क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

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क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी

स्वप्न बंधे जंजीरों में

आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ

आज समय विपरीत सही

विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ

स्वेद लिखेगा आने वाले

कल को बाज़ी किसकी होगी

झंझावात रुके हैं किससे

राहें होँ अवरुद्ध, भले होँ

जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य

कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षो का फल लाएगी …

हमने सीखा नहीं समय से

डर जाना घुट कर मर जाना

क्रान्ति और संघर्ष रहा है

परिवर्तन का ताना बाना

दुर्दिन के खूनी पंजों से

खेंच सुपल फिर वापस लाना

ठान लिया तो ठान लिया

पाना  है या कट कर मर जाना

थर्रायेंगे दिल दुश्मन के

वो भीषण हलचल लाएगी

क्रांति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी….

याचक बन कर जीना कैसा

घुट घुट आंसू पीना कैसा

रोशन होकर ही जीना है

धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा

घात लगा कर गलियों गलियों

गद्दारों की फ़ौज खड़ी है

तूफानों  से घबरा जाए

वो भी कहो सफीना कैसा

हर पगडण्डी राजमार्ग तक

आज नहीं तो कल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी ….

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15 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. समीर लाल
    जुलाई 08, 2010 @ 08:46:36

    बहुत बढ़िया रचना, पदम भाई///आनन्द आया!

    प्रतिक्रिया

  2. इस्मत ज़ैदी
    जुलाई 08, 2010 @ 08:46:52

    बहुत बढ़िया !
    आप की कविता की सब से अचछी बात इस की धनात्मकता लगती है मुझे ,
    एक जोश ,कुछ कर गुज़रने की भावना देखने को मिलती है यहां आ कर,

    क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
    संघर्षों का फल लाएगी …

    पूरी कविता का सार तो इन दो पंक्तियों में ही मिल जाता है परंतु उचित शब्द प्रवाह के साथ कविता पाठक को बांधे रखती है,
    किसी दूसरे को दोष दिये बिना अपने मिशन की सफलता का ये विश्वास पाठक को भी उत्साहित करता है
    बधाई और धन्यवाद

    प्रतिक्रिया

  3. गिरिजेश राव
    जुलाई 08, 2010 @ 08:52:49

    अति उत्तम। उत्तमोत्तम । इस तरह की प्रवाहमयी और चिंतामुक्त रचनाएँ अब बहुत कम दिखती हैं।

    प्रतिक्रिया

  4. rashmi prabha
    जुलाई 08, 2010 @ 11:58:53

    bahut hi gahree samvednaayen hain isme

    प्रतिक्रिया

  5. इंदु पुरी गोस्वामी
    जुलाई 08, 2010 @ 19:48:14

    हमने सीखा नहीं समय से
    डर जाना घुट कर मर जाना
    क्रान्ति और संघर्ष रहा है
    परिवर्तन का ताना बाना
    वाह मेरे शेर! इसे कहते हैं ‘मर्दों’ की तरह जीवन जीना.
    बाट राष्ट्र की हो या हमारी अपनी जिंदगी की जीने का सही अंदाज़ भी यही है.

    ‘याचक बन कर जीना कैसा
    घुट घुट आंसू पीना कैसा
    रोशन होकर ही जीना है
    धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा ‘

    हा हा हा
    मजा आ गया. अरे! सीता बंजारा जैसी औरत इतनी विकत परिस्थितियों में शेरनी -सी जी रही है और हम जो है उसे नही स्वीकारते जो नही है उसको रोते रहते.बाट समाज और देश की हो तो आलोचक या निरीह बन जाते है. आज मेरा शेर दहाडा एकदम ‘इंदु’जैसा. मन खुश हो गया कविता पढ़ के,जोश भरती हर पंक्ति.
    ‘नया जमाना आएगा’
    आमीन

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  6. प्रवीण पाण्डेय
    जुलाई 08, 2010 @ 22:07:40

    जंगी चेतना संचारित कर गयी आपकी कविता ।

    प्रतिक्रिया

  7. sajid
    जुलाई 09, 2010 @ 00:12:59

    अच्छा ताना बाना !

    प्रतिक्रिया

  8. Pankaj Upadhyay
    जुलाई 09, 2010 @ 10:38:25

    वाह पदम भाई वाह… आज के निराशावादी युग मे आशाओ से ओतप्रोत एक कविता… ये इसीलिये अलग है क्यूकि ये मरी हुयी आशायो को एक बानगी ओक्सीजन दिखाती है… बहुत सुन्दर..

    प्रतिक्रिया

  9. Manju
    जुलाई 09, 2010 @ 11:47:17

    “घात लगा कर गलियों गलियों गद्दारों की फ़ौज खड़ी है ”

    बिलकुल सही कहा आपने, घर के विभीषण ही तो लंका ढहाने का कम कर रहे हैं, पहली जंग तो इनसे छुटकारा पाने की ही लड़नी होगी

    प्रतिक्रिया

  10. Sanjeev Pal
    जुलाई 10, 2010 @ 15:03:29

    Jai Kranti

    प्रतिक्रिया

  11. Ranjit
    जुलाई 10, 2010 @ 17:48:06

    क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
    atal rahe yah vishwas…

    प्रतिक्रिया

  12. ललित शर्मा
    जुलाई 13, 2010 @ 23:02:20

    हर पगडण्डी राजमार्ग तक
    आज नहीं तो कल लाएगी
    क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
    संघर्षों का फल लाएगी ….

    संघर्ष का जज्बा कायम रहे तो मुस्किल नहीं।

    प्रतिक्रिया

  13. ulotki
    फरवरी 27, 2011 @ 02:01:08

    Rattling clear site, thanks for this post.

    प्रतिक्रिया

  14. tulsibhai patel
    जून 11, 2011 @ 18:19:13

    wah ! behatarin ..aapki kalam ko salam sir

    प्रतिक्रिया

  15. सुमित प्रताप सिंह Sumit Pratap Singh
    जून 12, 2011 @ 09:17:03

    बहूत खूब पद्म भाई…

    प्रतिक्रिया

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