हम हमेशा को एक हो जाएँ

एक पुरानी रचना दे रहा हूँ … शुरूआती दौर की रचना है …. पता नहीं कैसी लगे आपको …फिर भी देखिये …


चलो एक दूसरे में खो जाएँ
हम हमेशा को एक हो जाएँ

भटकती उम्र थक गयी होगी
नज़र पे धुंध पट गयी होगी
मन की दीवार से सुकून जड़ी
कोई तस्वीर हट गयी होगी
आओ अब परम शान्ति अपनाएँ
हम हमेशा को एक हो जाएँ

पहाड़ से उरोज धरती के
उगे हैं ज्यूँ पलाश परती के
बसे हैं सूर्य की निगाहों में
कसे है आसमान बाहों में
आओ हम मस्त पवन हो जाएँ
सारी दुनिया में प्रेम छितारायें

कई बादल झुके हैं घाटी में
शिशु सा लोट रहे माटी में
लगा है काजल सा अंधियारा
शाम की शर्मीली आँखों में
एक स्वर एक तान हो जाएँ
साथ मिल झूम झूम कर गायें
हम हमेशा को एक हो जाएँ

Posted via email from हरफनमौला

9 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    मई 03, 2010 @ 17:24:31

    एकाकार होने की चाह है तो मेरा स्व मेरा अहम् मुझे छोडता नहीं !…..अरे नहीं मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता !

    आपकी पर्ची मिल गयी है !

    प्रतिक्रिया

  2. इंदु पुरी गोस्वामी
    मई 03, 2010 @ 17:26:39

    कई बादल झुके हैं घाटी में
    शिशु सा लोट रहे माटी में
    लगा है काजल सा अंधियारा
    शाम की शर्मीली आँखों में
    एक स्वर एक तान हो जाएँ
    साथ मिल झूम झूम कर गायें
    हम हमेशा को एक हो जाएँ

    क्या लिखा है भई!
    कुछ कहिये न ??????
    कहूँ??????
    बादल शिशु सा लोट रहा माटी में???
    धुल धूसरित हो गया
    माँ हो रही है नाराज
    उसे भी मनाये
    खुद नही नहायेगा
    आओ अब पकड़ कर नहलाएं.
    काले बादलों पर जमी है धरती के धुँए और धुल की परत
    थोडा सा धोएं,पोंछे,चमकाएं
    मिलो मुझसे फिर इन बादलों के तले
    दो बनकर रहे हम तुम
    आओ आज एक हो जाएँ.

    कवि महोदय!
    भई आप जैसी कविता तो रचनी नही आती पर………………. सराहना आता है. बहुत खूब लिखते हो

    ३ मई २०१० ५:१९ PM

    प्रतिक्रिया

  3. SHEKHAR KUMAWAT
    मई 03, 2010 @ 19:00:27

    bahut khub

    jamesha ke liye ek ho jate

    प्रतिक्रिया

  4. महफूज़ अली
    मई 03, 2010 @ 20:32:27

    रचना दिल को छू गई……..

    प्रतिक्रिया

  5. E-Guru Rajeev
    मई 03, 2010 @ 20:46:07

    कई बादल झुके हैं घाटी में
    शिशु सा लोट रहे माटी में.
    दिल तो बच्चा है जी. 🙂

    प्रतिक्रिया

  6. MOHAN
    मई 03, 2010 @ 21:26:08

    रचना तो हम सबेरे पढ़ चुके, कहाँ ? क्या पहले भी बज़ाया था? हो सकता है।
    रचना अच्छी थी और बीच में उठ के चले गए टिपियाने से पहले, लौट के आए तो खो गई।
    अच्छा किया जो अभी बज़ा दिया, ठीक से पढ़ मिली।
    भाई, ज़रूरत भर रूमानी भी है, मुक्त भी और उन्मुक्त भी।
    धार लगता है बाद में आई है, कच्चा माल पहले से था आपके पास।

    और है?
    तो छापिए न!

    प्रतिक्रिया

  7. aradhana
    मई 04, 2010 @ 14:43:40

    शुरुआती दिनों में लोग बड़ी रोमैंटिक कवितायें करते हैं. मैंने भी लिखी थी कई, इधर-उधर हो गयीं.
    ये रचना बहुत ही रूमानियत भरी है. एकदम रोमैंटिक.

    प्रतिक्रिया

  8. हिमांशु
    मई 22, 2010 @ 17:47:32

    बनावट बताती है..शुरुआती कविता है !
    कई दिनों से सँजो कर रखा था फीड में .. पढूँगा ही यह सोचकर !
    शुरुआत की कविता का अपना रोमांच है..अपना रूमानीपन !
    शायद शुरुआती रूमानियत कविता ही लिखवाती है सबसे !
    मैंन भी लिखीं ..कई छुपाकर रखीं !
    बहुत खो गयीं…कुछ शेष रहीं !
    ब्लॉग ने बहुत कुछ अभिव्यक्त कर दिया है हमारा…सबको दिखाने का साहस आ गया है हममें !

    खैर! आप तो लाज़वाब हैं !

    प्रतिक्रिया

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