इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ

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बिन तुम्हारे भी क्या किया जाए
अब मरा जाए या जिया जाए

लुट गया सब न कुछ रहा बाकी
लुत्फ़-ए-आवारगी लिया जाए

इस से बेहतर कि शिकायत रोएँ
चाक दामन न क्यों सिया जाए

इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ
उम्र भर मय न फिर पिया जाए

इश्क है आज दिमागों का शगल
यूँ न हो ‘दिल’ से हाशिया जाए

अब तो नेज़ा-ए-इश्क पे सर है
जिस्म अब जाए जाँ कि या जाए

अजब गज़ल है जिंदगी की भी
रुक्न साधूँ तो काफिया जाए

छुट्टियों नेट से दूर होने के कारण एक लंबे अघोषित अंतराल के बाद ब्लॉग पर अपनी सक्रियता पुनः प्रारम्भ करता हूँ …. छुट्टियों में अपने जन्मस्थान या ‘मुलुक’ जाने का उत्साह और लोभ हमेशा उधर को खींचता है … लेकिन अपने जन्मस्थान से काफी दूर होने के कारण वर्ष में एक दो बार ही प्रतापगढ़ जाना हो पाता है … इधर लखनऊ में भांजे की सगाई का समाचार मिलते ही हमें लगा कि मौका भी है दस्तूर भी … इसी बहाने लखनऊ होते हुए प्रतापगढ़ भी कुछ दिन रह लेंगे … हर बार की तरह इस बार भी सब की प्लानिंग यही थी कि कार से गाज़ियाबाद से लखनऊ और फिर प्रतापगढ़ तक का सफर किया जाय . बच्चों का तर्क है कि कार से लोंग ड्राइव के मज़े भी मिल जायेंगे और इसमें जहाँ भी मन हो रुक कर खाते पीते जाया जा सकता है … लेकिन मेरे पूर्व के अनुभव बताते हैं कि कार से हर लॉन्ग ड्राइव का मज़ा मुझे अकेले ही लेना पड़ता है .. क्योकि ड्राइव पर हम जब भी निकले होते हैं… पन्द्रह बीस किलोमीटर के बाद कार की आगोश में मै ही मिलता हूँ.. शेष सभी नींद की आगोश में जा चुके होते हैं … और तब तक सोते रहते हैं जब तक कि गंतव्य न आ जाय … और तो और लगभग पांच सौ किलोमीटर की लंबी यात्रा के दौरान कई बार तो मुझे भी झपकी आ जाती .. और एक सेकेण्ड को कार दायें या बाएं झूल जाती … और ऐसा लगभग हर बार होता … इस लिए इस बार फैसला किया कि हमें कार से न चलकर ट्रेन की सुकूनदायक यात्रा करनी चाहिए … थोड़ी मुश्किल लेकिन बेहद सुकून के साथ लखनऊ पहुँच गए .. लेकिन गर्मी ने अपने पलक/फलक पांवड़े बिछा रखे थे .. या कहिये मोर्चेबंदी कर रखी थी …तीन दिन के लखनऊ प्रवास के दौरान मै व्यस्तता के चलते चाह कर भी अपने ब्लोगर बंधु(छोटा भईया) राजीव नंदन द्विवेदी और माननीय सरवत जमाल साहब से मुलाक़ात नहीं कर सका और प्रतापगढ़ चला गया … प्रतापगढ़ में विद्युत और सड़कों की ऐसी व्यवस्था देख आँखें चुंधिया गयीं … चुन्धियाना वाजिब भी था क्योकि जब दिन में चौबीस घंटे में अट्ठारह घंटे (के बाद) बिजली आती तो आँखें चुंधिया जाती… सौर ऊर्जा से एक छोटा पंखा चलता जो ऊंट के मुहं में जीरे का काम करता …. दिन भर की प्रचंड गर्मी के बाद रात को अगर हवा चल जाती… तब तो रात किसी तरह पार हो जाती लेकिन ऐसा चंद दिनों हुआ … आठ दस दिन बाद एक दिन की आंधी ने मेरे घर की ओर आने वाले कई विद्युत स्तंभ धराशाई कर के रही सही कसर भी पूरी कर दी … गर्मी से बचने का एक ही उपाय था घर से घूमने निकल जाओ … इस लिए अपने छोटे भाई के स्कूल की वैन से रोज़ कहीं न कहीं घूमने का प्लान बनता और निकल जाते घूमने … इसी बीच एक शाम अविनाश वाचस्पति जी का फोन आया कि ललित शर्मा जी दिल्ली की शोभा बढा रहे हैं और आप कहाँ है …मैंने शर्मा जी, और राजीव तनेजा जी से अपनी मजबूरी बताई और क्षमा प्रार्थना भी की … मेरी दूरी और मजबूरी दोनों को ध्यान में रखते हुए मुझे छूट दे दी गयी …. चंद दिनों में वापस गाज़ियाबाद आ गया ….घर से मेरे बड़े भैया अपनी इंडिका से लखनऊ के लिए निकले थे … कुछ समय बाद फोन आया कि दोपहर की धूप में ए सी चला कर सफर करते समय उन्हें झपकी आ गयी और चलते हुए ट्रक में पीछे से टक्कर मार दी है … शुक्र है कि गाड़ी के नुक्सान के अलावा कोई शारीरिक क्षति नहीं हुई क्योकि ट्रक आगे को जा रहा था .. . अफ़सोस करते हुए हम ट्रेन पर बैठे और वापस आ गए .. अब आप सोचेंगे खा म खा इत्ती कहानी बताई इस से क्या फायदा … टेम खराब किया … तो इस कहानी से सीख ये लती है कि

