लेकिन मैंने हार न मानी …. (पदम सिंह)



राहें कठिन अजानी

संघर्षो की अकथ कहानी

लेकिन मैंने हार न मानी

 

आशाओं के व्योम अनंतिम

स्वप्नों का ढह जाना दिन दिन

संबंधों  के ताने बाने

नातों  का अपनापा पल छिन

क्रूर थपेड़े संघर्षों के

दुर्दिन की मनमानी,

लेकिन मैंने हार न मानी

 

दूर क्षितिज तक अनगिन राहें  

अनबूझी सी  फैली फैली

लक्ष्य कुहासे जैसा धूमिल  

सभी दिशाएँ मैली मैली

कभी समय से टक्कर ली तो  

कभी भाग्य से ठानी

लेकिन मैंने हार न मानी

 

लिए  तकाज़े नए नए नित

समय खड़ा था सांझ सकारे

दुनिया के, मनके, भावों के

किसके किसके क़र्ज़ उतारे

बिखरा बिखरा बचपन देखा

टूटी हुई जवानी …..

लेकिन मैंने हार न मानी

 

कुछ भावों के अश्रु निचोड़े

मनुहारों के धागे जोड़े

टूटे छंद बंद रिश्तों  के

जोड़े कुछ तोड़े कुछ छोड़े

निश-दिन के ताने बाने में

बुनती गई कहानी

लेकिन मैंने हार न मानी

 

यार मिले तो यारी कर ली

दुःख की साझेदारी कर ली

ये न हुआ पर गद्दारों से

मौके पर गद्दारी कर ली

औरों  को माफ़ी दे दी  

पर अपनी गलती मानी

मैंने तम से हार न मानी

 

आँखें नम थी पर मुस्काए

रुंधे गले से गीत सुनाये

शब्दों की माला पहनाई

रस छंदों के दीप जलाए

प्रभु को हंस कर किये समर्पित

नयनों निर्झर पानी

लेकिन मैंने हार न मानी

 

 

 

Posted via email from हरफनमौला

31 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. परमजीत बाली
    मई 05, 2010 @ 21:26:13

    बहुत ही बेहतरीन रचना है…….बहुत बहुत बधाई।बढिया प्रस्तुति।

    प्रतिक्रिया

  2. ललित शर्मा
    मई 05, 2010 @ 21:46:38

    हार ना मान कर दृढता से लगे रहना जीवटता है।
    लेकिन कभी कदम पीछे हटाना पड़ता है दृढता से कदम बढाने के लिए

    बहुत ही अच्छी रचना पद्मसिंग जी

    आभार

    प्रतिक्रिया

  3. B B UPADHYAY
    मई 05, 2010 @ 21:50:18

    bhai bahut acha likte ho vaise bhi tum kab har mane ho maja aa gaya
    thank you

    प्रतिक्रिया

  4. Raghu
    मई 05, 2010 @ 22:09:15

    लेकिन मैंने हार न मानी ….

    कभी कभी आपको पढके किधर खो जाता हूँ ये खुद ही नहीं जानता …
    और ये जानना भी नहीं चाहता … बाद पढने का आनंद ले रहा हूँ …

    बहुत सुंदर लिखा है आपने पद्म जी ..
    जो भी कहा जाये कम ही होगा इधर

    प्रतिक्रिया

  5. इंदु पुरी
    मई 05, 2010 @ 22:47:39

    अरे हार तो मानना ही नही है .किसी ने कहा भी है-
    ‘ पार उतरेगा वो ही खेलेगा जो तूफ़ान से,
    मुश्किलें डरती रही है नौजवां इंसान से ‘
    कुरुक्षेत्र है ये जीवन जहाँ हर व्यक्ति को अपना अपना युद्ध स्वयम लडना होता है.
    एक नही के चक्र-व्यों से भी गुजरना होता है और कोई कृष्ण भी साथ नही.
    पर कायरों की तरह पीठ दिखाने के लिए तुम और हम पैदा नही हुए हैं. पद्म !
    ये युद्ध हार भी गए तो भी बहादुरों की तरह लड़ते हुएही

    प्रतिक्रिया

  6. rashmi prabha
    मई 05, 2010 @ 22:48:21

    manzil usi ki , jisne haar n mani

    प्रतिक्रिया

  7. Manju Mishra
    मई 05, 2010 @ 23:00:25

    अति सुन्दर रचना !

