आस्था बनाम बाज़ार

वर्षों से रोज़ मोहन नगर की मंदिर,पीर बाबा की मज़ार और हिंडन नदी के किनारे साईं उपवन वाले साईं बाबा के मंदिर पार करते हुए बाज़ार, बहुत सी रिहाईशें और कंक्रीट के फ्लाई ओवर पार करते हुए अपने आफिस पहुँचता हूँ… और इसी रास्ते आना भी होता है… लेकिन मुझे हर आस्था स्थल एक बाज़ार के रूप मे ही दीखता है .. ..जिस दिन पीर पर चमकदार गोटे लगी हरी-हरी चादरों और शीरयों ((प्रसाद की दुकानें, और ट्रैफिक के आगे खड़े हो कर अपनी अपनी दूकान की ओर आकर्षित करते दूकानदार दीखते हैं तो पता चल जाता है आज बृहस्पतिवार (पीर का दिन) है, और आगे साईं बाबा के मंदिर के आगे भी शाम को श्रद्धालुओं की कारों और वाहनों के कारण लगे जाम की स्थिति और फूल माला के साथ खील बताशे और चीनी के गट्टों से सजी धजी दुकानों से पता चलता है कि आज साईं बाबा का दिन है … और नौरात्रों मे तो चुनरी नारियल और फल वालों की तो पौ बारह रहती ही है .. कई बार रुक कर मैंने इन स्थानों पर हो रही गतिविधियों को नजदीक से देखने का प्रयास किया. किसी आराध्य के लिए नियत दिन के बारे मे धार्मिक आस्था की बात तो समझ मे आती है, लेकिन उन दिनों को भुनाने के लिए जो बाज़ार इन धार्मिक स्थलों के निकट पैदा होते हैं, उन्हें देखें तो लगता है कि ईश्वर तक पहुचने के लिए आस्था के अतिरिक्त उनकी अपनी एक अलग और समानांतर व्यवस्था है … इन्हें देख कर तो यही लगता है कि अगर ये न होते तो शायद अपने आराध्य तक पहुँच पाना भी शायद संभव न होता … क्योंकि जैसे ही कोई श्रद्धालु पहुँचता है उसके वाहन से लेकर चप्पल जूते, व्यक्तिगत सामान से लेकर बिना लाइन के दर्शन की व्यवस्था और आराधना सामग्री और नियम तक की व्यवस्था धन के हाथों बिकाऊ दिखती हैं… जहाँ एक आम आदमी को घंटों अपने आराध्य के लिए लाइन मे लगना पड़ता है वहीँ किसी पूंजीपति के लिए धर्मस्थल के ठेकेदार अलग से व्यवस्था करते हैं… और यही नहीं आम आदमियों के लिए तब तक भगवान के द्वार बंद कर दिए जाते हैं…

अक्सर हमारा हरिद्वार और ऋषिकेश जाना होता है … ऋषिकेश से लगभग २३ किलोमीटर ऊपर पहाड़ों पर नीलकंठ महादेव की मंदिर जाना एक सुखद
अनुभव होता है … यहाँ पर कुछ वर्षों पहले जहाँ चंद दुकानें और एक धर्मशाला हुआ करती थीं, गाड़ियां मंदिर के पास तक जाती थीं आज लगभग तीन किलोमीटर पहले ही बैरिकेटिंग लगा कर रोक दी जाती हैं(केवल व्यक्तिगत वाहन) और वहीं से दुकानों का सिलसिला शुरू हो जाता है … तीन किलोमीटर पहले से ही दुकानदार ये कहते हुए मिल जायेंगे कि चप्पल यहीं उतार दें प्रसाद ले लें… अपने हित साधने के लिए आपको तीन किलोमीटर नंगे पैर चलाने की व्यवस्था भी धर्म के इसी बाज़ारीकरण की ही देन है… यही नहीं… नीलकंठ से सात आठ किलोमीटर और ऊपर चढ़ाई चढते हुए माता पार्वती जी और उसके भी आगे भैरव बाबा की गुफा… और उससे भी आगे दो तीन और गुफाएं (जहाँ पैदल जाना भी कष्ट साध्य है) तक पेप्सी कोक और अंकल चिप्स की पहुँच अविरल बनी हुई है …

