनर लगा कर लोगों को जागृत करने वाले इस व्यक्ति के बारे मे कई बार उत्सुकता हुई कि यह कौन है … यह आजाद पुलिस क्या है ? कौन है वह व्यक्ति जो अपने  आप को आजाद पुलिस कहता है ?आखिर क्यों धूमता है वो अपनी रिक्शे पर आजाद पुलिस का बोर्ड लगा P100710_10.16कर ? आज सुबह अचानक जब उसका रिक्शा सामने से गुज़रा तो मुझसे रहा नही गया और मैंने उसकी वास्तविकता जानने का मन बना लिया …

रिक्शा किनारे लगवा कर मैंने जब अपनी उत्सुकता उसके सामने रखी तो उसने अपने बारे मे जो कुछ बताया वो सुन और देख कर मै हतप्रभ रह गया …. जब मैंने उससे उसके बारे मे पूछा तो उसने कहा भाई साहब मै   तो लेखक हूँ… मैंने अपना जीवन न्याय के लिए संघर्ष और गरीबी मे काट दिया है……लेकिन आज तक मुझे प्रशासन या न्याय व्यवस्था से न्याय नहीं मिल सका है … पिछले पन्द्रह सालों से मै प्रशासन के लचर रवैये और दमनात्मक नीतियों का जीता जागता उदाहरण हूँP100710_10.16_[02]… सरकार की कोई भी नीति गरीबों और लाचारों तक न् पहुँच पाने का कारण है प्रशासन का लचर और गैर जिम्मेदाराना रवैया … उत्सुकतावश उसके बारे मे मैंने कुछ और जानने की नीयत से उसके जीवन के बारे मे पुछा … तो उसने अपनी कहानी प्रमाणों के साथ(जो उसके रिक्शे मे ही गद्दी के नीचे रखे थे) एक एक कर मेरे हाथ पर रख दिए . इसने अपने बारे मे जो कुछ बताया उसे आगे लिखता हूँ .

बात चीत मे शिष्ट और प्रवाहमयी व्यावहारिक बातें करने वाले इस व्यक्ति ने अपना नाम ब्रह्मपाल प्रजापति बताया… सात भाइयों और एक बहन के बीच ब्रह्मपाल का गरीबी ने बचपन से ही साथ नहीं छोड़ा… बचपन मे पढ़ने की इच्छा रखने वाले ब्रह्मपाल गरीबी के कारण केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़ सके बारह वर्ष की कच्ची उम्र मे परिवार के भरण पोषण का जिम्मा ब्रह्मपाल पर होने के कारण चाय की दूकान पर नौकरी करनी पड़ी … खेलने कूदने और पढ़ने की उम्र मे इनके सामने परिवार की दो जून की रोटी का ही लक्ष्य था … लेकिन स्कूल छोड़ने की टीस हमेशा चुभती रही … स्वाभिमान ब्रह्मपाल के स्वभाव मे कूट कूट कर भरा था.. यही कारण था कि वो चाय की दूकान पर नौकरी अधिक दिन न् कर सका और मालिक की गाली गलौच से परेशान हो कर दिल्ली आ गया जहाँ उसने अथक मेहनत कर के कुछ रूपये जोड़ लिए … अपनी दमित इच्छाओं के वशीभूत ब्रह्मपाल ने जीविकोपार्जन के लिए बम्बई का रुख किया और मेहनत करते हुए परिवार को पैसे भेजता रहा …

कुछ सालों बाद परिवार वालों की जिद पर जब ब्रह्मपाल अपने गाँव वापस आया तो फिर बम्बई नहीं गया और परचून की दूकान खोल ली … इसी बीच अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के वशीभूत ब्रह्मपाल ने  कक्षा दो तक की शिक्षा के बावजूद भी अनेक कविताओं और लघु उपन्यासों की रचना की . उसकी इच्छा थी कि उसके उपन्यास पर अगर कोई फिल्म बना दे तो उसकी गरीबी दूर हो जाय.

इसी बीच ब्रह्मपाल का परिचय हापुड़ निवासी एक व्यक्ति शम्भूनाथ शर्मा से हुआ … शम्भूनाथ शर्मा ने जब उसका उपन्यास पढ़ा और लालच दिया कि यदि तुम आठ हजार रुपये का इन्जाम करो तो तुम्हारी उपन्यास पर फिल्म बनवा दूँगा … मेरे जानने वाले बहुत से लोग फिल्म इंडस्ट्री मे हैं …फिर तुम्हें लोग “गम के आँसू” के लेखक के रूप मे जानेंगे …. घर की माली हालत खराब होने के बावजूद ब्रह्मपाल ने आठ हजार रुपयों का इंतजाम किया और कहानी सहित शम्भूनाथ को दे दिया …शम्भूनाथ ने वो कहानी अपनी कह कर किसी प्रोड्यूसर को बेच दी …और ब्रह्मपाल को दुत्कार कर भगा दिया …  इस कहानी पर फिल्म भी बनी…  ब्रह्मपाल का अब तक का जीवन दुःख और संघर्षों से घिरा रहा…. लेकिन यहाँ से उसके संघर्षों का दूसरा अध्याय प्रारंभ होने वाला था…

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