१- ब्लॉग से बिना बताए कुछ दिन के लिए खिसक लेने में कोई हर्ज नहीं
२- ज्यादा लंबा सफर अगर कार से करना हो तो प्रोफेशनल ड्राइवर को साथ ले
लें या दो लोग चलाने वाले होँ
३ -सफर रात का अच्छा होता है लेकिन करीब दो बजे से सुबह तीन बजे के बीच
एक बार नींद ज़बरदस्त आती है … ऐसे में कहीं रुक कर झपकी ले लेना ठीक
होता है
४ -अगर ट्रक में टक्कर मारनी हो तो पीछे से मारें और चलती ट्रक में ही …
५ -लंबे सफर के लिए कार का चुनाव विशेष परिस्थितियों में ही करें
६ -किसी शहर में जाएँ तो कितनी भी व्यस्तता हो … ब्लॉगर खोजें और
मेहमान नवाजी का लुत्फ़ ज़रूर उठायें …(वरना वापस आ कर झूठ मूठ का बहाना
बनाना पड़ेगा)
७ -गरमी के मौसम में प्रतापगढ़ जैसे हिल (हिला देने वाले) स्टेशन पर जाने से
बचें ..

Posted via email from हरफनमौला

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11 thoughts on “इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    जून 20, 2010 को 11:02 पूर्वाह्न

    अजब गज़ल है जिंदगी की भी
    रुक्न साधूँ तो काफिया जाए…

    बेहतर…

    rashmi prabha said:
    जून 20, 2010 को 1:19 अपराह्न
    राजीव नन्दन द्विवेदी said:
    जून 20, 2010 को 4:04 अपराह्न

    आपका यह यात्रा-वृत्तान्त सुन कर मन प्रफुल्लित हुआ. टेम खराब करने जैसी कोई बात नहीं.
    अपना नाम देख कर मन प्रसन्न हुआ और यह जान कर और भी अधिक प्रसन्न हुआ कि हमारे अतिरिक्त माननीय सरवत जमाल जी से भी आप न मिल सके. (हम अकेले नहीं रहे, सरवत जी भी…)
    हाँ सीख तो आपने सभी अच्छी ली है पर पहली सीख का क्या मतलब !!
    बता कर जाइए तो ही अच्छा.