चढ़ावे की मात्रा और श्रद्धा के बीच क्या सम्बन्ध है ये तो ईश्वर जाने, लेकिन एक बात जो स्पष्ट दिखती है कि लालच,,स्वार्थ और अवसरवादिता ने ईश्वर और आस्था को भी बिकाऊ बना लिया है … और इसके लोगों की मानसिकता भी उतनी ही ज़िम्मेदार है… जो प्रसाद या चढ़ावे के अनुपात के आधार पर अपनी श्रद्धा और आस्था को प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं … और इसमें सीधे सादे (तथाकथित कैटल क्लास) लोगों के साथ पढ़े लिखे बुद्धिजीवी भी शामिल हैं … इस गोरख धंधे मे (यद्यपि गोरखनाथ जी ऐसे धंधेबाज़ नहीं थे) आज बिजनेसमैन, मठाधीशों से ले कर सरकार तक शामिल है …इसी व्यवस्था ने आज नेतागीरी से भी बेहतर विकल्प उपलब्ध कराये हैं… नेताओं को जहाँ हर पांच साल बाद अपनी औकात दुबारा रिन्यू करनी होती है वहीँ आस्था के व्यापारियों को ये सुविधा आजीवन मिलती है … मठों, वक्फ बोर्डोंमे अरबों, करोड़ो की संपत्ति और ज़मीनों का या तो बंदरबांट किया जा रहा है या फिर इनका प्रयोग सामाजिक उत्थान मे  नहीं किया जा रहा है … अंदर की तस्वीर तो कितनी काली है आस्था के नाम पर करोड़ो रूपये बिना किसी उपयोग के बेकार पड़े हैं … जिनका अगर एक हिस्सा भी समाज को वापस कर दिया जाए तो शायद तस्वीर कुछ और हो … इस दिशा मे कुछ सार्थक प्रयास भी हो रहे हैं(नाम लिखना उचित नहीं) जिनको नज़रंदाज़ करना भी उचित नहीं होगा…

जब तक हमें पांच रूपये के फूल या लाखों रूपये के चढ़ावों से श्रद्धा का स्तर मापने की विचारधारा रहेगी ये बाज़ार ऐसे ही पनपते रहेंगे … मुझे यहाँ मुंशी प्रेम चंद की सोने की बिल्ली याद आती है … खेद भी होता है कि हम इक्कीसवीं सदी मे भी दस वर्ष गुज़ार चुके हैं लेकिन रूढ़ियों के फंदे से अभी तक न निकल पाए … पश्चिम की नकल भी करते हैं तो अकल से नहीं करते … स्वार्थ, बाज़ारवाद और अवसर वादिता ने सांस्कृतिक मूल्यों और आस्था तक को बिकाऊ बना दिया है … एक प्रश्न मेरे मन मे उठता है कि “ईश्वर ने अपनी हितसिद्धि के लिए इंसानों की रचना की है … या इंसानों ने अपनी हितसिद्धि के लिए ईश्वर और धर्म की रचना की है ”

जहाँ विवेक रूढ़ियों का दास हो

जहाँ आस्था का कारण त्रास हो

जहाँ भेड़ व्यवस्था का वास हो

वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो

जहाँ प्रेम का मापन उपहार हो

जहाँ योग्यता का द्योतक प्रचार हो

जहाँ मेहनत से बढ़कर आस हो

वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो

जहाँ प्रेम की कीमत पैसा हो

जहाँ न्याय मेमने जैसा हो

जहाँ लघुतर का उपहास हो

वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो

जहाँ मात्रि शक्ति अपमानित हो

जहाँ भ्रष्ट, छली सम्मानित हो

जहाँ दया धर्म का ह्रास हो

वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो

* *

Posted via email from हरफनमौला

12 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. arun
    जून 24, 2010 @ 16:47:08

    बहुत सही कहा आपने पद्म भाई! बहुत दिनों बाद आपकी कोई रचना पढ़ी! देखिये ना किसी नए विकास से पहले वह पहुँच जाते हैं प्राचीन हनुमान मंदिर… कोई बहुत पुराने पीर… खोई पहुंचे हुए फ़कीर .. और फिर शुरू होता है जेब काटने का सिलसिला… मंगल को हनुमान जी के नाम पर… गुरु को साईं बाबा और किसी ना किसी पीर के नाम पर.. शनि को शनि देव के नाम पर… बाजार कि पहुँच हमारे आस्था तक हो गई है.. खतरनाक है.. संस्कृति और सभ्यता के लिए