    भाव, अर्थ और भाषा का सौंदर्य, सभी अत्यंत प्रभावशाली हैं

    प्रतिक्रिया

  8. समीर लाल
    मई 06, 2010 @ 07:11:43

    बहुत बेहतरीन…शानदार रचना.

    प्रतिक्रिया

  9. vani geet
    मई 06, 2010 @ 07:52:21

    आँखें नम थी पर मुस्काए
    रुंधे गले से गीत सुनाये…

    खुद रोकर भी दूसरों को हँसाना…यही मानवता की जीत है …और कभी हार नहीं मानने का जोश भी इन्ही दुआओं से आता है …जीवन उत्साह यूँ ही लबरेज़ रहे …शुभकामनायें …!!

    प्रतिक्रिया

  10. इस्मत ज़ैदी
    मई 06, 2010 @ 08:02:31

    बहुत ख़ूब ,आज इन्हीं हौसलों की ज़रूरत है ,इसी तमन्ना की ज़रूरत है जो आंधियों में भी दिया जलाए रख सके ,
    सुंदर और सटीक शब्दों के चयन के साथ एक जोशीली रचना,

    आप ने जब भी इन तेवरों के साथ क़लम उठाया ऐसी ही रचना अवतरित हुई ,बहुत बहुत बधाई

    प्रतिक्रिया

  11. राजीव तनेजा
    मई 06, 2010 @ 09:13:39

    प्रेरणा देती बढ़िया रचना …

    प्रतिक्रिया

  12. aradhana
    मई 06, 2010 @ 10:14:06

    बहुत अच्छी लगी कविता. जितना प्रवाह, उतना अर्थ, उतना भाव और सबसे बढ़कर इसमें से हौसलों की सुगंध आ रही है. वे हौसले, जो जीवन के कष्टों के बीच भी अपने आपको न सिर्फ़ बचाये हुये हैं, बल्कि तनकर खड़े भी हैं कि आने दो मुश्किलों को… हम भी देखते हैं कि हमसे लड़कर कौन जीत पायेगा?

    प्रतिक्रिया

  13. vaibhav singh
    मई 06, 2010 @ 13:09:29

    chacha bahut hi acchi kavita……….is time pe jaroorat thi aisi hi kavita ki……josh aa gaya wahhhhhhhhh….

    प्रतिक्रिया

  14. shivangi
    मई 06, 2010 @ 18:50:30

    सचमुच, बहुत ही प्रेरणादायक कविता.

    प्रतिक्रिया

  15. E-Guru Rajeev
    मई 06, 2010 @ 19:54:26

    हार मानने का हो भी नहीं रहा है.
    एकदम मेरी कविताओं जैसी….
    अब जब खोद ही दिए हो तो दो पंक्तियाँ हमसे भी लेनी ही पड़ेंगी.

    मैं लडूंगा मैं लडूंगा,
    जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

    कफ़न आलस का कभी ओढूं नहीं,
    कार्य करना है अभी सोचूँ यही,
    बैठे रहने से नहीं बनते किले,
    युद्धरत हूँ विजय जबतक ना मिले,
    है यही प्राण नियमों का पालन करूँगा.
    जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

    कंटकों से हो सुसज्जित मार्ग मेरा,
    हों खड़े पर्वत भी इसमें डाले डेरा,
    विद्युतों का कवच पहने हो गगन,
    चाहे रोके ज्वलित अग्नि का दहन,
    भस्म कर दूंगा उन्हें गर मैं उठूंगा.
    जीत जाऊं या मैं जाऊं हार लेकिन मैं लडूंगा.

    प्रतिक्रिया

  16. रवि कुमार, रावतभाटा
    मई 06, 2010 @ 23:02:13

    बेहतर…
    खूबसूरत भाव और शब्द प्रवंधन….

    प्रतिक्रिया

  17. satish saxena
    मई 07, 2010 @ 09:11:47

    आप इतना मधुर लिखते हैं ? शायद पहली बार ही आपको ध्यान से पढ़ा है पद्म सिंह जी क्षमा चाहता हूँ !भविष्य में पढने के लिए आपको फालो कर रहा हूँ !
    बहुत सरल , सुंदर, भावपूर्ण !