    padmsingh responded:
    जून 20, 2010 को 4:22 अपराह्न

    भईया राजीव…. केवल आप ही नहीं जमाल साब भी खुशकिस्मत रहे 🙂 … पहली सीख का मतलब तो केवल इत्ता …. कि बता के जाओ तो लोग सोचते हैं चलो एक और गया … और माला वाला ले कर भाव भीनी विदाई/श्रद्धांजलि तक दे डालते हैं …. सो चुप चाप जाओ थोड़े दिन आराम करो, स्वाध्याय करो , दूर से मज़े लो और फिर धमक पडो.. ….. बस इत्ता ही

    aradhana said:
    जून 20, 2010 को 6:41 अपराह्न

    बड़ा रोचक यात्रा वर्णन है… प्रतापगढ़ क्या पूर्वी यू.पी. के और जिलों का भी यही हाल है… आपकी सीखें बड़ी उपयोगी हैं. इनको नोट कर लिया है. ऐसी शिक्षाप्रद पोस्ट के लिए आभार (ज्यादा तो नहीं हो गया)… 🙂
    वैसे सच में इतने दिनों बाद आपको सक्रिय देखकर अच्छा लगा.

    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद said:
    जून 20, 2010 को 7:54 अपराह्न

    लुट गया सब न कुछ रहा बाकी
    लुत्फ़-ए-आवारगी लिया जाए

    ये शेर…और यात्रा का ऐसा अनुभव….
    क्या कहा जाए?

    Rohit Jain said:
    जून 21, 2010 को 4:35 पूर्वाह्न
    हिमान्शु मोहन said:
    जून 21, 2010 को 3:35 अपराह्न

    सुझाव अच्छे, यात्रा-वृत्तान्त अच्छा, गज़ल तो माशा-अल्लाह ख़ूब! बहुत ख़ूब!! छ्ठा शे’र तो अपने “कि या जाए” के इन्तज़ाम पे सौ बार दाद का हक़दार है। पद्म जी, बहुत बढ़िया लेखन है आपका – और आशुकवित्व में भी आपकी प्रतिभा “झलक दिखला जा”ती है। कुछ और कहना है, सो ईमेल पर कहना है, मगर मुझे लगता है शायद आपका ईमेल मेरे पास न हो। देखता हूँ। बधाई – वापसी का इस्तक़बाल और ख़ुश-आमदीद…!

    डा. सुभाष राय said:
    जून 24, 2010 को 10:52 पूर्वाह्न

    भाई पद्म, सरवत जमाल उस वक्त आगरे में थे, मेरे साथ. अच्छा लगा आप से मिलकर. आप के ब्लाग को इस बार ब्लागचिंतन में शामिल कर रहा हूं.

    shivangi said:
    जून 28, 2010 को 9:49 अपराह्न

    आपके ब्लॉग की नयी लुक बेहद पसंद आई. मुझे Eastern UP की जगहों के बारे में जरा भी जानकारी नहीं है, पर पढ़ कर अच्छा लगा. आपकी नज़्म ने दिल को छू लिया.

    ललित शर्मा said:
    जुलाई 3, 2010 को 7:45 पूर्वाह्न

    वाह भाई! हम तो कई दिनों से इधर आ ही नहीं पाए। उम्दा गजल के साथ यात्रा का विवरण बढिया रहा। लम्बी यात्रा में दो ड्रायवर होना जरुरी है। देखिए अभी हम दोनों ने 24 घंटे में 900 किमी गाड़ी चला दी थी। दो ड्रायवर होने के यह फ़ायदे हैं। रही ट्रक में पीछे से टक्कर मारने की बात, तो वह भी मार कर देख ली। ट्रक खड़ा था और हम पीछे से घुस गए-गाड़ी कुर्बान हो गयी और हम बच गए, अब कैसे बचे ये उपरवाला ही जानता है, हमें भी नहीं पता। लेकिन जोखिम तो है, अरे! डराना नहीं चाहता- लांग ड्राईव पर जाना चाहिए, जिन्दगी के मजे लेने चाहिए…….

    राम राम

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