    प्रतिक्रिया

    • padmsingh
      जून 25, 2010 @ 20:05:17

      मान्यवर अरुण जी ! अच्छा लगा आपको अपनी पोस्ट पर देख कर … रूढ़ियों ने विवेक को अपना कैदी बना रखा है … और इसी के चलते धर्म और आस्था का मज़ाक बनाया जाता है … और अवसरवाद इसे भुनाता है … जितना जेब काटने वाले तैयार हैं उतना ही जेब कटवाने वाले…

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  2. राजीव नन्दन द्विवेदी
    जून 24, 2010 @ 19:57:36

    ईश्वर और मनुष्य दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं.
    राजीवनन्दन बिन रघुनन्दन कुछ नहीं.
    रघुनन्दन बिन राजीवनन्दन कुछ नहीं.

    प्रतिक्रिया

  3. प्रवीण पाण्डेय
    जून 24, 2010 @ 21:09:54

    धर्म की व्यवस्था से मन उचट चुका है । आस्था है और रहेगी क्योंकि वह सिद्धान्त पर सदैव खरी उतरी है ।

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  4. हिमान्शु मोहन
    जून 25, 2010 @ 19:51:05

    पढ़ा सुबह ही था, कमेण्टा नहीं क्योंकि मोबाइल पर लिखने में कठिनाई तो होती ही है। बहुत उत्तम रचना है – छौंक तो लाजवाब!
    पद्म जी – लगे रहिए। आप अब सहज-मुक्त लेखन करें – जो आपकी नैसर्गिक प्रतिभा है। समाज के सरोकारों पर आपकी दृष्टि सोना और उस पर सुहागा आपकी अभिव्यक्ति – जारी रहिए आप – बार-बार, लगातार, चमत्कार!

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  5. aradhana
    जून 26, 2010 @ 00:10:12

    धर्म की व्यवस्था से मेरा कभी मोह ही नहीं था… बड़ा अजीब लगता है ये सब. कभी-कभी तो विरक्ति सी होने लगती है. सबसे ज्यादा तब जब किसी वी.आई.पी. को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है. ऐसा एक बार विंध्याचल में देखा था… तब से और मन उचट गया इन सब से. गरीबों की तो कोई बात नहीं , बड़े-बड़े व्यापारी किस तरह से अपना उल्लू सीधा करते हैं आम जनता की आस्था से. … पर किया भी क्या जाए? बाजार का युग है.

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  6. Manju Mishra
    जून 27, 2010 @ 04:42:56

    बहुत साल पहले ऐसा ही कुछ मैंने भी महसूस किया था जब मै पूर्णागिरी और वैष्णव देवी के मंदिर में गयी थी. बहुत क्षोभ भी हुआ था ऐसी प्रवृत्ति देख कर कि लोगों ने अपनी बाजारवादी मानसिकता से हमारी श्रधा को कितना अर्थ हीन सा बना दिया है .एक सवाल हमेशा मन को कचोटता है की जिस मंदिर में पक्षपात की नीति हो, सबको एक आँख से देखने का भगवान का नियम जिस स्थान पर नहीं चलता क्या वो मंदिर आस्था के घर हो सकते हैं ?

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  7. ललित शर्मा
    जुलाई 03, 2010 @ 07:49:16

    दुकानदारी सब जगह है,
    लूट सके तो लूट और फ़िर लूट

    कभी कभी तो इन जगहों से वितृष्णा हो जाती है,
    लेकिन धर्म के नाम पर इन आडम्बरों की जड़े इतनी गहरी है कि
    आपको न चाह कर जाना ही पड़ता है।

    अच्छी पोस्ट

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  8. Mukesh Kumar Sinha
    जुलाई 06, 2010 @ 09:08:49

    aapki baato se purntaya sahmat hoon!! mera home town jyotirling me se ek Baidyanathdham (Deoghar, jharkhand) me hai, wahan maine apne bachpan se hi dekha hai kaise dharmik aastha ko paisa kamane ka jariya banaya jata hai, kaise Panda (puja karane wale) station se mandir tak sakriya hote hain aur kaise logo ki jeb kat ti hai…………

    lekin fir bhi ye astha sayad hi kam ho, kyonki har koi chahta hai uska future bina kutchh kiye sanwar jaye………..:)

    hai na!!

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  9. rashmi prabha
    जुलाई 07, 2010 @ 19:10:25

    HAR JAGAH PAISE KA BOLBALA HAI…….BHAGWAAN WAHAN HAI YA NAHIN, ISKI BHI FIKRA NAHIN

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