    प्रतिक्रिया

  18. सुलभ
    मई 12, 2010 @ 10:54:39

    बहुत सुन्दर….!
    मन प्रसन्न हुआ आपकी रचना पढ़कर… बहुत सुकून मिला पद्म जी.

    प्रतिक्रिया

  19. Anamika
    मई 13, 2010 @ 22:57:07

    fir to problems hi khatam na….badhe chalo…badhe chalo…veer tum badhe chalo…….:)

    प्रतिक्रिया

  20. अमर
    मई 15, 2010 @ 09:40:19

    बहुत ही सुन्दर और प्रेरक भावाभिव्यक्ति।
    हार्दिक बधाई।

    प्रतिक्रिया

  21. हिमांशु
    मई 22, 2010 @ 17:56:27

    पंक्ति-पंक्ति का सौन्दर्य निरख रहा हूँ भाई !
    कुल मिलाकर इन पंक्तियों का औदात्य है जो बाँधे है…

    “कुछ भावों के अश्रु निचोड़े
    मनुहारों के धागे जोड़े
    टूटे छंद बंद रिश्तों के
    जोड़े कुछ तोड़े कुछ छोड़े
    निश-दिन के ताने बाने में
    बुनती गई कहानी
    लेकिन मैंने हार न मानी !” ..

    ब्लॉगजगत की बहुत सी अच्छी रचनाओं के साथ खड़ी हो गयी हैं पंक्तियाँ ! मुग्ध कर दिया बंधु आपने ! श्रेष्ठ रचनाकर्म !

    प्रतिक्रिया

  22. सुमित प्रताप सिंह
    जून 06, 2010 @ 09:57:39

    सच्चे योद्धा, सच्चे क्षत्रिय कभी हार मानते भी नहीं…

    प्रतिक्रिया

  23. Onion Insights
    जून 09, 2010 @ 12:09:22

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  24. राजीव नन्दन द्विवेदी
    जून 09, 2010 @ 20:52:05

    सच कह रहा हूँ, आज बस यही कविता पढ़ने के लिए ही आया हूँ.
    पुनः कहूँगा कि यह अजर-अमर रचना है जो समय के साथ और सुदृढ़ होती जायेगी. (यदि मेरी यह टिप्पणी समझ न आये तो कोई आश्चर्य नहीं, समय आपको बताएगा. जब आप खुद के वर्षों पश्चात एक विजेता के रूप में पायेंगे तब समझ पायेंगे.)
    (अरे इसका यह अर्थ नहीं है कि आप आज विजेता नहीं हैं !!
    बल्कि अभी तो आपको बहुत सारी विजयें प्राप्त करनी शेष हैं.)

    प्रतिक्रिया

  25. sochiye
    जून 17, 2010 @ 11:22:01

    बहुत सुंदर

    प्रतिक्रिया

  26. राजीव नन्दन द्विवेदी
    जून 19, 2010 @ 00:04:34

    लेकिन मैंने हार न मानी

    प्रतिक्रिया

  27. mahendra mishra
    जून 20, 2010 @ 16:17:03

    बढ़िया प्रस्तुति …आभार

    प्रतिक्रिया

  28. satish saxena
    जुलाई 11, 2010 @ 09:05:17

    आपका लिंक न होने के कारण आपको पहले पढ़ न सका, गज़ब का लिखते हो मगर अधिक संवेदनशीलता के कारण दुनिया बहुत कष्ट देगी ! काश आप जैसे लोग थोड़ी चालाकी सीख सकें …

    प्रतिक्रिया

  29. nidhi
    जनवरी 28, 2011 @ 20:13:10

    hardness is true but it cant break u

    प्रतिक्रिया

  30. indowaves
    जून 12, 2011 @ 09:47:48

    बहुत अच्छी कविताये लिख लेते है आप !!

    -Arvind K.Pandey

    http://indowaves.wordpress.com/

    प्रतिक्रिया

  31. राजीव नन्दन द्विवेदी
    जून 22, 2015 @ 23:05:04

    जीत की चाह पीने चला आया🙂

    प्रतिक्रिया

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